ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एकाकीपन
01-Dec-2017 06:57 PM 1245     

ख़ाली झोली रीते हाथ
पूछ रही हूँ ख़ुद से आज
क्या खोया क्या पाया है
जीवन आज कहाँ ले आया है।

सब कुछ होकर कुछ भी नहीं
अपने हैं पर पास नहीं
यादों की अब क्या बिसात
हर ले जो सूनेपन का संताप।

किल्लोल करता वह बचपन
आँगन में पायल की रुनझुन
खोज रहा मन घर का मधुबन
जो वीराना-सा है आज।

अपने संगी साथियों के साथ
जब तुम घर वापस आते थे
सबके स्वागत में जुट जाती थी
वह सब याद आता है आज।

है स्मृति में आज भी वह दिन
जब मैंने तुम्हें विदा किया था
एक विश्वास रहा था मन में
लौटोगे पूर्ण कर अपने काज।

ख़ाली झोली रीते हाथ
पूछ रही हूँ खुद से आज।
तुम्हारी थोड़ी-सी पीड़ा पर
मैं बेचैन हो जाती थी
आँखों से दूर कैसे हो अब
जान नही पाती हूँ आज।

फोन पर सुन आवाज़ तुम्हारी
मन को बहला लेती हूँ
परिचित जब हाल पूछते तुम्हारा
विषय बदलने का करती प्रयास।

बैठी हूँ मैं आस लगाये
कब आओगे आँखों के तारे
वादों पर वादे करते सुनते
बीता कितना समय नहीं कुछ याद।

प्रभु की कृपा हमेशा बनी रहे
नहीं भूलना अपनी पहचान
मेरे जीवन के अंतिम बेला में
हो सके तो आना तज सब काज।

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