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एक पुरानी चट्टान
01-Sep-2016 12:00 AM 5317     

आज जब हम अंग्रेजी हटाने की बात करते हैं, तब सवाल अंग्रेजी का नहीं है। सवाल तीन हजार साल पुरानी आदत बदलने का है। यह चट्टान अंग्रेजों ने हमारे ऊपर नहीं रखी है। वह एक प्रागैतिहासिक चट्टान है, जो आजादी के ज्वालामुखी में तप रही है और लावा बनकर बहना चाह रही है।

भाषा के मामले में भारत उस लंगड़े आदमी की तरह है, जो तीन हजार सालों से बैसाखियों के सहारे
चल रहा है। अब ये बैसाखियां पैरों से अधिक स्वाभाविक बन गई है और जब यह प्रस्ताव आता है कि हम अपने पैरों के बल चलें, तो हम भयभीत हो जाते हैं।
इस देश का सबसे पहला "अंग्रेजी हटाओ" आंदोलन गौतम बुद्ध ने शुरू किया, जब उन्होंने संस्कृत के बजाय लोकभाषाओं को प्रतिष्ठित करने की कोशिश की और पाली में धर्मग्रंथ लिखे। यह ढाई हजार साल पहले की बात है। लेकिन संस्कृत नहीं हटी और उसने कालिदास और भवभूति पैदा किये।
यह बहस करने लायक प्रश्न है कि अगर लोक भाषा और देव भाषा के बीच इतनी खाई यहां नहीं होती, तो क्या हमारा साहित्य और अधिक समृद्ध नहीं होता? क्या कालिदास कुछ और ऊँचे नहीं होते।
इस प्रश्न के साथ कुछ बड़े राजनैतिक प्रश्न भी जुड़े हुए हैं, जिनसे भारत की किस्मत बदल सकती थी। देव भाषा और लोक भाषा के बीच जो खाई यहां है, वह शासक और शासित, बुद्धिजीवी और जनता की, ब्राह्मण और शेष जातियों की खाई है। प्रश्न यह है कि अगर यह खाई खत्म नहीं होती, तो क्या भारत का पतन होता?
यों ऐसी खाई यूरोप में भी रही है। लेकिन जबसे यूरोप में रिनेसां (पुनर्जागरण) शुरू हुआ, तबसे उन्होंने वह दीवारें तोड़नी शुरू कीं, जो देव-भाषा और लोक भाषा को अलग करती है। लेटिन और ग्रीक का जब नयी भाषाओं के साथ संगम हुआ, तो पश्चिम की आधुनिक सभ्यता ने जन्म लिया।
भारत में दीवार तोड़ने की कोशिश अनादि काल से हो रही है, लेकिन हमारे यहां रिनेसां कभी नहीं आया। गौतम बुद्ध के 2200 वर्ष बाद जब तुलसीदास ने रामायण लिखी, तो पंडितों ने इस "भाखा" की किताब को गंगा में फेंक दिया। तब गंगा को लोक भाषा की लाज रखनी पड़ी और (जनश्रुति के अनुसार) रामायण तैरने लगी। इस चमत्कार से भयभीत होकर पंडितों ने रामायण को पूज्य मान लिया। भारत में जो बात तर्क से नहीं मानी जाती, वह चमत्कार से मान ली जाती है। अगर दिल्ली के दफ्तरों में हिन्दी की फाइलों के सारे अक्षर एकाएक सुनहरी हो जाएं, तो शायद हिन्दी का महत्व मान लिया जायेगा।
आर्यों से लेकर अब तक भारत ने तीन बार बैसाखियां बदलीं। सबसे पहले संस्कृत थी, फिर फारसी आई और अंत में अंग्रेजी। आज जो तर्क अंग्रेजी के समर्थन में दिये जाते हैं, वे भारत के इतिहास के किसी भी युग में संस्कृत या फारसी के लिये दिये जा सकते थे।
सबसे बड़ा तर्क तब भी यह था कि भारत को एक संपर्क भाषा चाहिए। केरल के शंकराचार्य बद्रीनाथ जाकर शास्त्रार्थ कैसे करें? (अगर बद्रीनाथ नहीं तो ओंकारेश्वर, जहां कहते हैं उनका मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ हुआ था।) ज्ञान की अखिल भारतीयता कैसे बनी रहे? वेदों और उपनिषदों के भाष्यकार एक-दूसरे से परिचित कैसे हों?
जब मध्य युग आया, तो देश में धर्म की भाषा संस्कृत हो गई और सांसारिकता की फारसी। हिन्दू राजाओं का कारोबार भी फारसी में चलने लगा। अंग्रेज लोग जब पहले बंगाल में आए, तो वे दो भाषाएँ सीखते थे- बंगला और फारसी। कुछ विद्वान लोग संस्कृत भी सीख लेते थे। इस तरह वे हमारे इतिहास की तीन सतहों से परिचय प्राप्त करते थे। (वही त्रिभाषा फार्मूला)।
अंग्रेजी के विरोध में सबसे बड़ा तर्क यह है कि वह दो प्रतिशत (तथाकथित) बुद्धिजीवियों को 98 प्रतिशत जनता से अलग करती है। लेकिन भारत में दो प्रतिशत देव भाषा बोलने वाले हमेशा ही अलग रहे हैं और जनता पर राज करते हैं। आज जब हम अंग्रेजी हटाने की बात करते हैं, तब सवाल अंग्रेजी का नहीं है। सवाल तीन हजार साल पुरानी आदत बदलने का है। यह चट्टान अंग्रेजों ने हमारे ऊपर नहीं रखी है। वह एक प्रागैतिहासिक चट्टान है, जो आजादी के ज्वालामुखी में तप रही है और लावा बनकर बहना चाह रही है।
देवभाषाओं के मोह ने भारत को सदियों से एक नकलची और दूसरे दर्जे का देश बना रखा है। संस्कृत में तो फिर भी ऊंचे दर्जे का साहित्य है, क्योंकि यायावर आर्य भारत आकर खेतिहर बनते गये और संस्कृत का विकास होता गया। केवल संस्कृत ही नहीं, एक पूरी सभ्यता का विकास होता गया, जिसकी जड़ें इस देश में थीं। फारसी की (और मुस्लिम साम्राज्य का) कुछ जड़ें इश देश में थीं और कुछ बाहर। कोई भी मुस्लिम शासक यह नहीं भुला सका कि वह इस्लाम के अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन का अंग है।
अगर 1947 में पाकिस्तान नहीं बनता, तो भारत की भाषा समस्या का एक और कोण होता। तब शायद हिन्दी-ऊर्दू के बीच वह झगड़ा होता, जो आज हिन्दी और दक्षिण की भाषाओं के बीच है। गांधीजी के जमाने में ऐसा झगड़ा था भी। इसीलिए तब कांग्रेस "हिन्दुस्तानी" नामक एक भाषा को राजभाषा बनाना चाहती थी, जिसमें हिन्दी और उर्दू के मिले-जुले शब्द हों। जब तक संविधान परिषद् ने हिन्दी को स्वीकार नहीं कर लिया, तब तक जवाहरलाल नेहरू हिन्दुस्तानी की वकालत करते रहे और हिन्दी को उन्होंने कड़वे घूंट की तरह मंजूर किया। गांधीजी प्राय: कहा करते थे कि हिन्दुस्तान के हर बच्चे को उर्दू सीखनी चाहिए। इससे सिद्ध होता है कि भाषा का हमारे यहां राजनीति से कितना गहरा संबंध है। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू या हिन्दुस्तानी का झगड़ा निपटा दिया है। लेकिन जब से भाषावार प्रांत बने हैं, तब से हिन्दी की फजीहत हो रही है।
फारसी भारत में वर्षों चली लेकिन उसने कालिदास पैदा नहीं किया। फारसी साहित्य के इतिहास में कितने हिन्दुस्तानियों का नाम शामिल किया जाता है।
फिर अंत में अंग्रेजी आई, जिसकी सारी जड़ें बाहर थी और केवल शाखाएं भारत में थीं। मुगलों के जमाने में एक मौलिक सभ्यता फिर भी भारत में पनपीं, जिसने हमें अकबर और ताजमहल दिये। लेकिन आंग्ल-भारतीय सभ्यता की मौलिक उपलब्धियां सचमुच सबसे कम हैं।
आंग्ल-भारतीय सभ्यता ने हमें कांग्रेस नामक संगठन दिया और राजा राममोहन राय से लेकर जवाहरलाल नेहरू तक सारे नेता दिये। उसने भारत को आजादी दी। उसने रेलें और डाक खाने और आईसीएस अफसर दिये। लेकिन यह सब अंग्रेजों का कर्ज था, कोई नया या मौलिक समन्वय नहीं, जैसा कि दो सभ्यताओं के मिलन से पैदा होता है। अगर ऐसा मौलिक समन्वय होता, तो वह यूरोप की संस्कृति धारा को प्रचुर बनाने वाला एक नया योगदान माना जाता। इस्लाम शायद हमारा कुछ कर्ज मंजूर कर ले, लेकिन यूरोप हमारा कोई कर्ज मंजूर नहीं करेगा। हमने लिया ही है, दिया कुछ नहीं।
भारत की जमीन पर जितना अधिक रासायनिक खाद डाला गया है, उतनी ही उसकी उर्वरता नष्ट हुई है। विदेशी भाषाएं रासायनिक खाद हैं। विदेशी आक्रमण रासायनिक खाद हैं। उनके बूते पर कुछ दिन यहां फसल लहलहाती हैं। लेकिन आज हम आजाद हैं और सोच रहे हैं कि बंजर जमीन पर कैसे खेती करें। आक्रमण तो हम मांग नहीं सकते। इसलिए हम विदेशी पैसा, विदेशी विशेषज्ञ, विदेशी साज-सामान, विदेशी संस्कृति मांग रहे हैं। अंग्रेजी हटने का संबंध इन सब चीजों के हटने से है और भारत की मौलिक प्रभुता (या मूढ़ता) के मुखरित होने से है।
गीता में लिखा है : स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:। क्या पराई भाषा की सरस्वती कंठ में आसीन करने के बजाय अपनी भाषा में जैसे-तैसे तुतलाना ज्यादा अच्छा है।
दरअसल भारत के सामने सवाल भाषा से कहीं अधिक बड़ा है। सवाल यह है कि अपनी मुक्ति, अपनी सार्थकता हम अपने अंदर खोजें या बाहर खोजें। बाहर तो खैर कोई मुक्ति खोज ही नहीं सकता। होता यह है कि बाहर वाले अपनी मुक्ति भारत के माध्यम से खोज लेते हैं। तीन हजार साल से यह हो रहा है। लेकिन अब 15 अगस्त, 1947 से हम पर यह जवाबदारी आई है कि अपनी सार्थकता हम स्वयं खोजें। यह काम बड़ा दुष्कर और अटपटा है, मानो मछली को कह दिया गया हो कि वह हवा में सांस लेना सीखें। हमारी सारी छटपटाहट का रहस्य यही है।
इसलिए इतने प्राचीन इतिहास के बावजूद हमें मानो नये सिरे से शुरू करना है। अब तक हम चांद की तरह थे, जो बाहरी प्रकाश में चमकता है। अब हमें तय करना है कि रोशनी उधार लेते रहें या समूचे अंधकारमय हो जाना पसंद करें, ताकि आगे-पीछे आत्मप्रकाशित हो सकें।

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