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परिवारवाद और भाषा
01-Apr-2019 09:08 PM 1226     

जब भी भाषाओं की बात आती है तो उनके जिक्र के साथ एक पदक्रम जैसा संबंध भी आता है। सेना के अधिकारियों/सिपाहियों की तरह भाषाओं का भी पदक्रम निर्मित किया जाता है। किसी भाषा विशेष के लिए देव भाषा, ईश्वरीय भाषा, खुदा की भाषा, गॉड की भाषा के साथ-साथ देवी भाषा, मां-भाषा (मातृभाषा से भिन्नी) जैसी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है और उन्हें महान बताया जाता है। आजकल एक नया टर्म शास्त्रीय (क्लासिकल) भाषा का भी चलने लगा है। जब भी इस प्रकार के शब्द आते हैं वे इसका प्रतिपक्ष भी लेकर आते हैं, अर्थात् जैसे ही हम "देव भाषा" पद का उपयोग करते हैं मन में यह सवाल उठता है कि क्या कोई "दानव भाषा" भी होती है? आर्य और श्रेष्ठ और शास्त्री शब्द के प्रयोग के साथ ही अनार्य, निम्न और अशास्त्री जैसे शब्द भी सामने आ खड़े होते हैं। तो क्या भाषाओं में भी नस्ल भेद होता है? या इनका नस्ल-विशेष से संबंध होता है? कुछ तो ऐसा रहा होगा तभी तो अनेक भाषा वैज्ञानिक भाषा की बात करने से पहले नस्ल और जाति की बात करने लगते हैं। भाषा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले डॉ. रामविलास शर्मा भाषा और समाज नामक पुस्तक के "भाषा परिवार और आदि भाषा" नामक अध्याय के शुरू के कई पृष्ठि नस्ल और रेस के वर्णन को देते हैं। क्योंकि भाषाओं के बहाने भी समाज में और भाषा-भाषियों में एक तरह का भेद निर्मित करने के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। जैसे कि भारत में मुख्य रूप से चार भाषा परिवार माने जाते हैं। इसमें से एक परिवार का नाम "आर्यभाषा परिवार" है जिसका संबंध यूरोपीय समुदायों से भी जुड़ता है। आर्य का अर्थ "श्रेष्ठ" होता है। इसी परिवार से बिलकुल सटा हुआ दूसरा भाषा परिवार है जिसे "कोल भाषा परिवार" कहा जाता है। "कोल" का अर्थ "सूअर" होता है। मानी हुई बात है कि कोई समाज खुद को सुअर कहलाना पसंद नहीं करेगा और यह नामकरण दूसरे (जाहिर है "प्रभावी") समाजों ने किया होगा। वास्तविकता यह है कि यह समाज खुद की भाषाओं को "मुंडा भाषा परिवार" का हिस्सा बताता है। मुंडा का अर्थ "मनुष्य" और "मस्तिष्क" होता है। दूसरे परिवारों की बात छोड़ दें और हम बहुत दूर न जाएं तो भारत में ही संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है और तथाकथित ढंग से इसी से विकसित भाषाओं को पैशाची और अपभ्रंश की संज्ञा दी जाती है। क्या देव का विकास पिशाच के रूप में हो सकता है? या बड़े समूह द्वारा व्यवहृत कोई भाषा भ्रष्टा हो सकती है?
स्पष्ट है कि समाज विशेष के पदक्रम से भाषा को पहचाना जाता है और इसके पीछे विशुद्ध रूप से सत्ता संरचना कार्य करती है। अक्सर प्राचीनतम भाषाओं के लिए ईश्वरीय या देव भाषा शब्द का प्रयोग किया जाता है, खासतौर से लैटिन, संस्कृत, अरबी जैसी भाषाओं को यह दर्जा हासिल है। हम सब जानते हैं कि आज के युग में मौजूद लोगों में सबसे पुराने समाज के प्रतिनिधि आदिवासी हैं। अंडमान निकोबार और ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का इतिहास 50 हजार से 75 हजार वर्षों तक जाता है जबकि किसी भी तथाकथित सभ्य समाज का इतिहास 10 हजार वर्षों तक भी नहीं जाता है। बावजूद इसके आदिवासी भाषाओं को कोल, किरात जैसे विशेषण ही मिलते हैं। सवाल उठता है क्यों? इसका जवाब भी उतना ही सरल है, इसलिए कि ये नामकरण करनेवाले लोग सत्ता में होते हैं और ज्यादातर बहुत ही नयी भाषा के लोग होते हैं। विभेदकारी संस्कृति के कारण परिवार का परिवारवाद में रूपांतरण हो जाता है जिसका अंत नस्लवाद में होता है। भाषाओं के बीच भी दास और दस्यु का संबंध बन जाता है। विजेता और विजित में हमेशा विजेता की भाषा श्रेष्ठतम मानी जाएगी। जैसा कि अंग्रेजी के साथ हुआ, कायदे से जिस भाषा का इतिहास 800 वर्षों का भी नहीं है उसने पूरी दुनिया की भाषा और संस्कृति को असभ्य ठहराने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई।
समन्वय और सामासिकता की बजाय भेद को मूल्य माननेवाले इन नयी भाषाओं के विद्वानों ने भाषा परिवार की परिकल्प ना की और ये बताने की कोशिश की कि भाषाओं का एक निश्चित परिवार होता है। उदाहरण के लिए अगर हम हिंदी की बात करें तो इसका विकास सामान्यत: निम्न रूप में दिखाया जाता है-
संस्कृत-पालि (प्रथम प्राकृत)-प्राकृत-अपभ्रंश-अवहट्ट-भारतीय आर्य भाषाएं- हिन्दी।
अक्सर मनुष्यों की तरह भाषाओं का भी वंश वृक्ष तैयार किया जाता है और एक शाखा से दूसरी शाखा निकलती हुई दिखायी जाती है। गजब तो यह है कि बहुत सारे हिन्दी के विद्यार्थी/विद्वान इसी को अंतिम सत्य मानकर इसका अनुगमन करते नजर आते हैं।
एक तरह से देखें तो भाषा परिवार की अवधारणा में कोई बुराई नहीं है। किसी भी शास्त्र के अध्येता शोध और अध्ययन की सुविधा के लिए अपने विषय का वर्गीकरण करते हैं और उन्हें एक सूत्र में पिरोने का कार्य करते हैं। कुछ भाषाविदों ने भी विद्यार्थियों के अध्ययन की सुविधा के लिए दुनिया की भाषाओं का वर्गीकरण किया और उन्हें भाषा परिवार में विभाजित किया। इस कार्य के लिए विद्वानों ने भौगोलिक समीपता, ध्वनिसाम्य, शब्दों में एकरूपता, व्याकरणगत समानता आदि को आधार एवं मानक के रूप में ग्रहण किया। कुछ चीजें मनुष्यों के मुख और वागांग की संरचना के कारण प्रत्येक भाषा में समान रूप से पायी जाती हैं इसलिए प्रत्येक भाषा में कुछ न कुछ साम्य मिल ही जाता है। जैसे कि कोई भी बच्चों अपने शुरुआती दौर में ज्यादातर ओष्ठव्य ध्वानियों का उच्चारण करता है क्योंकि तालु, दंत आदि से जीभ के घर्षण की तुलना में इन ध्वनियों का उच्चारण सरल होता है। छोटे बच्चे, घर के बड़े सदस्यों के उच्चारण की नकल करते हैं और बाह्य रूप में नजर आने के कारण ओष्ठव्य ध्वानियों को आसानी से देख और समझ लेते हैं। इसीलिए ज्यादातर (सारे नहीं) संबंध सूचक शब्द ओष्ठ ध्वानियों से उच्चारित होते हैं। मां, बाबा, मामा, पापा, मॉम, फादर, पितेर, भाई, ब्रदर आदि संबंध सूचक शब्द पवर्ग यानी ओष्ठ से उच्चरित होते हैं। ऐसे अनेक साम्यों का आधार लेते हुए भाषाविदों ने भाषा परिवार की परिकल्प न की परंतु यह परिकल्पना अध्ययन की सुविधा के लिए थी न कि भाषा विशेष के नाम पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए और यह बताने के लिए कि मेरी भाषा श्रेष्ठतम है और तुम्हारी भाषा निकृष्टा है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा परिवार से संबंधित ऐसी प्रत्येक साम्यता या मानक एक सुविधा मात्र होता है अंतिम सत्य नहीं, और ऐसे प्रत्येक मानक की सीमाएं होती हैं जैसे कि "भौगोलिक समीपता" के आधार पर एक भाषा परिवार का रिश्ता जोड़ते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस "भारोपीय भाषा परिवार" की भाषाएं यूरोप, एशिया, रूस (बाद में अमेरिका भी) जैसे सुदूरवर्ती विशाल क्षेत्र की भाषाओं को आपस में जोड़ लेती हैं और जिसका एक प्राचीन गढ़ मगध साम्राज्य रहा है उसी से एकदम सटी हुई भाषाएं भारोपीय परिवार की भाषाएं नहीं हैं। यानी बिहार में आदिवासी लोगों की भाषा बिल्कुल अलग भाषा परिवार से जुड़ती है जबकि इन दोनों भाषा परिवारों के बीच कोई हिमालय जैसा पर्वत, विशाल समुद्र या अमेजन जैसी नदी नहीं बहती है, बल्कि इनके बीच कुछ किलोमीटर का फासला है।
असल में किसी जीव विशेष के परिवार और भाषा के परिवार में एक मूलभूत अंतर है। जीव विशेष का निर्माण उसके माता-पिता करते हैं, वह उनका जैविक अंश होता है। एक बच्चा मां के पेट में लंबे समय तक निर्मित होता है और उस दौरान उसकी अस्थि-मज्जा से सीधा जुड़ा होता है। फिर जन्म के साथ ही उससे अलग हो जाता है और जैविक रूप में उसका मां से कोई सीधा संबंध नहीं रह जाता है। दूसरी ओर दुनिया की किसी भी भाषा का कोई जैविक माता पिता नहीं होता। किसी संतान की तरह न तो कोई भाषा अत्यंत करीब रहती है और न ही कुछ समय बाद संतान की तरह बिलकुल अलग हो जाती है। इसकी बजाय भाषाओं में मित्रता और संगी का संबध होता है। वे एक दूसरे के समानांतर चलती है, आपसी लेन-देन करती हैं और परस्पनर विकसित होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भाषाओं में परदादी-दादी-मां-बेटी-पौत्री आदि का संबंध नहीं होता या एक शाखा से दूसरी शाखा नहीं निकलती बल्कि बेटी और उसकी परदादी साथ साथ चल रही होती हैं और केवल बेटी ही नहीं बल्कि उसकी दादी भी बहुत सारी चीजें अपनी पौत्री से ग्रहण कर रही होती है। भाषाओं में शाखा से शाखा नहीं निकलती बल्कि कई पेड़ समानांतर विकसित होते हैं और एक दूसरे से केवल शाखा के रूप में नहीं बल्कि जड़-तना-पत्ती आदि अनेक स्तरों पर जुड़े होते हैं।
दो भाषा-भाषी समाज जब एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं तो उनमें अनेक चीजों का आदान-प्रदान होता है जिसमें सबसे बड़ी भूमिका भाषा निभाती है। भाषाओं की दुनिया में शुद्धता से अधिक मिलावट की भूमिका होती है क्योंकि भाषा स्थिर नहीं निरंतर गतिशील व्यवस्था है। थोड़ी-सी दूरी होते ही भाषा का रूप बदल जाता है, साथ ही एक ही भाषा का रूप कुछ दशकों में ही परिवर्तित हो जाता है। हम सब जानते हैं कि भाषा के लिखित रूप का प्रचलन कुछ ही शताब्दियों की बात है, इसके पहले ये मौखिक रूप में ही काम करती थीं जो कि इनका मूल रूप है और तब इनमें परिवर्तन की गति और तेज थी। इसी बात को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने ढंग से लिखते हैं कि "सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा (जीने की इच्छा)।"

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