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धर्मपाल महेंद्र जैन
धर्मपाल महेंद्र जैन

1952 को रानापुर, जिला झाबुआ, म.प्र. में जन्म। भौतिकी, हिन्दी एवं अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर। व्यंग्य संकलन "सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?" तथा तीन सौ से अधिक कविताएँ व हास्य-व्यंग्य विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। रचनाएँ आकाशवाणी से भी प्रसारित। स्वदेश दैनिक, इन्दौर तथा शाश्वत धर्म मासिक समाचार-पत्रों से सम्बद्ध रहे। जैन सोसायटी ऑफ टोरंटो, कैनेडा की मिनिस्ट्री ऑफ करेक्शंस के तहत आयएफसी में पूर्व निदेशक रहे। भारतीय कौंसलावास, न्यूयॉर्क की राजभाषा समिति और परमानेंट मिशन ऑफ इंडिया की सांस्कृतिक समिति में सदस्य तथा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स संस्थाओं से जुड़े रहे हैं।


चरवाहे के साथ	शब्द हो जाते हैं दुर्निवार
चरवाहे के साथ मैं नहीं समझता राग-बन्दिशें-ख्याल, आरोह-अवरोह फिर भी बहुत अच्छा लगता है तुम्हारा गाना लय-अलय। तुम्हारे स्वर आकुल बार-बार झंकृत करते हैं मन क्या होता है ऐसा किउदासी
हिन्दी के पाठक कहाँ हैं?
मेरे आसपास ढेरों हिन्दी प्रेमी हैं जो सिर्फ हिन्दी दिवस के दिन ही हिन्दी बोलते हैं, सोच-सोच कर। बाकी दिनों वे हिन्दी की ढपली बजाते हैं और कमा खाते हैं। कई मित्र तो रोमन लिपि पर इतने फ़िदा हैं कि देवनागरी में लिखने में उन्हें लज्जा आती है। देवनागरी
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