ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दूर-देशों के भारतवंंशी गिरमिटिया
CATEGORY : आवरण 01-Nov-2016 12:00 AM 2922
दूर-देशों के भारतवंंशी गिरमिटिया

यह मानव का नैसर्गिक स्वभाव है कि वह जोखिम भरे कामों को आगे बढ़कर उत्साहपूर्वक करता है। जब मानव को समुद्री मार्गों से यात्रा करना सुरक्षित लगने लगा, तब इंग्लैंड, पुर्तगाल, स्पेन और फ्रांस के विस्तारवादी तथा दु:साहसी लोग नये-नये भू-भागों की खोज में निकल पड़े। जहां-जहां उन्हें अवसर मिला, उन्होंने येन-केन-प्रकारेण उपनिवेश बनाने प्रारंभ कर दिए। ब्रिटिश कंपनियों ने विभिन्न देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करने से इसकी शुरुआत की। सर्वप्रथम ब्रिटेनवासियों ने उन क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व जमाना शुरू किया, जहां कृषि, खनिज और उत्पादन के क्षेत्र में लाभ अर्जित करने की अच्छी संभावनाएं थीं। स्वाभाविक है कि अपने देश से दूरस्थ स्थानों पर जाकर वे अपने बलबूते पर यह सब कार्य नहीं कर सकते थे। ब्रिटेन से मजदूर लाना तो बिल्कुल भी बुद्धिमत्ता का कार्य नहीं था, हालांकि उन्हें आयरिश एवं स्कॉटिश श्रमिक बड़ी संख्या में उपलब्ध हो सकते थे। ब्रिटिश श्रमिकों को ऐसे कामों में लगाना व्यवसाध्य था और ब्रिटेन के श्रमिकों के साथ वैसा क्रूर व्यवहार करना असंभव था, जैसा उन्होंने पहले आयरिश और अफ्रीका से लाए गये दासों और बाद में गिरमिटिया मजदूरों के साथ किया था।
उपर्युक्त कामों के लिये कामगारों की आवश्यकता की पूर्ति के लिये उन्होंने स्थानीय लोगों की सहायता से दास प्रथा का सहारा लिया। दास प्रथा 18वीं शताब्दी तक विश्वभर में अपने पैर फैलाती रही, जब तक कि इसका विधिवत् अंत नहीं कर दिया गया। जब तक दास प्रथा का अस्तित्व रहा, औपनिवेशिक शक्तियों ने दासों का जमकर शोषण किया। स्मरणीय है कि केवल अफ्रीका के लोगों को ही दास नहीं बनाया गया, बल्कि बहुत बड़ी संख्या में आयरलैंड और स्कॉटलैंड के लोग भी दासता की बेड़ियों में जकड़कर रखे गये। बल्कि गोरे दासों की दशा तो काले दासों के मुकाबले बहुत ही दयनीय थी और उनका मूल्य भी बहुत कम था। यह जानकर आश्चर्य होता है कि जहां बाजार में एक अफ्रीकी दास का दाम 50 शिलिंग होता था, वहीं गोरे दास मात्र 5 शिलिंग में ही उपलब्ध हो जाते थे। इसलिए गोरों के ऊपर बहुत ही अमानुषिक अत्याचार किए जाते थे। क्योंकि दासों के स्वामियों को लगता था कि यदि कोई गोरा दास मर भी गया तो उनकी कोई विशेष हानि नहीं होगी, जबकि अफ्रीकी दास के मरने पर उनका बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है। दास प्रथा की समाप्ति के साथ ही सभ्य समाज ने सोचा कि कम-से-कम इस अमानवीय प्रथा के द्वारा अब मानव मानव का शोषण नहीं कर पाएगा। परंतु जिनके मुंह खून लग चुका था, वे दास प्रथा का विकल्प खोजने में जुट गए।
दास प्रथा की समाप्ति के पश्चात् ब्रिटिश संस्थानों ने सस्ते श्रमिकों के लिए नये-नये रास्ते खोजने प्रारंभ किये, जिनके द्वारा वे उन्हें अपने दूरस्थ उपनिवेशों में ले जा सकें। शर्तबंदी के रूप में उन्होंने एक नया रास्ता खोज निकाला। ब्रिटिश कंपनियों ने उन क्षेत्रों से बंधुआ श्रमिकों को लाना प्रारंभ किया, जहां आबादी का घनत्व अधिक था, जैसे कि चीन और भारत। इसलिए अधिकांश: गिरमिटिया मजदूर भारत और चीन से बाहर ले जाये गये।
कहा जाता है कि 1834 से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति तक ब्रिटेन द्वारा 20 लाख बंधुआ मजदूर 19 उपनिवेशों में भेजे गये। इसके लिए उस समय की भारत में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का अध्ययन करना आवश्यक है। यह जानना भी अनिवार्य है कि किन कारणों से लाखों लोग अपनी मातृभूमि का मोह त्यागकर बाहर जाने के लिये तैयार हुए। इसके लिए ब्रिटेन और अन्य औपनिवेशक शक्तियों द्वारा क्या-क्या तरीके अपनाए गए और अपने गंतव्य पर पहुंचने के बाद उनकी हालत कैसी रही। औपनिवेशक शक्तियों ने समझौतों के आधार पर बंधुआ मजदूरों की नियुक्ति प्रारंभ की। 18वीं शताब्दी के प्रारंभ तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में अपने पैर जमा लिये थे। अधिकतर लोग गरीबी से ग्रसित थे और बड़े-बड़े जमींदार दिन-रात उनका शोषण कर रहे थे। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये यह स्थिति औपनिवेशक शक्तियों के लिये बहुत सुविधाजनक थी। स्थानीय प्रभावशाली और चालाक लोगों की सहायता से उन्होंने अपने उपनिवेशों में गन्ना, कपास और चाय के खेतों में काम करने के लिए बंधुआ मजदूरों की खोज की। मुख्यत: ऐसे बंधुआ मजदूरों की फीजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना, युगांडा, केन्या और दक्षिणी अफ्रीका के उपनिवेशों में भेजा गया। उनके आत्मसम्मान को क्षत-विक्षत करने के लिये इन श्रमिकों को "कुली" कहकर संबोधित किया जाने लगा। उनके साथ पशुओं से भी बुरा व्यवहार किया जाता था, ताकि वे कभी विरोध का कोई विचार भी अपने मन में न ला सकें।
यहां पर उन भारतीय मजदूरों का उल्लेख करना चाहते हैं, जिन्हें फीजी, मॉरीशस, कैरेबियन द्वीप समूहों, दक्षिण अफ्रीका के अतिरिक्त श्रीलंका और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में ले जाया गया। विशेष तौर पर जिन्हें भारत से सन् 1834 से 1917 के बीच ले जाया गया। आज उनकी नई पीढ़ियाँ अपने-अपने देशों के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक मामलों पर गहरा प्रभाव बना चुकी हैं। उनके में में भारत के प्रति एक आकर्षण है। इनके पूर्वज अपने साथ अपनी संस्कृति और भाषा को भी लेते गए थे। आज सदियां व्यतीत हो जाने पर भी उन्होंने अपनी भाषा को जीवित रखा है, भले ही उसमें अनेक प्रकार के परिवर्तन आते रहे हैं।
इन मजदूरों के साथ एग्रीमेंट करके उन्हें पांच वर्ष के लिये किसी निश्चित वेतन पर लिया जाता था। जो घर से चलने के पूर्व उन्हें प्राय: बताया नहीं जाता था। उन्हें कहा जाता था कि जहां वे जा रहे हैं, वहां की धरती सोने से भरी हुई है। इसलिए लौटने पर वे बहुत ही धनवान होकर लौटेंगे। बिचौलियों द्वारा उन्हें उज्ज्वल भविष्य के सुनहरे सपने दिखाए जाते थे। कहा जाता था कि वहां पर तुम्हें मुफ्त भूमि, खाना-पीना और वेतन के अतिरिक्त सभी सुविधाएं मिलेंगी तथा बहुत-सा धन कमाकर पांच साल बाद अपने देश लौट सकेंगे। उन्हें अपनी मंजिल की दूरी, वहां के रहन-सहन, वेतन इत्यादि के संबंध में कुछ भी पता नहीं होता था। वास्तव में ऐसे लोगों का लौटना कभी-कभार ही होता था, क्योंकि उन्हें वहां बहुत ही दयनीय स्थिति में रहना पड़ता था। उन्हें वहां कुली के रूप में काम करके धन कमाना होता था, जो उनके जीवन-निर्वाह के लिये भी कम पड़ता था। समझौते की अवधि के बाद उन्हें अपने देश लौटने का अधिकार था, परंतु आर्थिक संकटों के कारण बहुत ही कम लोग इस विकल्प को चुनते थे।
भारत में उन दिनों ब्रिटिश शासन के शोषण के कारण सर्वत्र गरीबी का बोलबाला था। देश के विभिन्न भागों को अक्सर सूखे और अकाल का सामना करना पड़ता था। अशिक्षा के कारण बहुत कम लोग समझौते की शर्तों को ठीक से समझ पाते थे। वे बिचौलियों की शर्तों को ठीक से समझ पाते थे। वे बिचौलियों अथवा अंग्रेज अधिकारियों के कहने पर ऐसे कागजों पर अपना अँगूठा लगा देते थे। अधिकांश लोगों को भ्रमित करके ही करके ही ले जाया जाता था। समुद्री यात्रा का मार्ग बहुत ही कठिन था और बहुत से लोगों की तो मार्ग में ही मृत्यु हो जाती थी। यात्रा 10 से 20 सप्ताह के बीच पूरी होती थी। यह निर्भर करता था कि उन्हें कितनी दूर ले जाया जा रहा है और जिस जहाज में यात्रा करनी है, उसकी स्थिति कैसी है। कैरेबियन द्वीप समूह में जाने वालों में से 17-20 प्रतिशत श्रमिक विभिन्न बीमारियों से ग्रसित होकर रास्ते में ही मर जाते थे।
बंदरगाह पर पहुंचने के बाद उन्हें गंदे वातावरण में बनी झुग्गी-झोपड़ियों में रखा जाता था, जिनकी हालत बहुत ही खराब होती थी। उन्हें कड़ी सुरक्षा में रखा जाता था और बात-बेबात पर उन पर कोड़े बरसाए जाते थे। बात-बात पर उन्हें कड़ा दंड दिया जाता था। उन्हें स्थानीय लोगों से अलग-थलग रखा जाता था। कोई बात न मानने अथवा कहे हुए से कम काम करने पर पिटाई की जाती थी। यह एक प्रकार की नई दास प्रथा थी, जिसमें उनके जीवन के हर पक्ष पर नियंत्रण रखा जाता था। सप्ताह में सातों दिन उनसे 12-16 घंटे काम करवाया जाता था। उपनिवेशों में उन्हें किसी प्रकार की चिकित्सा सुविधा नहीं मिलती थी। बहुत से लोग तो वातावरण की अनुकूलता के अभाव में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे। अनेक समाज-शास्त्रियों और मानवाधिकारों के लिये संघर्ष करने वाली संस्थाओं ने इन सबके विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई, जिसके फलस्वरूप 1916 में बंधुआ मजदूरी की इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया।
मुख्य रूप से विभिन्न उपनिवेशों में ऐसे मजदूरों को गन्ने की खेती करने के लिये ले जाया गया था। सन् 1834 में मॉरीशस के लिए जिन बंधुआ मजदूरों को बिहार से भेजा गया था, उन्हें गन्ने की खेती ही करनी होती थी, ताकि वहां चीनी उद्योग पनप सके। सर्वविदित है कि भारतीय बहुत परिश्रमी होते हैं और किसी भी स्थानीय वातावरण में अपने आप को आसानी से ढाल लेते हैं। इसलिए वहां पर भारत के विभिन्न भागों से भी श्रमिक भेजे जाने लगे और लगभग सौ साल की अवधि में वहां पर भारतवंशियों की संख्या 5 लाख के करीब हो गई। अब वहां पर बंगाल, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे प्रदेशों से पहुंचने वाले मजदूरों की संख्या में वृद्धि होने लगी। बिहार, उत्तरप्रदेश और अवध के मजदूरों से घुलने-मिलने के लिये भोजपुरी के माध्यम से हिंदी का प्रयोग संपर्क भाषा के रूप में होने लगा। अधिकांश देशों में भारतीय कुली बनकर गये थे, परंतु आज उनके वंशज वहां के प्रशासन के कर्ताधर्ता हैं।
स्मरणीय है कि छेदी जगन गुआना के प्रथम राष्ट्रपति बने। विश्व की राजनीति में उनका योगदान भी उल्लेखनीय है। सूरीनाम एक कृषि प्रधान देश है। क्योंकि यह हालैंड का उपनिवेश था, इसलिए उन्हें भारत से मजदूर ले जाने के लिए इंग्लैंड से आज्ञा लेनी पड़ती थी। सन् 1873 में लालारुख नामक जहाज 410 लोगों को लेकर भारत से चला था। 11 लोगों की रास्ते में ही मृत्यु हो गई थी।  सूरीनाम का क्षेत्रफल इंग्लैंड से भी पांच गुना है। अब बहुत से भारतीय मूल के लोग सूरीनाम से आकर हालैंड में बस गए हैं।
फीजी में मजदूरों को लाने वाला जहाज 14 मई, 1834 को पहुंचा था। अब बहुत से लोग ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा के अतिरिक्त अमेरिका में जाकर बस गए हैं।
गुआना में 5 मई, 1838 को मुख्यत: कलकत्ता से लाए गए श्रमिकों को उतारा गया था। इनकी भर्ती मुख्य रूप से बिचौलियों के माध्यम से की गई थी। आज भारतीय मूल के लोग वहां की राजनीति और व्यापार में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
त्रिनिदाद और टोबैको टापुओं के बहुत से भारतीय मूल के लोग निकलकर अनेक यूरोपीय देशों एवं अमेरिका में स्थायी रूप से बस गए हैं। कुछ और लोग भी इसकी तैयारी कर रहे हैं।
मॉरीशस, फीजी, सूरीनाम, गुआना, त्रिनिदाद और टुबैको में भारतीय मूल के लोगों ने जो संघर्ष किया और बाद में वहां पर अपनी प्रतिभाओं के झंडे गाड़े, यह सब को ज्ञात है। उन्होंने छोटे-छोटे स्थानों पर अकेले दम पर अपनी आस्थाओं की ज्योति प्रज्ज्वलित की।

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