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डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
1932 में जन्म। मध्यप्रदेश शिक्षा सेवा में दर्शन शास्त्र के आचार्य और महाविद्यालयों में प्राचार्य रहे। विभिन्न विषयों पर दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। आधे दर्जन व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा व्यंग्य-संग्रह "हंसो लेकिन अपने पर" शरद जोशी सर्जना पुरस्कार तथा निबंध विधा के अंतर्गत "साहित्य, समाज और रचना" ग्रन्थ पर महावीर प्रसाद द्विवेदी नामित पुरस्कार से सम्मानित। सम्प्रति - इलाहाबाद में निवास तथा सर्जनात्मक लेखन में सक्रिय।

धर्म के बाबा और बाबाओं का धर्म
भारत हमेशा से ही एक धर्मपरायण और धर्मनिष्ठ देश रहा है। आज भी है। फर्क केवल इतना है कि धर्म के प्रति जन जन में आस्था पैदा करने के लिए आज इसकी परिभाषा को सरल-सहज कर दिया गया है। धर्म वह है जो धारण किया जाए। अत: आप जो भी धारण कर लेते हैं वही धर्म हो
गांधी जी और पत्रकारिता
गांधी जी ने पत्रकारिता को कभी एक व्यवसाय के रूप में स्वीकार नहीं किया। वे एक मिशनरी पत्रकार थे और वे इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि उनके मिशन की सफलता के लिए पत्रकारिता एक अत्यंत सशक्त माध्यम है
कल-कल निनाद
आज बात मैं "कल" की करना चाह रहा था। अब आप पूछेंगे, कौन से कल की? जी हाँ, समय से संदर्भित "कल" दो प्रकार के होते हैं। क कल जो बीत गया और एक कल जो आने वाला है। जब तक पूरी बात न कह दें आप समझ ही नहीं सकते कौन से कल की बात कही जाएगी। पड़े रहिए भ्रम में
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