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बोली, राष्ट्र-भाषा और विश्व-भाषा
01-Aug-2019 02:47 AM 938     

दुनिया के सारे समाजशास्त्री और भाषा वैज्ञानिक यह भलीभांति जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की अभिव्यक्ति सबसे पहले बोली में हुई। बोली प्रकृति और मनुष्य के गहरे अनुभूतिमूलक सम्बन्ध से पैदा होती है। उसकी शुरुआत वनवासीजनों से हुई है जो अपने स्वभाव के अनुरूप वृक्षों, लताओं, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, नदी-सरोवरों के स्वभाव को स्वीकार करते थे और उन्हीं में पैदा होने वाले स्वरों से अपने शब्द बनाते थे। उनके पास लिपि नहीं थी, सिर्फ बोलना था और उनका यह आपस में बोलना उनके लिये काफी था।
पृथ्वी पर बसे हर देश के गांव में आदिजनों के अनुभव से और बोलचाल से थोड़ी-सी अधिक संस्कारित बोली दुनिया के गांव में, कस्बों में और फिर नगरों में आई होगी। अभी भी संसार की सभी भाषाओं में प्राचीन लोकबोलियों के शब्द आधुनिक सभ्यता में भी लोग बोलते पाये जाते हैं। सभ्यता की एक प्रारंभिक निशानी यह भी रही होगी कि बोली का व्याकरण बने। एक ऐसा नियम जिसमें भाषा में कर्ता, कर्म, क्रिया, विशेषण आदि वाक्यों में इस तरह अनुशासित किये जायें जैसे परेड के समय एक सीधी लाइन में सैनिक खड़े होते हैं। फिर शब्दकोश बने। हर भाषा में शब्दों के निरुक्त बने, शब्दों की उत्पत्ति की खोज हुई। शब्दों के अर्थ शब्दकोशों में बिठाये जाने लगे। रूढ़ शब्द स्थगित भी हुए, उनकी जगह पर नये शब्द बनाये जाने लगे। दर्शन में कुछ शब्द सुपरिभाषित तौर पर अपने निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होने लगे और आज भी होते हैं।
क्या कारण है कि बोली से शब्दकोष तक आते-आते तरह-तरह की दर्शन पद्धतियाँ समाज विज्ञान आदि का निर्धारण करने के बावजूद भी आदमी को अपना जीवन आज भी अधूरा और अर्थहीन जान पड़ता है। क्या कारण है कि भारत जैसे प्राचीन सनातन संस्कृति की खोज करने वाले देश में यहां के ऋषि-मुनि सत्य को अनसुलझा छोड़ देते हैं और उसके बदले में यह कहते पाये जाते हैं कि दुनिया और उसमें बसे जीवन को देखने के कई-कई उपाय हो सकते हैं। वह किसी एक भाषा, एक रंग, एक राजनीति, एक झंडे, एक धर्म और एक से समाज के आधार पर नहीं पहचानी जा सकती है।
आज हम जिस बाज़ारवादी समय में रह रहे हैं उसमें धर्म और राजनीति की धज्जियाँ उड़ रही हैं। किसी समय योरुप में राज्य धर्मनिरपेक्ष होने का सपना देखता था और हुआ भी, पर धर्म का एक अदृश्य दबाव योरुप और अमेरिका के राज्य पर अभी भी बना हुआ है। ऐसा ही हम एशियाई देशों में भी देखते हैं। लेकिन यह दबाव राजनीति पर कुछ प्रभाव नहीं डाल पा रहा है तो उसका कारण यह है कि पूरी पृथ्वी पर विश्व व्यापारियों की पहल ने अपना मुनाफा कमाने के लिये धर्म और राज्य को अपने अधीन कर लिया है। अब भारत के लोग अपने देश के कुम्हारों के हाथों से बनाये गये मिट्टी के दिये जलाकर दीवाली नहीं मनाते। वे चीन से भेजी गई बिजली की लड़ियाँ अपने घरों पर लटकाते हैं और उनकी कोई गारंटी नहीं होती। वे जलते ही फ्यूज हो सकते हैं, लेकिन अपने हाथों से बनाये गये दिये और उसमें डाले गये तेल और उसमें जलती हुई बाती यह आश्वस्ति करती है कि यदि ज्यादा हवा न चले तो लौ जलती रहेगी।
सवाल उठता है कि ये कौन-सी हवा चल रही है दुनिया में जो विभिन्न संस्कृतियों की लौ को बुझा रही है। इन संस्कृतियों की ज्योति और उसका प्रकाश हर देश की अपनी बोली-बानी में बसा हुआ होता है। हर देश के जीवन को पहचानने वाले अपने-अपने शब्द होते हैं और उन शब्दों से उस देश का नागरिक अपने और दूसरों के जीवन को पहचानकर एक-दूसरे के निकट आने की शक्ति अर्जित करता है। हम भारत का ही उदाहरण लें तो हिंदी के अलावा भारत में अन्य पन्द्रह-बीस भाषाओं बोली जाती हैं। उन भाषाओं के शब्दों के आकार-अलग अलग दिखाई पड़ सकते हैं क्योंकि उनकी लिपि में कुछ अंतर है। लेकिन सांस्कृतिक रूप से पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक भारत में जीवन का अर्थ नहीं बदलता।
आज ग्लोबलाईजेशन के युग में हर देश में अंग्रेजी-मिश्रित एक ऐसी भाषा बनायी जा रही है जिसे बाजार की मानक भाषा के रूप में कबूल कर लिया जाये। भारत इसका जबर्दस्त शिकार है। बाज़ार तमिल में, तेलुगु में, बांग्ला में, मराठी और गुजराती में प्रवेश कर गया है। हिंदी में तो कर ही गया है। क्योंकि वह हमारे देश की और दुनिया के करीब 150 से अधिक देशों में बरती जाने वाली भाषा है। सहज ही यह प्रश्न उठता है कि क्या भाषा सिर्फ वोट मांगने के लिये है जिससे नारे बनाये जाते हैं। क्या भाषा सिर्फ तरह-तरह के बाज़ारू देवताओं के प्रति विश्वास जगाने के लिये है और क्या भाषा सिर्फ बाज़ार की चीज़ें बेचने के लिये है। जबकि आज भी आदमी यह अनुभव करता है कि भाषा प्रेम के लिये है। रिश्तों में नई-नई जगह बनाने के लिये है। समाज में आपसी सम्बन्ध कायम करने के लिये है और भाषा में ही वह संभावना छिपी है कि उसे त्यागकर मौन भी साधा जा सकता है।
संसार के सभी भाषा शास्त्री इस बात को जानते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार उसकी भाषा ही है और वो हर देश की प्रकृति और उसके भूगोल और उसकी ऋतुओं के स्वभाव के अनुकूल बनी है। लेकिन हम योरुपियन संस्कृति पर गौर करें तो उसकी मानसिकता सदैव प्रकृति को लूटने में रही है। जिसे हम भारत में रहकर पश्चिम कहते हैं लेकिन पूर्व की मानसिकता प्रकृति को पूजने और उसके रक्षण में रही है और उसी के आधार पर भारत के सनातन धर्म की पीठिका तैयार हुई है। आज शायद दुनिया में सबसे बड़ा संकट यह है कि कम्प्यूटर, वाट्सएप, फेसबुक आदि के माध्यम से अंग्रेजी और उसकी रोमन लिपि दुनिया में बाज़ार की लूट का साधन बन चुकी है और खतरा यह बढ़ गया है कि संसार की दूसरी भाषाएं भी इस रोमन प्रतिमान से अपनी-अपनी लिपि को बाजार की साजिशों के कारण धीरे-धीरे खोती जा रही हैं।
आश्चर्य होता है कि जो भाषा हम बोलते और बरतते हैं वह मानव जीवन से इतनी निरपेक्ष हो जायेगी कि धर्म, राजनीति और दुनिया में बसे हुए अनेकों समाज अपनी भाषा से इस तरह बरताव करने लगेंगे कि वह हर हाल में सिर्फ बाज़ार की हो जाये। उस भाषा में लालच पैदा करने वाले शब्दों की भरमार हो, उस भाषा में रंग हृदय की शोभा न बनते, सिर्फ शरीर को सजाते हों, उस भाषा में अपनी आत्मा का अपना कोई अनुभव न हो, वह सिर्फ मनुष्य के मन की स्वार्थ वृत्तियों - काम, क्रोध और मोह आदि की सीमाओं में बाँध ली जाये और मनुष्य अपनी ही भाषा की कैद में बाज़ार के दर्शन के अलावा किसी और जीवन दर्शन की उम्मीद की खिड़की ही न खोल सके।
इस अंक में भाषा पर और खासकर हिंदी को लेकर कई दृष्टिकोणों से अनेक सुधि लेखकों ने विचार किया है। उनकी चिंता यही है कि हमारी भाषाएँ जीवन की अभिव्यक्तियों की भाषाएँ बनी रहें, वे केवल राजनैतिक और केवल बाज़ारू न बन जायें। क्योंकि देखने में यह आ रहा है कि आज आमतौर पर दुनिया का आदमी बाज़ार द्वारा गढ़े गये लोभ-लाभ के जीवन से संचालित हो रहा है। अगर हम पूरे विश्व में टेलीविजन और मीडिया चैनलों पर दिखाये जा रहे विज्ञापनों की व्याख्या करने के लिये तत्पर हों तो पायेंगे कि आदमी की निजता और व्यक्तिमत्ता आने वाले दिनों में नहीं बचायी जा सकेगी। प्रेम, रिश्ते, धर्म, समाज, राजनीति ये सब बाज़ार के हिस्से बन जायेंगे। हम यह प्रश्न इसलिये उठा रहे हैं कि क्या मात्र पृथ्वी पर फैलते जा रहे हाट-बाज़ारों के सहारे दुनिया में लोकतंत्र बचाये जा सकेंगे, क्योंकि भाषा ही एक ऐसी जगह है जहां प्रत्येक मनुष्य की अभिव्यक्ति का लोकतंत्र फल-फूल सकता है। अगर भाषा ही बाज़ार की गुलाम बन जाये या बना ली जाये तो इस पृथ्वी पर मनुष्य की उन अभिव्यक्तियों का क्या होगा जो पृथ्वी पर बसे जीवन के लिये बेहद ज़रूरी है।
इसी अंक में प्रकाशित श्री हाइंस वेसलर ने यह बहुत गंभीर सवाल उठाया है कि जिस भारत में आज तक राज्य हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित न कर सका हो, भले ही वह प्रस्तावित हो, उस राष्ट्र के राजनेता इस बात से कैसे संतोष कर रहे हैं कि वे कभीकभार संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी बोल आते हैं और यूएनओ से हिंदी में बुलेटिन प्रकाशित करने के लिये कुछ रुपये भी खर्च करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि नेता संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी बोलेंगे, वहां से हिंदी का बुलेटिन प्रकाशित करेंगे और उनके अपने देश में हिंदी की जगह घटाते-घटाते हिंदी लिपि पर भी रोमन लिपि चढ़ बैठेगी। इस रोमन लिपि के मोबाइल दबाव के कारण सिर्फ हिंदी ही नहीं भारतीय भाषाओं की लिपियां भी खतरे में पड़ गई हैं। तब भारत के लोगों के मन में राजनेताओं के द्वारा यह झूठा स्वाभिमान जगाना कि हम यूएनओ में हिंदी का झंडा फहरा चुके हैं, लेकिन भारत के लोगों को यह कौन बतायेगा कि उसके राजनेता भारत में हिंदी के झंडे को लगातार झुकाते चले जा रहे हैं, जिसमें विश्व व्यापार की बड़ी भूमिका है। यह बात अलग है कि भारत के लोग आज भी महात्मा गांधी की बात पर भरोसा करके जैसे-तैसे ही सही आज भी पूरे भारत और विश्व के अनेक देशों में हिंदी को अपनी संपर्क भाषा बनाये हुए हैं।

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