ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
फ़िलमियाँ बुखार
01-May-2017 01:59 PM 2250     

मुझमें फ़िल्मी बुखार के कीटाणु विरासत में मौजूद कब पाए गए, ख़बर नहीं।
हाँ, इतना तो था कि हम बड़ों से आँख छिपाकर फ़िल्मी स्टाइल में ज़ुल्फें,
नुक्कें निकालते और बनते सँवरते। इस तरह पनाह दिए फ़िलमियाँ बुखार के
कीटाणुओं के फलने-फूलने के लिए माक़ूल माहौल मुहैया कराते।
कोई जान-बूझकर नहीं, ये तो ख़ुद ब ख़ुद होता चलता।


फ़िलमियाँ बुखार का पूरा दारोमदार अगर बुआ पर डाल दिया जाय तो कोई न-नुकुर करने वाला नहीं। सोते-जगते, उठते-बैठते उनके सिर पर फ़िल्मी भूत सवार रहता। छत पर किताब लिए घूम-घूम कर पढ़ते समय भी मर्फी रेडियो पर आ रहे विविध भारती से बढ़िया फ़िल्मी गानों का आनंद लेते रहना, मतलब एक पंथ दो काज! उस समय के पढ़ाकुओं की अतिरिक्त ख़ूबियों में बख़ूबी शुमार था। छम्मो बुआ इसमें पारंगत, सरताज थीं।
मुझमें फ़िल्मी बुखार के कीटाणु विरासत में मौजूद कब पाए गए, ख़बर नहीं। हाँ, इतना तो था कि हम बड़ों से आँख छिपाकर फ़िल्मी स्टाइल में ज़ुल्फें, नुक्कें निकालते और बनते सँवरते। इस तरह पनाह दिए फ़िलमियाँ बुखार के कीटाणुओं के फलने-फूलने के लिए माक़ूल माहौल मुहैया कराते। कोई जान-बूझकर नहीं, ये तो ख़ुद ब ख़ुद होता चलता। साथ ही घर में होने वाली साहित्यिक चर्चाओं के साथ-साथ चुनिंदा चलचित्रों पर चर्चा, विवेचना, आलोचना एवं माधुरी, सारिका, धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं से प्राप्य ज्ञान बढ़ावा देता। अपने-अपने प्रिय अभिनेता-अभिनेत्री, गाने-दोगाने को सबसे ऊपर और सर्वोत्तम सिद्ध करने के लिए अड़ियल टट्टू बने रहना आम बात थी।
हीरो-हीरोइन कोई भी हों पर अक्सर चर्चा गाँव के जीवन पर आधारित फ़िल्मों पर होती। इन चर्चाओं ने जाने - अनजाने मेरे सरल फ़िल्मी मन में गाँव की सादगी और सुन्दरता को कब चाहत दे दी ये पता ही न चला। चाहे "नंदिनी" की नूतन का "अब के बरस भेजो भैया को बाबुल" या "मदर इण्डिया" की नर्गिस का "गाड़ीवाले गाड़ी धीरे हाँक रे" और "तीसरी क़सम" की वहीदा का "लाली - लाली डुलिया में...", वाला गीत हो। इन गानों के मिस गाँव की सौंधी मिट्टी की गंध-सा मौलिक सपन-संसार रचता बसता नज़र आने लगा। उस पर "हरिऔध" की अमर काव्य पंक्तियाँ - "अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है..." ने उस पर मौलिकता की मुहर लगा दी। और तो और इधर चमकी मौसी ने चट मँगनी पट ब्याह की तर्ज़ पर गाँव का दूल्हा खोज कर मुझे ब्याह दिया।
 विदा हुई! कार से पीहर की सरहद तक पहुँचा दी गई। अब गाँव की सीमा ने सगुन की सौग़ात दी। पालकी! सामने पालकी देख, मेरा फ़िल्मी मन डोल उठा! सारे "डोली" सीन मस्तिष्क के पर्दे पर उतर आए। मुझे डोली में मीना, नर्गिस, शर्मिला, राखी, वहीदा दिखने लगी। डोली और दुल्हन का रिश्ता- ज्यों मंदिर में पावन दिया टिमटिमाने लगे। मुदित मन खो गया। दख़ल दी चार कहारों ने। उन्होंने झटके के साथ पालकी को उछाल दिया था। इन्हें ये भी नहीं लगा कि अन्दर कोई बेजान वस्तु नहीं, जीती-जागती जान है! मैं कुछ कह भी नहीं सकती थी। चुपचाप सह लेना ही बेहतर समझा। इस दृश्य और सिनेमा के सीन में दूर- दूर तक कोई ताल-मेल नहीं था। अब मैंने पूरी ताक़त से पालकी के डंडे को पकड़े रखा क्योंकि गिरने से स्वयं को बचा लेना ही उस पल मेरा लक्ष्य था। सफल भी रही।
थोड़ी दूर तक जाकर पालकी से उतारी गई! राहत की साँस ली ही थी कि पता चला अब बैलगाड़ी से घर तक पहुँचना है। सगुन के लिए इतनी पालकी यात्रा हो गई। बैलगाड़ी! फ़िल्मियाँ जिगर फिर उछलने लगा। वहीदा! बैलगाड़ी! और शर्मीली-सी दुल्हन बैलगाड़ी में बैठी, राजकपूर गाड़ी चला रहा "सीन" चल रहा था! पीछे-पीछे गाँव की लड़कियाँ गाती हुई चल रहींं- लाली-लाली डुलिया में लाली सी दुल्हनियाँ... तभी किसी ने गाड़ी में बैठने का इशारा करते हुए कहा कि सँभलकर बैठना। ठेस लगी विचारों में खोए मन को। आ गई यथार्थ के धरातल पर।
जैसे-तैसे बैठी एक बार तो गिरते-गिरते बची। घूँघट से दिखे न दिखे अंदाज़े से काम ले रही थी। गाड़ी में मोटी खेस और धूप से बचाने के लिए गोलाकार सरकंडे में शायद धोती लगा कर छाया करने का प्रयास किया गया था। गाड़ी चलते ही वह पताका की तरह फहराने लगी। किधर की छाया! धूप तमंचा-तमाचे मार रही थी। गाड़ीवान ने दया करके अपनी छतरी पकड़ा दी।
मेरी हालत बेहालत! अरे वहीदा! कैसे तुम इतनी फ़्रेश, सजी-धजी और मुसकराती शर्माती वो भी बिना ज़रा सा भी मेकअप बिगाड़े गंतव्य तक पहुँच गईं! यहाँ तो भीषण गर्मी, बैलों का लीक पकड़कर दौड़ना, मेरा बार-बार सरक-सरककर बैलगाड़ी के ऊपरी हिस्से से नीचे आ जाना, फिर छाते को, घूँघट को, बेंदे, नथनी, चादर, बटुआ, चप्पल और ख़ुद को सँभाले रखना। ये कोई छोटा-मोटा इम्तहान तो नहीं, यहाँ तो इम्तहान के दादा-परदादा खड़े थे। चारों तरफ़ खेत ही खेत, हरे या सूखे किसको परवाह थी अभी। एक परिंदा भी नहीं दिख रहा था पर अचानक उसी समय साईकिल पर दो-तीन लोग पास से निकल गए। रास्ता ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। दाईं ओर एक छोटा सा प्राइमरी स्कूल दिखा। बैलगाड़ी और मुझे देख यहाँ भी कुछ लड़कियाँ भागी आ रही थीं। भाभी आईं! भाभी आईं!
मेरा फ़िलमियाँ दिल धड़का! अब की बार इसके पहले कि ये सिर चढ़ कर बोले मैंने कसकर पकड़े रखा और कहा- अब बस! बिलकुल बस! तेरी क़सम "तीसरी कसम" अगर मेरे आस-पास तो क्या ख़्वाब में भी फटकी! फ़िलमियाँ बुखार उतर चला।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^