ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एक अनुवाद ही तो है जीवन
01-Jun-2018 01:51 PM 1369     

हालाँकि अधिसंख्य जीव मूल प्रवृत्तियों से संचालित जीवन मात्र ही जीते हैं लेकिन चिंतनशील जीव की यात्रा विचारों से शब्दों में होती हुई कर्म तक जाती है। इस प्रकार शब्द विचारों का अनुवाद हैं तो कर्म शब्दों का अनुवाद है। एक सार्थक जीवन मन-वचन-कर्म की एकता का निरंतर परावर्तन है। यदि आध्यात्मिक होना चाहें तो यह समस्त सृष्टि परमब्रह्म की मनोलीला का अनुवाद है। जीव स्वयं अपने मनोभावों, लक्ष्यों और आदर्शों का अनुवाद है। यदि इसे अपने काव्यात्मक शब्दों में कहूँ तो-
भावना बिन क्या धरा है व्याकरण में
शब्द का अनुवाद तो हो आचरण में।
हर अनुवाद में, भाषांतरण में कहीं भाव-लोक बिछड़ न जाए यह ज़रूरी है। तभी अनुवाद मात्र शब्दानुवाद नहीं होता। जब तक आप किसी के मन तक नहीं पहुंचते तब तक उसके शब्दों के अनुवाद मात्र से बात नहीं बनती। तभी शब्दकोश साहित्य नहीं हो सकता। शब्द की सम्पदा को सार्थकता और संवेदना के साँचे में ढलना ज़रूरी है।
जीवन में शायद भाषा का निर्माण भी एक अनुवाद ही है। अन्यथा मनुष्य जैसी भाषा के बिना भी, समस्त मानवेतर जगत के चराचर का काम सीमित ध्वनियों वाली भाषा या फिर मौन की भाषा से ही, चल रहा है। उसमें जीव सीधे भावना और संवेदना से जुड़ता है जब कि मानव शब्दों के अभाव में बहुत बार भावना और संवेदना से दूर रह जाता है। शब्दानुवाद को इसीलिए शुष्क कहा गया है। तभी साहित्यकारों विशेष रूप से कवियों की कविता से पहले उनका जीवन-दर्शन और देशकाल पढ़ाया जाता है क्योंकि हम उन्हें उसी सन्दर्भ में सही ढंग से समझ पाते हैं। अन्यथा अर्थ का अनर्थ होने की बहुत संभावना रहती है।
दुनिया के अधिसंख्य लोग एक से अधिक भाषा नहीं जानते। मनीषियों और विद्वानों की दुनिया इसीलिए बड़ी होती है कि वे एकाधिक भाषाएँ जानते हैं। हम जितनी अधिक भाषाएँ जानते हैं हमारी दुनिया उतनी ही बड़ी हो जाती है। कूपमंडूकों से दुनिया का कोई हित नहीं होता। वे अपने ही कुएँ में जीने को विवश होते हैं। जबकि उदार दृष्टि वाले बहुभाषी विद्वान समाजों के बीच सेतु रचते हैं। दिलों की दूरियां कम करते हैं। भिन्न लोगों को निकट लाते हैं।
बहुभाषी विद्वानों ने एक समाज के ज्ञान, विज्ञान और आशाओं-अपेक्षाओं को दूसरे समाजों तक पहुँचाया है। यह परंपरा विभिन्न देशों की यात्रा करने वाले जिज्ञासुओं की बहुत ऋणी है। फिर चाहे वे यात्री रहे हों या धर्म के ज्ञाता या समाजसुधारक। ऐसे लोग जहां भी गए हैं उन्होंने अपने नए स्थान को अपने ज्ञान से समृद्ध किया और वहाँ के ज्ञान का अपने समाज की भाषा में अनुवाद करके अपने समाज को लाभान्वित किया। दुनिया का समस्त विकास और ज्ञान इसी अनुवाद और लेनदेन की प्रक्रिया का परिणाम है। लेकिन जब किसी समाज में कुंठाग्रस्त लोग सक्रिय हो जाते हैं तो वे किसी के महत्त्व को स्वीकार करने की बजाय सब कुछ अपने यहाँ हो चुका मानकर अपनी कुंठा को शांत करते हैं। ऐसे समाजों का विकास रुक जाता है। मध्यपूर्व के देश किसी ज़माने में ज्ञान-विज्ञान और जिज्ञासा के मामले में बहुत आगे थे लेकिन जबसे वहाँ कट्टरता आई है, वे पिछड़ते चले गए। सोचना होगा कि कहीं हम भी राष्ट्रीय गर्व के नाम पर अपने ज्ञान के दरवाजे तो बंद नहीं कर रहे हैं?
अनुवाद के लिए व्यक्ति का दोनों भाषाओं, दोनों संस्कृतियों और सभ्यताओं का जानकार होने के साथ किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त होना ज़रूरी है। यदि अनुवादक पहले से खास किस्म का चश्मा लगाकर देखना-समझना शुरू करता है तो वह दोनों ही पक्षों का अहित करता है। "आनो भद्रा..." वाले देश के लोग अब दुनिया के सभी धर्मों और संस्कृतियों को एक खास चश्मे से देखने लगे हैं। जो ज्ञान-वृद्धि कम और समस्याएँ ज्यादा पैदा करेगा। अनुवादक को सत्यान्वेषी होना चाहिए किसी का प्रचारक-प्रशंसक या निंदक नहीं।
सभी देशों में जो वैश्विक समझ बनी है वह ज्ञान-विज्ञान के अनुवाद से बनी है। यह क्रम बहुत प्राचीनकाल से चला आ रहा है। हमने अपनी किशोरावस्था में ही गुलाम-प्रथा की बुराइयों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित करने वाली हैरियट बीचर की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक "अंकल टॉम्स केबिन" का "टॉम काका की कुटिया" के नाम से हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा अनूदित, 1916 में छपी, पुस्तक पढ़ ली थी। इसी तरह से कैथरीन मेयो की भारतीय समाज के काले पक्षों को उजागर करने वाली पुस्तक "मदर इण्डिया" भी इसी उम्र में पढ़ ली थी। यदि विद्वानों ने इनका अनुवाद नहीं किया होता, भले लोगों ने अपने प्रयत्नों से गाँव के पुस्तकालय में इन्हें नहीं जुटाया होता तो एक छोटे गाँव के, एक सामान्य किशोर के लिए पश्चिमी दुनिया के इन विचारों से अवगत होना कैसे संभव होता?
पुस्तकों से दुनिया बदलती है, मनुष्य की सोच बदलती है। विकसित समाज अपने नागरिकों को उदार और संवेदनशील बनाने के लिए अधिकाधिक पुस्तकों की व्यवस्था करते हैं। इस मामले में अमरीका में पुस्तकालय की व्यवस्था बहुत अच्छी है। जहां पुस्तकालयों की बड़ी शानदार इमारतें हैं, आराम से पढ़ने की व्यवस्था है। यदि कोई पुस्तक नहीं है तो वे उसकी किसी अन्य लाइब्रेरी से व्यवस्था करते हैं लेकिन पाठक को पुस्तक ज़रूर उपलब्ध करवाते हैं। इन पुस्तकालयों का खर्च उस इलाके के लोगों द्वारा दिए गए टैक्स से चलता है। बुजुर्गों को उनकी पसंद की पुस्तकें घर पर भी पहुंचाई जाती हैं। हमारे यहाँ धीरे-धीरे पुस्तकें पढ़ने का शौक कम होता जा रहा है। पुस्तकालयाध्यक्ष लोगों को पुस्तकें पढ़वाने की बजाय पुस्तकों की रखवाली अधिक करते हैं और उसका सबसे अच्छा उपाय है पुस्तकों को ताले में बंद रखना। सार्वजनिक पुस्तकालयों का चलन बंद हो गया है। पहले लोग किसी ख़ुशी में या यादगार के रूप में पुस्तकालयों में पुस्तकें दिया करते थे। माता-पिता बच्चों को सार्वजनिक पुस्तकालयों का सदस्य बनवाते थे। ये पुस्तकालय हिंदी ही नहीं बल्कि विश्व की श्रेष्ठ पुस्तकों के अनुवाद के समृद्ध थे।
इसीलिए हम देखते हैं कि स्वाधीनता से पहले बहुत से विद्वानों ने विश्व की श्रेष्ठ पुस्तकों के अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद किए। उसी का फल था कि देश में एक जागरूक वर्ग तैयार हुआ। आज केवल प्रचारात्मक साहित्य का समय है। ऐसा साहित्य मूढ़ समाज तैयार करता है।
यदि किसी भी भाषा और उसके बोलने वाले समाज का वैचारिक सशक्तीकरण करना है तो उसे दुनिया की अधिकाधिक श्रेष्ठ पुस्तकें मूल या अनुवाद के रूप में उपलब्ध करवाना बहुत ज़रूरी है। व्यक्ति सभी भाषाएँ नहीं जान सकता इसलिए श्रेष्ठ पुस्तकों का अच्छे अनुवादकों से अनुवाद करवाया जाना चाहिए। उसी से हमारा समाज वैचारिक रूप से स्वस्थ और सशक्त होगा।
अनुवाद लेखन से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता। फ्रॉस्ट के "स्पार्टकस" का "आदि विद्रोही" नाम से अमृत राय ने अनुवाद किया। एक श्रेष्ठ पुस्तक का एक श्रेष्ठ अनुवाद। इसी से अमृत राय ने खुद को एक श्रेष्ठ लेखक और प्रेमचंद का सुपुत्र सिद्ध कर दिया।
अनुवाद केवल कहानी, कविता, उपन्यास का नहीं बल्कि विचार प्रधान पुस्तकों का भी होना चाहिए। यदि हम किसी विषय की कोई श्रेष्ठ पुस्तक नहीं बना सकते तो विश्व के बहुत से देशों में अच्छी पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध हैं। विदेशी कारों और स्मार्ट फोन से अधिक काम की बात है वहाँ की अच्छी पाठ्य पुस्तकों का अनुवाद। अनुवाद इस प्रकार होना चाहिए कि उसमें स्वाभाविकता बनी रहे। यदि उचित लगे तो उसके नाम और परिवेश भारतीय बनाए जा सकते हैं। प्रायः नामों में भिन्नता के चक्कर में कभी-कभी तथ्य समझने में बाधा उत्पन्न हो जाती है। ज्ञान-विज्ञान और दर्शन पर किसी एक धर्म, जाति और भाषा का एकाधिकार नहीं है। इस संसार में जो भी ज्ञान है वह मानवता के साझे प्रयत्नों से कमाई गई साझी दौलत है। यदि कोई भी देश या समाज अपने सर्वज्ञ होने का दावा करता है तो वह या तो मूर्ख है या फिर बहुत शातिर बदमाश। मज़े की बात यह है कि सभी धर्म खुद को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं और शेष दूसरे धर्मों को निकृष्ट। इसका कारण यह है कि इस प्रकार वे अपने अनुयायियों को कट्टर बनाकर उन्हें अपना मानसिक गुलाम बनाए रखना और उनका अपने लाभ के लिए सभी प्रकार से दोहन करते रहना चाहते हैं। विकसित समाज ज्ञान और विचार पर न तो एकाधिकार जताते हैं और न ही किसी नए ज्ञान के लिए दरवाजे बंद करते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि बिना किसी कुंठा के दुनिया भर का समस्त ज्ञान-विज्ञान सब तक पहुंचे जिससे यह दुनिया कूपमंडूकता और मूर्खता से मुक्त हो सके, सबमें वर्तमान एकता तो अनुभव कर सके और अपने समस्त दुखों से वैचारिक रूप से एक होकर मिल-जुल कर लड़ सके। सबके लिए, सभी भाषाओं और पुस्तकों तक पहुँचना सरल नहीं होता इसलिए दुनिया में अधिकाधिक पुस्तकालय होने चाहिए और उनमें ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की अधिकाधिक पुस्तकों के अनुवाद उपलब्ध होने चाहिए।
पुस्तकें और विचार, तर्क और संवाद से सभी बदमाशों और तानाशाहों को डर लगता है। वे संवाद नहीं आदेश और उसके प्रश्नहीन पालन में विश्वास करते हैं। लेकिन क्या यह दुनिया अब तक एक ही विचार से चली है? एक ही रंग में रही है? जो परिवर्तन हुए हैं वे मानव के तर्क और संवाद से हुए हैं और उन्हीं के कारण यह दुनिया इतनी विकसित हुई है। हमारे देश में भी जो भी विचारक हुए हैं वे किसी न किसी बेहतरी के लिए परिवर्तन चाहते थे। किसी देश में इतने विचारकों का होना उस देश की गतिशील वैचारिकता का प्रमाण है। देशप्रेम, राष्ट्रीयता, श्रेष्ठता-ग्रंथि, धार्मिक कट्टरता या अन्य निहित राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थों के चलते विचार के इस स्रोत को सूखने नहीं दिया जाना चाहिए और उसे अनुवाद की नहरों के माध्यम से समस्त मानव जाति तक निस्वार्थ भाव से पहुंचाया जाना चाहिए अन्यथा यह दुनिया और भी कष्टप्रद होगी।

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