ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ध्रुव शुक्ल
ध्रुव शुक्ल
11 मार्च 1953 को सागर में जन्म। कवि-कथाकार के तौर पर पहचान। "उसी शहर में', "अमर टॉकीज' एवं "कचरा बाज़ार' उपन्यास, "खोजो तो बेटी पापा कहाँ हैं', "फिर वह कविता वही कहानी', "एक बूँद का बादल', "हम ही हममें खेलें' कविता संग्रह, "हिचकी' कहानी-संग्रह प्रकाशित। राष्ट्रपति द्वारा कथा एवार्ड और कला परिषद् के रज़ा पुरस्कार से सम्मानित।

वैद वेदना

कथाकार कृष्ण बलदेव वैद के शब्द मेरी देह पर उड़ती हुई खाक की तरह झरते हैं और यह खाक देह पर ठहरती नहीं, पल-पल उसी में विलीन होती जाती है। आँखों की कोरों पर भाषा के काजल की तरह कुछ देर ठिठकती जरूर है ज

पिता और कवि

पिता अपनी एक कविता रचते हुए कहते हैं कि – बाँस की पोर ने मुझे पहना है और मेरे भीतर कोई अज्ञात अँगुलियाँ उसे छूती रहती हैं जैसे वे मुझमें कोई स्वर ढूँढ रही हों । उनका यह भाव जानकर लगता है कि प

बाँसुरी की टेर

श्री अरविन्द कहते थे कि मानव जाति के इतिहास में वह समय भी आता है जब युध्द को मित्र की तरह गले लगाना पड़ता है। गहरे आशय से भरी उनकी यह बात मुझे हिरण्यकश्यपु के वध की याद दिलाती है और कहने का मन होता

आते ही जाने वाला

हरिवंशराय बच्चन ने - मधुशाला - काव्य रचते हुए गाया -- इस दुनिया में आते ही मैं कहलाया जाने वाला। जल्दी-जल्दी ढलते दिन में बीतता जाता जीवन किसी एक दिन नहीं रहता। वे अपनी कविता में रूप-रस-गंध-स्पर्श


नये वर्ष की देहरी पर राम की याद

हे राम मेरा यह हृदय ही तुम्हारा घर है और इस पर बड़ी विपत्ति आयी हुई है। इस घर
पर काम-क्रोध-लोभ-अहंकार ने धावा बोल दिया है। ये चारों तस्करों की तरह तुम्हारे
घर

लोक का आँगन

लोक अनंत भी है और आँगन भी। वह अनन्त को आँगन में उतार लेता है और घर के आँगन से ही अनंत की यात्रा करता है। लोक में ही यह शक्ति है कि वह आवाहन न जानते हुये भी सारे देवताओं को एक छोटा-सा चौक पूरकर उसमे

होना शुरू होना

सागर शहर की झील के किनारे नजरबाग की सीढ़ियों पर बैठा निर्मल वर्मा के निबन्धों की किताब -- शब्द और स्मृति -- पढ़ रहा हूँ। जैसे कोई जलस्रोत किसी नदी में मिल जाने के लिए आकुल हो। दूर ठहरी हुई शब्दों की

घर सँवरने से दुनिया सँवरती है

मेरा घर अब दोस्तों को अपने घर से दूर लगता है। मुझे बच्चे घर से दूर लगते हैं। मैं भी घर से कुछ दूर जाता सा लगता हूँ। क्या घर से दूर जाने के लिए ही घर में रहने आया हूँ? श्यामला हमेशा घर में रहती है।


प्रेम होता है तो हो, ध्रुव उसे क्यों करते हो...

किसी-किसी के लिए वह सिर्फ एक अहसास भर है और किसी के लिए आहट-सा सुनायी पड़ता है। किसी के लिए वह ऐसी खुशबू है जो पलकों में इशारों की तरह बस गयी है। किसी के लिए वह एक ख्वाब-सा है और किसी के लिए हाथों म

उष्ण कटिबन्ध के प्रवासी

संयोगवश करीब तेरह बरस पहले मुझे मॉरीशस जाने का अवसर मिला। हिन्द महासागर में अपनी थोड़ी सी जगह में फैले इस व्दीप पर भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी फ्रांसीसियों और अफ्रीकियों के साथ रहती है। अंग्रेज

महात्मा गांधी चरित स्वयं ही काव्य

भारत के हृदय प्रदेश के उज्जयिनी नगर निवासी यशस्वी कवि श्री शिवमंगल सिंह "सुमन" की नोटबुक में पण्डित नेहरू ने, 1954 में यह वाक्य लिख दिया था- "अपने जीवन को कविता बनाना चाहिये"।
1989 में जब पूरे

प्रतीति की भाप

भाषा एक सेतु की तरह लगती है जिसे मन और बुध्दि के बीच बाँधना पड़ता है। पीड़ाओं के खारेपन में हिलुरते भवसागर में अपनी नौका खेते कवि की आँखें बार-बार भर आती हैं और छलककर सागर में झर जाती हैं। कवि की आँख


हम जो समझा किये

कागज पर कभी कोई सवाल हल नहीं हो पाता। वह उन कागजों को पढ़ डालने से भी हल नहीं होता जो सदियों से लिखे पड़े हैं। कई पीले पड़कर सड़ गये, कई हवा में उड़ गये। दुनिया कागज सँभालकर थक गयी है पर उन्हें रोज कोई

पानी की आवाज सुनो

अब पानी सब व्यक्तियों, व्यापारियों और व्यवस्थाओं के खिलाफ आंदोलन पर है
कि मेरे रास्ते से हटो। मेरा रास्ता मत रोको। मुझे नदी में बहने दो, कुइया में,
पोखर में, ताल में भरने दो, कुओं में आ

लागा चुनरी में दाग़

पण्डित कुमार गंधर्व की आवाज़ आ रही है। वे कबीर के करघे की लय पर गा रहे हैं-
दास कबीर जतन सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।
झीनी-झीनी बीनी चदरिया।
अपने कर्म की लय पर रचा गया क

अब ज़रूरत है जल सत्याग्रह की

सबकी जरूरत की चीज़ नमक पर जब फिरंगियों ने कर लगाया तो महात्मा गांधी नमक कानून तोड़ने दाण्डी कूच पर निकल पड़े थे। पूरी दुनिया में इस अनूठे सविनय अवज्ञा आन्दोलन की मिसाल ढँूढे नहीं मिलती। वे गुलामी के द


स्मृतिगंधा

जैसे पूरा यथार्थ आमने-साने की पहाड़ियों के बीच फैला है। एक पहाड़ी उजाले की दूसरी अंधेरे की। उजाले में अंधेरे की पहाड़ी दिखाई देती है-- उजाले को अपने पास बुलाती, इतने पास कि उजाले की पहाड़ी अंधेरे में ड

अवलोकी अज्ञेय

कवि अज्ञेय की एक कविता उद्धरित करता हूँ। इसे स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में दिल्ली की जेल में लिखा गया। यह उनकी प्रारंभिक गद्य कविताओं में शामिल है। कविता बयान के शिल्प में रची गयी है--
मैं अ

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