ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गांधी और भारतीयता के प्रश्न
02-Jul-2019 11:09 AM 146     

उन्नीस सौ नौ में गांधी ने एक महत्वपूर्ण कथन अपनी गुजराती में लिखी पुस्तिका "हिन्द स्वराज" में किया था कि अंग्रेज भी चाहें तो वे यहां रह सकते हैं, शर्त केवल एक है कि उन्हें अपनी अंग्रेजियत छोड़नी होगी। इसी पुस्तिका में उन्होंने यह भी कहा कि पाश्चात्य सभ्यता जन्यों की लूट-खसोट और शोषण पर टिकी होने के कारण राक्षसी है। कुछ लोगों ने इसका अनुवाद शैतानी कहकर भी किया है। इसका अर्थ यही कि अपने शोषक और दमनकारी चरित्र के कारण पश्चिम की सभ्यता मानव विरोधी है। अत: भारत जैसे मुल्कों में इसका स्वागत और समर्थन नहीं किया जा सकता।
इस संदर्भ की व्याख्या में जाएं तो बहुत सारे अर्थ निकलेंगे। खुद राक्षस और शैतान शब्द भारत की अपनी संस्कृति के लिए नए नहीं हैं। लेकिन आधुनिक भारत के सन्दर्भ में जब हम अमेरिका आदि पूंजीवादी देशों और उनके विश्वव्यापी बहुराष्ट्रीय निगमों को देखते हैं, तो यह अनुभव करने में कठिनाई नहीं जाती कि भारत और पश्चिम की सभ्यताओं में कितना फर्क है। ईस्ट इण्डिया के जमाने से लेकर आज तक का सारा उद्योग व्यापार, आर्थिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद भारत के लोगों के बुनियादी चरित्र को बदलने में कामयाब हुए हैं और अब यह कह पाना मुश्किल है कि यहां पैदा होते लोग सचमुच कितने भारतीय रह गए हैं। अब तो यह अपेक्षा भी शायद अनुचित और अपराधपूर्ण मानी जाये कि हममें अन्य राष्ट्र-राज्यों की तुलना में अधिक उदारता और विश्व बंधुत्व होना चाहिए। वह दया, करुणा और क्षमा भाव भी जिसके लिए हम जाने जाते रहे हैं।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हमारी इस समस्या को समझने की एक कोशिश कभी की थी- "हे मोर चित्त एई पुण्यतीर्थे जागो रे धीरे, एइ भारतेर महा मानवेर सागर तीरेे" वाले अपने गीत में उन्होंने हमें उस नयी भारतीयता का साक्षात्कार कराने की कोशिश की है, जिससे कि हम स्वाभाविक उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने यह संकेत भी किया है कि हम अपनी जड़ों को या निखालिस अथवा ठेठ भारतीयता को अगर खोजना भी चाहें, तो अब यह संभव नहीं रह गया है। हजारों सालों से हमने जो अनुभव किए हैं, जितनी जातियों के सम्पर्क में आते रहे हैं, उनके साथ हमारे इन सम्पर्कों और संवादों के चलते हमने इतने सारे जो लेन-देन किए हैं, उनके चलते हमारे कुछ के कुछ नहीं हुए हैं, वे भी इसी महामानवों के सागर में घुल-मिलकर इसकी स्वाभाविक तरंगों का हिस्सा बन चुके हैं।
यह एक कठोर ऐतिहासिक सच्चाई है और इससे हम इनकार नहीं कर सकते। इसलिए भारतीयता को लेकर जो शुद्धता और पवित्रतावाद की दुष्टि अपनाना चाहते हैं, उनको इस विचारभूमि पर चलने में परेशानी का अनुभव करेगा, तब भारतीयता का यह पद उनके लिए काफी असमंजसपूर्ण हो उठेगा कि वे इसे अपने सदंर्भ में ग्रहण और मंजूर करें भी या नहीं। वे शायद पौराणिकों की हिन्दूवादी दृष्टि अपनाएं और उन्हीं की संकरी अवधारणाओं में कैद होकर रह जाएं।
जवाहरलाल नेहरू ने जरूर इस समस्या से निपटने के लिए एक पद की तलाश की और कहा कि यह देश और यहां के लोग सामाजिक जीवन प्रवाह में विश्वास करने वाले लोग रहे हैं और ऐसा वे सदियों से करते आ रहे हैं। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि हम भारतीयों की संस्कृति, सामासिक अथवा कम्पोजिट है। "संस्कृति के चार अध्याय" लिखते हुए कविवर दिनकर ने भी अपनी सहमति इसी अवधारणा के प्रति प्रकट की और यह कहा कि समकालीन भारतीय संस्कृति को इन अनेक मोड़ों के बगैर देखना मुश्किल होगा। वैदिक प्रस्थानों के बाद अवैदिक कहे जाने वाले बौद्धों और जैनों के बाद उन्होंने इस्लाम और ईसाइयत को भारतीय संस्कृति की पहचान निर्मित करने वाले कारकों के रूप में देखा और कहा कि भारतीय संस्कृति के यही चार अध्याय हैं। इसलिए भारतीयता की खोज और पहचान की कोई कोशिश इन चारों से गुजरे बगैर किसी भी स्थिति में संभव न होगी।
यहां मैं दो अन्य महान कवि-चिन्तकों की याद भी करना चाहता हूं, जिनमें से एक हैं सर डॉक्टर मुहम्मद इकबाल और दूसरे हैं हिन्दी कवि और नाटककार जयशंकर प्रसाद। इकबाल ने "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" वाली जो नज़्म लिखी है, उसमें समस्त भारतीयों को उन्होंने इस गुलिस्तान की बुलबुलों के रूप में देखा है। हमारी अपनी सभ्यता को प्राचीनता, अपराजेयता और कालजयिता की ओर भी उन्होंने साफ इशारे किए हैं। पर जो सबसे बड़ी बात है वो यह कि हम हिलमिल कर रहने की कला जानते हैं और दूसरों को यही सिखाते भी हैं।
जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक स्कन्दगुप्त और चन्द्रगुप्त में अलग-अलग प्रसंगों में दो गीत लिख हैं। स्कन्दगुप्त में जो गीत है वो समवेत गायन के लिए है और जिसमें भारत के गौरव और भारत की महिमा का सविस्तार वर्णन किया गया है। प्रसाद ने इसमें जिन गुणों का गान किया है, उसमें इकबाल की तरह भारत की प्राचीनता भी है। किन्तु इससे भी कहीं अधिक भारतीय मेधा की उत्कृष्टता और भारतीय मनुष्य के चमत्कारी पुरुषार्थों की याद भी की गई है। उस गीत में अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों के जीवन में हमारे प्रदेशों की भी ब्यौरेवार चर्चा है। उदाहरण के लिए उन्होंने चीन-जापान आदि देशों में गए बौद्ध धर्म को भारत द्वारा दी गई धर्म-दृष्टि कहा है। ज्ञान-विज्ञान में तो प्राचीन भारत सबसे आगे रहा ही है। इन्हीं प्रसाद ने चन्द्रगुप्त नाटक में एक गीत सेल्युकस की पुत्री कार्नेलिया के मुंह से गवाया है। उसकी शुरुआती कुछेक पंक्तियां याद आ रही हैं-
अरुण यह मधुमय देश हमारा,
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता - एक सितारा
अनजान क्षितिजों को सहारा देने का काम यह देश हमेशा से करता रहा है।
बीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में छपकर आए कमलेश्वर के बहुपठित उपन्यास "कितने पाकिस्तान" के अंतिम पन्नों से गुजरते हुए हम दो तरह के एहसासों से भर उठते हैं। पहला तो बेहद वितृष्णापूर्ण और भयावना है, जिसमें पश्चिम की तिज़ारती सभ्यताओं ने व्यापार के नाम पर हमें बुरी तरह लूटा-खसोटा और लगभग बर्बाद कर दिया। पर दूसरा एहसास हमें आत्मगौरव से भर देता है, जब हम यह पढ़ते हैं कि हमारे पुरखे भी आस-पड़ोस के मुल्कों में गए पर बोधिवृक्ष और ज्ञान का दिया लेकर। बारूद लेकर तो कदापि नहीं। इसलिए हमने दुनियाभर में अहिंसा, करुणा और प्रेम का संदेश दिया। विपरीत इसके पश्चिम के देशों ने पूरब के देशों और संस्कृतियों से उनका स्वत्व तक छीनने की भरपूर कोशिशें कीं, जो गांधी जी ने भी किया।
जिन दिनों भारत को जानने के ख्याल से मैं वैदिक साहित्य में उस काल की समाज और राज-व्यवस्था की जानकारी इकट्ठी कर रहा था। मुझे दो अत्यन्त केंद्रीय शब्द मिले। ॠत् और सत्। ॠत् तो ब्रह्माण्ड-व्यवस्था (कॉस्मिक आर्डर) का ही दूसरा नाम है। हमारे उन दिनों के पुरखों ने अपनी सामाजिक और धार्मिक चेतना का विकास इसी व्यवस्था को देखते और समझते हुए किया। पर वह समय भी आया जब हमारे पुरखों का दंभ अनियंत्रित हो उठा और हमारी रची दुनिया प्रलय में डूबने लगी। इसी का चित्रण करते हुए कामायनी के कवि प्रसाद ने लिखा- "प्रकृति रही दुर्जेय पराजित हम सब थे डूबे मद में।" प्रसाद ने उसी कामायनी में यह भी दिखाया कि किस तरह हमने स्वाभाविक और सहज का पथ छोड़ अतियों का रास्ता अपनाया और प्रलय के शिकार हुए। ॠत् की सारी अर्थवत्ता को तभी तो इसी नैसर्गिकता में खोजने की सलाह दी गई है। ॠतुओं और मौसमों का आना-जाना, सूरज और चन्द्रमा की गतिविधियां, फसलें फूल और फल, यहां तक कि हमारा अपना जीवन भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। हम न तो अकेले हैं, न हो सकते हैं। हमारे होने में सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का योगदान है इसलिए यह दम्भ नहीं पाला जा सकता कि कुछ भी और कोई भी नहीं होगा तब भी हम होंगे। यह सोच ही भ्रमपूर्ण और निराधार है। बल्कि एक बहुत बड़ा मुगालता है। असत्य है। ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का अपने विधान के अंतर्गत चलना ही सत्य है।
भारत के लोगों के मन में इस व्यवस्था के प्रति हमेशा निष्ठा रही आई है। उनकी समाज-व्यवस्था और राज-व्यवस्था के ढांचे के पीछे भी कहीं इन बातों का कोई योगदान रहा है। इसी के पालन को यहां धर्म कहा गया।
आज धर्म को लेकर हमारी धारणाएं भी बदली हैं और सोच भी। हमारी राज-व्यवस्था ने अपने को धर्म से निरपेक्ष कर लिया है। इसके कारणों में जाने की जरूरत इसलिए है कि धर्म के मूल अर्थ से हम दूर चले आए हैं। हमें याद रखना होगा कि भारत में धर्म का मतलब मानवीय सदाचरणों से है। इसलिए मोटे तौर पर कह दिया गया कि धर्म वही है, जिसे धारण करने योग्य माना जाये। तभी किन्हीं विकट स्थितियों में पहुंच यह भी कहा गया- अहिंसा परमो धर्म:।
सोचता हूं यदि पूजा-पाठ, नैवेद्य, बलिदान या कुर्बानी किसी देवी-देवता के चरणों में बैठना ही धर्म है तो फिर तो रावण से बड़ा धार्मिक कौन है? हमारे अपने समय में तमाम चोर-लुटेरे, डकैत और यहां तक कि इनकम टैक्स चोर भी, तमाम घूसखोर और भ्रष्टाचारी लोग पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन में डूबने का दिखावा करते हैं। क्या भारतीय मानस इन सब क्रियाओं को धार्मिक मान लेने को कभी तैयार होगा। निराला की कविता "राम की शक्तिपूजा" की ही यह पंक्ति है- "रावण अधर्मरत भी अपना मैं हुआ अपर, यह रहा शक्ति का खेल समर शंकर शंकर।"
भारतीय मन ने ऐसे किसी भी पूजा पाठी मन को धार्मिक नहीं माना। धर्म की असली पहचान तो उसकी मनुष्यता में है। पश्चिम में भले ही वह चर्च के अधीन या उसके हाथ में एक प्रलोभनकारी ताकतवर सत्ता के रूप में रहा हो और एक समय तक उसने अपने ही अनुयायियों का भरपूर दमन किया हो पर यहां तो धर्म का यह रूप और ऐसा अर्थ कभी मंजूर नहीं किया गया। उलटे यह कहा गया कि - "परित्राणय साधूनाम विनाशायश्च दुष्कृताम/ धर्म-संस्थापनार्थाय संभवामि युगे - युगे।"
धर्म वह है जो दुष्टों का विनाशकर भद्र नागरिक समाज को उनके अत्याचारों से मुक्ति दिलाता है। इसलिए धर्म अन्याय और अत्याचार विरोधी चेतना का ही दूसरा नाम है। राम और कृष्ण, गौतम बुद्ध और महावीर, कबीर, सूर-तुलसी, गांधी आदि इसीलिए तो याद किए जाते हैं कि उन्होंने धर्म के इस स्वरूप की रक्षा के लिए अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाईं। आज अगर हमारे नेशन-स्टेट इण्डिया के सन्दर्भ में धर्म इतना गर्टित और वर्जित शब्द हो गया है तो उसका कारण यह पारंपरिक धारणा नहीं है, बल्कि पूजा-घरों और पूजा पद्धतियों से जुड़ी अर्थवत्ताएं हैं, जो धर्म को एक संकरे साम्प्रदायिक अर्थ में तब्दील कर चुकी हैं। आश्चर्य यह कि हम फिर भी जब-तब यह पंक्ति गाते हैं- मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। "अंग्रेजों से पहले का भारत" शीर्षक अपनी ऐतिहासिक व्याख्यान माला में सुप्रसिद्ध गांधीवादी समाज-विज्ञानी धर्मपाल ने इन भटकावों पर चिन्तन करते हुए कहा- "मुझे लगता है कि हमारा समाज और हमारी राज्य व्यवस्था जिस तरह की दो अलग-अलग दुनियाओं में बंटती जा रही है, उसके पीछे गहरे और दार्शनिक कारण हैं। शायद भारत के लोगों का चित्त और इसके आधार पर जो निजी संसार उन्होंने बनाया है, वह एक ऐसी दुनिया से मेल नहीं बैठा सकता, जिसमें वर्गों और क्षेत्रों के बीच एक अनिवार्य विद्वेष रहता हो।"
धर्मपाल की इस सोच से यह तो पता लगता ही है कि डेढ़-दो सौ सालों की परतंत्रता ने हमें भीतर से काफी कुछ बदल डाला है और आज उससे उबरना इतना आसान नहीं रह गया है। लेकिन हमारी बेचैनियां फिर भी जारी हैं और हम अपनी धुरी पर लौटने की इच्छा से भरे हुए हैं। भारतीयता का प्रश्न इसी इच्छा से जुड़ा हुआ है। लेकिन यह इच्छा जितनी उत्कट, प्रिय और सगी लग रही है, इसका साकार या फलवती होना उतना ही कठिन और चुनौतीपूर्ण भी है।
आज यह सवाल और भी मुश्किल तलब हो उठा है, क्योंकि हम एक और नए और पहले से अधिक मक्कार और मायावी संजाल में फंस चुके हैं। एक ऐसी धूर्त विश्व-व्यवस्था के शिकंजे में फंस चुके हैं, जिसका उस ब्रह्माण्ड-व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है, जिसमें सत् और ॠत् केन्द्र में थे। इस व्यवस्था का केन्द्र सिर्फ मुनाफा है। काशीनाथ सिंह जैसे लेखकों की मानें तो यह व्यवस्था गाय की उस खुरदुरी जीभ की तरह है, जो प्यार करने के बहाने चाटना शुरू करके हमारा अस्तित्व ही समाप्त कर देगी। न केवल हम भारत के लोगों का बल्कि उन तमाम मुल्कों का जो इसकी चपेट में हैं।
टेक्नोलॉजी और विकास की जो शुरुआती इबारतें यहां लिखी जा रही हैं, उनका भयावह परिणाम हम देशजता के लोप में देख रहे हैं। प्रकरण ही नहीं आदिवासी और वनवासी बिफरे हुए हैं। स्थानीय और आंचलिक बोलियां अस्मिता की लड़ाई लड़ रही हैं। नगरों, महानगरों, शहरों और कस्बों से दूर की नागरिक बस्तियों की भवें तनी हुई हैं और उनके माथे पर बल पड़ने लगा है। यह राष्ट्र एक अघोषित सांस्कृतिक बंटवारे की जद में आ चुका है, जिसमें एक तरफ इण्डिया होगा तो दूसरी तरफ बचा-खुचा, दबा-कुचला और हर तरह से छला गया भारत। एक ऐसा भारत जिसमें अपनी पारंपरिक कारीगरी और सहज सृजनशीलता से वंचित वे शिल्पी, कारीगर और मेहनतकश लोग होंगे, जिनके हक उन लोगों द्वारा बेरहमी से छीने जा चुके होंगे, जो इण्डियावासी हैं। ये ही लोग विकास का फायदा लूटने वाले लोग होंगे और उस उत्तर आधुनिक टेक्नोलॉजी के गुलाम भी जो देर-सवेेर बाजार के इशारों पर जीते-जागते रोबोट में बदल चुके होंगे। टेक्नोलॉजी और उसे अपनी मुट्ठी में रखने वाला बाजार ही हमारा सबसे बड़ा ईश्वर होगा। एकदम आधुनिकतम प्रभु।
भारतीयता का अर्थ अगर स्वदेश में स्वाधीन होकर रहना है तो इसकी संभावनाएँ दिन-प्रतिदिन खत्म होती जा रही हैं। विश्व व्यवस्था वाले प्रसारवादी हिंसक बाजारों को भला यह क्यों मंजूर होगा कि आप भी अपनी स्वाधीन सृजनशीलता से काम लें। ऐसा करने पर तो उनका मकसद ही पूरा नहीं होगा और उनकी लुटिया ही डूब जाएगी। विश्व व्यवस्था, जिसे आप-हम ग्लोबलाइजेशन कहते हैं, इसका सबसे पहला और आक्रामक हमला हमारी देशजता और स्थानीयता पर हो रहा है। हमारे स्वदेशी खान-पान, बोली-बानी, उठने-बैठने के हमारे तौर-तरीके धीरे-धीरे गायब होने लगे हैं और इण्डिया में रहने वाले इसे आधुनिकता का मतलब क्या पिछलग्गूपन, नकल और सृजनशून्य हो उठना है? क्या हम खुद अपनी आधुनिकता नहीं रच सकते? अगर ऐसा न हुआ होता तो यहां स्वदेशी का आन्दोलन ही क्यों चलाया गया होता। वह हमारी सबसे जबरदस्त भारतीयता थी, जिसका बौद्धिक नेतृत्व गांधी ने किया जो राष्ट्रपिता कहलाए। इसलिए भारतीयता वाले सवाल पर हमें निकट के इतिहास पर भी नजर डालने की जरूरत है। इससे हमारी आँख के जाले साफ होंगे और रास्ता दिखाई देने लगेगा।

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