ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारत में ज्ञान और शिक्षा की विफलताएं
01-Sep-2019 01:02 PM 493     

जयपुर के विनोद भारद्वाज जी ने गालिब की बेहतरीन जीवनी लिखी है, आत्मकथात्मक शैली में। यह इस वर्ष के अंत तक संवाद से प्रकाशित होने वाली है। इस पर विस्तार से चर्चा बाद में। फिलहाल इसका संपादन करते हुए जहां रुका हूं, वह मिर्जा गालिब की 1826 में की गई कलकत्ता की यात्रा है। यह 1857 के संग्राम से 31 साल पहले, भारत की आजादी से 121 साल पहले और आज से 193 साल पहले की हिंदुस्तानी दुनिया की कहानी है।
गालिब दिल्ली से गए थे। रास्ते में कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद ठहरते हुए। कलकत्ता में एक दूसरा संसार उन्हें दिखा। दिल्ली और लखनऊ से अलग। एक गढ़ा जाता हुआ, बनता हुआ संसार।
वे शायरी और ज्ञान की जिस रवायत में पले-बढ़े थे, उसके लिए भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का केंद्र कलकत्ता कल्चरल-शॉक से कुछ ज्यादा था। उन्हें वहां के फोर्ट विलियम कॉलेज में ज्ञान की एक नई प्रणाली का पता चला, जो अंग्रेजी हुकूमत को चलाने के लिए वहां शुरू की गई थी। उन्हें यह पता चला कि अंग्रेजों को भारत जैसे विशाल देश की सत्ता को चलाने के लिए ऐसे लोगों की सख्त जरूरत है जो हिंदुस्तानी जुबानों के साथ अंग्रेजी भी जानते हों। वे समझ गए कि मामला सिर्फ भाषा का नहीं है। वे जान गए कि वह पूरा संसार खत्म हो चुका है जिसके वे बाशिंदे थे। उनका अनुभूतिप्रवण मन यह भी जान गया कि उनकी उदासी और अवसाद की जड़ें उससे ज्यादा गहरी हैं, जितनी वे अब तक समझ रहे थे। बहादुरशाह जफर की दिल्ली तक महदूद प्रतीकात्मक बादशाहत, उसका गौरव लाल किला, कुतुबमीनार, बचपन के आगरे का ताजमहल, अकबर का बनवाया किला, फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा अतीत की निशानियां तो उन्हें पहले भी लगते थे, पर अब वे जान गए थे, कि वे एक खत्म हुए संसार के भग्नावशेष से अधिक कुछ नहीं हैं और वह संसार अब कभी नहीं लौटेगा। नया कोई संसार बनता हुआ भी उन्हें नहीं दिखा। कलकत्ता से वे बगैर पेंशन का मामला सुलझे अवसादग्रस्त उस शहर में लौट आए, उस दिल्ली में जो उनके अवसाद की ही प्रतिध्वनि था।
कोई अच्छा रिसर्चर गालिब की शायरी में निहित दुख और विषाद की, अस्तंगत मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश सत्ता की पराई निष्ठुर दुनिया में पसरी जड़ों की बेहतरीन शिनाख्त कर सकता है।
फिर इतिहास बीता। दो सदियां बीत गईं। आजादी की दो लड़ाइयां, दो मुल्कों की बंटी आजादी और लोकतंत्र की पौन सदी गुजर गई। भारत ने एक यात्रा तय की, अपनी बहुत-सी यात्राओं की तरह -- ज्ञान और शिक्षा की दिशा में भी। इस यात्रा का इतिहास लिखा जाना बाकी है। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद से पूरे सौ साल तक भारत हर दिशा से टूटा-- व्यापार, उत्पादन, शिक्षा। जो भी मध्यकालीन ढांचा था, जगह-जगह से चरमरा कर टूट गया।
यानी 19वीं सदी शुरू होते-होते ज्ञान और शिक्षा की स्थिति में भी अराजकता थी। दूसरी ओर मजबूत हो चुके ब्रिटिश साम्राज्य को अब अपने संचालन के लिए ज्ञान और शिक्षा का एक ढांचा निर्मित करना था। वह किया गया। हम सरल ढंग से यह मान लेते हैं कि इस तरह से भारत में आधुनिक शिक्षा का आरंभ हुआ। भारत में जो पढ़ा-लिखा वर्ग जन्मा उसमें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय चेतना इसी आधुनिक शिक्षा के माध्यम से उपजे और इस शिक्षित मध्यवर्ग ने राष्ट्रीय आंदोलन का निर्माण किया और भारत में समाज-सुधार से लेकर आजादी की लड़ाई तक को नेतृत्व दिया जिसके परिणामस्वरूप एक नया भारत जन्मा।
परंतु यदि पिछली दो सदियों का भारत में ज्ञान और शिक्षा का कोई आलोचनात्मक अध्ययन किया जाए तो कुछ अलग ही तथ्य सामने आएंगे।
दो सदियों पहले भारतीय समाज का उच्च मध्यवर्ग एक नई प्रणाली के तहत शिक्षित होना शुरू हुआ था। कुछ ही दशक में उच्च मध्यवर्ग के ठीक नीचे का मध्यवर्ग इस शिक्षा के दायरे में आया, उसके बाद आजादी से लेकर आज तक यह शिक्षा और ज्ञान समाज के अन्य नीचे के स्तरों तक पहंुचा। और आज औपचारिक-अनौपचारिक माध्यमों के जरिए भारत का लगभग संपूर्ण समाज ज्ञान और शिक्षा के इस ढांचे के तहत आ चुका है। अब यह ढांचा कैसा है, इसका निरंतर विकास किस तरह हुआ और आज यह कैसे परिणाम पैदा कर रहा है, भविष्य में यह किस तरह के मनुष्य और कैसा समाज रचेगा? ये प्रश्न बहुत जरूरी हैं।
यह जान लेना बेहद जरूरी है कि अंग्रेजों ने जो शैक्षिक ढांचा निर्मित किया था और प्रेस आदि विकास के जरिए दशकों के अनंतर जो अनौपचारिक जनशिक्षा का ढांचा 19वीं सदी में निर्मित हुआ था, उसने उन व्यक्तित्वों को, उस पूरी एक पीढ़ी को निर्मित नहीं किया था, जिसने भारत में समाज-सुधार और स्वतंत्रता के बेमिसाल संघर्षों का निर्माण किया और उसे नेतृत्व दिया।
ये लोग, ये पीढ़ी ब्रिटिश शैक्षिक ढांचे का नहीं, महान यूरोपीय पुनर्जागरण, प्रबोधन और फ्रांसीसी क्रांति से जन्मे आधुनिक जीवन-मूल्यों का उत्पाद थे। ये मूल्य बाबू पैदा करने वाली ब्रिटिश शिक्षा या उस वक्त शैशवकाल में चल रहे भारतीय प्रेस के जरिए नहीं आए थे।
राजा राममोहन राय, गांधी, अरविंद, आंबेडकर, नेहरू आदि ने लंबा अरसा इंग्लैंड में गुजारा, वहां शिक्षा प्राप्त की, वहां के समाज को देखा, कैंब्रिज, आक्सफोर्ड आदि के समाजवादी विचारों के शिक्षकों से पढ़े, वहां के अखबारों-पत्रिकाओं-पुस्तकों की दुनिया से वाकिफ हुए। यह एक प्रक्रिया थी, जिसके तहत वे समता-समानता-स्वतंत्रता की चेतना में दीक्षित हुए। यूरोपीय मानवतावादी विचारकों और यूरोपीय पुनर्जागरण ने ही ज्योतिबा फुले और विवेकानंद जैसी उन हस्तियों को भी एक नई चेतना दी, जिनकी शिक्षा-दीक्षा भले इंग्लैंड में नहीं हुई थी, पर स्वाध्याय के जरिए वे उन मूल्यों तक पहुंचे। फुले जॉन स्टुअर्ट मिल के विचारों से बहुत प्रभावित थे, वहीं दूसरी ओर विवेकानंद को निरे हिंदू संन्यासी में बदल चुका समाज यह जानने में पूरी तरह से अनिच्छुक है कि वे आसमान से उतरी कोई दैवीय शक्ति नहीं, अपितु श्रमसाध्य अध्ययन और गहन भावना से निर्मित एक दृष्टिवान क्रांतिकारी विचारक थे। यूरोप और अमेरिका के मानवतावादी विचारों के प्रभाव ने ही उन्हें प्राचीन भारतीय ग्रंथों से जीवंत तत्वों की जीवंत व्याख्या करने की राह दिखाई थी।
यह लंबा और जटिल विषय है। पर मूल बात यह है कि यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन की जिस ज्ञान-परंपरा ने भारत की आधुनिक चेतना के बंद द्वार खोले थे, वह समय के साथ अवरुद्ध होती गई।
भारत शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में प्रत्यावर्तन के पथ पर लौट गया। आज के समय की विद्रूपताओं के कुछ बीज-कारण यहां छिपे हैं। यह होना ही था। क्योंकि प्रबोधन और क्रांति के मूल्य जिन व्यक्तियों के जरिए भारत में पनपे वे उच्च वर्ग के ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें विदेशों में रहने और पढ़ाई का अवसर मिल सका। उन्होंने भरपूर मेहनत से इस आधुनिक मानवतावादी दृष्टिकोण को भारत के अवरुद्ध समाज में रोपने का प्रयत्न भी किया। पर वह पीढ़ी चली गई और उसके वैयक्तिक प्रयासों को संस्थागत स्वरूप न मिलने से वे प्रयास भी खत्म हो गए। संस्थागत स्वरूप ज्ञान और शिक्षा की जिस प्रणाली को मिला, उसका मोटा-मोटा वर्गीकरण यह है :
1. पिछले सौ वर्षों में प्रेस का अभूतपूर्व विकास हुआ और भूमंडलीकरण के बाद तो इसने शिक्षित, अशिक्षित, अद्र्धशिक्षित समस्त आबादी को अपने दायरे में ले लिया है। अब यह मीडिया है -- भारत में जनशिक्षा का अभूतपूर्व और विराट संजाल और अत्यंत प्रभावी। दुखद है कि पिछले तीस सालों में इसका जो थोड़ा-बहुत संबंध समता-स्वतंत्रता आदि से था वह भी समाप्त हो चुका है और यह भारतीय पूंजीपतियों के हाथों में पूरी तरह से जन-उत्पीड़न का एक अत्यधिक सशक्त और प्रभावी उपकरण है।
2. औपचारिक शिक्षा का समस्त सरकारी ढांचा चरमरा चुका है। इसने भी भारतीय प्रबोधन और स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों से निजीकरण के जरिए मुक्ति प्राप्त कर ली है।
3. औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरह के शिक्षा माध्यमों को बड़े ही कौशल से इस्तेमाल करते हुए समाज को पीछे ले जाने वाली हिंदू पुनरुत्थानवादी ज्ञान और शिक्षा की प्रणाली पिछले सौ वर्षों में एक खास विचारधारा और उसके आनुषंगिक संगठनों के नेतृत्व में एक निश्चित स्वरूप पाती गई है। और इसकी वर्तमान स्थिति यह है कि यह मीडिया, साइबर माध्यम, स्कूलों के संजाल और अब समस्त सरकारी संस्थाओं और नीतियों के जरिए दैत्याकार रूप ले चुकी है -- साथ ही भविष्य के गहन संकेत अपने भीतर लिए हुए है।
यह विचार करने की बात है जिस तरह से इलाहाबाद के संगम में क्षीण काल्पनिक सरस्वती होती है, ठीक उसी तरह से जन-प्रबोधन के दायित्व का दावा माक्र्सवादी विचारों और संगठनों द्वारा लगातार किया गया -- दोनों रूपों में -- भारतीय एकेडमिक तंत्र में प्रविष्ट होकर भी और तरह-तरह की लघुपत्रिकाओं, पुस्तिकाओं, प्रेस आदि के जरिए समाज में भी। यह पूरा प्रयास किस कदर आत्ममुग्ध, सीमित और जनता से कटा रहा, इसे क्या अब भी अस्वीकार किया जा सकता है? यह तर्क-वितर्क का विषय नहीं है, न ही जस्टीफिकेशन का या किन्हीं अवांतर शक्तियों पर दोषारोपण का। यह गहन आत्मनिरीक्षण का विषय है और आत्ममंथन का भी और सिर्फ रणनीतिक पराजय के स्वीकार तक रुकने का नहीं, बल्कि उन वैचारिक खाइयों की शिनाख्त का भी, जिनके कारण यह स्थिति हुई। यह स्थिति जो भयानक है -- दो सदी पूर्व आरंभ हुए भारत में नवचेतना के गहरे भाव को सामाजिक सन्निपात और पतन के महागर्त में ले आई है।
भारत में ज्ञान और शिक्षा देश की चेतना के निर्धारण में पूर्णतः विफल हुए हैं, इस यथार्थ का बोध अभी पूरी तरह से इसलिए नहीं है कि जब भूस्खलन शुरू होता है, तो उसके वास्तविक ध्वंस का अंदाजा तब तक नहीं लग पाता, जब तक वह संपूर्ण गति न प्राप्त कर ले।
इस स्थिति से निपटने का मार्ग भी ज्ञान, शिक्षा और संस्कृति के उन स्वरूपों के पुनर्निर्माण के लिए कार्य और संघर्ष से ही होकर जाएगा, जो यूरोपीय पुनर्जागरण, प्रबोधन, क्रांतियों से अर्जित मूल्य की बड़ी थाती को लेकर चले, भारतीय ज्ञान और शिक्षा के जीवंत तत्वों का नवीकरण करे और इस कार्य में पीढ़ियां खपा देने का हौसला रखे। यद्यपि हो सिर्फ अरण्यरोदन रहा है और किन्हीं शत्रुओं पर उनकी विजय के लिए किए गए दोषारोपण को सबसे बड़ा करणीय समझ लिया गया है।

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