ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अमेरिकी हो गये भारतीयों का द्वंद्व
01-Jan-2018 02:21 PM 2021     

अमेरिकन महाद्वीप में भारतीय दक्षिण एशियाई लोगों का आगमन विशेषकर 19वीं सदी से आरम्भ हो गया था जिनमें स्वामी विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस, स्वामी रामतीर्थ व स्वतंत्रता संग्राम और गदर से जुड़े अनेक व्यक्ति शामिल थे। बीसवीं शताब्दी के छठे-सातवें दशक में अमेरिकन नीतियों में बदलाव होने के कारण बहुत से लोग उच्च शिक्षा हेतु अमेरिकन महाद्वीप में पहुँचे और फिर स्वेच्छा से या परिस्थितिवश यहीं बस गए। तभी से लोगों का भारत से आना छुटपुट चलता रहा। नब्बे के दशक के बीच से भारतीय अर्थव्यवस्था की नीतियों में परिवर्तन आने से मानो भारत व अमरीका दोनों के द्वार जैसे खुल गए। वर्ष 2000 में "वाई-टू-के" यानि "वर्ष 2000 से सम्बंधित" कार्यों को पूरा करने के लिए दक्षिण एशियाई लोगों को बुलाया गया, जिनमें अधिकतर टेक्निकल लोग थे। उनमें से कुछ फिर यहीं बस गए। अब उत्तम भविष्य की आशा लेकर भारत और अन्य देशों से बहुत युवा छात्र पिछले 10-15 सालों में 12वीं पास करके अमेरिकन विश्वविद्यालयों में दाख़िला ले रहें हैं। इनको आर्थिक सहायता भी अपने परिवारों से मिलती है। कुछ यहीं रच-बस जाते हैं और अन्य को स्वदेशी कम्पनियाँ वापस बुला लेती हैं। इन युवा छात्रों का भारतीय प्रवासियों से अधिक परिचय व समन्वय नहीं हो पाता।
प्रवासियों की प्रत्येक नयी पीढ़ी अपने साथ बहुत कुछ नवीन लेकर आयी परन्तु उसके लिए चुनौतियाँ भी अलग-अलग रहीं। चालीस-पचास वर्ष पहले विद्यार्थी बनकर अमेरिका आने वाली पीढ़ी को शुरू-शुरू में बहुत संघर्ष करना पड़ा। इसका सजीव चित्रण झुम्पा लाहिड़ी ने अपने उपन्यासों "द नेमसेक" और "लो-लैण्ड" में भी किया है। एक ओर जीवनशैली, खान-पान आदि की विभिन्नता, अकेलापन और दूसरी ओर भारत व अन्य भारतवंशियों से संपर्क की कठिनाई। छोटे शहरों में पीछे छूटे परिवार से पत्र व्यवहार ही संपर्क का एक मात्र साधन था। दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की जनसंख्या बढ़ने पर व्यापारियों की संख्या बढ़ी, जिनका आगमन पहले से पहुँचे रिश्तेदारों की स्पॉन्सरशिप पर आधारित था। महानगरों से आरम्भ होकर भारतीय भोजन सामग्री, साड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकानें व रेस्टोरेंट इत्यादि हर यूनिवर्सिटी वाले शहर में खुलने लगे। अस्सी-नब्बे के दशक तक मंदिर, मस्जिद व कम्युनिटी/ साँस्कृतिक सेंटर आदि भी बनने लगे, जिनको बनाने में बीसवीं शताब्दी के मध्य में आने वालों का बहुत योगदान रहा। यह वह पीढ़ी थी जिसने प्रयास किया कि अमेरिका में जन्म लेने व पलने वाली सन्तानों को यानी भावी पीढ़ी को यथासंभव भारतीय संस्कार भी दिये जा सकें। बाहर से आनेवालों का सामाजिक ज्ञान चूँकि शुरू में सतही ही होता था एवं नए समाज के तौर तरीकों को भली प्रकार जानने में समय लगता है इस कारण बहुत से प्रवासी परिवारों के लिए प्रारम्भिक समन्वय कठिन था।
छात्रवृत्ति पर आने वालों के लिए पूर्ण परिवार के भरण-पोषण की आर्थिक समस्या भी थी। धीरे-धीरे भारतीय मूल के प्रवासी अमेरिकन समाज में रचते-बसते गए और अपने-अपने क्षेत्रों में पहचान बनाने लगे। अब यह पीढ़ी रिटायर्ड या रिटायरमेंट की ओर अग्रसर हो रही है और वृद्धावस्था की चुनौतियों का सामना कर रही है।
अमेरिका में पलने व शिक्षा ग्रहण करने वाली हमारी पहली युवा पीढ़ी को पश्चिमी सँस्कृति से प्रत्यक्ष परिचय व अनुभव का लाभ प्राप्त हुआ जो समाज में सफल होने के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज चाहे विज्ञान, चिकित्सा, व्यापार आदि कोई भी क्षेत्र हो वहाँ विदेशी धरती में जन्मी पहली पीढ़ी के सफल व्यक्ति मिल जाएँगे। बहुत से लोगों ने अन्तर्जातीय विवाह भी किये। धीरे-धीरे प्रवासियों की संख्या में वृद्धि होने से अब भारतीय मूल के लोगों में परस्पर विवाह का चलन बढ़ा है। चूँकि भारत व अमेरिकन समाज के सामाजिक मूल्यों में अंतर तो है ही।
वर्ष 2000 के आरंम्भ से जो नए प्रवासी प्रोफेशनल हैं और कांट्रेक्टर के रूप में अमेरिका में पधारें हैं उनके अनुभव भिन्न हैं। एक तो पति-पत्नी को शुरू से ही अच्छी तनख़्वाह वाली प्राइवेट संस्थानों में अस्थायी नौकरी मिल जाती है इस कारण संघर्ष कम रहता है। वे अधिकतर अपने जैसे विदेशी लोगों के साथ ही काम करते हैं और उनके साथ ही रहते हैं। किसी भी शहर में चले जाएँ वहाँ बहुत सी कॉलोनियाँ ऐसी भी हैं जिनमें अधिकतर भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इन लोगों को स्थानीय लोगों के साथ, जिसमें पुराने भारतीय बुज़ुर्ग भी शामिल हैं, अधिक घुलने-मिलने का अवसर नहीं मिलता। उनके माता-पिता भी अमेरिका बच्चों की देखरेख के लिए आते-जाते हैं इस कारण प्रवासी होते हुए भी वे पूर्ण रूप से भारत से जुड़े हैं। इनके बच्चे भी अपनी मातृभाषा, हिंदी, बंगाली, कन्नड़, तेलगु, तमिल, मलयालम आदि, नाना-नानी या दादा-दादी से सुलभता से सीख लेते हैं।
संक्षेप में प्रवासियों की हर नयी पीढ़ी ने अपने से पहले आये स्वदेशियों द्वारा बने संसाधनों एवं सद्भावना की नींव पर अपना बसेरा बनाया है। आज अमेरिका के अनेक छोटे बड़े नगरों में मंदिर, मस्जिद व गुरुद्वारे मिल जायेंगे जिनके लिए नवीनतम प्रवासियों को अधिक प्रयास नहीं करना पड़ा। लेकिन भाषा, जाति या धर्म पर आधारित गुटबाज़ी के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों का भी आगमन हुआ है। अमेरिका में भी कई संस्थायें बनी हैं जो दक्षिण एशियाई लोगों में जागरूकता फैलाने व समाजसेवा का कार्य करतीं हैं।
बचपन में हिंदी के कोर्स में आचार्य श्रीरामचन्द्र शुक्ल का निबंध "हमारे कत्र्तव्य व अधिकार" पढ़ा था जिसके अनुसार हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तो अवश्य हों किन्तु साथ-साथ कत्र्तव्यों को अनदेखा नहीं करें। भविष्य ही बतायेगा कि प्रवासियों की नयी पीढ़ियाँ क्या वृद्ध प्रवासियों का संबल बनेगीं? क्या ऐसी सोच रखना या अपेक्षा करना सही भी है या नहीं? प्रवासियों के सामने आज ऐसे कई ज्वलंत प्रश्न खड़े हैं जिन पर परस्पर संवाद शीघ्रातिशीघ्र आवश्यक है। वैसे तो अमेरिकन जीवन शैली ऐसी है जिसमें ऑफिस, घर बाहर की आवश्यकताओं, बच्चों के पाठ्येतर कार्य आदि को पूर्ण करने में ही समय बीत जाता है, फिर प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि सप्ताहांत में स्वयं एवं बच्चों को हमउम्र साथ मिले। कहीं जीवन की इस आपाधापी में विभिन्न पीढ़ियों में पारस्परिक संपर्क का मौका तो छूट नहीं रहा? इसी तथ्य पर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है।

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