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गरिमापूर्ण हो जीवन और मृत्यु
01-Oct-2019 11:22 AM 507     

कई जैन संत अपने जीवन के अंतिम दिनों में किसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित होने या जीवन की निर्थकता अनुभव होने या उसकी कोई उपयोगिता न रह जाने पर स्वेच्छा से अन्न-जल त्यागकर शरीर को नियति के हवाले कर देते हैं जिसे वे "संथारा" नाम देते हैं। इसे एक प्रकार से अपने जीवन का विसर्जन कह सकते हैं।
जीवन नश्वर है, इसके छूटने में कम या अधिक कष्ट भी अवश्य होता है। सभी चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धि के बावजूद इसे कष्टों और नष्ट होने से नहीं बचाया जा सकता है। कई बीमारियों में तो सभी को पता होता है कि अपार कष्ट हैं और मरणोपरांत ही उनसे मुक्ति मिलेगी। ऐसे में मरणान्तक कष्ट भुगत रहे व्यक्ति को यह अधिकार क्यों नहीं होता कि वह जीवन त्यागने का विकल्प चुन सके?
दुनिया में अधिकतर सरकारें अपने नागरिकों को यह छूट नहीं देना चाहतीं। इसका कारण यह नहीं है कि उनकी दृष्टि में अपने नागरिकों का जीवन बहुत महत्त्वपूर्ण है बल्कि वे इस बात से डरती हैं कि ऐसी छूट मिलने पर लाखों लोग इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए लाइन लगा लेंगे। और ऐसे में यह उनकी बदनामी का कारण बनेगा। अपने भारत में ही लाखों गरीब, ऋणग्रस्त किसान, बेरोजगार तैयार हो जाएंगे। तब कल्याणकारी सरकारों की पोल खुल जाएगी।
यहाँ बैठकर हमें लगता है इस समय स्वर्ग अमरीका में ही है। जहां कोई काम नहीं, खाओ-पीओ और मौज करो। डॉलर तो पेड़ों पर लगते हैं। उन्हें पता होना चाहिए कि वहाँ कभी भी, कोई भी, किसी भी स्कूल और मॉल में जाकर आपको भून सकता है। वहाँ कभी भी किसी की भी नौकरी जा सकती है। वहाँ भी करोड़ों भूखे, घरहीन और बेकार हैं। वैसे वहां कानून है कि मनुष्य के जीवन को अमूल्य मानते हुए, यदि बीमा नहीं है तो भी, उसका इलाज़ किया जाएगा। लेकिन जब भी उसकी औकात होगी वसूल लिया जाएगा। ऐसे लोगों का इलाज़ करने वाले अस्पतालों ने लोगों को अनावश्यक रूप से अस्पताल में रखा और बड़े-बड़े बिल बनाए हैं। अब उसे वसूल करने के लिए तीन हजार लोगों पर मुकदमे दायर कर दिए गए हैं।
मान लें, सरकारें इस प्रकार की मुक्ति (मर्सी किलिंग) के लिए तैयार हो भी जाएं तो इस बात की पूरी संभावना है कि प्राण-त्याग की सरकारी सुविधा के कारण लोगों के प्राण तो न निकलें बल्कि उसके स्थान पर कोई और अपेक्षाकृत अधिक कष्टकारक समस्या गले पड़ जाए। नमाज़ छुड़ाने गए और रोज़े गले पड़े।
भारत में कुछ पशु-पक्षी इसलिए दुर्गति को प्राप्त हो रहे हैं कि वे आस्था और धर्म से जुड़ गए हैं। इसलिए उनके कल्याण के लिए योजनाएं तो बहुत बढ़-चढ़कर बनती हैं। सरकारें हजारों करोड़ रुपए खर्च करती हैं लेकिन उनका उन जीवों के लिए उपयोग नहीं होता बल्कि वे उनके संरक्षण के नाम पर संस्थाएं चलाने वाले लोगों के पेट में चले जाते हैं। और दुर्गति अपने स्थान पर वैसे की वैसी बनी रहती है।
इसमें सबसे पहला नंबर आता है गायों और सांडों का। जो गायें नहीं ब्याती और स्वस्थ हैं वे रात को किसानों के खेतों में घुसकर विनाश करती हैं और किसान उनके साथ गाय शब्द जुड़ा होने के कारण स्पष्ट रूप से तो उन्हें नहीं मारता लेकिन उसका यह गुस्सा कभी-कभी बड़ी निर्दयता के रूप में प्रकट होता है।
कोई भी गाय पालने वाला बछिया को तो फिर भी कुछ खाने को दे देता है, लेकिन बछड़े को कुछ भी खिलाना शुद्ध अपव्यय मानता है। वह जल्दी से जल्दी उसे घर से बाहर निकाल देना चाहता है। कुछ समय पहले मैंने एक-डेढ़ महिने के एक बछड़े को शाम को ऐसे ही घूमते हुए देखा। और अगले दिन सुबह ही देखा कि गली के कुत्तों ने उसे नोंचकर खा लिया था और उसके सिर और पैर गली में पड़े हुए थे। जो बछड़े सांड बन जाते हैं उन्हें खा पाना न तो कुत्तों के वश का है और न ही उन्हें गौशाला में रखकर उनके हिस्से का अनुदान खा पाना गौ सेवकों के वश का है। इसलिए सांड आवारा हैं और सड़कों पर आतंक मचाए हुए हैं।
लोग तरह-तरह के सुझाव देते हैं लेकिन सच बात कह कर कोई बुरा नहीं बनना चाहता। ट्रेक्टर से खेती होने लगने के कारण वे किसान के लिए व्यर्थ हो चुके हैं। जब खेती के लिए बैलों के अलावा कोई विकल्प नहीं था तब बैलों की पूजा होती थी। मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने, जब वे छठे दशक में विश्व युवा महोत्सव में भाग लेकर पोलैंड से लौटे तो बताया कि वहाँ अभी खेती का मशीनीकरण नहीं हुआ है। अभी भी लोग घोड़ों से खेती करते हैं। इसलिए मांसाहारी होते हुए भी वे घोड़े का मांस नहीं खाते। यह बात और है कि उन्होंने हमारी तरह घोड़े को आस्था का मामला नहीं बनाया है।
आजकल तो खेती का अपशेष भूसा भी बिकता है। ऐसे में हर किसान या तो उसे दूध देने वाले पशु को खिलाएगा या फिर बेचेगा। कभी भी काम न आ सकने वाले सांड को क्यों खिलाएगा? ऐसे में सांड के लिए उपयुक्त स्थान सड़क ही बचता है। जाने को तो सांड संसद में भी जा सकते थे लेकिन अभी उनके लिए वहाँ कोई स्थान खाली नहीं है। पहले से ही जन सेवकों की लाइन बहुत लम्बी है।
जिन पशुओं को काम का न होने पर बेचा जा सकता है वे कभी भी सड़क पर आवारा घूमते नज़र नहीं आते। इस प्रकार इस देश में किसी के प्रति आस्था उसकी दुर्गति का कारण ही बनती है। आस्था में किसी की कोई ज़िम्मेदारी तय नहीं होती। वैसे भी आस्था में कर्म नहीं, कर्मकांड का दिखावा होता है। दिखावे में पूजा-आरती होती, किसी का आर्तनाद नहीं सुना जाता है भले ही वह गंगा का हो या गाय का।
इसी प्रकार बन्दर भी कई स्थानों पर ज़बर्दस्त आतंक मचाए हुए हैं लेकिन वे हनुमान का स्वरूप होने के कारण अवध्य हैं। कई धर्म-प्राण नेताओं ने बंदरों से मुक्ति पाने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करने का सुझाव भी दिया है लेकिन वह कारगर नहीं हुआ। बंदरों को हनुमान चालीसा सुनने की बजाय अपनी बदमाशियां जारी रखने में ही अधिक लाभ नज़र आया।
अभी महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में पैर-मुंह बांधकर सड़क पर फेंके हुए कोई एक सौ आवारा कुत्ते मिले हैं जिसमें से केवल दस जिंदा बचे। यह काम किसी पड़ोसी देश के आतंकवादी का नहीं है। यह कर्म हमारे देश के ही दयालु और संवेदनशील भारतीयों का है। क्या यही तरीका है विकसित होने का? इससे अच्छे तो वे लोग हैं जो कुत्तों को मारकर खा जाते हैं। क्या इन कुत्तों को किसी ऐसे इलाके में नहीं भिजवाया जा सकता था जहां ये कम कष्ट में किसी का भोजन बन सकते। वैसे हिंसा तो हिंसा ही है फिर चाहे वह मुर्गे के साथ हो या बकरे के साथ। अहिंसा और करुणा में भी धर्म-जाति?
दुनिया के करोड़ों नहीं बल्कि अरबों लोग गरिमापूर्ण तो बहुत दूर की बात है, गर्हित जीवन जी रहे हैं। यदि उन्हें गरिमा पूर्ण जीवन नहीं दिया जा सकता तो कम से कम गरिमापूर्ण मौत तो दी जा सकती है। जो इस जीवन से मुक्ति चाहते हैं उन्हें योजनाबद्ध तरीके से यह सुविधा दी जानी चाहिए। उनके शरीरों का चिकित्सा महाविद्यालयों में उपयोग किया जा सकता है। उनके काम में आ सकने वाले अंगों का भी किसी ज़रूरतमंद को दान दिया जा सकता है।
व्यक्ति का अपने जीवन पर अधिकार क्यों नहीं? इस सुविधा के बाद शायद दुनिया की कई समस्याएं दूर हो जाएंगी। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि कल को काम के अंग निकाले हुए ऐसे ही मानव शव किसी महाराष्ट्र की सड़कों पर नहीं मिलेंगे।

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