ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शिक्षा : अतिक्रमण और अनुसरण का द्वंद्व
02-Jul-2019 11:07 AM 193     

जब गाँधी जी कहते हैं कि जो शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के योग्य
बनाती है वह निकृष्ट है। यह वैसी ही एक अतिवादी उक्ति है जैसे कि
वह शिक्षा जो केवल शाब्दिक और वैचारिक वाग्विलास तक सीमित रह
जाती है। जीवन रूपी धारा इन दोनों किनारों के बीच बहती है।

वैसे तो समस्त चल-अचल की चहल-पहल और हलचल के बीच जीवन अपने संचलनों और विचलनों में संतुलन बनाता, बिगाड़ता निरंतर चलता ही रहता है। कालचक्र एक बहुत बड़ा चक्र है जिसके दोनों सिरे एक साथ किसी को दिखाई नहीं देते। एक सिरे से निकलकर दूसरे सिरे तक जाते-जाते इतना सब कुछ बदलता-छूटता और विस्मृत होता रहता है कि दोनों सिरों के बीच तारतम्य और संबंध बैठना मुश्किल होता है। फिर भी विभिन्न कालखंडों में, विश्व के विभिन्न भागों में कुछ चैतन्य मस्तिष्क, इस बड़ी किन्तु स्पष्टतः लगभग अपरिभाषेय प्रक्रिया का हिस्सा रहते हुए भी जिज्ञासा, रोमांच और साहसिकता के चलते, इसका अतिक्रमण करते रहते हैं। वे चैतन्य मस्तिष्क भले ही अपने सीमित परिप्रेक्ष्य में यद्यपि बहुत बड़े और असरकारी लगते हैं किन्तु अंततः वे किसी अँधेरे में चमकते छोटे-छोटे जुगनुओं से अधिक बड़े नहीं होते। फिर भी जुगनुओं का यह छोटा-सा संसार ही इस कालचक्र की बड़ी किन्तु ऊबाऊ और निरर्थक लगने वाली प्रक्रिया का सबसे बड़ा किन्तु जादुई सौन्दर्य है।
वैसे तो हर नया जीवन नित्य नया और रोमांच भरा होता है। हर जीवन ही अपने में उस विराट कालचक्र को समेटे है। जो अपने-अपने छोटे से छोटे और बड़े से बड़े विस्तार में भी समान रूप के एक चमत्कार की तरह कौंधता है। यह कौंध कभी डराती है तो कभी अपनी चकाचौंध से भटकाती भी है फिर भी इसका अपना एक रोमांच होता है। रोमांच का आनंद है तो खतरे भी हैं।
सभ्यताओं के विकास की कहानी जहाँ मनुष्य के सुरक्षित होने की कोशिशों की कहानी है वहीं वह उसकी प्रश्नाकुलता, रोमांच, साहस, शौर्य के कुंद होने की कहानी भी है। मानवेतर सृष्टि में सभी जीव अपने छोटे से जीवन चक्र में भी समस्त रोमांच और साहस के आनंद एवं खतरों को जीते हैं। वैसे तो मानवेतर जीवों में भी जीवन रक्षा की प्रवृत्ति पाई जाती है लेकिन उसमें आधुनिक काल के मानव समाज जितनी संश्लिष्टता नहीं है। मानव समाज में मानव की अतिरिक्त चतुराई ने सुरक्षा की इस चिंता की कुंठा को भयादोहन की स्थिति तक पहुंचा दिया है। अब मानव समाज में केवल जीविकोपार्जन की ही चर्चा होती है। जीवन और जीवन का उद्देश्य एक सिरे से उसमें से गायब है। जीवन को सुरक्षित होना चाहिए क्योंकि वह अमूल्य है। और इतना बहुमूल्य भी नहीं कि उसके लिए सभी जीवन मूल्यों को निरस्त कर दिया जाए।
यदि प्यास में पीड़ा है तो उसकी तृप्ति में आनंद भी है। कुआँ खोदने में कष्ट है तो उपलब्धि की अनुभूति भी। प्यास को कुआं खोदने की उपलब्धि तक जाना या उसे वहाँ तक ले जाना जीवन का उद्देश्य हो सकता है। इन दोनों का मेल ही योग हो सकता है। जीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भी जीवन को उस आनंद से दूर न जाने देना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। शिक्षा मात्र सुरक्षित जीवनयापन नहीं है। यदि शिक्षा का उद्देश्य मात्र इतने तक ही सीमित कर दिया गया तो वह एक कैद से अधिक कुछ नहीं है। पिंजड़े में पड़े पक्षी को भोजन देकर उसकी भूख छीन लेने की तरह।
आज विश्व के सभी समाज शिक्षा के नाम पर सुरक्षा की इसी नीरसता की ओर दौड़ रहे हैं। जीवन और उसकी जीवन्तता की कितनी सुरक्षा हो पाती है, यह अलग बात है। मानव समाज के विकास-क्रम के प्रारंभिक काल में अधिकतर लोग अपनी जीवन यात्रा में जीवंत भागीदार हुआ करते थे। उनके जीवन के अनुसरण-अनुकरण और अतिक्रमण उनके अपने हो सकते थे। जहां जोखिम बहुत बड़े नहीं थे क्योंकि भौतिक उपलब्धियां भी इतनी बहुआयामी नहीं थीं। संलिष्टताओं के अभाव में जीवन में श्रम और बौद्धिकता के बीच इतनी दूरी नहीं थी। मनुष्य-मनुष्य के बीच, उत्पादक और उपभोक्ता के बीच इतनी दूरियाँ नहीं थीं। गाँव जैसी हर इकाई आपस में गुंथी हुई थीं। विस्तार और दूरियाँ इतने स्पष्ट परिभाषित नहीं थे। विशेषज्ञता भी इतनी स्पष्ट परिभाषित नहीं थी। इसलिए शिक्षा भी सीधी सरल थी लेकिन आज से अधिक बहुआयामी भी।
यदि शिक्षा को सम्पूर्ण जीवन मानें तो उसमें इन अतिक्रमणों और अनुसरणों का देशकाल और शाश्वतता के बीच एक आनुपातिक संतुलन आवश्यक है जो कि आज बहुत असंतुलित होता जा रहा है।
जब गाँधी जी कहते हैं कि जो शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के योग्य बनाती है वह निकृष्ट है। यह वैसी ही एक अतिवादी उक्ति है जैसे कि वह शिक्षा जो केवल शाब्दिक और वैचारिक वाग्विलास तक सीमित रह जाती है। जीवन रूपी धारा इन दोनों किनारों के बीच बहती है। जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ नहीं लेकिन यह भी सच है कि क्या जीवित रहना मात्र ही जीवन की इतिश्री है? इसीलिए हमारे दर्शन में मन, वाणी और कर्म की त्रयी का विधान है। मन (चिंतन) से शुरू होकर वाणी (संवाद) से होते हुए उसका कर्म तक आना ही उसकी पूर्णता है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था इन तीनों पक्षों का समन्वय है? वर्तमान स्थितियों में तो बिलकुल नहीं।
सभी संस्थान सबसे पहले तो अपने बोर्ड के रिजल्ट, मेरिट और उसके बाद यदि उस संस्थान में पढ़े बच्चों को कहीं नौकरी मिल जाए तो उनके प्लेसमेंट को ही प्रचारित और विज्ञापित करते हैं। क्या शिक्षा का उद्देश्य मात्र इतना ही है? क्या संस्थान इसके अतिरिक्त अपनी कोई उपलब्धि भी प्रचारित करते हैं? शायद इसके अतिरिक्त किसी अन्य योग्यता को शिक्षा की उपलब्धि माना ही नहीं जाता। यदि इसके बाद किसी उपलब्धि का नंबर आता भी है तो किसी खेल, कला आदि के क्षेत्र में आर्थिक कमाई का कीर्तिमान।
मैंने 40 वर्ष अध्यापन किया। एक छात्र के अतिरिक्त कभी कोई विद्यार्थी परीक्षा में अनुतीर्ण नहीं हुआ। छात्र बोर्ड की परीक्षा में मेरिट में भी आए, बड़े-बड़े स्वनामधन्य संस्थानों से निकलकर अच्छी आर्थिक स्थिति में भी हैं। लेकिन मुझे सबसे अधिक गर्व अपने उस विद्यार्थी पर है जो 1990 में बारहवीं की परीक्षा में हिंदी में बोर्ड की व्यवस्था के अनुसार उत्तीर्ण नहीं हो सका। गर्व का कारण यह कि एक बार उसी विद्यार्थी ने स्कूल की छुट्टी के बाद सड़क के किनारे खुले गटर में गिर पड़ीं तीसरी-चौथी कक्षा की एक बच्ची बचाया था।
विद्यालयों और संस्थानों के मेरिट में आए या किसी ऊंचे पद पर स्थापित छात्र उन संस्थानों के लिए विज्ञापन के काम आते हैं जिससे वे और अधिक कमाई कर सकें। लेकिन मुझे लगता है कि बच्ची को बचाने किन्तु हिंदी में अनुत्तीर्ण वह छात्र समाज की बहुत बड़ी आधारभूत शक्ति है। इसी तरह संभवतः 1964-65 में एक छतरी में किसी साधु को जलने से बचाने के प्रयत्न में जल जाने से मेरे एक ग्यारह वर्षीय छात्र की मृत्यु हो गई थी। दोनों को कोई वीरता पुरस्कार नहीं मिला।
हो सकता है वे प्रचलित मूल्यों के अनुसार अनुसरण में सफल नहीं हुए लेकिन उन्होंने बंधी-बंधाई लीक का अतिक्रमण किया।
शायद दुनिया के सबसे मधुर गीत वे ही हैं जो आजतक न लिखे गए और न ही गाए गए लेकिन वे कहीं न कहीं अंतरिक्ष में गूँज और घूम तो अवश्य रहे हैं।
इसलिए शिक्षा उतनी ही सार्थक है जितना वह इन दोनों बिन्दुओं में बीच संतुलन बैठा सकती है। फिर भी कभी-कभी व्यवस्था के लिए भी तो अव्यवस्था ज़रूरी हो जाती है। समाज में व्यवस्था के बीच थोड़ी अव्यवस्था के लिए जगह होनी चाहिए जैसे शिक्षा में अनुसरण के बीच अतिक्रमण के लिए।

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