ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ध्रुव शुक्ल
ध्रुव शुक्ल
11 मार्च 1953 को सागर में जन्म। कवि-कथाकार के तौर पर पहचान। "उसी शहर में', "अमर टॉकीज' एवं "कचरा बाज़ार' उपन्यास, "खोजो तो बेटी पापा कहाँ हैं', "फिर वह कविता वही कहानी', "एक बूँद का बादल', "हम ही हममें खेलें' कविता संग्रह, "हिचकी' कहानी-संग्रह प्रकाशित। राष्ट्रपति द्वारा कथा एवार्ड और कला परिषद् के रज़ा पुरस्कार से सम्मानित।

पड़ौसी
पड़ौसी के अहाते में खड़े वृक्षों की छाया हमारे घर पर पड़ती है। इस घर में रहते हुए पाँच बरस हो गये, पड़ौसी हमारे घर कभी नहीं आया। वह तड़के घर से निकल जाता है और देर रात कब लौटता है, पता ही नहीं चलता। कभी-कभार वह अपने अहाते में दिख जाता है। उसके अहाते मे
जनता की आलोचना
नेताओं की आलोचना खूब होती है पर जनता की आलोचना कोई नहीं करता। आजकल नेता यह कहते हुए पाये जाते हैं कि देश की सवा सौ करोड़ जनता उनकी मालिक है और वे जनता के नौकर हैं। नौकरों की आलोचना करने वाले थक गये हैं और नौकर इतनी मोटी चमड़ी के हैं कि उन पर कोई असर
जन्मजात साक्षर विश्व की कविता
कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनकी कविताएँ अलग-अलग समयों में अपने अर्थ खोलती हैं। महाकवि तुलसीदास ऐसे ही कवि हैं जो जीवन भर हमारे साथ चलते हैं।अपने स्वभाव और प्रकृति से प्राप्त कर्मों पर आधारित हमने अपना वर्ण पाया है। उसका कोई विकल्प हमारे पास नहीं
म्हारा उरलगिया घर आया जी
कौन किस गर्भ से जन्म लेगा, नहीं जानता। बस जन्म होता रहता है। जन्म लेते ही सम्बन्ध भी जुड़ जाते हैं। कोई पुत्र हो जाता है, कोई माता और कोई पिता। यह तीनों सम्बन्ध फिर और भी कई सम्बन्धियों से जोड़ देते हैं।जन्म लेते ही और भी बहुत सारे नाते यूँ ही

माधव हम परिणाम निरासा
इस सदी में तमाम तरह के स्वप्न देखती दुनिया में मिथिला के कवि विद्यापति की याद आ रही है। देखो तो माधव के प्रेम में पगी राधा की देह में कैसी प्रलय मची हुई है। लगभग उत्सव में डूबी यह आधुनिक दुनिया कैसे अपने अवसान की ढलान उतरती जा रही है, अगर यह जानना
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी
ईश्वर का धाम शरीर ही है, जो सबको मिलता है। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द होकर वह सकल संसार में व्यापा है। शरीरों में हृदय ही उसका भवन है। प्रभु के घर में काम, क्रोध और लोभ घुस आये हैं। महाकवि तुलसीदास जी कहते हैं कि हे राम! वे मुझे अनाथ समझ
अव्दैत का विस्तार और संसार
कभी विकल होकर कहने का मन होता है कि अव्दैत की धारणा कुछ विरले ज्ञानियों की जिद है और संसार को देखकर लगता है कि वह व्दैत में ही जीने की जिद बांधे हुए है।कोई उत्प्रेरक जरूर है जिसके कारण इतना बड़ा जीवन व्यापार चल रहा है पर विरले ज्ञानियों की नज
मैं तुइ पाए आपन जीऊ
उत्तर प्रदेश के अमेठी अंचल के पास एक छोटा-सा नगर जायस भी है। इसी नगर में अवधी बोली के महाकवि मलिक मुहम्मद जायसी हुए; जिनका "पद्मावत" महाकाव्य संसार में प्रसिद्ध हुआ है।सिंहलद्वीप की सुन्दरी पद्मावती को कौन नहीं जानता। उसकी कथा घर-घर में प्रच

स्वभाव, सम्बन्ध, सभ्यता
हम एक बोधमय नित्यता में सदा रहते आये हैं। इसका अनुभव हमें अपने स्वभाव के अनुरूप हुआ करता है। हमारा यह स्वभाव हमें मिली जन्मजात प्रकृति के न्याय से स्वतः संचालित है। इसे हठपूर्वक बदला तो नहीं जा सकता पर बोधमय नित्यता के आइने में अपनी ही प्रतिपल मिट
नया काव्य-मुख
सागर विश्व विद्यालय की देहरी छूते हुए अशोक वाजपेयी के कविता संग्रह "शहर अब भी सम्भावना है" से सामना हुआ और उसे पढ़ते हुए लगा कि मैं भी फूल खिला सकता हूँ। मेरी किशोरवय में एक ऐसा कवि सामने आया जिसने असंख्य छायाभासों, काँपते-सिहरते लयों के सुनसानों,
श्रुतियों की भोर
श्री नरेश मेहता और जगदीश गुप्त के साथ जबलपुर में कविता सुनाने का अवसर मिला। नरेश मेहता की कविताएँ सुनकर लगा कि कविता में श्रुतियों की भोर हो रही है जैसे आधुनिक कविता की भूमि पर वैदिक ऋचाएँ उतर रही हों। कविता पाठ के बाद दोनों कवियों से गपशप करने का
देश को खोकर कविता
आज सुकवि की मुश्किल यह है कि वह मानुषी जनतंत्र की माया के सामने इतना निहत्था और असहाय है कि वह किससे शिकायत करे।मूर्खो, देश को खोकर ही मैंने प्राप्त की थी यह कविता --दूर दिल्ली से श्रीकान्त वर्मा की आवाज सुनाई देती है -- मगर खबरद

हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक बोध
भारत में फिरंगियों के रहते और उनके जाने के बाद हिन्दी में विमर्श की परम्परा बहुत गड़बड़ा गयी है, हम अपने शब्द भूलकर जैसे किसी आयातित भाषा में विमर्श कर रहे हैं, किसी और के बीज शब्दों को व्यर्थ ही अपनी जमीन पर रोप रहे हैं, हम अपने अनुभव की फसल उगाना
वैद वेदना
कथाकार कृष्ण बलदेव वैद के शब्द मेरी देह पर उड़ती हुई खाक की तरह झरते हैं और यह खाक देह पर ठहरती नहीं, पल-पल उसी में विलीन होती जाती है। आँखों की कोरों पर भाषा के काजल की तरह कुछ देर ठिठकती जरूर है जैसे किसी वाक्य की रेखा हो और जो बह जाना चाहती हो।
पिता और कवि
पिता अपनी एक कविता रचते हुए कहते हैं कि – बाँस की पोर ने मुझे पहना है और मेरे भीतर कोई अज्ञात अँगुलियाँ उसे छूती रहती हैं जैसे वे मुझमें कोई स्वर ढूँढ रही हों । उनका यह भाव जानकर लगता है कि पिता तो अनन्त काल से अपने से बाहर आकर कुछ कहना चाहत
बाँसुरी की टेर
श्री अरविन्द कहते थे कि मानव जाति के इतिहास में वह समय भी आता है जब युध्द को मित्र की तरह गले लगाना पड़ता है। गहरे आशय से भरी उनकी यह बात मुझे हिरण्यकश्यपु के वध की याद दिलाती है और कहने का मन होता है कि वह समय भी आता है जब अत्याचारी को गोद में रखक

आते ही जाने वाला
हरिवंशराय बच्चन ने - मधुशाला - काव्य रचते हुए गाया -- इस दुनिया में आते ही मैं कहलाया जाने वाला। जल्दी-जल्दी ढलते दिन में बीतता जाता जीवन किसी एक दिन नहीं रहता। वे अपनी कविता में रूप-रस-गंध-स्पर्श और शब्दों से भरे जीवन के इस पार से उस पार को भी दे
नये वर्ष की देहरी पर राम की याद
हे राम मेरा यह हृदय ही तुम्हारा घर है और इस पर बड़ी विपत्ति आयी हुई है। इस घर पर काम-क्रोध-लोभ-अहंकार ने धावा बोल दिया है। ये चारों तस्करों की तरह तुम्हारे घर को लूट रहे हैं। मुझे चिन्ता हो रही है और मैं तुम्
लोक का आँगन
लोक अनंत भी है और आँगन भी। वह अनन्त को आँगन में उतार लेता है और घर के आँगन से ही अनंत की यात्रा करता है। लोक में ही यह शक्ति है कि वह आवाहन न जानते हुये भी सारे देवताओं को एक छोटा-सा चौक पूरकर उसमें प्रतिष्ठित कर सकता है। लोक में ही साहस है कि वह
होना शुरू होना
सागर शहर की झील के किनारे नजरबाग की सीढ़ियों पर बैठा निर्मल वर्मा के निबन्धों की किताब -- शब्द और स्मृति -- पढ़ रहा हूँ। जैसे कोई जलस्रोत किसी नदी में मिल जाने के लिए आकुल हो। दूर ठहरी हुई शब्दों की कोई नौका स्मृति की पतवारों से धीरे-धीरे चलने लगी ह

घर सँवरने से दुनिया सँवरती है
मेरा घर अब दोस्तों को अपने घर से दूर लगता है। मुझे बच्चे घर से दूर लगते हैं। मैं भी घर से कुछ दूर जाता सा लगता हूँ। क्या घर से दूर जाने के लिए ही घर में रहने आया हूँ? श्यामला हमेशा घर में रहती है। वह कभी घर से दूर जाती ही नहीं। अगर कुछ दिनों के लि
प्रेम होता है तो हो, ध्रुव उसे क्यों करते हो...
किसी-किसी के लिए वह सिर्फ एक अहसास भर है और किसी के लिए आहट-सा सुनायी पड़ता है। किसी के लिए वह ऐसी खुशबू है जो पलकों में इशारों की तरह बस गयी है। किसी के लिए वह एक ख्वाब-सा है और किसी के लिए हाथों में आ गयी पूरी दुनिया-सा। किसी-किसी को उसमें उमर भर
उष्ण कटिबन्ध के प्रवासी
संयोगवश करीब तेरह बरस पहले मुझे मॉरीशस जाने का अवसर मिला। हिन्द महासागर में अपनी थोड़ी सी जगह में फैले इस व्दीप पर भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी फ्रांसीसियों और अफ्रीकियों के साथ रहती है। अंग्रेजी और फ्रेंच के साथ भोजपुरी, उर्दू, मराठी और दक्षिण
महात्मा गांधी चरित स्वयं ही काव्य
भारत के हृदय प्रदेश के उज्जयिनी नगर निवासी यशस्वी कवि श्री शिवमंगल सिंह "सुमन" की नोटबुक में पण्डित नेहरू ने, 1954 में यह वाक्य लिख दिया था- "अपने जीवन को कविता बनाना चाहिये"।1989 में जब पूरे देश में नेहरू जन्मशती के आयोजन हुए, तभी इस अवसर प

प्रतीति की भाप
भाषा एक सेतु की तरह लगती है जिसे मन और बुध्दि के बीच बाँधना पड़ता है। पीड़ाओं के खारेपन में हिलुरते भवसागर में अपनी नौका खेते कवि की आँखें बार-बार भर आती हैं और छलककर सागर में झर जाती हैं। कवि की आँखों का स्रोत उसके हृदय में ही तो है जिस पर प्रतीतिय
हम जो समझा किये
कागज पर कभी कोई सवाल हल नहीं हो पाता। वह उन कागजों को पढ़ डालने से भी हल नहीं होता जो सदियों से लिखे पड़े हैं। कई पीले पड़कर सड़ गये, कई हवा में उड़ गये। दुनिया कागज सँभालकर थक गयी है पर उन्हें रोज कोई न कोई गूदता ही रहता है। कागजों पर संसार का कोई नक्
पानी की आवाज सुनो
अब पानी सब व्यक्तियों, व्यापारियों और व्यवस्थाओं के खिलाफ आंदोलन पर है कि मेरे रास्ते से हटो। मेरा रास्ता मत रोको। मुझे नदी में बहने दो, कुइया में, पोखर में, ताल में भरने दो, कुओं में आहिस्ता-आहिस्ता रिसने दो, पर्वत से मुक्त झरने
लागा चुनरी में दाग़
पण्डित कुमार गंधर्व की आवाज़ आ रही है। वे कबीर के करघे की लय पर गा रहे हैं-दास कबीर जतन सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।झीनी-झीनी बीनी चदरिया।अपने कर्म की लय पर रचा गया कबीर का यह गीत उनके पूरे जीवन पर छाया हुआ है। कबीर

अब ज़रूरत है जल सत्याग्रह की
सबकी जरूरत की चीज़ नमक पर जब फिरंगियों ने कर लगाया तो महात्मा गांधी नमक कानून तोड़ने दाण्डी कूच पर निकल पड़े थे। पूरी दुनिया में इस अनूठे सविनय अवज्ञा आन्दोलन की मिसाल ढँूढे नहीं मिलती। वे गुलामी के दिन थे जब बापू के नेतृत्व में हमारे पूर्वज सेनानियो
स्मृतिगंधा
जैसे पूरा यथार्थ आमने-साने की पहाड़ियों के बीच फैला है। एक पहाड़ी उजाले की दूसरी अंधेरे की। उजाले में अंधेरे की पहाड़ी दिखाई देती है-- उजाले को अपने पास बुलाती, इतने पास कि उजाले की पहाड़ी अंधेरे में डूब जाती है। सब कुछ एक ही कौंध में चमकता है, एक ही
अवलोकी अज्ञेय
कवि अज्ञेय की एक कविता उद्धरित करता हूँ। इसे स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में दिल्ली की जेल में लिखा गया। यह उनकी प्रारंभिक गद्य कविताओं में शामिल है। कविता बयान के शिल्प में रची गयी है--मैं अपने अपनेपन से मुक्त होकर, निरपेक्ष भाव से जी
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