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शिक्षा, भूख और भय
01-Aug-2019 03:00 AM 995     

जीवन का क्या महान लक्ष्य है, किसी को पता नहीं। लेकिन यह तय है कि जीवन की पहली शर्त और आवश्यकता इसे कायम रखना है। तभी अधभूखे रहकर, कंद-मूल फल खाकर चिंतन करने वाले, जीवन को नश्वर तथा पानी का बुदबुदा और माया को भ्रम बताने वाले, आत्मा-परमात्मा से कम पर बात न करने वाले ऋषि कहते हैं- शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनं। काया राख धरम है। प्राण-रक्षा के लिए आपद्धर्म के नाम पर कुत्ते का और वह भी चांडाल का जूठा मांस खा लेने वाले विश्वामित्र उसका जूठा पानी पीने से मना कर देते हैं, क्योंकि पानी तो कहीं भी मिल जाएगा। कितना विचित्र है धर्म, संस्कृति और जीवन का गणित।
सभी जीव अपने शिशुओं को शिकार करना, भोजन ढूँढ़ना आदि सिखाते हैं। अपने शिशुओं के सक्षम होने तक पशु-पक्षी उनके लिए भोजन लाते हैं। जिनमें इस प्रवृत्ति का विकास नहीं हुआ है जैसे सांप, मछलियाँ, कछुए आदि जीव- वे प्रकृति, नियति, भगवान भरोसे अपने अंडे अपनी समझ के हिसाब से सुरक्षित स्थान पर दे देते हैं जो बचने होते हैं बच जाते हैं, शेष जीवो जीवस्य भोजनं।
मनुष्य थोड़ा विकसित हुआ और क्रमशः भोजन ढूँढ़ने से आगे भोजन संग्रह करने वाला, फिर भोजन के लिए पशु पालने वाला और फिर भोजन उगाने वाला कृषक। यहीं से जीवन में स्थायित्व शुरू होता है। शुरू में सभी थोड़ा बहुत कृषक और पशु पालक थे। भोजन के लिए लगभग आत्मनिर्भर। खाली समय में सूत कातना, सामान्य कपड़े बुनना, राज-मिस्त्री का छोटा-मोटा काम, रस्सी बटना, चारपाई बुनना आदि काम सभी अपनी आवश्यकतानुसार कर लिया करते थे। कोई थोड़ा बड़ा या कौशल की दरकार वाला काम हुआ तो आपसी सहयोग से हो जाता था। फसल की बुवाई, कटाई भी आपसी सहयोग से हो जाते थे। शादी व्याह, भोज-उत्सव में आसपास के सभी लोग रिश्तेदार आमंत्रित होते थे तो मिलजुल कर वे काम भी हो जाते थे। वस्तुएं भी आपस में ले-देकर काम चला लिया जाता था। बाज़ार लगभग नहीं था। आवश्यकताएं कम थीं नौकरी की अवधारण नहीं थी। उसे अधम माना जाता था- अधम चाकरी।
उत्तम खेती माध्यम बान।
अधम चाकरी, भीख निदान।।
ऐसे समाज में भी शिक्षा की अवधारणा थी और उसकी एक सरल व्यवस्था भी थी। शिक्षा के कई अर्थ या उद्देश्य बताए-माने जा सकते हैं। सबसे प्रमुख उद्देश्य है जीविकोपार्जन। चूंकि पहले सब लगभग आत्मानिर्भर थे और जीवनयापन के लिए उस आत्मानिर्भरता को सीखने के लिए किसी कोचिंग सेंटर या कॉलेज में जाने की ज़रूरत नहीं थी। कोई प्रतियोगिता परीक्षा नहीं थी। कोई मेरिट लिस्ट नहीं। जन्म के पूर्व से ही जीव का उस क्षेत्र में प्रशिक्षण शुरू हो जाता था। गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदन। जन्म के बाद भी कण-कण और क्षण-क्षण में वही काम। दस-बारह बरस का बच्चा किशोरावस्था से पहले ही बहुत कुछ सीख चुका होता था। सब कुछ प्रेक्टिकल और साक्षात्। नो कन्फ्यूजन।
शेष रहा, उस परिवार-समाज का व्यावहारिक ज्ञान जिसमें उसे रहना है। यह उसे विभिन्न अवसरों पर उन कार्यक्रमों में शामिल होकर, दूसरों को वास्तव में करते देखकर हो जाता था।
जीवन में रोटी के अतिरिक्त ललित कलाएं, अभिनय, नृत्य, साहित्य आदि का भी स्थान है जो मनुष्य का मनोरंजन करने के साथ-साथ उसे तनाव मुक्त भी करते हैं। इसके लिए कृषि काल के अतिरिक्त समय में विभिन्न प्रकार के कलाकार आते-जाते रहते और अपनी प्रस्तुतियां देते रहते थे। ये सब भी खेती करने वाले लोग होते थे। कवि, विचारक और ऋषि भी अपना अन्न खुद उगाते थे। कबीर, रैदास अपनी रोटी कमाकर कविता करते थे। इसलिए सच कह सकते। ऐसे ही जीवन के लिए, जीवन का सहित्य रचा जाता है। मसि, कागद छूने की ज़रूरत नहीं।
विभिन्न उत्सवों-त्योहारों, मेलों आदि में बहुत से वैचारिक और व्यावहारिक अनुभव सहज ही होते रहते थे। साधु-संत, विद्वान भी अपने कथावाचन, प्रवचन आदि से मानसिक शिक्षण करते रहते थे।
जहां तक लिखने की बात है तो हम सब जानते हैं कि ज्ञान-प्राप्ति और उसे काम में लेने की दृष्टि से लेखन कितना होता है। इसलिए साक्षरता आज के कागजी समाज में ज़रूरी बना दी गई अन्यथा साक्षरता अपने आपमें कोई ज्ञान नहीं है।
आगे जाकर चतुर लोगों ने अदृश्य सत्ता की एजेंसी ले ली और भय दिखाकर हफ्ता वसूली करते थे। कुछ व्यवस्था के नाम पर, खुद काम न करने से अधिक मरने-मारने में विश्वास करने वाले, शस्त्रजीवी लोग गुट बनाकर राजा बन बैठे। दोनों परजीवी। ऐसे में व्यापारी वर्ग का उदय स्वाभाविक था जो केवल उपभोक्ता और उत्पादक के बीच कड़ी बने। अंततः ये तीनों वर्ग ही स्वयं खेती और पशुपालन कम करते गए और किसान, मजदूर और कारीगरों पर बोझ की तरह लदते गए।
फिर भी चूँकि मशीनें नहीं थीं। सब कुछ मानव श्रम पर ही आधारित था। इसीलिए मनुष्य और पशु का महत्त्व बना रहा। पहले कभी पशुओं का महत्त्व था। काटकर खा लिए जाने वाले पशुओं का आज भी महत्त्व है। पशु कृषि का अपशिष्ट खाकर बहुत कुछ देते थे। आज वे लोग भी पशुपालन करने लगे हैं जिनके पास खेती नहीं है। वे चारा खरीदते हैं और दूध बेचते हैं। जिस दिन नफा नहीं रहता पशु को कटने के लिए बेच देते हैं। पहले बछड़े की माँ गाय महँगी बिकती थी क्योंकि खेती के लिए बैल चाहिए। आज ट्रेक्टर काल में बछड़े को निकाल दिया जाता है जो समाज के लिए सर दर्द बन जाता है। काटने में आस्था आड़े आ जाती है। कहते हैं घर बैठा तो बेटा भी नहीं सुहाता। बैल जैसे पशुओं की तरह आदमी भी बोझ हो गया। कभी काले लोगों को अफ्रीका से मंगवाने वाले गोरे अमरीकी मालिकों को अब वे "बर्डन" लगने लगे हैं।
जो कारीगर, किसान और मजदूर हैं वे उन लोगों की बजाय वास्तविक जीवन से ज्यादा जुड़े हैं जो कोई उत्पादक काम नहीं कर रहे हैं। व्हाईट कोलड्र्स। इस प्रकार कृषि व्यवस्था वाले समाज में शिक्षा का स्वरूप सरल था और व्यक्ति को अपने व्यक्तित्त्व के विकास के लिए कुछ गुंजाइश मिल जाती थी। आज उस युग की आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई है। किसान, मजदूर और कारीगर के अलावा सब तथाकथित संस्थानों से निकलकर नौकरी मांगने निकल पड़ते हैं। यह चाकरी और भीख का मिलाजुला रूप है। मजदूर कारीगर से आधे वेतन पर अध्यापक, क्लर्क, इंजीनियर मिल जाते हैं।
किसान, मजदूर, कारीगर अपने श्रम के बल पर रोजगार माँगते नहीं फिरते। वे तुलनात्मक रूप से साहसी हैं और अपने सीमित साधनों में भी जीवन जीने का माद्दा रखते हैं। या फिर नेता, व्यापारी, सेवा और धर्म का धंधा करने वाले जिन्होंने अपनी चालाकी से अपने लिए सभी साधन जुटाने की व्यवस्था कर रखी है। शेष देश का निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग इन्हीं तथाकथित शिक्षण संस्थानों में जाता है, माता-पिता के पसीने की कमाई लुटाता है, दिन में अठारह-अठारह घंटे कोचिंग सेंटरों द्वारा उपलब्ध करवाई गई सामग्री को रटता है, दबाव में कुंठित होकर आत्महत्या तक करता है, लाखों रुपए खर्च करके डिग्री लेता है और फिर निकल पड़ता है नौकरी की भीख माँगने के लिए।
नौकरी दाता उसका मज़ाक उड़ाते हैं, शोषण करते हैं, डराकर रखते हैं। नौकरी मिल भी गई तो किसी भी क्षण छूट जाने का डर। ज़रा सी तनख्वाह, हर वक्त तनाव। परिणाम की चिंता किए बिना एकलव्य और कर्ण की तरह अतिक्रमण की कोई कोशिश नहीं।
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बड़ी कंपनी का कोई सीईओ फसल काटते किसान की तरह काम के साथ गा भी सकता है, क्या कोई सीईओ कबीर की तरह कपड़ा बुनते हुए झीनी-झीनी रे बीनी चदरिया रच सकता है? हर समय शिकारी और शिकार की तरह तने हुए पुट्ठे, हर ओर से संकट सूँघती चेतना, भाग पड़ने या टूट पड़ने को सन्नद्ध स्नायु तंत्र।
न परिवार के लिए समय, न अपने लिए। कहाँ का सर्वांगीण विकास, कहाँ का मनोरंजन, कहाँ साहित्य-कला, कहाँ खेल-कूद। न जाड़े की धूप का सुख, न गरमी की दोपहर में सुस्ताने का मज़ा। न भोजन का आनंद, न धूप-हवा बरसात। याद नहीं पहले कब सूरज को उगते देखा था। कब पहली बरसात में मिट्टी की गंध आई थी। बरामदे में कबूतर आ जाएं तो बालकनी के गन्दा होने डर। और यदि गोरैया घर के किसी कोने में घोंसला बना ले तो...। सबसे दूर, सबसे अलग कौन-सा हठयोग साध रहा है आज का विद्यार्थी, युवा, गृहस्थ और यह तथाकथित शिक्षित समाज। क्या इसी शिक्षा से मुक्ति मिलती है ? सा विद्या या विमुक्तये ?
विद्या ददाति विनयम् याति पात्रताम्
पात्रताम् धन आप्नोति धनात् धर्मस्ततो जयः।
कहीं दिखती है विनय, पात्रता, पात्रता से प्राप्त धन, धर्म और धर्म की जय? कहने को शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो रहा है। और वास्तव में हालत यह है कि यदि सरकारी सफाई कर्मचारी के लिए डीलिट् की डिग्री अनिवार्य कर दी जाए तो गली-गली में डीलिट् बांटने वाले संस्थान खुल जाएंगे और एक पद के लिए सौ अर्जियां आएंगीं।
और आजकल की उच्च शिक्षा प्राप्त युवकों में कहाँ है सामान्य शिष्टाचार, लोकव्यवहार, धैर्य, जोखिम उठाने की क्षमता, प्रायोगिक कौशल, संबंधों को साधने और बांधने की परिपक्वता। चिंतन के नाम पर दुविधा या अंधविश्वास या अन्धानुकरण। रचनात्मकता के नाम पर अधकचरी, अनुपयोगी सूचनाएं। आत्मविश्वास की कमी को वस्तुओं के ढांपने का उपक्रम।
मान लीजिए कोई छात्र सब बाधाओं को पार करके किसी बड़े संस्थान से शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त कर ले, साल के एक-दो करोड़ का पॅकेज पा ले तो भी क्या वह स्वस्थ और सार्थक जीवन की अनुभूति कर सकता है? क्या उसका बहुमुखी विकास हो जाएगा? वह भी तनाव में रहेगा, डरा हुआ और टारगेट पूरा करने के चक्कर में। उसकी भूमिका नौकरीदाता की नज़रों में एक शिकारी कुत्ते से अधिक नहीं हैं। जितना शिकार करके लाएगा उसी हिसाब के कुछ मिलेगा। जब मालिक ही अपने अध्यवसाय में नोट-मुद्रा ढूँढ़ रहा है तो उसके नौकर को कहाँ से ब्रह्मानंद प्राप्त हो जाएगा?
जीवन का उद्देश्य क्या मात्र नौकरी करके किसी तरह जीवनयापन करना मात्र है? इसी को देह धरे का दंड कहते है। यदि आत्मनिर्भर बनने के लिए कुछ श्रम और किसानी करने का साहस जुटाया जाए और आवश्यकताओं को कम किया जाए तो अब भी कुछ संभावना हो सकती है। आसमान में तारे अब भी निकलते हैं, अब भी सवेरे-सवेरे सुबह मंद समीरण चलता है।
हम देखते हैं कि पराधीन भारत में जीवन की इतनी सुविधाएं नहीं थीं लेकिन कृषि व्यवस्था वाली थोड़ी-सी आत्मनिर्भरता के बल पर हमारे वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, विचारकों ने बंधनों का अतिक्रमण किया। विद्या को मुक्ति का मार्ग सिद्ध किया। और आज इतने संस्थानों और विकास के दावों के बावजूद हमारे पास क्या अनुकरणीय और श्लाघ्य है? सिवाय कुछ घोटालों, गालियों, जुमलों और आंकड़ों की जोड़-तोड़ के।
अतिक्रमण हो रहा है ज़मीनों का, शालीनता की सीमा का। जहां तक मानवीय चेतना के जैविक सीमाओं से परे वैचारिक उत्स, सार्वभौमिकता की कोई बात, जीवन के किसी मूल्य पर कोई ठहराव जैसी, सीमाओं के अतिक्रमण की बात है तो वह तो कहीं नहीं दिख रही है।
फिर भी अँधेरी रात में कभी-कभी जो जुगनू चमक जाते हैं वे नियति का चमत्कार हैं, हमारा पराक्रम और व्यवस्था नहीं। क्या इस अंधे कुएँ में कहीं कोई किरण है या हो सकती है? आखिर इस स्थिति के लिए कौन उत्तरदायी है? क्या श्रम और सकारात्मकता का कोई भविष्य है? क्या जीवन एक अवसर न होकर किसी कुकर्म के फल की तरह दुर्वहनीय दंड ही बनता चला जाएगा?

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