btn_subscribeCC_LG.gif
एक नई भोर
01-Feb-2016 12:00 AM 1114     

तूम पुरुष हो ना
क्यों न हो तुममें दम्भ
तुम पैदा ही ताकतवर हुए
तुम्हारा बनाया समाज
ख़ूब पोसता है तुम्हारे दम्भ को
सिखाता है तुम्हें
कि तमाम कमियों
तमाम ख़ामियों के बावज़ूद
तुम्हीं हो मुखिया
घर-संसार के मालिक
रखना ही होगा तुम्हें अंकुश
कि स्त्रियाँ
अगर लाँघ गर्इं देहरी
तो नाप लेंगी आकाश।

सदियों से
तुम्हारी नस-नस में
बह रहा है सामंतवाद
और
छटपटा रही हैं स्त्रियाँ
आज भी एक गवाक्ष को।

नैराश्य के अंधकार में
देख कुछ उम्मीद के जुगनू
स्त्री के जुझारू सपने
पा लेते हैं नया हौंसला
जुटाते हैं पूरी ताकत
तौलते हैं पंख
भरते हैं उड़ान
अनजान क्षितिज की ओर।

साथ है उनके
कुछ जुगनुओं की रोशनी
उम्मीद की डोर
कि क्षितिज के पार
खड़ी है बाँहें फ़ैलाए
एक नई भोर।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^