ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बोली और भाषा
01-Nov-2018 09:55 AM 1317     

बोली और भाषा कैसे एक-दूसरे के विरोधी हैं और साहित्य इन्हें कैसे संयोजित करता है, उसे ही समझने की कोशिश यहाँ हुई है। इतना समझ लेना चाहिए कि बोली और भाषा परस्पर निर्भर हैं। मतलब कि एक-दूसरे के सह हैं। परंतु सहना दोनों का समान नहीं है। एक सहता है, तो दूसरा सहाता है। देखिए, बात किसी काम की बनी या नहीं।
भोजपुरी का लअ हिन्दी का ला है। भोजपुरी ल् के अंत के अ को इतना खींचती है कि दो अ के उच्चारण का समय लगता है, परंतु उच्चार तो अ का ही होता है। हिन्दी ने संधि करके आ कर दिया, तो उसका अर्थ ही उलट गया। दाता कह रहा है कि "लअ"। मतलब कि पकड़ो। हाथ फैलाओ, परंतु यहाँ तो लेनेवाला कहता है, "ला"। लोक और नागर के यह भाषाई संवाद उनकी भावात्मक वृत्ति को दर्शाता है। इस भव को लोक अभवने पर विभव करता है। लोक का यही वैभव है। उसने कुछ बनाया, तो दूसरे से कहा - "लअ"। दूसरा अगर लोक का हुआ तो हाथ फैलाकर कहेगा- "दअ"। लोक के लेन-देन में "ल" का उच्चार देनेवाला और "द" का उच्चार लेनेवाला करता है। ध्यातव्य है कि यहाँ "दअ", "लअ" की पहल पर आया है, न कि "लअ", "दअ" की पहल पर। नागर हाथ फैलाने और "दअ" कहने के बदले "ला" कहता है, जिसमें थोड़ी ही सही, परंतु "आदेश" की गंध है। नागर ऐसे ही सदियों तक देश को आदेश देता हुआ उससे लेता रहा। नागर की यह अकड़ उसकी भाषा में छिपती नहीं, दिख जाती है। लोक और नगर एक-दूसरे के सह हैं। दोनों का जीवन परस्पर निर्भर है। तो दोनों को सहना चाहिए, परंतु सहता एक है। दूसरा सहता नहीं, सहाता है। ऐसा कब तक चलता! फिर तो देश उससे दूर होने लगा, तो नागर को "आदेश" छोड़ "उपदेश" अपनाना पड़ा। अकड़ को मुलायम करना पड़ा। देश के क़रीब आकर मित्र बनना पड़ा। "उपदेश" होने पर लगता है कि उसका सहना बढ़ा, मगर नहीं, इससे उसका कहना बढ़ा। उसका कहना बदल गया। कहने की रीति बदल गई। सिर्फ़ इतना हुआ कि उसकी बाहरी स्थिति बदल गई। पहले देश से ऊँचे था, अब धरातल पर आ गया। देश के सहने में तो कोई कमी नहीं आई। और नहीं तो बढ़ गई। लम्बे काल तक यह भी चला। देश को जब यह सह असह्य होने लगा, तो फिर वह दूर होने लगा। नागर ने ऐसे में "कांतासम्मित उपदेश" अपनाया। ग़ौर करें, तो पाएँगे कि नागर को क्रमशः नीचे उतरना पड़ा है। देश के अपनत्व और सम्मान से कहे "लअ" पर नागरजी "ला" कहते थे। सहते-सहते असह्य होने की स्थिति में देश ने "लअ-लअ" कहना छोड़ा, तो ख़ुद ही "ला-ला" कहते रहे। परंतु जब "ला-ला" नहीं हुआ, तो उन्हें कांतारूप धरना पड़ा। यही विष्णु का कांतारूप है, जिससे वह देश को छलता है। इससे ज़ाहिर होता है कि शुरुआती साहित्य देश को छलता था। इसी की पूर्ति के लिए उसका शास्त्र बनता था और उसकी व्याख्या की जाती थी। वाणी जब ख़ुद स्त्री है, तो उसे कांतासम्मित होने की ज़रूरत ही कहाँ रही। ज़रूरत रही, इसलिए कि हर स्त्री कांता नहीं होती। कांता वह स्त्री है, जो अपनी कांति से पुरुष मात्र को कंत बना लेती है, अथवा उसमें कंत बनने की लालसा पैदा कर देती है। शुरुआती शास्त्र और व्याख्या इसी कांता (छल) की सहायता करते हुए उसके सहायक बन गए थे। यही नागरवृत्ति थी, देशवृत्ति नहीं। हम तो देश का ज़ोर-ज़ोर से उच्चार करते नहीं थकते, और देशी जन को साँस लेने की भी फ़ुरसत नहीं देते। हम निरंतर नागरिक ही तो बनते रहे। भारत देश के नागरिक हैं हम। हम तो देशी के नहीं, नगर के उद्देशी हैं। ऐसे में, देशी को तो सहते-सहते ही दम तोड़ना है, और तोड़ रहा है, फिर भी हमारा नगर और नागर ज़रा भी चिंतित नहीं हो रहा। वह तो गिरिधारी (कांतासम्मित वाणी को धारे हुए) चैन की वंशी बजा रहा है। उसके शांत चेहरे की यही कांति है। देश की विडंबना यही है। जो डिंबित है उसे विडंबित होना है। देश शायद इसे जान गया है, तभी तो डिंब से मुक्त होने की कोशिश कर रहा है। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।
ऊपर जो भोजपुरी "लअ" और हिन्दी "ला" के अंतर को दिखाया गया है, वही बोली-भाषा, देश-नगर का अंतर है। आज भी देश को ही सहना अधिक पड़ रहा है। नागर तो निरंतर अपना रूप बदलता हुआ देश को छल रहा है। रामायणम् की प्राचीन व्याख्याएँ छल को छिपाती हैं। छल को छिपाने की व्याख्याओं को फिर भी लगता रहा कि उनकी व्याख्या उसे छिपा नहीं पा रही, तो वाल्मीकि ही उलटा कह दिया। मतलब कि वाल्मीकि उलटा देखते थे। तुलसी तो स्पष्ट कह देते हैं, "उलटा नाम जपत जग जाना। बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।" उन्हें अपनी मति के उलटा होने पर ज़रा भी संदेह नहीं। जो तुलसी "मो सम कौन कुटिल जग माहीं" कहते हुए विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं, वे ही वाल्मीकि को उलटा कहते हुए ज़रा भी नहीं हिचकते। उनके अनुसार वाल्मीकि ने राम नाम को उलटा जपा। मतलब कि राम-राम नहीं, मार-मार जपा। राम का उलटा मरा नहीं, मार होता है। ख़ुद ही देखिए, र्-आ-म, म्-आ-र। वाक्छल की ख़ूबी देखिए कि वाल्मीकि की श्रेष्ठ छवि को मंडित करते हुए उनके काम के प्रभाव को ही बदल दिया। राम कितने उदार और महान हैं कि अपना उलटा नाम जपनेवाले को भी ब्रह्म के समान कर दिए। इस तरह वाल्मीकि के व्यक्तित्व और कृतित्व, दोनों को राम के रहमो-करम पर आश्रित बना दिए। थोड़े दिन पहले विश्वनाथ त्रिपाठी जी का एक साक्षात्कार विवादित हुआ, जिसमें कई महत्त्वपूर्ण बातें थीं, जो दब गईं, या दबा दी गईं। नागरिक प्रवृत्ति के कारण ही ऐसा हुआ। त्रिपाठी जी की एक किताब का नाम शायद "लोकवादी तुलसी" है। त्रिपाठी जी ने स्वीकारा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें एक पत्र में लिखा था कि तुलसी लोकवादी नहीं थे, वे लोक के जानकार थे। लोक का जानकार होने के बावजूद लोकवादी न होना, आख़िर क्या दर्शाता है। अगर कुछ दर्शाता है, तो उसे देखना-सुनना चाहिए कि नहीं। देश के काम की बात ऐसे ही दब-दबा जाती है। और जानते हैं न कि दबी हुई को ही पृथ्वी ऊँचे उठाती है, नए रंग-रूप में। इस तरह कांतासम्मित वाणी लोक को छलती है। म्लेच्छ-कर्म का ही नाम छल है। मछली का शिकार छल से किया जाता है। उसके शिकार के साधन का क्या नाम है, वंशी। वंशी के द्वारा उसका शिकार किया है। शिकारी चैन की वंशी बजाते हुए जल की मछली को थल पर लाता है, तो मछली उलट जाती है। मर जाती है। इसका मतलब हुआ कि वह जल में सीधी रहती है। फिर तो उलटी (मरी हुई) मछली का नाम भी उलटकर लछमी हो जाता है। यही मरती हुई मछली शिकारी का पाँव पकड़ मानो कहती है कि हमें जल में छोड़ दो, हमें जल में छोड़ दो। शिकारी अपने शिकार को कहीं छोड़ा होगा! यही है लछमी के द्वारा शिकारी का पैर दबाया जाना। यही शिकारी क्षीरसागर पर सोता है। इस तरह जल की मछली थल के नागरिक की लछमी के रूप में क़ैद हो गई।
वाल्मीकि का काम "रामायणम्" भी कहीं शिकार तो नहीं हुआ! शिकारी की लछमी जल में मछली के रूप में उलटी थी। थल पर लाकर शिकारी ने अपनी लछमी को सीधा किया। इस तरह उसकी लछमी सधी, अन्यथा उलटकर जल में मछली हो गई थी। शिकारी के अनुसार वाल्मीकि का काम उलटा था, जिसे उसने सीधा कर दिया। इससे शिकारी का काम सध गया। फिर क्या है, चैन की वंशी बज रही है, शिकार सध रहा है। लछमी पाँव पलोट रही है, या पाँव पर लोट रही है, या पाँव पर लोट भी रही है और पलोट भी रही है। कितनी आसानी से सधा जीवन! नागरिक जीवन की यही साध है। नागर साधू ऐसे ही होते हैं। बाँस की वंशी बजाते हुए उलटे जीवों को सीधा करते हुए साधते जाते हैं।

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