ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
तरक्की की राह पर चालीस कदम
01-Feb-2019 02:52 PM 1659     

चीन पर कोई हुक्म नहीं चला सकता और न ही चीन को प्रगति से कोई रोक सकता है। 18 दिसंबर 2018 को बीजिंग के विशाल कक्ष में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को संबोधित करते हुए चीन के राष्ट्रपति शीं जिन फ़िंग के ये शब्द पूरी दुनिया विशेषकर अमेरिका को एक खुली चुनौती थी। चीन के आर्थिक सुधार और खुलेपन की चालीसवीं वर्षगांठ पर लगभग डेढ़ घंटे के अपने भाषण में शीं ने आर्थिक सुधार को जारी रखने का वादा तो जरूर किया लेकिन ये किस तरह से आगे बढ़ाया जाएगा, उसमें क्या नयापन होगा या यूँ कहें कि अमेरिका के साथ चल रहे व्यापारिक युद्ध के इस माहौल में आर्थिक सुधार को जारी रखने की सरकारी नीतियाँ क्या होंगी, इस पर कोई ख़ास विश्लेषण नहीं दिया। शीं ने जिन सात नियत मुद्दों की चर्चा की उसमें घरेलू खपत बढ़ाने के के अलावा उच्च गुणवत्ता के साथ उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर दिया। चीन के आर्थिक विश्लेषकों के शब्दों में कहें तो इस भाषण में कोई नयापन नहीं था। यहाँ तक कि उन्होंने जीडीपी भी प्रस्तुत नहीं की।
चालीस साल पहले 1978 में चीन की दूसरी पीढ़ी की सरका के नेता दंग्ग शियाओ फ़िंग ने सोवियत संघ की परिपाटी में वर्षों से चल रहे चीन में एक नयी पहल की। सिंगापुर और जापान की आर्थिक प्रगति से प्रभावित दंग्ग ने परंपरागत चीन में आर्थिक सुधार का नया बिगुल फूंका और विदेशी निवेशकों के लिए चीन का दरवाजा खोल दिया। लिहाज़ा दुनियाभर की मल्टीनेशनल कंपनियों ने चीन में अपनी फ़ैक्ट्री लगानी शुरू कर दी। दंग्ग ने दक्षिण में अवस्थित शहर शेनजेन से इस प्रयोग की शुरूआत की। हॉगकांग से सटा होने की वजह से शेनजेन से व्यापार आसान था, लिहाज़ा उन्होंने इसे ही मॉडल सिटी के तौर पर इस्तेमाल किया। जैसे-जैसे दंग्ग को अपने इस प्रयोग में सफलता मिलती गई वो इसका विस्तार दक्षिण से पूर्व की ओर करते चले गये। मुख्यत: कृषि पर निर्भर चीन की अर्थवयवस्था को अब नया आयाम मिल गया था और ग़रीबी से जूझती यहाँ की जनता को काम।
सस्ते और मेहनती मज़दूर पाकर जहाँ विदेशी कंपनियों ने मुनाफ़ा बनाया वहीं चीन का नक़्शा विश्व मानचित्र में जल्द ही बदल गया। चीन अब पूरे विश्व के लिए सस्ता माल बनाने वाला "प्रोडक्शन हाउस" बन चुका था। इस दौरान चीन ने लगभग चालीस गुणा तरक़्क़ी की (1978-2018)। चालीस साल पहले लिये गये क्रांतिकारी फ़ैसले ने न सिर्फ चीन को एक ग़रीब देश से विश्व की दूसरी आर्थिक शक्ति के रूप में सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया बल्कि पूरे विश्व के नज़रिये को भी बदल दिया और अब विश्व का केन्द्र पश्चिम से पूरब की ओर खिसक रहा है।
सीसीटीवी पर प्रसारित एक कार्यक्रम के दौरान सेंटर फॉर चायना एंड ग्लोबलाइजेशन के वाइस प्रेसिडेंट विक्टर गाओ जिन्होंने दंग्ग के साथ उनके आर्थिक सुधार मिशन में काम किया कहते हैं कि "चालीस साल पहले जब दंग्ग ने आर्थिक सुधार की शुरूआत की थी तो विश्वभर में समाजवाद और पूँजीवाद पर बहस छिड़ गई थी। लेकिन, चालीस साल के इस सफर में अपनी उपलब्धियों से चीन ने इस बहस पर पूर्ण विराम लगा दिया है।" दंग्ग के आर्थिक सुधार की वकालत करते हुए विक्टर गाओ कहते हैं कि "चालीस साल पहले चीन एक विशाल वैचारिक बक्से में बंद था, दंग्ग शियाओ ने सभी वैचारिक बहस पर विराम लगाते हुए सिर्फ विकास, कार्यक्षमता और उत्पादकता पर ज़ोर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने यहाँ के लोगों की सोच ही बदल डाली। दंग्ग ने चीन के लोगों को वैचारिक रूढ़िवादिता से उबारा है। इस चालीस साल में यहाँ की जनता ने कड़ी मेहनत की, अपनी गाढी कमाई को जमा किया और ख़ुद को पूरी दुनिया से अलग-थलग कर सिर्फ और सिर्फ देश के विकास के लिए काम किया है। कड़ी मेहनत का कोई सानी नहीं है और सिर्फ विकास ही देश के नागरिकों के जीवन में ख़ुशहाली ला सकता है, उनके जीवन स्तर को सुधार सकता है।"
विक्टर गाओ की इन बातों से मैं काफी हद तक सहमत हूं। कड़ी मेहनत का कोई सानी नहीं होता। अगर चीन की आम जनता की बात करूँ विशेषकर नई पीढ़ी, देश के इस विकास से सचमुच काफी ख़ुश है। इस विकास ने यहाँ की जनता के जीवन स्तर में कई गुना सुधार किया है, इस बात में भी कोई संशय नहीं। हर गाँव में बिजली, पक्की सड़क, विद्यालय और अस्पताल आम बात है। शहरों में गगनचुंबी इमारतें, स्पीड ट्रेन, अत्याधुनिक सुविधा से लैस सरकारी अस्पताल, साफ़-सुथरी चौड़ी सड़कें, डीजिटल बस स्टैंड, अंतराष्ट्रीय स्कूल एवं विश्वविद्यालय, आर्टफिशल इंटलिजन्स के माध्यम से काम करती सरकारी बैंक ये सब कुछ इसी आर्थिक सुधार की सौग़ात है। जीवन स्तर में सुधार का प्रमाण इससे भी मिलता है कि इस देश में बिरले लोग ही भीख माँगते नज़र आते हैं। लेकिन बुद्धिजीवियों की नज़र में चीन अब भी कई मामलों मसलन भ्रष्टाचार, क़ानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य, घर आदि जैसे कई मुद्दों पर सिंगापुर से काफी पिछड़ा हुआ है।
इस विकास को जारी रखने के लिए चीन के सामने कई चुनौतियाँ हैं। आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक़ एक तरफ जहाँ आंतरिक मंदी चिंता का विषय है वहीं आने वाले साल में घरेलू विकास दर में स्थिरता और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के बीच सामंजस्य बनाते हुए आगे बढ़ना एक बड़ी चुनौती होगी। जिस पर धैर्य और समझदारी के साथ काम करना होगा। आर्थिक विश्लेषकों की सलाह है कि आर्थिक सुधार को जारी रखने के लिए विदेशी निवेशकों को बड़ा बाजार उपलब्ध कराने के अलावा कॉरपोरेट टैक्स और इंडिवीजुअल टैक्स (कंपनियों पर लगने वाले टैक्स और व्यक्तिगत टैक्स) को भी कम करने की ज़रूरत है। साथ ही पूरे तंत्र को सरल एवं कारगर बनाने की आवश्यकता है। सूचौ विश्वविद्यालय, स्कूल ऑफ़ कम्यूनिकेशन के डीन एवं दांगवु थिंक टैंक के सदस्य प्रोफ़ेसर छेन लॉग कहते हैं कि यहाँ की जनता घबराई हुई है क्योंकि सरकार उनकी अच्छी जिन्दगी की कोई गारंटी नहीं दे सकती। चालीस वर्षों में सरकार ने सेन्स ऑफ़ सेफ़्टी को लोगों में जगाया ही नहीं है। यह जापान, अमेरिका, यूरोप सभी देशों से अलग स्थिति है। जापान में सोशल गारंटी है। वहाँ के तंत्र ज़्यादा स्वस्थ हैं। जापान में लोगों की ज़िन्दगी सामंजस्यपूर्ण एवं समरसतापूर्ण है, लेकिन चीन के समाज में इसकी कमी है। प्रोफ़ेसर छेन के मुताबिक़ आर्टफिशल इंटलिजन्स का बढ़ता उपयोग इस घबराहट की एक बड़ी वजह है। प्रोफ़ेसर छेन के मुताबिक़ ई-बिज़नेस ने पारंपरिक व्यापारिक व्यवस्था पर गहरा प्रहार किया है और भविष्य के लिए यह भी एक ख़तरा है। प्रोफ़ेसर का मानना है कि चालीस साल पहले जब सुधार की शुरूआत हुई थी तो 50, 60 के दशक में पैदा हुए लोगों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया, सिर्फ इस उम्मीद पर कि उनका बुढ़ापा सुरक्षित रहेगा और उनके बच्चों को अच्छी ज़िन्दगी मिलेगी, लेकिन बदले माहौल में उनकी पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य का सपना कहीं खो गया है। समाज कल्याण सरकार के लिए बड़ी सिरदर्द बन गई है। आने वाले दस वर्षों में साठ के दशक में पैदा हुए लोगों की हालत बद से बदतर होने वाली है। जिस तेज़ी से नयी तकनीक को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है, पुराने शिक्षकों के सामने चुनौती बढ़ती जा रही है। उनके लिए नये पाठ्यक्रम को नई तकनीक के साथ पढ़ाना मुश्किल हो रहा है, दूसरी ओर नये विद्यार्थियों को पुराने ढर्रे की पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं है। वैसे लोग जो पढ़े-लिखे होकर भी तकनीकि तौर पर प्रशिक्षित नहीं हैं उनके भविष्य की कोई गारंटी नहीं है।
प्रोफ़ेसर छेन कहते हैं कि इस विकास ने बहुत कुछ बदल दिया है। नई पीढ़ी के लिए पैसा ही धर्म है। समाज से मूल्यों का निरंतर क्षय हो रहा है। नये ज़माने की मान्यताएँ बदल गईं है। नई पीढ़ी चौबीस घंटों में से सात-आठ घंटे अपने मोबाइल पर ही व्यस्त रहती है, सामाजिकता उन्हें आती ही नहीं है। हज़ारों साल पुरानी चीन की संस्कृति में से कई चींजें ऐसी हैं जो अब संग्रहालय तक सिमटकर रह गई है। साठ के दशक में पैदा हुए लोग आज भी मंदिरों में जाते हैं, प्रार्थना करते हैं, एक-दूसरे के साथ मिलते हैं, बुजुर्ग महिलाएँ सुबह-शाम स्क्वायर डाँस करती हैं, लेकिन ग्लोबलाइज़ेशन ने यहाँ भी सेंध मार दी है। प्रोफ़ेसर कहते हैं ये जरूर है कि ग्लोबलाइज़ेशन ने चीन को एक नया अवसर प्रदान किया लेकिन इसकी वजह से हमारी नई पीढ़ी पश्चिमी सभ्यता वाली बन गई है। आज का युवा वर्ग 25 दिसम्बर को चर्च में नज़र आता है, ऐसा नहीं है कि धर्म में उनकी आस्था है इसलिए वो चर्च जाते हैं, सच तो यह है कि 90 के दशक में पैदा हुई पीढ़ी सिर्फ पैसे के पीछे भाग रही है। यह पूरी की पूरी पीढ़ी स्वार्थी पीढ़ी है, यह सिर्फ अपने बारे में सोचती है। भौतिक सुख सुविधा देने वाली वस्तुएँ ही इन्हें आकर्षित करती है। मॉडन कपड़े पहनना, महँगी कार में घूमना, बड़े विदेशी माल से ख़रीददारी करना इनके जीवन का उद्देश्य है। ख़ासतौर पर युवा लड़कियाँ ज़्यादा भौतिकवादी हो गईं हैं, उनकी नज़र में दौलतमंद के साथ विवाह करके वह ज़्यादा ख़ुशहाल ज़िन्दगी जी सकती हैं, क्योंकि पैसे से ही ताक़त है। युवा पीढ़ी के लिए वैवाहिक जीवन की परिभाषा ही बदल गई है और यह चीन की पारंपरिक जीवन शैली के लिए बड़ा ख़तरा है। प्रोफ़ेसर आगे कहते हैं इस विकास ने कई तरह की समस्याओं को जन्म दिया है जो हमारे समाज के हित में नहीं है, लेकिन निराशाजनक बात ये है कि इन समस्याओं से निबटने के लिए सरकार के पास कोई कारगर योजना नहीं है।
सूचौं विवि के समाजशास्त्र संकाय के उपाध्यक्ष प्रोफ़ेसर गाओ की नज़र में विकसित चीन का यह नया चेहरा ग्रामीण संस्कृति की क़ीमत पर हासिल हुआ है। विकास के साथ हमारी सांस्कृतिक विविधता तेज़ी से धूमिल होती जा रही है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि किसी पौधे को वृक्ष बनाने के लिए उसे बढ़ने के लिए छोड़ देना चाहिये लेकिन इस क्रम में हम उसकी शाखाओं को भुला देते हैं। विकास के लिए चाहिये कि हम अपनी छोटी-छोटी सांस्कृतिक धरोहरों को बचाकर रखें न कि उन्हें नेस्तनाबूत कर दें। समाज का विकास घुमावदार होता है यह सीधी रेखा की तरह नहीं हो सकता। हालाँकि प्रोफ़ेसर गाओ नई पीढ़ी के जोश, हाज़िरजवाबी और तकनीकि बुद्धि की प्रशंसा करते हैं। वे स्वीकारते हैं कि युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से ज़्यादा होशियार है अत: उन्हें उनके स्वरूप के साथ ही हमें स्वीकारना होगा। पुराने दिनों को याद करते हुए वो कहते हैं कि उस ज़माने में दो महीने खेती और एक महीने बसंतोत्सव (Ïस्प्रग फ़ेस्टीवल) मनाने के अलावा पूरे नौ महीने वे लोग सिर्फ खेलकर, बेकार बैठकर या मस्ती करके समय गुज़ारा करते थे। लेकिन अब तो काम का इतना बोझ बढ़ गया है कि आराम के लिए फुर्सत ही नहीं मिलती है। पहले की शादियां भी महीनेभर चला करती थीं। समाज में अपना रूतबा दिखाने से लिए दूल्हा पक्ष जमकर खर्च किया करता था, यह सब सिर्फ फ़िज़ूलखर्ची और समय की बर्बादी थी। नये ज़माने की शादियाँ सिर्फ छुट्टियों के दिन हुआ करती हैं, लिहाज़ा किसी को भी दफ्तर से छुट्टी लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रोफ़ेसर गाओ के मुताबिक़ नई और पुरानी पीढ़ी के बीच बढ़ती खाई को पाटना बेहद ज़रूरी है और यह सिर्फ और सिर्फ बातचीत के माध्यम से ही संभव है। नई पीढ़ी पतंग की तरह है जो खुले आकाश में उड़ना चाहती है लेकिन उसकी डोर पुरानी पीढ़ी के हाथ में है, जिसे सोच समझकर ही ढील देनी चाहिये। विकास को प्रमुखता देने के साथ हमें देश की मूल संस्कृति और सांस्कृतिक विविधता को साथ लेकर चलना चाहिये।
अधिकांश लोग यह ही जानते हैं कि चीन में सुधार की शुरूआत दंग्ग शियाओ फ़िंग की 1978 में लागू की गई आर्थिक सुधार नीति और खुलेपन से हुई लेकिन चीन के इतिहास को टटोलें तो वास्तव में इसकी शुरूआत "न्यू रिपब्लिक ऑफ़ चाइना" (1949) के पहली पीढ़ी के नेता माओ जअ दंग (माओ के नाम से प्रसिद्ध) ने ही अपने कार्यकाल (1949-1976) में कर दी थी। सूचौं विश्वविद्यालय में अंतराष्ट्रीय इतिहास की लेक्चरर च्यांग यांग के मुताबिक़ इसकी पहल माओ के सांस्कृतिक क्रांति के साथ ही हो गई थी। ये अलग बात है कि उस दरम्यान जो कुछ चीन में घटा उसकी चर्चा आज भी लोग दबी ज़ुबान से ही करते हैं। लेकिन, उस सांस्कृतिक क्रांति की वजह से ही महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा मिला। आज चीन के समाज में आत्मनिर्भर, शिक्षित और सफल महिलाओं का परचम लहरा रहा है, यह उसी सांस्कृतिक क्रांति का नतीजा है। ये अलग विषय है कि चीन में कन्फ़्यूशियस दर्शन की जड़ें कितनी गहरी हैं पर ये भी सच है कि कन्फ़्यूशियस दर्शन में महिला और पुरुष का दर्जा बराबरी का नहीं है। इस दर्शन में पुरुष को ही प्रधान और निर्णय लेने का अधिकारी बताया गया है। इस विषय पर अलग-अलग लोगों की राय अलग जरूर हो सकती है लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि 1949 के पहले चीन में महिलाओं को वो अधिकार प्राप्त नहीं थे जो आधुनिक समाज की महिलाओं को प्राप्त है। श्रीमती च्यांग भी मानती हैं कि आधुनिक चीन में नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच खाई बहुत गहरी हो गई है और युवा पीढ़ी बेहद स्वार्थी हो चुकी है। निराशाजनक बात ये है कि चीन के युवा इतने आत्म केन्द्रित हो चुके हैं कि उन्हें अपने आसपास की घटनाओं का भी भान नहीं है या यूँ कहें उन्हें इसमें दिलचस्पी नहीं। एक ओर जहाँ कई देशों के युवा इस दिशा में काम कर रहे हैं कि पूरे विश्व को किस तरह से रहने के लिए और बेहतर जगह बनाया जा सके वहीं चीन के युवा सिर्फ इस फ़िराक़ में रहते हैं कि कैसे उन्हें और बेहतर नौकरी मिले और बेहतर कमाई हो, किस तरह से और बेहतर कार और लग्ज़री लाइफ़ को पाया जा सके।
श्रीमती च्यांग की नज़र में इस सबके पीछे एक बड़ी वजह है चीन का "रैपिड ग्रोथ"। इतिहास पर नज़र डालें तो यूरोप को आधुनिक और पूर्ण विकसित होने में लगभग सौ वर्ष लग गये, इसी तरह अमेरिका को भी विकसित, विश्व की प्रथम अर्थव्यवस्था और फिर विश्व का सबसे प्रभावशाली देश बनने में लगभग दो सौ साल लग गये, वहीं चीन को विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था बनने में महज़ चालीस साल लगे। यह तेज़ी अपने साथ कई बुरे परिणाम लेकर आया है। अपने ही परिवार की मिसाल सामने रखते हुए च्यांग कहती हैं - "मेरी सास ने कभी विद्यालय का चेहरा तक नहीं देखा और मैं उनकी बहू न सिर्फ पीएचडी हूँ बल्कि एक साल तक अमेरिका में रहकर खुले माहौल में पढ़ाई भी की, दो पीढ़ी के बीच इतना बड़ा फर्क, ज़ाहिर तौर पर दोनों की सोच मिलना नामुमकिन है। समाज में महिलाओं की सम्माजनक स्थिति के बावजूद बुजुर्ग परिवार में बेटे की ही चाह रखते हैं। आज भी समाज से बेटा-बेटी का फ़र्क ख़त्म नहीं हुआ है। चीन में अपना मकान खरीदने से लिए आपके बैंक में ख़ूब सारा पैसा होना चाहिये ताकि आप लोन के किश्त आसानी से भर सकें जिसके पक्ष में कई युवा नहीं हैं। वो किराये के मकान में ज़िन्दगी गुज़ार देना बेहतर समझते हैं बजाय अपनी गाढ़ी कमाई बैंक को दे देना, लेकिन पुरानी पीढ़ी की नज़र में यदि आपके पास घर नहीं तो आपकी कोई औक़ात नहीं और आपके पास कोई रहने की जगह तो होनी ही चाहिये। इसके लिए युवाओं पर वो काफी दबाव बनाते हैं।
ये सही है कि अपने मकान की ख़ातिर वो बेटे को हर तरह से मदद करते हैं पर यह भी उनकी दक़ियानूसी सोच का ही परिणाम है। यहाँ भी विचारों का फ़र्क़ दोनों पीढ़ी के बीच खाई को बढ़ाता है। च्यांग की तरह चीन के कई आर्थिक विश्लेषकों के विचार में तेज़ गति विकास से ज़्यादा महत्वपूर्ण है धीमी गति से लगातार विकास करते रहना। ऐसे में कहा जाना चाहिये कि अब वो समय आ गया है जब चीन को आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है। दुनिया की दूसरी आर्थिक शक्ति बनना एक बात है लेकिन दुनिया की दूसरी सबसे प्रभावशाली देश बनने के लिए अभी चीन को बहुत पापड़ बेलना बाक़ी है।
एक बच्चा नीति ने चीन के सामने युवा मज़दूर की समस्या तो खड़ी की ही है अभिभावकों में बच्चे को लेकर असुरक्षा की भावना को भी बढ़ाया है। दूसरा बच्चा नीति लाने में सरकार ने जो देरी की उससे जनसंख्या विस्फोट की समस्या तो सुलझ गई लेकिन कई अंदरूनी समस्याओं ने जन्म ले लिया। अमूमन यह सभी कोई स्वीकार रहा है कि एक बच्चे को देखने के लिए चीन में माता-पिता के अलावा चार और अभिभावक होते हैं, नई पीढ़ी के आत्म केन्द्रित होने के पीछे एक वजह यह भी है।
बीजिंग के अंतर्राष्ट्रीय भाषा विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफ़ेसर पु बायलिंग कहती हैं एक बच्चा नीति का प्रभाव सिर्फ बुज़ुर्गों पर नहीं पड़ा है बल्कि युवा पीढ़ी पर भी दोहरी ज़िम्मेदारी का बोझ बढ़ा है। एकलौती संतान होने की वजह से बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी उनकी होती है और अपने एवं अपने बच्चे की बेहतर ज़िन्दगी की ख़ातिर दिन-रात काम करने का दबाव भी वो झेलते हैं। इस महँगाई में भौतिक सुख सुविधा की ज़िन्दगी इतनी आसानी से नहीं मिलती। ये जरूर है कि किसी भी दूसरे देश से अलग चीन में युवा वर्ग को अपने अभिभावको का हर क्षेत्र में सबसे ज़्यादा सहयोग मिलता है लेकिन यह उनकी मजबूरी भी होती है। आज चीन के कई गाँव ऐसे हैं जहां बुजुर्ग एकाकी जीवन जीने को बेबस है। 2016 में सरकार ने दूसरा बच्चा नीति लागू जरूर किया लेकिन लोगों में इसे लेकर वो उत्साह नहीं दिखा जिसकी अपेक्षा थी। ऐसे में ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की विश्व मानचित्र में इस नये चमकते चीन को बनाने में यहाँ की आम जनता ने अपना बहुत कुछ खोया है।

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