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डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री राजभाषा को समर्पित व्यक्तित्व
01-Feb-2019 02:18 PM 2089     

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमें सरलता थी, सौम्यता थी, स्पष्टवादिता थी, निडरता थी, कर्मठता थी, सादगी थी और ऐसे ही व्यक्तित्व का नाम था डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री जो विगत 15 जनवरी 2019 को हमारे बीच नहीं रहे। अग्निहोत्री जी उस दौर में बैंकिंग जगत् के राजभाषा-कार्यान्वयन के क्षेत्र में आए जिस दौर में बैंकों में हिंदी का कार्यान्वयन कठिन था और वह शुरुआती दौर भी था। बैंकों में हिंदी की फौज नहीं थी। भारतीय स्टेट बैंक जैसे बड़े बैंक में अग्निहोत्री जी ने हिंदी की फौज खड़ी की और इसकी नींव में माननीय संसदीय राजभाषा समिति के तत्कालीन निरीक्षण के शब्द डाले। यह 1984-85 का वह दौर था जब बैंकों में हिंदी के कर्ता-धर्ता नियुक्त होने लगे थे और बैंकिंग जगत् में हिंदी की धारा बह चली थी जो आज पल्लवित और पुष्पित है, भले ही फलित न हो। वे भारतीय स्टेट बैंक के प्रधान कार्यालय में मुख्य अधिकारी (राजभाषा) रहे और वर्ष 1995 में सेवानिवृत्त हुए। वे सेवानिवृत्ति के बाद के दिनों में भी राजभाषा हिंदी को समर्पित रहे। उन्होंने बैंकिंग के अपने कार्यकाल में पूरी निष्ठा के साथ राजभाषा कार्यान्वयन पर बल दिया।
प्रारम्भ में डॉ. अग्निहोत्री ने उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में स्नातक तथा स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन किया। वे जयपुर के राजस्थान विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे। तदुपरान्त भारतीय स्टेट बैंक के केंद्रीय कार्यालय, मुंबई में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी संभाली और वहीं से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद वे कई बैंकिंग तथा प्रबंधन-संस्थाओं से जुड़े रहे। वे जहां भारत सरकार के वित्त मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य रहे वहीं पुणे स्थित राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान में प्रोफेसर व सलाहकार और चेन्नै स्थित एसबीआईओए प्रबंध संस्थान में वरिष्ठ प्रोफेसर रहे। वे हिंदी, अंग्रेज़ी तथा संस्कृत के जानकार थे। हिंदी, अंग्रेज़ी तथा संस्कृत से संबन्धित लगभग 500 लेख-आलेख-समीक्षाएं लिखने वाले, लगभग 10 शोध-रचना करने वाले तथा लगभग 40 पुस्तकों के रचयिता डॉ. अग्निहोत्री कई विश्वविद्यालयों एवं बैंकिंग उद्योग की विभिन्न संस्थाओं से भी सम्बद्ध रहे व अपनी हिंदी सेवाएँ देते रहे और भारतीयता की अलख जगाते रहे। उन्होंने निबंध, समीक्षा, कहानी, संस्मरण जैसी कई विधाओं में अपनी कलम चलाई। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं - "आधुनिक भारतीय शिक्षा : समस्याएँ और समाधान", "भारतीय शिक्षा : दशा और दिशा", "राजभाषा नीति, प्रयोजनमूलक हिंदी : अर्थ और रूप", "समग्र गुणता प्रबंध, सम्प्रेषण और प्रभावशीलता", "सुलेख के साधन", "भाषा कोश", और "शिशुओं का भाषा विकास"।
डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री के कई आलेखों पर ख़ूब चर्चा हुई है। उन्हीं में से एक आलेख है - "300 रामायण : कथ्य और तथ्य" जो उनका प्रसिद्ध आलेख है। यह आलेख अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के प्रोफेसर ए.के. रामानुजन (1929-1993) के लगभग 30 पृष्ठों के "300 रामायणाज़" पुस्तिका पर लिखी एक तरह की आलोचना है। प्रोफेसर रामानुजन की इस रचना की ख़ूब चर्चा रही है जो दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के बी.ए. ऑनर्स पाठ्यक्रम में 2006 से 2010 तक लगा हुआ था। इसे काफी विरोध के बाद वर्ष 2011 में पाठ्यक्रम से हटाया गया था। डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री ने इस प्रकरण पर एक लंबा लेख लिखा और यह कहा कि डॉ. बुल्के ने भी लगभग इतनी ही रामकथाओं का उदाहरण अपने शोध में दिया है। उन्होंने अपने आलेख में इस बात पर ज़ोर दिया कि फ़ादर बुल्के की इस पुस्तक को आज भी "रामकथा संबंधी समस्त सामग्री का विश्वकोश" माना जाता है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि फादर डॉ. कामिल बुल्के (1 सितंबर 1909 -- 17 अगस्त 1982) ने सन् 1950 में किए अपने हिंदी शोध "रामकथा : उत्पत्ति और विकास" में लगभग 300 रामकथाओं का जिक्र किया है। इस पुस्तक का ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा विश्वविद्यालय के प्रो. रिचर्ड बार्ज द्वारा अंग्रेज़ी में अनुवाद हो चुका है।
डॉ. अग्निहोत्री शिक्षा क्षेत्र से बैंकिंग क्षेत्र में आए थे। उनकी पकड़ जितनी शिक्षा क्षेत्र में थी, उतनी ही पकड़ बैंकिंग क्षेत्र में भी थी। वे अंग्रेजी से हिंदी के सफल अनुवादक थे। यही कारण है कि वे अनुवाद में छोटी-छोटी-सी गलतियों तथा बारीकियों को भी पकड़ लेते थे। हिंदी प्रूफ-रीडिंग पर भी जबरदस्त पकड़ थी उनकी। लेखन तथा प्रकाशन में अशुद्धियों को उन्होंने कभी बर्दाश्त नहीं किया। इसीलिए उन्होंने सही प्रूफ-रीडिंग को वरीयता दी और एक भी गलती न जाए इसका हमेशा ख्याल रखा। आमतौर पर बड़े अधिकारी कनिष्ठ अधिकारी के क्रम में, खासकर हिंदी में, बहस, तर्क-वितर्क, विमर्श, टिप्पणी, समालोचना आदि को तरजीह नहीं देते, जबकि अग्निहोत्री जी अपने स्टॉफ के बीच इसे प्राथमिकता देते थे। यह सभी के आगे बढ़ने की उनकी सकारात्मक सोच थी। कार्यालय में पदोन्नति समय पर मिले तो खुशी की बात होती है। आम तौर पर जैसा होता है प्रबंधन में पदोन्नति के मामले में, उन्हें समय पर उप महाप्रबंधक का पद नहीं मिला लेकिन उन्होंने इसका कभी बुरा नहीं माना और सदैव राजभाषा की प्रगति देखना चाहा, श्री हीरलाल हैदराबादी ने इसका जिक्र किया है।
हिंदी के प्रति समर्पित व्यक्तित्व था उनका। उनके इसी समर्पण का परिणाम था कि उन्हें ढेर सारे पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, दिल्ली स्थित एनसीईआरटी से सर्वोत्तम शोध पुरस्कार, माता कुसुम कुमारी पुरस्कार, जयपुर स्थित राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी से प्रतिष्ठित लेखक सम्मान, अंतर-राष्ट्रीय कला एवं साहित्य परिषद् से राष्ट्रीय एकता सम्मान और कालिदास कपूर सम्मान प्राप्त हुए। यहाँ ध्यातव्य यह है कि उनकी कई पुस्तकों पर जहां कई अखिल भारतीय पुरस्कार प्राप्त हुए वहीं उन्हें यथासमय माननीय राष्ट्रपति जी से सम्मानित भी किया गया। उनका राजभाषा हिंदी तथा साहित्य के प्रति ऐसा समर्पण था कि उन्हें विद्या-वाचस्पति तथा साहित्य-शिरोमणि जैसी मानद उपाधियों से भी नवाजा गया।
डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री को बैंकिंग का राजभाषा-समाज जानता ही नहीं था, पहचानता भी था और आज उनके निधन पर सभी शोकाकुल हैं जो वाट्सएप के विभिन्न ग्रुपों के संदेशों से पता चलता है। कुछ हिंदी सेवियों के शोक उद्गारों से अग्निहोत्री जी के विलक्षण व्यक्तित्व का निदर्शन होता है। श्री हीरालाल हैदराबादी ने उनकी कई विशेषताओं को रेखांकित करते हुए एक अविश्वसनीय पक्ष तथा उनकी कर्मठता को सामने रखा। "क्या कोई विश्वास करेगा कि जुहू स्थित अपने निवास से नरीमन प्वाइंट स्थित कार्यालय आते समय वे चार्टर्ड बस में प्रूफ रीडिंग करते हुए आते थे।" डॉ. जवाहर कर्णावट ने लिखा-- "बैंकिंग की राजभाषा जगत् में पितामह समान डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री जी के अतीत के चलचित्र दिखाकर वर्तमान राजभाषा पीढ़ी को अभिप्रेरित किया है।" श्री उदयभान दुबे ने अपने उद्गार में कहा- "दुख है कि हम लोग किसी व्यक्ति के मूल्य-महत्व को तब आँकते और समझते हैं, जब वह नहीं रहता है।" विभिन्न पोस्टों से पता चलता है कि अग्निहोत्री जी का व्यक्तित्व जादुई और राजभाषा से जुड़े लोगों के लिए अनुकरणीय था। स्टेट बैंक में और प्रकारान्तर से अन्य बैंकों, संस्थाओं में राजभाषा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाने में उनका महान योगदान था। इसलिए वे न केवल अपने सहकर्मियों के बीच, बल्कि सम्पूर्ण राजभाषा जगत् में अत्यंत लोकप्रिय और सम्मानित थे। समय रहते हम उनसे कुछ ज्यादा नहीं सीख सके, इसका दुख है। डॉ. श्याम किशोर पांडेय ने अपनी भावना इस रूप में व्यक्त कि "एक सुलझे हुए विद्वान, उद्भट वक्ता, बैंकों में राजभाषा हिंदी के पूर्ण रूप से कार्यान्वयन हेतु निष्ठापूर्वक सतत प्रयत्नशील परमादरणीय अग्निहोत्री जी के निधन से हिंदी की अपूरणीय क्षति हुई है। मेरे जैसे असंख्य राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयनकारों को इस शोक- समाचार से गहरा आघात लगा है।"
डॉ. अग्निहोत्री का जन्म 11 मई 1937 को लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका बचपन बीता जबलपुर में, किशोरावस्था भी गुजरी यहीं। यहीं टी.बी. सेनेटोरियम में उनके पिता जी मुख्य चिकित्सा अधिकारी थे। यद्यपि उन्होंने अपना पड़ाव पी/138, एमआईजी, पल्लवपुरम-फेज 2, मोदीपुरम, मेरठ को बनाया था लेकिन फिलहाल वे अपनी संतान के पास ऑस्ट्रेलिया में रह रहे थे।
डॉ. अग्निहोत्री ने विदेशों की भी यात्राएं कीं। कुछ वर्ष उन्होंने ऑस्ट्रेलिया (डोरसेट ड्राइव, अल्फ्रेडटन, बेलारेट, विक्टोरिया) में बिताए। अभी भी वे वहीं थे जहां वे ब्रेन हेमरेज के ऑपरेशन के बाद संबन्धित जटिलताओं से उबर नहीं पाए और उनका निधन इक्यासी वर्ष की उम्र में 12 जनवरी 2019 को भारत से दूर ऑस्ट्रेलिया में हुआ। उनका फोन अब कभी घनघनाएगा नहीं। उनकी कमी हमेशा खलती रहेगी। वे भाषा-प्रेमी तथा हिंदी के हितैषी तो थे ही, प्रवासी भारतीयों की मासिक ई-पत्रिका "गर्भनाल" के संपादकीय परिवार के सदस्य भी थे। उन्हें विनम्र भावभीनी श्रद्धांजलि।

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