ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
द्विविधा भंजक कबीर
01-Jun-2016 12:00 AM 2739     

कर्मकाण्डी समाज को और कोई क्या झकझोरेगा? आज किसी को ये बातें कह दें, सामने वाला मटियामेट कर देगा। समाज तनावग्रस्त हो जाएगा। लेकिन, कबीर साहिब साधारण, तरीका साधारण, पर बात असाधारण।
सुनो! सबसे पहले मेरा एक निरंजन है। मुस्लिम आदमी, निरंजन उसका? और कह भी रहा है न हिन्दू न मुस्लिम किसी के पास नहीं फटकता। न व्रत, न रमजान, न रोजा। सिमरण बस उसका, जो अन्त तक साथ रहेगा। न पूजा, न नमाज, मात्र निराकार। इसे नमस्कार। न हज, न पूजा। एक को पहचान लिया है, तो फिर दूजा कौन? मेरे सब भ्रम भाग गए, केवल एक निरंजन मन से लगा लिया।
कबीर साहिब विद्वानों के समक्ष विद्वान और ठेठ गंवारों के बीच वही, उन्हीं की भाषा। "पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहाड़, वा सै तौ चाकी भली, पीस खाय संसार।' साधारण बात से असाधारण आडंबरों से मुक्ति। दूसरे क्षण विद्वानों और सामान्य जनों दोनों को चैतन्य करने का बीड़ा। उनकी ख़बर लेने लगे :
नाम सुमरि पछितायगा
पापी जियरा लोभ करतु है, आज काल उठि जायगा
लालच लागी जनम गँवाया, माया भरम भुलायगा
तन जोबन का गर्ब न कीजै, कागद ज्यों गलि जायगा
जब जम आय केस गहि पटकै, ता दिन कछु ना बसायगा
सुमिरन भजन दया नहिं कीन्हॅ, तो मुख चोटा खायगा
धर्मराय जब लेखा माँगे, क्या मुख लेके जायगा
कहत कबीर सुनो भई साधो, साध संग तरि जायगा।
सुमिरण भजन दया नहिं कीन्हॅ, यानी सुमिरण, सत्संग और सेवा नहीं की, कर ले, पछताएगा। दयाभाव सेवा ही का रूप है, आलस से भरे जन का क्या दयाभाव। दयाभाव कर्म प्रेरित है। सन्तों का संग कर, भवसागर से तर जाएगा।
सुन्न महल में दियना बारि ले। आसन से मत डोल रे। घूंघट का पट खोल रे, तो को पिया मिलेंगे।
भ्रमित "सुन्न' को ¶ारीर सुन्न होना कहते हैं। कबीर जी का सुन्न ¶ाून्य निवासी राम, निरंजन, अल्लाह है। इस घर में जम जा, दीया बाती कर ले, ज्ञान की रो¶ानी में नहा जा और फिर उस आसन से डोलना नहीं अन्त तक, तोड़ निभा देना। अपने भ्रमों के द्वार खोल, देख इस जीव के पिया मिलेंगे, ई·ार मिलेंगे।
काया मंजसि कौन गुना, घट भीतर है मलनाँ
जौ तूँ हिरदै सुध मन ग्यानी, तौ कहा बिरोलै पानी
तूँबी अडसठ तीरथ न्हाई, कड़वापन तऊ न जाई
कहै कबीर बिचारी, भवसागर तारि मुरारी।
काया का गुनाह क्या? इसे क्यों माँज रहा है? मैल भीतर समाई है। ह्मदय ¶ाुध्द करेगा, तभी ज्ञान समाएगा। पानी क्यों मथ रहा है? इस ¶ारीर रूपी तूँबी को अड़सठ तीर्थ नहाने ले जाएगा, तो भी कड़वी ही रहेगी। सुन! कबीर साहिब कह रहे हैं, अगर तुझे चिन्ता है पार उतरने की, तो मेरा मुरारी ही तुझे पार लगाएगा।
कबीर जी का मुरारी मीरा का कृष्ण नहीं। उस मीरा के, जो गुरु रविदास से प्रभु का ज्ञान लेने से पहले "मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो ना कोई' गाती थीं, उसे जैसे ही ई·ारीय ज्ञान गुरु रविदास जी ने कराया, तो बोल उठी "पायो री मैंने राम रतन धन पायो'।
समाज में सदा भटकाव रहा है। कभी कम, कभी ज्यादा। जैसे संचार के साधन बढ़े, भटकाव बढ़ चरम पर पहुँच गया, लोग समझते हैं, हम धार्मिक हो गए हैं, लेकिन ज्ञान से दूर भटकन में हैं। भटकाव इतना तीव्र कि सोचने का मौका कहाँ? कहाँ व्यवसाय में धर्म और धर्म में व्यवसाय? दोनों में फर्क नामुमकिन?
ज्ञान बिबेक जतन से करि लै, जा बिधि अजर झरावै
सुरत निरत की सडसी करि लै, जुगत निहाई जमावै
नाम हथौड़ा दृढ़ करि मारै, करम की रेख मिटावै
पाँच आत्मा दृढ़ करि राखै, यों करि मन समुझावै
कहै कबीर सुनो भई साधो, भूला अर्थ लगावै।
ज्ञान विवेक का वो जतन कर, वह विधि अपना, जिससे ये अजर-अमर तेरा हो जाए, तेरे सामने प्रगट हो। जमे हुए भ्रमों को जुगत निरत की सड़सी बना कर उखाड़ दे और नाम का ऐसा हथौड़ा मार कि तेरे कर्मों की सभी रेखाएँ नष्ट हो जाएँ। कहते हैं जब ब्राहृ का ज्ञान होता है, पुराने कर्म भस्म हो जाते हैं। पाँचों इंद्रियों को, पाँच भ्रमों को (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) और मन को फिर ये ज्ञान अपने नियंत्रण में रखता है। कबीर साहिब कहते हैं भ्रमों में पड़ अर्थ का अनर्थ मत करो।
संतो घर में झगड़ा भारी
राति दिवस मिलि उठि उठि लागैं, पाँचों ढोटा एक नारी
न्यारो न्यारो भोजन चाहें, पाँचों अधिक सवादी
कोउ काहु को हटा न माने, आपहि आप मुरादी
दुमर्ति केर दोहागिन मेटो, ढाटेहि चाप चपेरे
कहें कबीर सोई जन मेरा, जो घर की रार निवेरे।
हे संतो! घर, यानी जीवन में, भयानक झगड़ा है। जिद्दी बच्चों से पाँचों इंद्रियाँ और मन दुर्मति सा रात-दिन सोने नहीं देते हैं। सबके मार्ग अलग। कोई किसी की नहीं सुनता। हरेक को दुष्कर्म से रुचिकर भोजन चाहिए, सब अपनी-अपनी मुराद पूरी चाहते हैं। पाँचों जिद्दी बच्चे और दुर्मति दुष्ट-चतुर हैं। वे कहते हैं मेरा मित्र वही, जो जीवन के दुष्ट, जिद्दी बच्चों और दूर्मति के प्रभाव में न आकर रार मिटा सन्तों सा जीवन जीता है।
साधो सब्द साधना कीजै
अवधू भूले को घर लावै, सो जन हम को भावै
घर में जुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरु अलख लखावै
सहज सुन्न में रहे समाना, सहज समाधि लगावै
उनमनि रहै ब्राहृ को चीन्है, परम तत्त को ध्यावै
घर में बसत वस्तु भी घर है, घर की बस्तु मिलावै
कहें कबीर सुनो हो अबधू, त्यों का त्यों ठहरावै।
हे मित्र! हे साधु! बस उस की ही साधना करो, जो गुरु ने बख्या है। अवधूत बने फिरते को घर का मार्ग दिखाए, वही जन मुझे भाता है। कहाँ जाना अब, जब मोक्ष की युक्ति घर में, यानी ग्रहस्थ में। और मोक्ष भी घर में ही है। ये मुझे उस गुरु ने समझाया है, जिसने मुझे अलख के दर्¶ान कराए हैं। नहीं दिखने वाला अलख दिखाया है। वह सहज भाव से रहने वाला ¶ाून्य निवासी सहज समाधि लगाए रहता है, यानी अचल है। हे मित्र! साधु वो है, जो तटस्थ भाव से जीता है और ब्राहृ को जान कर केवल इसी परम तत्त्व की साधना में लीन रहता है, लेकिन घर-बार तज कर नहीं। ये ब्राहृ यहीं था, मुझमें भी था, घर में भी था, जिसे मेरे सतगुरु ने मुझसे घट में ही मिला दिया। हे अवधूत! मैं आपको सत्य बता रहा हूँ ये वहीं का वहीं ठहरा है, उसे खोजने जंगलों में, ¶ाम¶ाान में क्यों भटकते हो? कबीर जी महाराज का यह कथन उस समय के लिए बहुत आव¶यक था, जब घर छोड़ कर भाग जाने की परंपरा सी बन गई थी, इसलिए लोगों को जगाना ज़रूरी था।
अवलि अलह नूर उपाइआ कुदरति के सभ बंदे
एक नूर ते सभु जग उपजिआ कउन भले को मंदे
लेगा भरमि न भूलहु भाई
खालिकु खलक खलक महि खालिकु पूरि रहिओ रुाब ठांई
माटि एक अनेक भांति करि साजी साजनहारै
ना कछु पोच माटी के भांडे ना कछु पोच कुभांरे
कहि कबीर मेरी संका नासी सरब निरंजनु डीठा।
जब सब ओर सभी जाति-पाँति, धर्म कुटेब में बँटे थे और उसी निखट कार्य में ही व्यस्त थे, तब उन्होंने यह कहना भी आव¶यक समझा कि भाई एक रहो, क्योंकि सब एक ही घट से उपजे हैं। सभी अल्लाह, ई·ार के ही नूर हैं, इसी के बन्दे हैं, भ्रम में मत पड़ो। मालिक यानी प्राकृत प्रकृति में है और प्रकृति प्राकृत में समाई है। क्योंकि खालिक पूरा है, इसलिए सबमें यही समाया है। सभी इसी के हैं, जैसे कुम्हार की मिट्टी से अनेक भांडे बनते हैं। और ये भी जान लो न तो इसकी मिट्टी में ही कोई दोष है और न ही इसमें स्वयं में कोई दोष हो सकता है। तुम क्या जानो मुझे भी कैसी-कैसी ¶ांकाएँ थीं, लेकिन सतगुरु ने मेरी सभी ¶ांकाएँ समाप्त कर मुझे ब्राहृ दिखा दिया है। मैंने निरंजन देख लिया है और निरंजन को देखना एक बार की क्रिया नहीं है, इसे सतत् देखता हूँ, क्योंकि सर्व दि¶ााओं में बस यही एक है।
जब तक ऊँच-नीच में फँसे रहोगे, प¶ाु के समान भ्रमित भटकते रहोगे। कबीर साहब कहते हैं, जबसे मैंने मेर-तेर खोई है, तभी जान पाया हूँ कि राम जैसा कोई नहीं। यह भी जान बैठा हूँ कि सच्चा ही सिमरण कर सकता है और सतगुरु व राम के भय के बिना भक्ति नहीं हो सकती। सच्चाई में ही कोई भेद नहीं होता। यदि भेद को बीच आने दोगे, तो पारस छूने पर भी कंचन नहीं हो सकोगे।

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