ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दीघा का मोहना तट शिमला में साँझ
01-Feb-2019 03:13 PM 1356     

दीघा का मोहना तट

यहां वृंदावन की सुगंधित गलियां नहीं
नहीं है इत्रों का कारोबार
यहां राधा-कृष्ण ने कभी नहीं रचाया महारास
गोपियों की करतल ध्वनियों से
नहीं गूंजा कभी मोहना तक
फिर भी सुंदर है इस तट का किनारा
जब फूट पड़ती हैं फेनिल जल राशियां
मोहना की चट्टानों पर मोतियों-सी
गीत गा-गाकर नाचती है मत्स्यगंधाएँ
नथुनों में गंध आंखों में रात का आहार
माछ भात, सिल्वर पंपेना, चागोश व कबिया
वह ढोएगी माथे पर
कल बाजार खूब सजेगा
मोइनी उठाती है पूरे दमखम से जाल
और पटक देती है समुद्री बिछौने पर
इला, इला, आ, आ, इश् इश्
कमरे में लौटती हूं लेकर मोहना तट की गंध लिए
छुन छुन बजती है कानों में
मत्स्यगंधाओं की पायल रात भर!

 

शिमला में साँझ

जब शाम अपने पीहर लौटने के बन्दोबस्त में लगी थी
और सूरज दूसरे मोर्चे के तैनाती की तैयारियो में
उसी क्षण एक लुप्तप्राय चिड़िया
चीड़ की छाती पर अपनी वसीयत लिख रही थी
एक चोंच, दो आँखें, एक ग्रीवा
कुछ नुचे टूटे से पंख
पहाड़ की तपस्या में लीन
उसके नाजुक से दो पैर
चिड़िया की चोंच से टपक रहा था अभी भी
सतलज का मीठा पानी

वह जानती थी
फरवरी की धूप में चमक जाती है शिलाएँ
गाड़ियों की धू-धू में मटमैला-सा
धुंधला जाता है शिमला का चेहरा
पोंछती आ रही चिड़िया रोयेंदार पंखों से
वर्षों से इस गर्द को

पर्यटकों के जूते से धराशायी होते बर्फ खण्डों से
तेज़ हो जाती उसकी उड़ान घाटियों में
मालरोड से उतरती सीढ़ियों से
मेरे कमरे के सोफे तक
चिड़िया के नुचे पंख जेहन में चले आते हैं
अपनी आँखों में सहेजती
पहाड़ का सबसे सुन्दर दृश्य
अपनी चोंच में भरती
सतलज की कलकल धारा
मुझे विदा होने से रोक लेती है!

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