ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
इंसानी बिरादरी का ख़्वाब
01-Mar-2019 02:56 PM 979     

जब भी दुनिया में छोटे-बड़े संघर्ष और जंग होती है तब एक सुर सुनाई देता है कि लड़ने से पहले बातचीत कर लो। संवाद से ही रास्ता निकलेगा। क्योंकि यह दुनिया ही ऐसी है कि इसमें बहुत दिनों तक दुश्मनी स्थायी रह ही नहीं सकती। दोस्ती की तरफ हाथ बढ़ाये बिना ये दुनिया चल ही नहीं सकती।
दुनिया में दो बड़े युद्ध योरुप की धरती पर हुए - पहला 1914 और दूसरा 1945 के आसपास और इन युद्धों से योरुप के लोगों ने जो नुकसान उठाये वे इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। कैसे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी में कई पीढ़ियों तक अपाहिज संतानें पैदा होती रहीं, इस युद्ध के कारण जो रेडियोधर्मिता फैली उसने आदमी के और पशु-पक्षियों तक के जीवन में कई तरह के रोगों को पैदा किया। पता नहीं उन्हें इन रोगों से अब तक पूरी निजात मिल पाई है या नहीं, क्योंकि युद्ध के कारण जो रोग जीवन की अनुवांशिकी में घर कर जाते हैं वे कई पीढ़ियों तक उस जीवन का पीछा करते रहते हैं।
स्मरणीय है कि युद्ध और प्रेम का सम्बन्ध आज तक टूटा नहीं है। दुनिया में लिखे गये महान उपन्यास युद्ध और प्रेम के बिना लिखे ही नहीं जा सकते थे। भारतवर्ष ने मनुष्य के समूची सृष्टि से प्रेम को अपने दर्शन में आत्मबल से युक्त माना है। यह आत्मबल लड़ने वाले योद्धा को उसके पौरुष की उस आत्मिक ऊँचाई पर खड़ा करता है जहाँ सामने कोई शत्रु नहीं होता सिर्फ अन्याय का प्रतिकार होता है। कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को यही समझाया कि अर्जुन जब तक तुम्हें अपने बंधु-बांधवों से मोह है तब तक तुम इनसे युद्ध कर ही नहीं सकते। पर जैसे ही तुम्हें यह भरोसा हो जायेगा कि दुर्योधन और तुम्हारी आत्मा की एकता में कोई फर्क नहीं है तब तुम दुर्योधन को नहीं मार रहे होगे, तुम सिर्फ उस अन्याय का प्रतिकार कर रहे होगे जो दुर्योधन की रजोमयी और तमोमयी प्रकृति के कारण हो रहा है। रामायण में भी राम ने रावण को शत्रु मानकर नहीं मारा। उस पर करुणा करके ही उसका वध किया है। अन्यथा राम, रावण की मृत्यु के समय अपने भाई लक्ष्मण से यह क्यों कहते कि जाओ दशानन से कुछ सीख लो। नहीं तो जो ज्ञान दशानन को प्राप्त है उसे उसकी मृत्यु उठा ले जायेगी।
बहुत गहराई से विचार करें तो मनुष्य का जीवन शत्रुता के लिये बना ही नहीं है। इसका कारण यह है कि वह अपने विवेक से अपने द्वारा की जाने वाली हिंसा पर काबू पाने में सक्षम है। मानव जाति अगर इस संयम में जीना सीख ले तो इस पृथ्वी पर अन्याय का प्रतिकार होने के बावजूद भी शत्रुता का सदा अभाव बना रहेगा और आपसी मैत्री के ही फूल दुनिया के हर देश में खिलते रहेंगे।
गर्भनाल पत्रिका के सहयोगी और हिंदी के कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल ने पिछले दिनों कश्मीर के पुलवामा में घटी घटना पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों द्वारा चलाये जा रहे छद्म वार्ता-विमर्श पर अपने नियमित ब्लॉग में मानवता के पीछे छूट रहे ज़रूरी सवालों को रेखांकित किया। वे लिखते हैं :
""कश्मीर में हुई एहतियातन गिरफ्तारियों पर वहाँ की एक राजनीतिक पार्टी की नेता ने कहा कि किसी को कैद करके उसके विचार को कैद नहीं किया जा सकता। उनकी बात गलत नहीं है। भारत की आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी को बार-बार कैद करके उनके अहिंसा और सत्याग्रह के विचार को कभी कैद नहीं किया जा सका। वह विचार दुनिया में आतंक के बावजूद जिन्दा है और उसके बिना किसी की जिन्दगी चलने वाली नहीं है। गांधी जी ने साफ तौर पर राष्ट्र उसे माना जिसमें हिन्दू-मुसलमान साथ रह सकें। भारत में वे साथ रहने के काबिल बन भी गये हैं। पर सीमा पार से जो आफतें लगातार आती रहती हैं उनकी जड़ें इतिहास की जमीन में खोजी जाती रही हैं।
विचारक और लेखक नीरद सी. चौधरी यह अनुभव करते रहे कि -- पाकिस्तान की ट्रेजेडी यह है कि वह एक विनष्ट उद्देश्य (थ्दृद्मद्य ड़ठ्ठद्वद्मड्ढ) के लिए लड़ने को विवश है और वह है-- इस्लाम। कोई देश अब इस्लामी आदेशों को दुनिया पर थोपने का इरादा नहीं रखता और न ही इस्लाम के अनुसार अपना संपूर्ण जीवन हूबहू चलाता है। पाकिस्तान की समस्या ये है कि अगर वह इस विनष्ट उद्देश्य से मुँह मोड़ ले तो उसमें रहने वाले लोग भारत की तरफ खिंचे चले आयेंगे और दो देशों के बीच का अस्वाभाविक विभाजन खत्म हो जायेगा। इसीलिए पाकिस्तान अपने अस्तित्व को किसी तरह बचाये रखने के लिए इस विनष्ट और विलुप्त उद्देश्य के लिए जद्दोजहद करता रहता है। यह दुष्चक्र ही उसकी बिडंबना है। कश्मीर की वो नेता इसी विनष्ट उद्देश्य के पक्ष में खड़ी दिखायी दे रही हैं। उन्हें तो इस दुष्चक्र से कश्मीर को बाहर निकालने की कोशिशों में अपना हाथ बंटाना चाहिए। वो भारत की आदरणीय नागरिक हैं, पाकिस्तान की नहीं।
"फ्राइडे टाइम्स" के संपादक नज्म सेठी ने कभी कहा था कि -- पाकिस्तानी यह तय नहीं कर पाये हैं कि एक राष्ट्र के रूप में वे कौन हैं, कहाँ से जुड़े हुए हैं, किस चीज में विश्वास रखते हैं और किस दिशा में जाना चाहते हैं। क्या वे दक्षिण एशिया के अंग हैं या मध्य-पूर्व के। क्या वे सऊदी अरब या ईरान जैसे देश हैं या जार्डन और मिश्र जैसे उदार हैं। यदि इनमें से कोई नहीं तो फिर क्या हैं। सेठी प्रश्न उठाते हैं कि इस्लाम की हम कौन-सी व्याख्या मानें। अनगिनत इस्लामी जमातों और संप्रदायों की अपनी अलग इस्लामी धार है और इसी कारण पाकिस्तान तनाव और हिंसा की उलझन में फँसा हुआ है। इस उलझन ने पाकिस्तान को चोट ही पहुँचाई है और दुनिया में वह अपनी पहचान के संकट से ग्रस्त है।
कश्मीर को जिहाद का दरवाजा बनाकर पाकिस्तान को दुनिया में बदनामी के अलावा अब तक मिला ही क्या है। यूरोप में भी जिहाद के अनेक दरवाजे खुले हुए हैं। इटली की रहने वाली साहसी पत्रकार ओरियाना फलासी ने इस्लाम और यूरोप के बारे में अपना चालीस साल का अनुभव प्रकट करते हुए यही निचोड़ निकाला है कि -- यह युध्द हमारे शरीर पर नहीं, आत्मा पर चोट करना चाहता है। हमारी जीवनशैली और चिंतन को मिटाना चाहता है। यह एक रणनीति है और वे हमें झुकाने के लिए मार रहे हैं। यह हिंसा हमें धमकाने, थकाने, नैतिक रूप से कमजोर करने और ब्लैकमेल करने के लिए हो रही है।
यूरोप और भारत जिस साजिश से त्रस्त हैं, हमारी उन कश्मीरी नेता को इस साजिश में कौन-से मूल्यवान विचार नजर आ रहे हैं जो दोनों मुल्कों में खुशहाली और शांति लाने के काबिल हों। दूसरी तरफ हमारे ज्यादातर मीडिया चेनलों पर भारत और पाकिस्तान के बीच जंग जारी है और इस जंग को जुबानी गोलियाँ दागने वाले राजनीतिक दलों के प्रवक्ता और रिटायर सैनिक लड़ रहे हैं जबकि हमारी सेना अपने धैर्यपूर्ण साहस और पराक्रम से शत्रु का सामना कर रही है।
मीडिया चैनल अच्छी तरह समझ लें कि कोई भी जंग दुनिया के जीवन को आगे नहीं ले जाती बल्कि पीछे धकेल देती है। अब तो फेसबुकिया युध्द भी लड़े जा रहे हैं। मीडिया चाहे तो पाकिस्तान की उस दुविधा पर सारगर्भित विचार-विमर्श आयोजित कर सकता है जिसमें वह फँसा हुआ है। मीडिया को ऐसा खुदाई खिदमतगार होने का सपना पालना चाहिए जिससे एक बड़ी इंसानी बिरादरी का प्रेम इस धरती पर फल-फूल सके।""
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हिंदी के सुप्रतिष्ठित आलोचक डॉ. नामवर सिंह का पिछले दिनों 93वें वर्ष की आयु में दिल्ली में निधन हो गया। वे प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं के भी गहरे जानकर थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सानिध्य ग्रहण करने के कारण उन्हें संस्कृति वांग्मय और भारतीय संस्कृति के आयामों से दूर का नहीं कहा जा सकता। वैसे वे आधुनिक देश-विदेश के साहित्यकारों के बीच एक माक्र्सवादी आलोचक भी थे। नामवर सिंह से उनकी साहित्य में प्रगतिशील अवधारणाओं के कारण साहित्य जगत में अनेक प्रकार की असहमतियाँ पैदा होती रहीं जिस पर यथासमय गैरनतीजतन सम्वाद होता रहा।
यह बात यहाँ जरूर रेखांकित करने की है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के जमाने से जो हिंदी नयी चाल में ढलती आ रही थी और बाद में चलकर वह भारत के साहित्य, स्वतंत्रता संग्राम और समाचार-पत्रों की भी प्रभावी बोली बनी, डॉ. नामवर सिंह उसी नयी चाल की ढली हिंदी के साहित्यकार थे। अगर किसी को अतिश्योक्ति न लगे तो यहां यह कहना भी उचित होगा कि वे आधुनिक हिंदी की साहित्य परम्परा के लगभग अंतिम आचार्य थे। उनकी प्रमुख पुस्तकों में कविता के नये प्रतिमान, छायावाद, इतिहास और आलोचना, वाद, विवाद, सम्वाद और दूसरी परम्परा की खोज आदि कृतियाँ शामिल हैं। निश्चय ही उनके अवसान से हिंदी के साहित्य जगत में एक सूनापन दीर्घकाल तक बना रहेगा।
इस अंक से हम सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी सुश्री लीना मेहेंदळे का एक स्थायी स्तम्भ शुरू करने जा रहे जो हर महीने गर्भनाल में "यादें" शीर्षक से प्रकाशित होगा। इस स्तम्भ की एक विशेषता की ओर ध्यान दिलाना बहुत जरूरी है कि कैसे भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने वाली एक नारी प्रशासक हिंदी और अंग्रेजी के द्वंद्व को पार करती हुई लोकसेवक की भूमिका निभाती है।

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