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दूर देश में
01-Aug-2017 11:40 PM 1926     

दूर देश रह कर भी हम
हर रोज मनाते हैं स्वदेश।
नन्हीं-नन्हीं बातों में
ढूँढा करते अपना देश।

लहजा बदल गया है पर
बदली नही तहज़ीब
पुश्तें बदल गई हैं फिर भी
हम बने नहीं अँगरेज।

बर्गर से सुबह होती है पर
परांठे पर अब भी दिल अटके
पौष्टिक दूध पीते हैं लेकिन
अब भी खोजें दही भल्ले।

दिन गुजरे हैे जींस-टीशर्ट में
कम्फर्ट की चादर ओढ़े
पर मौके ढूँढे हम दीवाने
अब भी सलवार-साड़ियों के।

पाश्ता-पीजा घर में लाएँ
दोस्तों की करने माँगें पूरी
पर रातों के सन्नाटों में
राजमा चावल ही करे
दिल की भूख पूरी।

मॉल सजे हैं बड़े-बड़े
क्रिसमस में हर ओर
फिर भी दीवाली की रस्में
दिल को देतीं झकझोर।


बैसाखी के हों झूले या
संक्रांति की पतंग बेलगाम
मेहंदी भरे हाथ हों या
आलते से सजे हुए कदम
कोई रंग न ले पाया कहीं
मेरी होली के मदहोश रंग।

बिन बात ही हाल पूछना
मेहमान को अपनेपन से
कुछ भी परोसना, अपनी परम्परा
अपने होने की पहचान बनती।

कितना भी मशगूल रहूँ
रोज़ी की जिद्दोजेहद में
पर याद करता हूँ हर रात
अपने चमन को
बेबे की कोमल हथेलियों में।

दूर देश रहकर भी हूँ मैं
माटी से जुड़ा हुआ
वही नन्हा सा नंद किशोर
अब भी हैं मुझ में मेरा
नन्हा सा स्वदेश
विस्तृत फैला हर ओर।

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