ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गाँधी और उनके आलोचक
01-Jun-2019 12:47 AM 158     

गाँधी, दुनिया के उन बिरले लोगों में हैं जिन पर सबसे ज्यादा जीवनियाँ लिखी गयी हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब दो सौ जिनमें आधे से ज्यादा दुनियाभर के प्रतिष्ठित लेखकों, पत्रकारों द्वारा लिखी गयी हैं। हिन्दुस्तान में यह सम्मान अन्य किसी को प्राप्त नहीं है। लेकिन एक अन्तर है। जहाँ विदेशी जीवनियों का स्वर थोड़ी-बहुत नुक्ताचीनी के साथ इस आस्था के आस-पास घूमता है कि "आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही यकीन कर पाएँ कि हाड़-मांस का ऐसा व्यक्ति भी इस धरती पर हुआ था" (आइंसटाइन)। भारतीय टीकाओं में आलोचना का स्वर ज्यादा तीखा है। इतिहास-समाज-सापेक्ष आलोचना की पद्धति में इसमें कुछ बुरा भी नहीं है लेकिन जब जाति-संप्रदाय के अवैज्ञानिक पूर्वाग्रहों से त्रस्त होकर इतिहास पुरुषों पर व्यक्तिगत भावनाओं के बोझ तले फतवे और निष्कर्ष निकाले जाएँ तो न हम इतिहास के प्रति न्याय कर रहे होते हैं न समाज के।
पिछले एक दशक से इतिहास के साथ, विशेषकर आजादी के इतिहास के साथ, ऐसी ही छेड़छाड़ की जा रही है। आजादी के सारे नायक-महानायकों को बाँट-बाँटकर सिलसिलेवार ऐसे धोबीबाट पर पीटा जा रहा है कि अर्थ और अनर्थ दोनों बेमानी लगने लगते हैं। प्रजातंत्र की राजनीति में केवल संख्या सबसे महत्त्वपूर्ण है वह चाहे मूर्खों की हो या विद्वानों की और राजनेता का लक्ष्य यदि उसी संख्या पर है तो इसमें कोई खास बुराई नहीं है। बुराई तब है जब ऐसे पूर्वाग्रहों के प्रति सचेत करने वाले तथाकथित लेखक, बुद्धिजीवी जाने-अनजाने अपने तर्कों-कुतर्कों के खेल के बूते इन्हीं पूर्वाग्रहों को और मजबूत बनाते हैं। बल्कि ये ज्यादा बड़े अपराधी हैं क्योंकि तथ्यों की आड़ में गलत तथ्यों से बुने इनके निष्कर्षों के बूते ही राजनीति प्रजातंत्र की संख्या का खेल खेलते हैं। सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, बाबा साहेब अम्बेडकर, विवेकानन्द से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर, निराला, प्रेमचन्द्र इसी शतरंज के खेल में शामिल कर लिए गए हैं। गाँधी को भी इससे नहीं बख्शा गया है। बल्कि और ज्यादा ही, कभी मजे ले-लेकर तो कभी परपीड़क मुहावरों के साथ। कभी-कभी लगता है कहीं ये सारी कोशिशें इन सभी महापुरुषों को पत्थरों में बदल देने को तो नहीं है या मनमर्जी पत्थर के निजी भगवानों द्वारा बेदखल करने की।
असफलता उतने दुश्मन नहीं बनाती जितनी सफलता। गाँधी की आलोचना की कहानी गाँधी के उत्थान की कहानी के साथ-साथ चलती रही है और इसी अनुपात में असहमति के बिन्दु भी। गाँधी अपनी कार्यशैली में एक करिश्मा जरूर लगते हैं किन्तु उनका उत्थान इतना सीधा-सपाट नहीं रहा। उन्हें निरंतर प्रश्नचिह्नों का सामना करना पड़ा। स्वयं कस्तूरबा उनकी सफाई की धारणा, मल साफ करने से लेकर आभूषण-त्याग तक बहुत धीमे-धीमे ही गाँधीमय हो पायीं। उनके बच्चों तक ने उन्हें एक क्रूर पिता और पति के रूप में देखा। वर्णव्यवस्था के पक्षधरों ने तो उन पर जानलेवा हमला तक किया। अम्बेडकर और जिन्ना तो खुलकर सामने आए ही। यही स्थिति काँग्रेस के अन्दर पनपे समाजवादी धारा के नवयुवकों की थी। क्योंकि उनके आस-पास जुड़ आया समाज बहुत ही व्यापक रहा है, अतः आलोचना-असहमति के बिन्दु भी अनगिनत खोजे जा सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं- 1. जाति-व्यवस्था के समर्थक के रूप में, 2. हिन्दू धर्म के कट्टर अनुयायी के रूप में और 3. अव्यावहारिक सिद्धान्तकार के रूप में। आइए एक-एक करके इन मुद्दों पर विचार करते हैं।
क्या गाँधी जी मौजूदा जाति-व्यवस्था के हिमायती थे और उनके उपवास-अनशन सामाजिक सुधार की महज औपचारिकता? यह सही है कि दक्षिण अफ्रीका के वापसी के आरंभिक वर्षों में वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति उनका रुख कुछ दुविधापूर्ण या रोमनी लगता है। किन्तु यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि ये उनके विश्वास के अनुसार सुदूर अतीत की व्यवस्था के बारे में हैं न कि जैसी वह उनके समय में बन गयी थी उसके बारे में। उन्हें लगा कि अपने प्रकट दोषों के बावजूद इस प्रणाली में उथल-पुथल के उन युगों में बाहरी दबावों को सीख लेने का काम किया था और हिन्दू समाज को ऐसा लचीलापन प्रदान किया जिसमें करोड़ों लोग शासक, राजवंशों की उठापटक से परे बेखबर अपना जीवन जीते रह सके। समय के साथ आई रूढ़ता, कर्मकाण्डीय भावना और अनेक प्रकार के निषेधों ने इस प्रथा को विरूपित कर दिया। भारत के सामाजिक परिदृश्य को प्रत्यक्ष और निकट से देखने पर उन्हें विश्वास हो गया था कि अन्धविश्वासों, सामाजिक विषमताओं ने इस प्रथा को इतना सड़ा दिया है कि वह सुधार के लायक नहीं रह गये हैं। इसके बाद उनका रुख लगातार सख्त होता गया। उन्होंने घोषणा की कि शास्त्रों में वर्णित वर्णश्रम व्यवस्था आज व्यवहार में अस्तित्वहीन है। आज की जाति प्रथा वर्णाश्रम से एकदम उलट। सार्वजनिक राय से इसे जितनी जल्दी समाप्त किया जाए तो उतना ही अच्छा है। उन्होंने इस विचार का खंडन किया कि छुआछूत हिन्दू संस्कृति का एक अनिवार्य अंग है। उन्होंने कहा, यह एक महामारी है जिससे लड़ना हर हिन्दू का परम कर्तव्य है। यदि भारत एक है तो निश्चय ही इसमें ऐसे कृत्रिम विभाजन नहीं होने चाहिए जो न एक-दूसरे के साथ बैठकर खाना खा सकें और न परस्पर विवाह कर सकें। 1946 में गाँधीजी ने एक चौंका देने वाली घोषणा की कि उनके सेवाग्राम स्थित आश्रम में कोई विवाह संस्कार तय तक नहीं किया जाएगा जब तक वर-वधू में से एक जन्म से अछूत न हो। इन्हीं विश्वासों का असर था कि 1932 में इस समाचार ने कि गाँधी जी उपवास करने वाले हैं, एक कोने से दूसरे कोने तक पूरे भारत को हिला दिया। 20 सितम्बर, 1932 जिस दिन उपवास प्रारंभ हुआ देश-भर में उपवास और प्रार्थना दिवस के रूप में मनाया गया। मंदिरों, कुओं और सार्वजनिक स्थानों को अछूतों के लिए खोल दिया गया। सवर्ण हिन्दुओं और अछूतों का एक सम्मेलन पूना में बुलाया गया जिसका उद्देश्य एक वैकल्पिक निर्वाचन व्यवस्था की खोज करना था जो अंग्रेजों के साम्प्रदायिक निर्णय के उन प्रावधानों का स्थान ले सके। आगे चलकर यही पीठिका इन वर्गों के लिए आरक्षण का आधार बनी। यदि गाँधी जी ने 1932 में उपवास रखकर पूना समझौते के द्वारा बदला न होता तो सम्भवतः मुस्लिम अलगाववाद और रियासतों के हठपूर्ण रवैये के कारण पहले से ही दुरूह बनी 1946-47 की बातचीत अनुसूचित जातियों की समस्या के अतिरिक्त भार से और उलझ जाती। दुर्भाग्य से आजादी के बाद गाँधी के नाम पर वोट बटोरनेवाले शासकवर्ग ने ऐसे आरक्षण को महज सत्ता हथियाने का औजार ही बना डाला है। सामाजिक बराबरी का जो स्वप्न गाँधी जी ने इस रास्ते से देखा था वह मौजूदा शासकों के रहते शायद ही कभी साकार हो पाए। हाँ, इतना जरूर है कि इस असफलता का ठीकरा गाँधी के सिर पर जरूर फोड़ा जाता है।
दूसरा प्रमुख आरोप उन्हें हिन्दू धर्म के कट्टर अनुवायी के रूप में देखना है। वैचारिक समीक्षा के क्रम में जब से भाजपा ने गाँधी के पक्ष में खड़ा होना शुरू किया है तब से यह सिद्धांत/आरोप और भी तेजी से मान्यता पा रहा है। काफी कुछ गड़बड़ी इस तथ्य के कारण भी हुई है कि गाँधी जी की धर्म संबंधी अवधारणा का कर्मकाण्डों, अंधविश्वासों और हठवादों के साथ बहुत ही कम मेल था। गाँधी जी का धर्म दैनिक जीवन को चलाने के लिए आवश्यक एक नैतिक ढाँचा मात्र था। निःसंदेह गाँधी जी गहन रूप में धार्मिक थे और सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकारने में उन्हें कभी यह बात धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध नहीं लगी। मौजूदा सत्तासीन राजनेताओं के विपरीत जो दैनिक जिंदगी में तो कई कर्मकाण्डों, धर्मों के जनेऊ पहने हैं किन्तु सार्वजनिक रूप से धर्मनिरपेक्षता का त्याग रचने में उन्हें कोई शर्म नहीं आती। गाँधी धर्म को एक व्यक्तिगत प्रवृत्ति के रूप में देखते थे। उन्होंने कहा भी था कि यदि भारत की पूरी आबादी एक ही धर्म को मानने वाली होती तब भी वे राजकीय धर्म के किसी भी प्रस्ताव का विरोध करते। गाँधी जी की आलोचना उनके द्वारा प्रयुक्त प्रतीकों में खोजी जाती है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान के पक्षधरों ने रामराज्य के मुहावरे को लेकर बहुत तमाशा बनाया। गाँधी जी के लिए अंग्रेजी शब्द "यूटोपिया" के करीब था जिसका प्रयोग वे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का लक्ष्य बताने के लिए करते थे। उनका लक्ष्य प्राचीन काव्य रामायण में वर्णित रामराज्य की स्थापना नहीं बल्कि असमानता, अन्याय और शोषण से मुक्त राज्य की स्थापना था। इसी प्रकार स्वराज, सर्वोदय, अहिंसा और सत्याग्रह जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी मुस्लिमलीग ने मुसलमानों को राष्ट्रीय संघर्ष से काट देने में किया। उनकी प्रार्थना-सभाएँ भी किसी मंदिर में न होकर खुले आकाश के नीचे होती थी और उन्होंने हिन्दू-मूसलमान, ईसाई, पारसी और बौद्ध धर्म ग्रन्थों के पाठ इनमें शामिल करके इन्हें धार्मिक सामंजस्य का प्रतीक बना दिया था। प्रार्थना के तुरंत बाद ये देश के सामने उपस्थित समस्याओं पर बोलते थे। साबरमती, सेवाग्राम स्थित उनके आश्रम सांसारिक जीवन से पलायन की शरणस्थली के बजाय समाज सेवा, ग्रामीण विकास, प्राथमिक शिक्षा, छुआछूत उन्मूलन के केन्द्र बने। इसे आज के अन्य सैकड़ों आडम्बरी बाबाओं, आश्रमों के संदर्भ में रखकर देखिए तो गाँधी जी के धर्म और समाज की अवधारणाओं का अंतर साफ समझ में आ जाएगा। गाँधी का धर्म घर और बाहर के लिए अलग नहीं था और न ही वे उसे मौजूदा राजनीतिज्ञों की तरह अवसरवादिता के तहत इस्तेमाल ही करते थे। जिन्ना और मुस्लिमलीग के बार-बार आरोपों के बावजूद भी उनकी आस्था इन प्रतीकों के बारे में तनिक भी नहीं डोली क्योंकि इनका संदेश अनिवार्यतः नैतिक, मानवतावादी और सवमान्य था। उनके जीवनीकार लुई फिशर ने जिन्ना और गाँधी के विरोधाभाषों को लक्ष्य करके लिखा है- "जिन्ना ने जो आरंभिक वर्षों में एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी के रूप में सामने आया था और जिसे प्रकटतः धर्म में बहुत कम रुचि थी- धर्म-आधारित राष्ट्र (पाकिस्तान) की नींव डाली जबकि पूरी तरह धर्मनिष्ठ गाँधी ने एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना के लिए काम किया।"
गाँधी जी पर तीसरा आरोप उनके "वाद" या "सिद्धांतों" की अव्यावहारिकता को लेकर लगाया जाता है। न केवल आज बल्कि उनके जीवन-काल में भी उनके निजी मित्र और अनुयायी तक उनके तरीकों से भौंचक्के रह जाते थे। उनके डाँडी मार्च आंदोलन को कुछ लोगों ने "समुद्री पानी को केतली में" उबालकर अंग्रेज सम्राट को पदच्युत करनेे का बेहूदा एवं अव्यावहारिक विचार माना। स्वयं जवाहर लाल नेहरू ने गाँधी जी के 1932 में आमरण अनशन को "एक गैर महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए आहुति देना" माना था। खादी और चरखे को लेकर भी नेहरू जी बहुत बाद में गाँधी जी से सहमत हो पाएँ। जनता की ताकत को गाँधी जी ने सबसे बेहतर ढंग से समझा था और इसीलिए दूसरों को उनके सामाजिक लक्ष्यों को समझना मुश्किल होता था। यहाँ तक कि जो आलोचक साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी आन्दोलन के नेता के रूप में गाँधी जी की भूमिका को ऐतिहासिक मानते हैं ये भी उनके सामाजिक दृष्टिकोण को समझने में गलती कर जाते हैं। गाँधी जी के खिलाफ मशीनीकरण को लेकर काफी बातें कही जाती हैं। गाँधी जी मशीनों के विरुद्ध नहीं थे बल्कि उस व्यवस्था के विरुद्ध थे जो बेरोजगारी पैदा करे, ग्राम केन्द्रित शिल्पों को बरबाद करे और नगरों को शोषण की दुर्दांत व्यवस्था के रूप में स्थापित करे। गाँधी जी के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था की मूलभूत समस्या गाँवों में व्याप्त दीर्घकालीन बेगारी है और इसका निदान पश्चिमीकरण के औजारों से सम्भव नहीं है। उनका दृढ़ विश्वास था कि चुनाव पूँजीवाद और समाजवाद के बीच नहीं बल्कि केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण के बीच है। क्या ये प्रश्न आज भी उतनी बड़ी विकरालता के साथ मौजूद नहीं है? जैसा कि शुरू में कहा गया है, उन पर लगाये गये आरोपों का कोई अन्त ही नहीं है किन्तु फिर भी एक और आरोप उन पर बार-बार लगता रहा है और वह है पूँजीपतियों के साथ साठगाँठ का, कि ये सारी उम्र विरला, बजाज जैसे बड़े-बड़े पूँजीपतियों के साथ खाते रहें, कि उन्होंने किसानों, गरीबों और धनियों के बीच के संबंधों में कोई परिवर्तन भारत में नहीं होने दिया। यह एक असंगत धारणा है। गाँधी जी के अस्त्र थे सत्य, अहिंसा और इन्हीं के द्वारा वे सामाजिक संबंधों को पुनःव्यवस्थित करने की वकालत करते रहे। ऐसा नहीं है कि पूँजीपतियों के बारे में उन्हें कोई गलतफहमी थी किन्तु समस्त पूँजीवादी प्रणाली को दुष्ट मानकर उसे हिंसक क्रान्ति से नष्ट करने के तौर-तरीकों से वे पूरी तरह सहमत थे। पूँजीपतियों की मदद और उनके सिद्धांत अनेक बार आपस में टकराये। एकाध घटना का जिक्र उचित रहेगा। 1915 में भारत वापस आने पर अहमदाबाद में जो पहला आश्रम उन्होंने स्थापित किया उसमें एक अछूत परिवार को रखा गया। इस मुद्दे पर अहमदाबाद के धनी व्यापारी जिन्होंने आश्रम के लिए मदद की थी वे बिगड़ उठे। विरोध में कुछ साथ भी छोड़ गये। किन्तु गाँधी जी टस से मस नहीं हुए। ऐसा ही विरोध 1920 में हुआ था जब गाँधी जी ने अंग्रेजों के विरुद्ध अपना असहयोग आंदोलन आरंभ किया, तो भारतीय मिल मालिकों के लगभग पूरे वर्ग ने एक संस्था बनाकर उनका विरोध किया था।
यह सभी जानते हैं कि गाँधी जी बहुत अधिक लिखते थे और अपने विचारों को फैलाने के लिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में अनेक पत्रिकाओं को शुरुआत और संपादन किया। लेकिन इन पत्रिकाओं को उन्होंने कभी व्यापार नहीं बनाया। ये कोई विज्ञापन स्वीकार नहीं करते थे और उनकी दृढ़ मान्यता थी कि पत्रकारिता एक पेशा है, व्यवसाय नहीं। मौजूदा वक्त में हमारे संस्कृति-कर्मी और अन्य रचनाकारों को साधन और साध्य के संदर्भ में गाँधी जी के उदाहरण को समझने की जरूरत है।
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इनमें से अधिकांश आलोचक अपनी नाल वामपन्थ से जुड़ी घोषित करते हैं। इसे दुःखद तथ्य हो कहा जाएगा कि वामपन्थी विचारकों का रवैया शुरू से ही किसी-न-किसी बहाने गाँधी-विरोधी रहा है। जो वाम जनवाद का नारा अपने जन्म से देता आ रहा है वह गाँधी जी की टक्कर का तो छोड़ो उनके चौथाई कद का भी कोई नेता न आजादी के पहले पैदा कर पाया न बाद में। रूस, चीन की आयातित विचारधारा शुरू से ही उन पर हावी रही है। उनकी शब्दावली में गाँधी के लिए प्रतिक्रियावादी, बुर्जुवाई हितों का रक्षक, समझौतापरस्त जैसे विशेषण बेशुमार भरे पड़े हैं। कांग्रेसी फटे दूध से निकले सामाजिक न्याय की छाछ के साथ संकर प्रजनन का परिणाम बस इतना हुआ है कि फिलहाल ये गाँधी जी के मामले में चुप हैं। सार्वजनिक रूप से गलती उन्होंने अभी भी स्वीकार नहीं की, जैसी कि वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, विभाजन, चीन युद्ध, आपातकाल जैसी घटनाओं पर अवसरवादी के तहत जब-तब करते रहते हैं। वाम विचार मौजूदा दलों में किसी के भी सामने अधिक तार्किक, अधिक मानवीय ठहर सकता है किन्तु अकेले गाँधी जी के सामने दयनीय रूप से बौना नजर आता है। तर्क की हठधर्मिता के अधीन वह अपनी हर गलती को भले ही सही सिद्ध कर दे, गाँधी को न स्वीकार करना उसकी सबसे बड़ी भूल है। यदि लेनिन या माओ भारत में पैदा हुए होते तो वे निश्चित रूप से या तो गाँधी होते या उनके अनुयायी। गाँवों में परिवर्तन की गाँधी जी की इच्छा और किसी भी जनान्दोलन में अंतिम व्यक्ति की भागीदारी और उसकी किसी भी व्यवस्था में पहला लक्ष्य रखे जाने के स्वप्न से ज्यादा जनवादी क्या हो सकता है? एक छोटे-से संदर्भ से जनान्दोलन के प्रति गाँधी जी और वाम के रवैये को समझा जा सकता है। गाँधी जी के लिए किसी भी जनान्दोलन में जितनी महत्त्वपूर्ण अहिंसा थी उतना ही महत्त्वपूर्ण था किसानों, ग्रामीणों की हिस्सेदारी, मिल-फैक्ट्री में काम करने वालों के लिए उनकी स्पष्ट चेतावनी थी कि जब तक उनके मालिक उन्हें अनुपस्थित होने की इजाजत नहीं दे, वे शामिल न हों, उनको अपने काम के प्रति नैतिकता का संदेश एकदम साफ था। जबकि इसके उलट वाम आंदोलन पनपा ही मिल और फैक्ट्री कामगारों के बीच कुछ शहरों और कस्बों में। अधिक विस्तार में जाने की जरूरत नहीं कि जायज-नाजायज अधिकारों (कर्तव्य कभी भी नहीं) के लिए छेड़े इन्हीं आंदोलनों ने आजाद भारत में काम के प्रति ऐसा रवैया बना दिया है कि काम करना पाप समझा जाता है और हरामखोरी राष्ट्रीय स्वाभिमान, इंकलाबी कर्तव्य, उत्तर प्रदेश, बिहार, पं. बंगाल में सरकार और सरकारी संगठनों या संगठित उद्योगों में इसी मानसिकता के चलते इतनी गिरावट आ गयी है कि ये संस्थान ही अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। निश्चित रूप से वामपन्थ की सदस्य संख्या तो बढ़ी है इन संस्थानों में, लेकिन घाटे में डूबते और परिणामस्वरूप लगातार कम होते जाते उद्योगों की वजह से बेरोजगारी कई गुना ज्यादा। गाँधी जी का 100 वर्ष पहले ग्राम-संबंध में किया गया चिंतन आज भी एक क्रान्तिकारी और मौलिकता के साथ प्रासंगिक है।
हमें ठहरकर पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर गाँधी पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। गाँधी के पूरे जीवन में एक ऐसा व्यवस्थित स्पैक्ट्रम है जो केवल सूरज की रोशनी में होता है। एक ऐसी लय जो सधे हुए शास्त्रीय संगीत में ही संभव है।
समय और समाज के मौजूदा उथल-पुथल में गाँधी को पढ़ना-समझना एक ताकत देता है- हर उस अन्याय से लड़ने की- वह चाहे राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक हो या राजनैतिक-किन्तु उन प्रवृत्तियों से न कि व्यक्तियों से। विरोध के स्वर का सामना करने और उसे अंततः अपने अस्त्रों से पराजित करने का नाम है महात्मा गाँधी।

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