ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एक और सच
01-Dec-2018 06:56 PM 733     

सामने औंधे मुँह पड़ी वह औरत बस हड्डियों का ढाँचा मात्र थी जो जरा भी हिलाने-डुलाने क्या, छूने तक से टूट सकती थी। सूखे फूल-सी झर सकती थी। मुझे यह सब तभी समझ लेना चाहिए था जब सुबह-सुबह, सात बजे, बारबरा का फोन आया था- "हमारी मदद करो। यहाँ क्राइसिस सेंटर में एक हिन्दुस्तानी औरत है, जिसने हफ्ते भर से कुछ भी नहीं खाया-पिया। स्नान तक नहीं किया है। किसी से बात नहीं करती। पास तक नहीं आने देती। पुलिस जब से छोड़कर गई है, ऐसे ही चुपचाप, एक ही जगह पर गुमसुम बैठी है। हम सबको बहुत फिकर है इसकी। शायद अंग्रेजी न बोल पाती हो, शायद तुम्हारे आगे ही खुले और तुमसे ही कुछ मदद मिल जाए इसे? क्या पता तुम ही इसके लिए कुछ कर पाओ?"
देखते ही सब कुछ समझ में आ गया। बात बस हिन्दी या अंग्रेजी बोलने तक नहीं थी। सिर्फ कुछ सवाल और जबाव की नहीं थी। मुरदे में जान फूंकने जैसी, कठिन और दुर्लभ थी। कमरे की मरघटे वाली उदास गंध दूर से ही पहचानी जा सकती थी।
मैली-कुचैली वह औरत सो रही थी या जग रही थी, यह तो नहीं जान पाई, पर इतना निश्चित था कि उसने खुद को काट कर कब का दुनिया से अलग कर लिया था। उस बीमार-उदास भभके को झेलती मैं खुद भी वहीं जमीन पर, उसके पास ही बैठ गई। आकंठ डूबी इस औरत से क्या और कैसे कहूँ, समझ नहीं पा रही थी। उसे बचाने आई थी और अब उस कमरे में आकर खुद भी डूबने लगी थी। इतना अंधेरा कि चेहरा देखना तो दूर अपना हाथ तक नहीं देख पा रही थी। बैठे-बिठाए क्या मुसीबत मोल ले ली। खुद को धिक्कारती उठी और कमरे के परदे और खिड़की दोनों ही खोल दिए। ताजी हवा की जरूरत हम दोनों को ही थी।
थोड़ी ही देर में उन अस्त-व्यस्त कपड़ों के ढेर में थोड़ी-सी हलचल हुई और कांपते पैर सिकुड़कर सीने से सट गए। मैंने बिस्तर का कंबल उठाकर उसे उढ़ा दिया। वह औरत शायद पूरी तरह से अचेत नहीं थी, क्योंकि कंबल हलका-हलका, दबी-घुटी सांसों और सिसकियों से बीच-बीच में हिल रहा था, गहरी सांसें ले रहा था।
हिम्मत करके हाथ उस कंबल पर रख दिया। उसके दुख से बीमार शरीर को आहिस्ता-आहिस्ता सहलाने लगी, "इस तरह से मन दुखाने से क्या फायदा? तुम चाहो तो हमारी मदद ले सकती हो। अपनी परेशानी दूर कर सकती हो।"
कोई जबाब नहीं मिला। सिसकियां जरूर तेज हो गईं। शायद सहानुभूति के कान आदी नहीं थे ेेया फिर थोड़ा और अपनापन मांग रहे थेेेे, बालों में उंगलियाँ फेरते हुए मैने पूछा,
"कहां से आई हो?"
"अबरगवानी से।"
आवाज मानो गले से नहीं किसी अंधे कुँए से आ रही थी। हफ्ते भर मौन रहकर बोला जाए, या बस रोते ही रहा जाए। वह भी ग्लानि और खून के आंसूूूू तो शायद ऐसी ही अस्फुट और फसफसी-सी आवाज ही निकलती है।
"मैं यहां, इस देश की नहीं, अपने देश की बात कर रही हूँ?" एक पतली सी सहायता की डोर मैंने उसकी तरफ फेंकने की कोशिश की।
पता नहीं भाषा का अपनापन था या वेशभूषा का, हम दोनों जुड़ रहे थे। उसने न सिर्फ आंखें खोल ली थीं वरन् आंसू भरी आंखों से मेरी तरफ देख भी रही थी ।
"क्या नाम है तुम्हारा?"
"कनकलता, हम भागलपुर, बिहार से हैं।"
अब वह मेरी बात न सिर्फ सुन रही थी अपितु थोड़ा-थोड़ा मुझे समझ भी रही थी। मेरे होठों पर भी अपनेपन की मुस्कान आ गई। माथे पर लगातार चमकती, गिरी बिन्दी का फीका सफेद निशान और पैरों में पड़े हुए बिछुए बता रहे थे कि सफल या असफल जैसी भी हो कनक की शादी हो चुकी थी और पति जिन्दा था।
"तुम्हारे पति का क्या नाम है?"
"हैरी प्रसाद।"
"हैरी प्रसाद!" मैंने शब्द हल्के आश्चर्य से दुहराए। वैसे तो हरि का हैरी और जयकिशन का जैक्सन बनना यहां आम बात थी।
तब पहली बार मुंह पर नयी-नवेलियों की लाली और झिझक के साथ उसने मुझे बताया कि उसके सास-ससुस ने वैसे नाम तो हरिप्रसाद ही रखा था पर जबसे यहां आया है, सबको हैरी ही बतलाता है। अब तो मरीज भी उसे डॉ. हैरी ही कहकर बुलाते हैं।
"मरीज..." मेरा आश्चर्य और कौतुहल दोनों ही बढ़ते जा रहे थे, "क्या करते हैं तुम्हारे पति?"
"जी.पी. हैं यहीं अबरगवानी में।"
"तुमने पहले क्यों नहीं बताया कि तुम डॉ. प्रसाद की पत्नी हो?" मैंने आश्चर्य के साथ पूछा। "डॉ. प्रसाद तो यहां के सफल मनोवैज्ञानिक माने जाते हैं। उनकी पत्नी यहाँ, इस हालत में?"
"पत्नी नहीं, बस ब्याहता ही कहो। पत्नी के सारे सुख तो अल्वा ले रही है।"
"यह अल्वा कौन है?" अब मेरा कौतुहल छुपाए नहीं छुप रहा था।
"उसकी दूसरी।"
"दूसरी क्यों? पत्नी क्यों नहीं?" मैंने बातचीत को कुरेदते हुए पूछा।
"इसलिए, क्योंकि विधि-विधान से शादी नहीं हुई। बस कागज पर दस्तखत करके घर में आ बैठी। न किसी ने कन्यादान किया, न किसी ने मंत्र पढे। आगे-पीछे कोई नहीं था। इसके ही अस्पताल में नर्स थी। वहीं संग काम करतेे-करते फांस लिया होगा? मेरी मौसी ने तो सगाई के वक्त ही कहा था कि ये डॉ. बडे रसिया होते हैं, चौबीसों घंटे इनकी नर्सों से छेड़़-छाड़ और हंसी मजाक चलती रहती है। पर पापा ने तुरंत ही बात काटी थी- हंसी-मजाक नहीं करें तो चौबीसों घंटे जीवन और मौत से कैसे खेल पाएं बेचारे? वे तो इसके गुण गाते-गाते न थकते थे। डॉ. लड़का तो ढूंढे नहीं मिलता, जहां बैठ जाए रोटी कमा ले, जहां खड़ा हो जाए वहीं इज्जत पाए।
मेरी ही किस्मत खोटी थी जो यह ऐसा निकला। नहीं तो लोगों के तो खोटे सिक्के भी खूब चलते हैं। फिर कोई सभी डॉ. खराब ही थोड़े होते हैं। दुनिया में एक से एक शरीफ डॉ. भी हैं। इस अल्वा की भी थोड़ी बहुत गलती तो होगी ही? देखा होगा बड़े घर का लड़का है, बस आ चिपकी। बिना देखे, कि आगे पीछे कौन-कौन हैं, किसका घर तोड़ रही है? वैसे भी इन छोटी जात वालों में तो यह सब चलता रहता है। छोटी जात की ही है-तभी तो आंखों में शरम का एक भी बाल नहीं। एक दिन खुद ही बता रही थी कि इसके बाप-दादे बरसों पहले सड़क बनाने बंधुआ मजदूरों की तरह अफ्रीका गए थे। शायद यही था इसमें जो मुझमें नहीं और शायद यही था जो इसे पसंद भी आया!"
उन झुकी हुई आंखों का आक्रोश और दुख मेरे मन को छू रहा था, विचलित कर रहा था-
"तुमने कोई भी विद्रोह नहीं किया। आवाज नहीं उठाई कि तुम्हारे रहते यह सब नहीं कर सकता वह?"
"पर मैं यहां होती, तभी तो आवाज उठाती। मैं तो वहां मोतीहारी में बैठी अपने राकेश को पाल रही थी। जरा सा बेटा समझदार हो जाए तो पति के पास जाऊं, ऐसे रंग-बिरंगे सपने देख रही थी।" ब्लाउज के अन्दर से, कहीं सीने में छुपी, उसने एक सुन्दर और स्वस्थ सात-आठ साल के बच्चे की तस्वीर मेरे आश्चर्य से फैले हाथों पर रख दी।
"जब मेरे भाइयों को पता चला तो वहां गांव में तो लठ्ठ चल गए। सुनते हैं पांच महीने की गाभिन भी थी यह तभी शादी के समय। पता नहीं प्यार करता था या इसी दबाब में शादी कर ली। बाद में वह बच्चा भी खराब हो गया। आज तक वैसी की वैसी ही है। दूसरे का घर फूंककर भला कौन सुखी रह पाया है? बस मेरी छाती पर मूंग दलने के लिए, मेरे घर में घुस आई। मेरे ही दूध पीते बेटे से बाप छीन लिया। पर किसे दोष दूं? कोई सी भी जांघ उघाडूं, नंगी तो बस मैं ही होती हूं।
अगले हफ्ते ही मेरे ससुरजी मुझे यहां इसके पास छोड़ गए थे। इस धमकी के साथ कि देवताओं को हाजिर-नाजिर मानकर हाथ पकड़ा है, मांग भरी है। अब जीते-जी निभाना तो पड़ेगा ही। मैं अभागिन भी इस अनकही शर्त पर सब हार बैठी, बेटे की खातिर इनकी चाकरी में जुट गई, बस रोटी और एक कोठरी की तनख्वाह पर। नौकरानी, मेहतरानी, सब बन गई। ये भी खुश थे और मैं भी। इनका घर चल रहा था और मैं अपनों की आंख में, पति के घर में रह रही थी। क्या कहते हैं आपकी अंग्रेजी में श्रीमती कनकलता प्रसाद से बस एक हाउस मेट बनकर। यह बात दूसरी है कि इन लोगों ने मुझे मेट नहीं हाउसकीपर या हाउसहेल्पर ही कहा। अंग्रेजी में कहो या हिन्दी में अर्थ तो नहीं बदल जाता। गाली तो गाली ही रहती है, फाउल माउथ तो साफ नहीं हो पाता। मैं चुपचुप हर एब्यूज और दुव्र्यवहार सहती झेलती रही। भूखी-भूखी पिटती और खटती रही। खाना बनाती, छाड़ू-पोंछा करती, कपडे-बिस्तर सब कुछ और शाम होते ही इसके आने के पहले चुपचाप आंसू पीकर अपने कमरे में बन्द हो जाती।
यही मेरा काम था। यही मेरी डयूटी थी। यही बताया था मुझे अल्वा और इसने। इसके बदले में यह मेरे बेटे को पांच हजार रुपए हर महीने भेजता था। कितने कम पैसों में दोनों जिम्मेदारियां निभ जाती थीं। बाप का फर्ज और ब्याहता का कर्ज। कितनी आसानी से, दोनों से ही सिलट जाता था यह। और शायद इसकी आत्मा भी नहीं कचोटती थी कि मुझसे मुफ्त में काम करा रहा है। वैसे पता नहीं आत्मा थी भी या नहीं। पर मैं खुश थी। मेरा राकेश माउन्ट-टव्यू स्कूल, बंगलौर में पढ़ रहा था और एक दिन जब बड़ा होकर, खूब बड़ा आदमी बनकर आएगा, मेरे सारे ही आंसू पोंछ देगा। अब तो शायद इसके कंधे तक आता होगा। क्या पता हल्की-हल्की मूंछें भी आ गई हों। इससे तो बहुत अच्छी कद-काठी का है वह। पता नहीं मुझे पहचान भी पाएगा या नहीं?" बेटे की याद आते ही कनकलता अपने दुख को थोड़ी देर के लिए बिल्कुल भूल गई। उसकी गर्वीली दीप्त मुस्कान तैरकर आंसुओं के संग पूरे चेहरे पर फैल गई।
"पर यह सब कैसे हुआ?" उसकी जली पीठ के घाव और टूटी कंधे की हड्डी के बारे में चाहकर भी, मैं खुलकर कुछ भी तो नहीं पूछ पा रही थी।
"यह सब तो मेरी नौकरी के साइड पर्क हैं।" उसने दर्द से तार-तार, रोने से भी बदतर मुस्कुराहट से मुझे बताया- "यह तो रोज की ही बात है। कभी मंहगी क्राकरी टूट जाने से, तो कभी हारी-बीमारी की बजह से। जब भी काम रह जाए तभी। शुरु-शुरु में तो बस डांट पड़ती थी, फिर मार पड़ने लगी। और फिर जब मेरे दुखते तन और मन से गलतियां होती ही गईं, तो बात शारीरिक दुव्र्यवहार तक जा पहुंची। पर जलते गरम चिमटे से तो मैं डॉ. वर्मा से मिलने के बाद ही पिटी थी।"
दो पल रुककर कनकलता ने अपने उमड़ते दुख को लगाम देनी चाही फिर बिना कुछ पूछे, बिना कुछ सुने ही, बोलती चली गई। मानो मुझसे नहीं खुद से बात कर रही हो, मानो आज एकबार सब कुछ दबा-ढंका याद करके हमेशा के लिए भूलना चाहती हो या फिर बरसों का पकता फोडा आज हलके से छू भर जाने से लपलप फूट पड़ा था। और अब इस सारे सडे-ग़ले मवाद और पानी को बहाकर ही रुक पाएगा।
"डॉ. वर्मा हमारे पास के दरभंगा के ही थे। उनकी पत्नी शीला से मैं यूं ही बाजार में आते-जाते मिल गई थी। बाद में जब उन्हें पता चला था कि वह मेडिकल स्कूल में मेरे बड़े भाई के साथ ही पढ़ी थीं, तो मेरे लिए उनके मन में एक हमदर्दी, एक अपनापन-सा हो गया।
कभी-कभी तो वह खुद ही शाम को मेरे पास आने लगीं, मुझे भी बुलाने लगीं। ऐसी ही एक दीवानी शाम को मैं अपने घर और अपने बारे में सबकुछ बता बैठी। घर की इज्जत भरे बाजार में उघाड दी। बातों-बातों में बात डॉ. वर्मा के कानों तक जा पहुंची। वह खुद मुझसे पूछने आए कि उन्होंने जो कुछ सुना है, समझा है, क्या सच है? मैं अभागिन जबाब तक न दे पाई, बस फूट-टफूटकर रोती रह गई। कैसे कहती कि मेरी मांग तो सिन्दूर से ही भरी गई थी पर मैं कुलच्छिनी ही कुछ न संभाल पाई और न जाने कब अपनी मांग राख से भर लाई। उन्होंने मुझे छोटी बहन की तरह सान्त्वना दी। समझाया कि सब फिर से ठीक हो जाएगा। वह इस नर्स अल्वा को निकालकर ही दम लेंगे। जरूरत पड़ी तो मार-पीट से भी नहीं हिचकिचाएंगे। क्योंकि एक बीबी के रहते दूसरी शादी न भारत में की जा सकती है और न यहां यूरोप में। हमारा बेटा राकेश भी यहां आ जाएगा। और तब हम खुशी-खुशी एक साधारण परिवार की तरह साथ-साथ ही रहेंगे।
और अगर हैरी नहीं माना, उनकी बात नहीं सुनी, तो वह उसकी अकल ठिकाने लगवा देंगेेेे जेल तक भिजवा सकते हैं। इतनी पहुंच और पहचान तो उनकी है ही यहां पर। ससुरा, साइकैट्रिस्ट बनना चाहता हैै अपने घर तक को तो संभाल नही पा रहा, मरीजों की मानसिक बीमारी क्या दूर कर पाएगा? और उसी दिन शाम को ही डॉ. वर्मा ने मेरे पति का कॉलर कार से निकलते ही, वहीं घर के दरवाजे पर ही पकड़ लिया। खड़े-खड़े ही घंटों दोनों में बहुत सारी बातें हुईं। और उस दिन, पहली बार मैं आउट हाउस में नहीं, अपने घर के अंदर सोई। अगले दिन मैंने भगवान के आगे माथा भी टेका था। शायद अब मेरे दिन फिर जाएं? अब ससुराल और मायका दोनों ही फिर से जो मिल गए थे मुझे। पर वह लंगड़ी खुशी ज्यादा दिन तक न चल सकी। महीने भर के अन्दर ही हम सब केन्ट से उठकर वेल्स के इस छोटे से गांव में आ गए। उसके बाद तो किसी भी परदे की जरूरत नहीं थी। मैं बस मेट लता थी। बाहर की दुनिया से मेरे सभी कौनटैक्ट तोड दिए गए थे। राकेश की खबर और चिठ्ठियां तक मिलनी बन्द हो गईं।
मैके, ससुराल किसी ने भी पलटकर मेरे बारे में नहीं पूछा। शायद सबको ही विश्वास हो गया था कि कनकलता नाम की औरत अब जिन्दा ही नहीं हो सकती।
उसके बाद की कहानी आपके आगे है। हैरी जिस बदहवासी और नफरत से मुझे मारता-पीटता था, उससे किसी पत्थर का सीना भी चटक जाता पर मैं तो जाने किस मिट्टी की बनी हूं? कुछ भी नहीं चटका-टूटा। एक दिन जब मेरी चोटों से अल्वा डर गई या उसे लगा कि अब मैं किसी काम की नहीं, तो घर से बाहर निकाल फेंका। और हैरी से छुपकर पुलिस को फोन भी कर दिया। और इस तरह से मैं यहां, आप लोगों के पास, बोझ बनकर रहने आ गई। एक अनबूझ पहेली-सी, आप सबका कौतुहल बन गई। कहते हैं इन जगहों का पता सबको नहीं मिल पाता, तभी तो वह मुझे ढूंढ नहीं पाया है या शायद उसने इसकी जरूरत ही नहीं समझी होगी।"
उसकी आंखों की नकारात्मक खाइयों में लगा वह खुद को कब का डूबो चुकी थी। इतनी घृणा और नफरत की जिन्दगी एक ही जीवन में जी पाना इतना आसान तो नहीं। जिन्दगी किसी के लिए इतनी कडवी और दगाबाज हो सकती है यह मेरे लिए आज एक नया और घिनौना सच था। जी करा कि उस सामने दुहरी बैठी कनक को बांहों में भर लूँ। बच्चों सा प्यार दूँ।
चौके से गरम-गरम सूप ले आई और अपने हाथों से उसे पिलाने लगी। उसकी आंखों का हर आंसू चुपचाप बहकर मेरे मन में उतर रहा था। अब शायद वह बहुत थक गई थी। उसे आराम चाहिए था। नहाना-धोना तो कल भी हो सकता है। मैंने उसके रूखे और उलझे बाल, हलका-सा तेल लगाकर काढ़ दिए। शायद थोड़ा चैन मिला हो। साफ-सुथरे, अभी-अभी बदले बिस्तर में उसे लिटाकर मैंने पूछा, "कनक अब तुम्हें आराम करना चाहिए मैं कल फिर आऊंगी। खूब सारी बातें करेंगे और बंगलौर में राकेश से भी तुम्हारी बात करवाएँगे। तब तक तुम अपना ध्यान रखना और आराम से सोना। मैं यह बत्ती बन्द कर देती हूँ, पर यह नाइट-लाइट जली छोड़ देती हूं। यह कॉल-बेल भी तुम्हारे बिस्तर के पास ही है। किसी भी चीज की जरूरत हो तो बुला जरूर लेना, नर्स तुरंत ही आ जाएगी। तुम काफी कमजोर और बीमार हो। तुम्हें मदद लेने में झिझकना नहीं चाहिए। आदमी ही आदमी के काम आता है। तुम ठीक हो जाओ, तो चाहो तो, तुम भी कई दीन-दुखियों की मदद कर सकती हो। तुम्हारा काम मैं यहीं पर लगवा दूंगी। यह पानी का जग और थोडी-सी दर्द की गोलियां छोडे जा रही हूं। जरूरत समझो तो ले लेना।"
उसने बेहद थकी नजरों से मेरी तरफ देखा और विदा में हाथ जोड़ दिए।
सुबह-सुबह फिर से फोन की कर्कश घंटी बजी और फिर से नींद पूरी होने से पहले ही मेरी आंख खुल गई। आज तो सात भी नहीं, सुबह के छह ही बजे थे। लाइन पर फिर से बारबरा ही थी। जल्दी से आओ। तुम्हें मेरी मदद करनी है। इट इज एन इमरजेंसी। मैं कुछ पूछूं, कहूं, इसके पहले ही वह फोन रख चुकी थी।
आधे घंटे के अंदर ही मैं क्राइसिस सेंटर में थी। सब लोग इधर-उधर दौड़-भाग रहे थे मानो आज इस सेंटर में कोई बडी सी क्राइसिस टूट पडी थी। रिसैप्शन पर ही ली ने कनक के कमरे की तरफ जाने का संकेत कर दिया। धड़क़ते दिल से मैं लिफ्ट का कॉल-बटन दबाकर, बेचैन, सीढियों पर दौड पड़ी। लिफ्ट का खुला दरवाजा कुछ देर इंतजार करके, यूं ही बन्द हो गया।
सामने बारबरा दरवाजे पर ही खड़ी मिली, लगता है रात में ही सब खतम हो गया। हमने तो सोचा था कि शायद अब खुली है, तो ठीक ही हो जाएगी।।
मेरी नजर चैन से सोई कनकलता पर पड़ी, क्या बात है? क्यों तुम परेशान हो बारबरा, यह तो बस सोई हुई है? मैने खुद को तसल्ली देनी चाही।
"शायद कौरोनर केस हो। इस बृहस्पतिवार को ही क्रिमिनेशन है। यहीं फॉरेस्ट एकड ग्ऱेवयार्ड में। आ पाओगी, तो अच्छा ही होगा। हमें तो तुम्हारे हिन्दु संस्कारों के बारे में कुछ भी पता नहीं। तुम शायद जानती हो या किसी से पूछकर ही आ जाना। बेचारी की आत्मा को शान्ति मिल जाएगी। वैसे भी, हमें तो नहीं पता कि इसका कोई रिश्तेदार है भी, या नहीं? तुम्हें किसी के बारे में, इसने कुछ बताया हो तो इनफौर्म कर देना। ।
मेरी ग्लानिपूर्ण अपराधी आंखों ने बिस्तर के नीचे लुढ़क़ी खाली दवा की शीशी को देख लिया था। खुद को समझा पाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था। कनक सच में ही मुझसे जुड़ गई थी। क्या जरूरत थी इसे यह गोलियां पकड़ाने की? क्या अपनों से विश्वासघात की, मुंह खोलने की यह सजा दी है उसने खुद को? उसे तो दर्द सहने की आदत थी? कभी-कभी भला चाहते हुए भी, हम जाने किस-किस अनर्थ के साधन बन जाते हैं! शायद मैं अपने को कभी माफ न कर पाऊं! घर लौटते ही सबसे पहले राकेश को बंगलौर फोन मिलाया। पता चला कि राकेश प्रसाद नाम का तो कोई बच्चा वहां कभी आया ही नहीं। वह भी मोतीहारी से तो हरगिज ही कोई भी, कभी भी नहीं। पिछले बीस साल में तो नहीं ही। हां झरिया का एक राकेश अवस्थी जरूर है। यदि मैं चाहूं, तो उसे वे बुला सकते हैं या मैसेज वगैरह दे सकते हैं।
चुपचाप भारी मन से फोन रख दिया। कनक के राकेश का कोई और पता-ठिकाना मेरे पास नहीं था, जहां मैं कुछ बता सकती? वैसे उस बच्चे की मां तो, उसके लिए शायद तभी मर गई होगी जब उसकी मां को उसका दादा इंगलैंड छोड़ आया था। अकेले ही, उसके हाथ से आंचल छुडाकर। अब उसे दुबारा रुलाने से क्या फायदा? मुश्किल से ही बेचारे के आंसू सूख पाए होंगे?
मैं उठी और कनक की याद का दिया जलाकर भगवान के आगे रख दिया। बचपन में सुना था कि चार दिन तक मृतात्मा अपनों के आसपास ही भटकती रहती है। कनक को शायद मेरी जरूरत हो? आखिर अब और उसका है ही कौन, जिसके पास वह जा पाएगी?
इतना बड़ा छल? बिचारी यूं ही बेकार में ही पिसती रही? जिस बेटे के लिए खुद को तिल-तिल मारा, उसे तो कुछ भी नहीं मिल पाया। कभी किसी अच्छे स्कूल में नहीं भेजा गया उसेे क्यों रो रही हूं मैं? वैसे भी तो कनक की जर्जर जिन्दगी, बस एक-के-बाद-एक, व्यर्थ की दुर्घटनाओं और यातनाओं से घुनी और रिसी हुई ही थी। आज तो उसके मोक्ष का दिन है। मां के अपने जन्मदिन के लिए भेजे कपड़े मैंने निकाल लिए और बृहस्पतिवार के लिए संभालकर थैले में रख दिए।
हलके नीले रंग की उस बूटों वाली मां की भेजी कीमती चंदेरी साड़ी में, नहाई धोई, सलीके से बाल कढी क़नक, बहुत ही सुन्दर और नाजुक लग रही थी। बिल्कुल नरगिस के फूल-सी। वह कितनी सुन्दर थी, आज सभी बस यही कह रहे थे।
"कैसी सुन्दर लड़की यूं ही भटक-भटककर व्यर्थ हो गई। ओवर-डोज का ही केस था। कौरोनर ने यही मृत्यु का कारण लिखा है। हमें तो पता भी नहीं था कि इसके पास पैनाडौल की शीशी भी है। तुम इन्डियन लेडीज, ब्लाउज को पर्स की तरह भी इस्तेमाल करती हो, हमें यह बात नहीं मालूम थी। इसके पास से यह सामान भी मिला है। बारबरा ने राकेश की फोटो और बिछुए मेरी तरफ बढ़ा दिए।
"आई डोन्ट नो वाट टु डू विथ हर? क्या पादरी को बुलाएं? या तुम खुद ही कुछ और करना चाहोगी या फिर बस अब चलें?"
बारबरा ने मुझ से फिर से पूछा? मुझे अब समझ में आया कि कहां क्या कमी रह गई थी? कनक इतनी सज-धज कर भी इतनी अधूरी और उदास क्यों लग रही थी?
हाथ फैलाकर वे दोनों चीजें उससे ले लीं मैंने। फोटो को वापस अपनी जगह पर, वैसे ही कनक के सीने के पास रख दिया और बिछुए उन कमजोर नाजुक ठंडी उगलियों में पहना दिए। मैंने देखा उसकी बिन्दिया भी अब कुछ और ज्यादा ही चमक रही थी और कनक के बंद होंठ भी अब मुझे पूरी तरह से संतुष्ट लग रहे थे। आखिर जिन-जिन चीजों को उसने कभी अपने से अलग नहीं किया, जिन पर शायद उसे हमेशा गर्व और संतोष रहा था, अब फिर से उसके पास पहुँच चुकी थीं। अब वह जाने के लिए पूरी तरह से तैयार थी। सब कुछ अपनी जगह पर सही और ठीक लग रहा था।
मैंने भरपूर नजरों से आखिरी बार उसे देखा और आंखें चुराकर, भर आई आंखों को पोंछ डाला। भगवान से मन ही मन प्रार्थना करने लगी कि, भगवान अगले जनम में इसके लिए ढेर सारी खुशियां और सुख लिखना मत भूलना। इसकी गलतियों को माफ करना और इसका ध्यान भी रखना।
बारबरा जाने कब से पीछे खडी सबकुछ देख रही थी। आकर उसने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया।
"अब चलें? हर बात इतनी मन पर मत लिया करो। तुम तो भगवान में विश्वास करती हो? तुम्हारी गीता में ही तो लिखा है कि हमारे हाथ में बस कर्म है फल नहीं। और जानती हूँ कर्म करने में कभी पीछे नहीं हटी हो तुम। तुम बस इतना ही कर सकती थीं। उसकी तो बस इतनी ही जिन्दगी थी। इतनी ही सांसें लेकर आई थी वह।"
मेरी उदास और सूनी आँखें देखकर, उसने एकबार फिर मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया और बेहद धीमे स्वर में बोली, मानो मुझे ही नहीं खुद को भी समझा रही हो।
"वैसे भी मरने की कोई उमर तो नहीं होती। हरेक के हर पल और हर सांस पर ही मौत का अधिकार है। हम सभी, बस एक उधार की जिन्दगी ही तो जीते हैं। लो, आंसू पोंछ लो। यह तो अब अपने सब कष्टों से मुक्त हो गई है। क्या पता एक बहुत ही अच्छा और सफल जनम इसका इन्तजार कर रहा हो। आई होप यू अन्डरस्टैंड मी, आई मीन, रिबर्थ। तुम हिन्दु, खुद को, हर हाल में बहलाना कितनी अच्छी तरह से जानते हो। काश हम भी, इतने ही समझदार और आशावादी हो पाते।"
वह क्या कहना चाह रही थी, क्या कह गई, मैं कुछ समझ नहीं पाई पर बारबरा की हंसी इस समय मुझे बहुत ही बेतुकी और खोखली लग रही थी। शायद वह बस एक नर्वस हंसी ही थी, उसका और कोई मतलब नहीं था। कनक और दोनों काली कारें धीरे--धीरे अपनी यात्रा के आखिरी पड़ाव पर चल पड़ी थीं।
लाल ट्रैफिक-लाइट पर रुकी मैं सोच रही थी कि अगर सच में कहीं भगवान है और अगर वाकई में वह दीनानाथ है तो इतना तो वह भी जान ही गया होगा कि अब कनक को एक बहुत अच्छा जन्म ही मिलना चाहिए क्योंकि वह अगलेे-पिछले कई जन्म की तकलीफें इसी जन्म में झेल चुकी थी। अब तो उसके हिस्से का सुख-ही-सुख बचना चाहिए। अभागिन को यूं अकेले लावारिसों की तरह विदा करते हुए बादलों का मन भी उमड़ा पड़ रहा था। पर अगले पल ही गहरे काले बादलों से एक बहुत ही सुन्दर, सुनहरा सूरज निकल आया।
शायद वह सच में कभी-कभी इधर से गुजरता है। हमारी प्रार्थना सुनता है और लगता है आज मेरी सोच को उसने भी अपनी स्वीकृति दे ही दी थी। बरबस ही उमड़ आए आंसुओं को पोंछकर एकबार फिर से स्वस्थ और तटस्थ होना चाहा, परन्तु हो नहीं पाई। एक अवसाद, एक अधूरापन लगातार मथे जा रहा था।
यह मेरे लिए एक और नया सच था। मन का कोई एक कोना अभी भी कनक से जुड़ा रह गया था और जुड़ा रहना भी चाहता था। कोई रिश्ता न होकर भी कनक भावात्मक रूप से मुझसे पूरी तरह से जुड़ चुकी थी और उसकी सारी जिम्मेदारियां अब मुझे अपनी लगने लगीं। उसने मुझ पर पूरा विश्वास किया था और उसके इसी भरोसे का मान रखते हुए मुझे शीघ्र ही राकेश को भी ढूँढना होगा।
घर पहुंचते ही मैंने खुद को फोन पर भारत की टिकिट खरीदते पाया। मोतीहारी में राकेश कैसा है, क्या उसकी जरूरतें हैं, यह सब जानना न सिर्फ जरूरी, अपितु अब मेरे जीवन का सबसे बड़ा ध्येय बन चुका था।

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