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दुनिया की नज़र में कुम्भ
01-Apr-2016 12:00 AM 1393     

कुम्भ मेला केवल एक मेला ही नहीं वरन विभिन्न भाषा, संस्कृति और क्षेत्रों से आने वाले आस्तिक और नास्तिकों के मिलन का एक केंद्र है। मेले के दौरान जो विशाल जन समूह दिखता है, अगर उसे जन समुद्र का नाम दिया जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। यह मानवता का अनंत प्रवाह है, जो सदियों से अनवरत चला आ रहा है, जिसकी पुष्टि चीनी यात्री हुएनसांग जिसने राजा हर्षवर्धन के राज्य काल में वर्ष ६२९ से ६४५ तक भारत के विभिन्न भागों की यात्रा की, और उन्होंने अपने यात्रा संस्मरणों में कुम्भ के आयोजन से सम्बंधित कई बातों का उल्लेख किया है। इसे मानवता के प्राचीन, मध्य युगीन और सामयिक इतिहास में नि&संदेह इसे सबसे बड़े धार्मिक और अध्यात्मिक मेलों में से एक माना जा सकता हैं।
सूचना क्रांति के इस दौर में जब सूचनाएँ और समाचार एक देश या महादेश से दूसरे महादेश तक आँख झपकते ही पहुँच रही हैं, ऐसे समय में कुम्भ जैसे आयोजनों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के द्वारा भी खूब प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है, जिससे न सिर्फ कुम्भ मेले के बारे में विदेशों में लोगों को जानकारी हो प्राप्त हो रही है, बल्कि इस प्रक्रिया में भारत और भारतीय संस्कृति का नाम भी विदेशी मीडिया में छा रहा है और यह अवसर नि&संदेह भारत के नाम और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में सहयोग करता है।
एक बड़ी बात जो कुम्भ के साथ जुड़ी है वह है, भीड़ और यह कोई हजार, दस हजार की भीड़ नहीं बल्कि पूरे कुम्भ मेले के दौरान कई लाख लोग वहाँ इकट्ठे होते हैं। सरकारी और गैर सरकारी आकड़ों के अनुसार २०१३ में आयोजित महाकुम्भ में लगभग १२ करोड़ लोगों ने कुम्भ के दौरान गंगा में डुबकी लगाई। जितने लोगों ने इस मेले में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई, वह संख्या कई देशों की सकल जनसंख्या से भी ऊपर है और अस्थायी तौर पर ही सही इतनी विशाल जनसंख्या के कारण नि&संदेह संगम का क्षेत्र महाकुम्भ के दौरान दुनिया का सबसे बड़ा शहर बन गया था। यही प्रश्न हर किसी के दिमाग में कौंधता है कि इन कल्पवासियों का प्रबंधन और उनको रोजमर्रा की सुविधाएँ किस तरह से उपलब्ध करवाई जायेंगी? बहुत लोगों सोचते हैं कि इतनी भीड़ की वजह से कितना जल, वायु, ध्वनि और मृदा प्रदूषण होता है और प्रश्न किया जा सकता है कि इतनी भीड़ में किसी को अध्यात्मिक शांति कैसे प्राप्त हो सकती है? लेकिन, एक शोध के मुताबिक अगर आप विशाल जन समूहों के साथ कुछ दिन बिताते हैं तो आप समूह का हिस्सा बनने से पहले जितने खुश थे, समूह के साथ कुछ दिन बिताने के बाद आप मानसिक रूप से पहले से ज्यादा सुखी और प्रसन्न होते हैं।
स्टीफन रेइकर और उनकी मंडली ने दो समूह तैयार किये, एक कल्पवासियों का समूह और दूसरा ऐसा समूह जिसके सदस्यों ने कुम्भ में भाग नहीं लिया था। इन दोनों समूहों के ऊपर विभिन्न परीक्षण किये गए और स्टीफन रेइकर और उनकी मंडली ने यह निष्कर्ष निकाला कि कल्पवासियों की मानसिक प्रसन्नता का स्तर गैर कल्पवासियों के स्तर से काफी ऊँचा था। यह शोध सभी आँकड़ों और शोध के लिए अपनाये गए सिद्धांतों के साथ पलोसवन (घ्थ्दृद्मदृदड्ढ) नामक वैज्ञानिक पत्रिका में छपा है, और इसे अँग्रेज़ी में ऑनलाइन यहाँ ण्द्यद्यद्र://त्र्दृद्वद्धदठ्ठथ्द्म.द्रथ्दृद्म.दृद्धढ़/द्रथ्दृद्मदृदड्ढ/ ठ्ठद्धद्यत्ड़थ्ड्ढ?त्ड्डउ १०.१३७१/त्र्दृद्वद्धदठ्ठथ्.द्रदृदड्ढ.००४७२९१ पढ़ा जा सकता है। नि&संदेह यह शोध "वसुधैव कुटुम्बकम' की भारतीय अवधारणा को सही साबित करता है, जिसमें आपकी प्रसन्नता और खुशियाँ सिर्फ आप पर ही नहीं बल्कि आपके वृहत परिवार और आस-पास रहने वाले लोगों पर भी निर्भर है और उनकी स्थिति आपको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकती है।
ऑस्ट्रेलिया से आये एंड्रयू के अनुसार "भारत के बारे में जानने के लिए कुम्भ आयोजन से बेहतर समय नहीं हो सकता था। करोड़ों लोग यहां जुटते हैं।' २०१३ के कुम्भ मेले के सफल आयोजन के बाद वि?ा बैंक ने कहा था कि जिस तरह से मेले के दौरान पानी, बिजली और सुरक्षा के साथ-साथ संगम क्षेत्र में एक पूरा अस्थायी शहर बसाया गया और मेले के समाप्त होते ही उसे पूरी तरह से खाली किया गया, वे सारे प्रयास बहुत ही प्रशंसनीय हैं।
इलाहाबाद कुम्भ के दौरान हॉर्वर्ड वि?ाविद्यालय से ५० शोधकर्ताओं की एक मंडली आयी जिसमें प्रोफ़ेसर, शोधकर्ता और छात्र भी शामिल थे और इस मंडली ने मेले के हर पहलू का अध्ययन किया और इन सभी सूचनाओं को "कुम्भ मेला : अल्पकालीन शहर का चित्रण' (ख़्द्वथ्र्डण् ग्ड्ढथ्ठ्ठ: ग्ठ्ठद्रद्रत्दढ़ द्यण्ड्ढ कद्रण्ड्ढथ्र्ड्ढद्धठ्ठथ् ग्ड्ढढ़ठ्ठड़त्द्यन्र्) नामक किताब में विस्तार से प्रकाशित किया है।
इस समूह ने मेले में तकरीबन ५० दिन बिताये और इस दौरान उन्होंने न सिर्फ मेले के अद्भुत धार्मिक अनुभव प्राप्त किये, बल्कि मेले में उपस्थित शहरीकरण योजना, जन स्वास्थ्य सेवा, सरकारी तंत्र, सुरक्षा और व्यापार आदि विषयों का भी गहन अध्ययन किया। इन लोगों ने न सिर्फ गंगा में डुबकी लगाई बल्कि साधुओं और संतों के धार्मिक अनुशासन को करीब से देखा और उसका अवलोकन किया ।
हार्वर्ड और कुम्भ की राजकीय आयोजन समिति के अनुसार, मेले के दौरान श्रद्धालुओं के लिए ४१ पुलिस चेक पोस्ट, ३६ अग्नि-शमन केंद्र, ३० अस्पताल केन्द्रों के अलावा कई निजी संस्थाओं ने तकरीबन ७ लाख टेंट कुम्भ के अस्थाई शहर के अंदर बसाये गए थे। २५ हजार खम्भों पर प्रकाश व्यवस्था के लिए ९६० किमी बिजली के तार और अनवरत बिजली, प्रति घंटे ५ लोगों की धारण क्षमता के १८ पंटून पुल, पीने के पानी के लिए ६९० किमी पानी के पाइप, जैव परिवर्तक तकनीक युक्त ३४ हजार शौचालय और ७००० स्वच्छता कर्मचारियों की दिन-रात सेवा, १५६ किमी का नया सड़क जाल, कानून-व्यवस्था, तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और आतंकी घटनाओं को विफल करने के लिए २० हजार पुलिस के जवान और सरकारी परिवहन व्यवस्था आदि की सुविधाएँ भी मुहैया कराई गयीं। बहुतेरे स्वयं सेवी संस्थाओं ने उत्तर प्रदेश पुलिस के सहयोग और समन्वय के साथ भूल भटके केन्द्र चला रहे थे।  
हॉर्वर्ड की मंडली ने पाया कि कुम्भ मेले के लिए बसाये गए शहर का क्षेत्रफल, संयुक्त राष्ट्र संघ, अमेरिका के नेवादा राज्य में आयोजित होने वाले "बÍनग मैन' मेले से कुछ ही गुणा बड़ा था, लेकिन कुम्भ में मौजूद शीर्ष-संख्या नेवादा के "बÍनग मैन' से कम से कम १००० गुणा ज्यादा थी। अकेले पूर्णिमा के दिन ही लगभग ३-४ करोड़ लोग मेले में जुटे थे। ५५ दिन चले इस मेले के लिए आवास, सड़क, शौचालय और अन्य जन सेवाओं की सुविधाओं की सतत आवश्यकता थी और इसे बखूबी प्रदान भी किया गया। हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर राहुल मेहरोत्रा के अनुसार शहरीकरण योजना के लिहाज से मेले का आयोजन एक ऐसा अनुभव था जिसमें एक वृहद शहर जिसकी स्थापना ही समाप्ति तिथि के साथ की गयी थी और इसे न सिर्फ तय समय में बसाया गया, बल्कि तय समय में ही उसे उखाड़ भी लिया गया।
पूरी दुनिया में कुम्भ मेला केवल एक भारत का आन्तरिक मेला ही नहीं वरन दुनिया की विभिन्न समस्याओं का समाधान पाने की एक जीवित प्रयोगशाला की तरह है और इस प्रयोगशाला से निकलने वाले समाधानों का महत्व अंतरराष्ट्रीय परिपेक्ष्य में प्रासंगिक और कारगर सिद्ध हो सकता हैं।

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