ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
धर्म कर्म कछु नहीं उहंवां
01-Jun-2016 12:00 AM 2228     

रामानन्द के ¶िाष्य, संवादी कबीर ने स्वयं को न कभी धर्मगुरु कहा, न अवतार। वे स्वयं को न पैगंबर के रूप में देखते हैं, न नये धर्म के संस्थापक के रूप में। उनके नाम से पंथ का प्रवर्तन किया धनी धर्मदास ने - कबीर के निधन के कम से कम सौ बरस बाद। आधुनिक खोजियों ने कबीर के दावों और पंथ के दावों को गड्डमड्ड कर डाला। ये खोजी कल्पना ही नहीं कर सकते थे कि आधुनिक युग से पहले भी संगठित धर्म की ऐसी आलोचना संभव थी, जिसका लक्ष्य किसी नये धर्म का प्रवर्तन या किसी नये पंथ की स्थापना करने की बजाय धर्म-मात्र के विकल्प की खोज करना होगा। अपनी कल्पना की दरिद्रता को कबीर पर आरोपित करके यह मान लिया गया कि वे नया पंथ खड़ा करने चले थे; वे धर्मगुरू थे, उनका लक्ष्य एक और संगठित धर्म-मत की स्थापना करना था। धर्मगुरुओं द्वारा कबीर के नाम से किये गये दावों को ऐसे सुना गया जैसे कि वे कबीर के अपने वचन हों। मान लिया गया कि कबीर की सारी साधना का लक्ष्य था : नये पंथ या नये धर्म का प्रवर्तन।
सुनना चाहिए कि स्वयं कबीर के वचन क्या कहते हैं। कैसे बखान करते हैं अपनी साधना का। परखना चाहिए कि उनकी आलोचना का लक्ष्य हिन्दू धर्म और इस्लाम है या धर्म-मात्र के मूल तर्क को ही प्र¶नबिद्ध करते हैं कबीर के वचन। स्वयं कबीर की दृष्टि में क्या लक्ष्य और क्या स्वरूप है उनके द्वारा प्रस्तावित साधना का?
इस साधना के स्वरूप को समझने के लिये इस धारणा से मुक्त होना जरूरी है कि चूंकि कबीर संस्कृत नहीं जानते थे, इसलिए कुछ नहीं जानते थे। बे¶ाक उन्होंने कहा, "मसि कागद छुयो नहीं कलम गह्रो नहिं हाथ...', लेकिन उन्होंने यह भी कहा, "सात समंद की मसि करौ लेखनि सब बनराइ।' पहली पंक्ति को उनके पढ़े-लिखे न होने के पक्ष में अकाट्य तर्क की तरह प्रस्तुत किया जाता रहा है; दूसरी पंक्ति के आधार पर उन्हें खासा पढ़ा-लिखा भी साबित करना असंभव तो नहीं। वास्तविकता यह है कि कबीर के समय और समाज में "पढ़ा-लिखा' और "जानकार' होना उस तरह से पर्यायवाची नहीं माने जाते थे, जिस तरह छापे के असर से आतंकित समाज में माने जाते हैं। इस बात का साक्ष्य स्वयं कबीर की कविता है कि वे भले ही "¶ाास्त्र-ज्ञान-सम्पन्न' न रहे हों, अपने समय में प्रचलित धर्मों और आस्थाओं के मुहावरे से भलीभांति परिचित थे, केवल वैदिक, अवैदिक, पौराणिक मतों से ही नहीं, इस्लाम से भी, जैसा कि पंडित चन्द्रबली पांडेय सप्रमाण, सविस्तार बरसों पहले दिखा चुके हैं।
यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी समाज में विचारों और ज्ञान के संप्रेषण तथा प्रसार का एकमात्र माध्यम लिखित/मुद्रित ¶ाब्द नहीं होता। आधुनिक समाजों में भी मौखिक और श्रुत ¶ाब्द के जरिए विचार फैलते हैं- उत्तर-आधुनिक समाजों में तो और भी ज्यादा। कबीर की कविता ही इस बात को साफ कर देती है कि वे "बहुपठित' हों या न हों, "बहुश्रुत' तो नि¶चय ही थे। उनके जीवनकाल से लेकर आज तक उनके प्रेमी और प्र¶ांसक कबीर को "ज्ञानीजी' यूँ ही नहीं कहते आए हैं- और उनका ज्ञान केवल भीतर का नहीं बाहर का भी था। उन्हें केवल अपने "आतम' की ही नहीं, आस-पास के ज्ञान-विमर्¶ा की भी अच्छी-खासी "खबर' थी। इसलिए हमें कबीर द्वारा किये गये उल्लेखों और उनसे भी अधिक अनुल्लेखों में, केवल उनकी जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि उनका चुनाव भी देखना चाहिए। उनके एक-एक ¶ाब्द को विनम्रता और ध्यान से समझना चाहिए।
एक और बात। दो स्थितियों में फर्क करना चाहिए। कबीर या किसी के भी द्वारा स्वयं धर्मस्थापना का प्रयत्न करना एक स्थिति है; उनकी कविता को धर्म¶ाास्त्र बनाकर अन्यों द्वारा उनके नाम से पंथ या धर्म चला देना दूसरी बात। पंथ चलाने वालों की ऐतिहासिक भूमिका पर सहानुभूतिपूर्वक ध्यान जरूर देना चाहिए लेकिन स्वयं कबीर को धर्मगुरु, पंथप्रवर्तक, आत्मघोषित पैगंबर आदि घोषित करने के पहले उनकी कविता पर ध्यान देना चाहिए।
तो क्या है कबीर की साधना का स्वरूप? और क्या है संगठित धर्म और धर्मसत्ता के प्रति कबीर का रवैया? "धर्मगुरु' कहे गये कवि-दार्¶ानिक कबीर की रचना में कितनी बार आता है यह ¶ाब्द-"धर्म'!
¶यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित "ग्रन्थावली' के आधार पर उपर्युक्त प्र¶न का उत्तर है : कुल बीस बार; इसमें "धर्म' का सम¶ाील ¶ाब्द "दीन' भी ¶ाामिल है। साखी, पद, रमैनी और परि¶िाष्ट में संकलित "आदिग्रन्थ' के अं¶ाों को मिलाकर कुल बीस बार। इनमें से चार बार तो ¶ाब्द है- "धर्मराज' (मृत्यु के देवता), जैसे : "अब की बेर न कागद कीर्यो, तौ धर्मराई सूं तूटै' (पद 108) और "परगट भए निदान सब जब पूछे धर्मराइ' (परि¶िाष्ट, साखी 61)। एक जगह "धर्म' किसी वर्ण या जाति के अपेक्षित लोकस्वीकृत कर्तव्य के अर्थ में है- "खत्री करै खत्रिया धरमो' (अष्टपदी रमैनी, ग्रन्थावली, पृ. 182), एक जगह आ¶ाय है : देहधारी, जीव-मात्र का स्वभाव : "देही गावा जीव धर्महत' (ग्रन्थावली, परि¶िाष्ट, पद 120)। एक स्थान पर "धर्म' का अर्थ है, गृहस्थ-कर्तव्य : "जौ गृहकर हित धर्म करु' (परि¶िाष्ट, साखी 66)। मतलब यह कि जिस अर्थ में इस ¶ाब्द को लेते हुये कबीर को धर्मप्रवर्तन का श्रेय दिया जाता है, उस संगठित आस्थातन्द्र के पारिभाषिक अर्थ में "धर्म' और "दीन' ¶ाब्द कुल मिलाकर ग्रन्थावली में आते हैं सिर्फ तेरह बार। इनमें भी देखें यह प्रसिद्ध साखी : सूरा सो पहिचानियै जु लरै दीन के हेत। पुरजा पुरजा कटि मरै कबहुँ न छाड़ै खेत। (ग्रन्थावली, दास, परि¶िाष्ट, साखी 192, पृ. 200)
इस साखी का दूसरा रूप भी प्रचलित है : सूरा तबही परषिए, लडै धणीं के हैत। पुरिजा पुरिजा है पड़ै, तऊ न छाड़ै खेत। (ग्रन्थावली, दास, सूरा तनकौ अंग 9)
"धनी' याने स्वामी। सो, कुल मिलाकर, सारी ग्रन्थावली में धर्म/दीन प्रकटे : बारह बार। उपर्युक्त साखी के पहले रूप में भी "दीन' का आ¶ाय संगठित धर्म ही हो, यह जरूरी नहीं। संगठित धर्म के लिये कट गिरने वालों को कबीर ¶ाूर-वीर मानें, इससे अधिक संभावना तो इस बात की है कि वे "दीन-दुखी' के पक्ष में संघर्ष करने वाले को सच्चा ¶ाूरवीर मानें। सो, धर्म दीन की उपस्थिति रह गई : ग्यारह बार। इनमें से दस स्थानों पर "धर्म' ¶ाब्द ठेठ कबीरीय अंदाज में आया है। धर्म प्राण या दीनदार होने का दावा करने वालों को छेड़ने/छकाने के प्रयोजन में सारी ग्रन्थावली में एक बार, कुल मिलाकर एक बार ऐसा लगता है कि कबीर धर्म-उपदे¶ा की कुछ फिक्र कर रहे हैं। यहाँ भी वे अपनी वाणी को धर्म-उपदे¶ा बताने की बजाय उनकी पात्रता की चिन्ता कर रहे हैं, जो उस वाणी को धर्म-उपदे¶ा की तरह सुनने पर उतारू हैं : जीवन को समझै नहीं, मुवा न कहै संदेस। जाको तनमन सौं परचा नहीं, ताको कौण धरम उपदेस। (ग्रन्थावली, दास, उपदे¶ा को अंग, फुटनोट, पृ. 44)
और इस साखी के बारे में भी मजे की बात यह कि जिन दो पांडुलिपियों के आधार पर ग्रन्थावली तैयार की गई, उनमें से प्राचीनतर पांडुलिपि में यह साखी है ही नहीं। (देखें ग्रन्थावली, पृ. 44) डॉ. माता प्रसाद गुप्त ने ग्रन्थावली के अपने पाठ में इस साखी को ¶ाामिल भी नहीं किया है।
है न रोचक स्थिति? पंथप्रवर्तक, धर्मगुरु, नये धर्म के पैगंबर ठहराए गए कवि की रचना में धर्म/दीन के दर्¶ान कुल ग्यारह बार-उसमें भी दस बार विडम्बनापरक अर्थ में! प्राचीनतर पांडुलिपि को आधार मानें तो "धर्म-उपदे¶ा' की चिन्ता तक एक बार भी नहीं, स्वयं की कविता को "धर्म-उपदे¶ा' बताने का तो सवाल ही नहीं। अपनी कविता को "निज ब्राहृ विचार' कहने वाले कवि-दार्¶ानिक कबीर "ब्राहृा विचार' और धर्म-उपदे¶ा या पंथप्रवर्तन के बीच फर्क करते थे। इस फर्क को यत्नपूर्वक मिटाया है कबीर के दावेदारों ने। और उन दावेदारों तथा स्वयं कबीर के बीच फर्क न करने वाले अध्येताओं ने।
ऐसा तो है नहीं कि कबीर अपने समय की धर्म-साधनाओं से नावाकिफ थे। उलटे उनकी काव्य-भाषा में इन धर्म-साधनाओं की पारिभाषिक ¶ाब्दावली की भरमार ही है। "राम' की तो खैर गिनती ही कैसे करें, ठेठ वैष्णव नाम के¶ाव, गोविन्द, मुरारि भी बार-बार आते हैं- पौराणिक कथाओं और दार्¶ानिक विचारों से कबीर के अच्छे-खासे परिचय का संदे¶ा देते हुये। साथ ही "अल्लाह' और "करीम' जैसे ¶ाब्द ही नहीं, इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि इस्लामी आस्था और पौराणिकता से भी कबीर का खासा परिचय था। नाथपंथी ¶ाब्दावली का तो खैर कहना ही क्या।
कबीर अपने "अनभै सांचा' (आध्यात्मिक अनुभव) और "अनभै बानी' (सामाजिक आलोचना) दोनों को कहने के लिए उस वक्त प्रचलित धार्मिक ¶ाब्दावली का जमकर उपयोग करते हैं। लेकिन इस उपयोग का लक्ष्य क्या है?
जगजाहिर बात है कि कबीर की साधना हिन्दू धर्म, इस्लाम, नाथपंत, दे¶ााचार, लोकाचार से न्यारी थी। सवाल यह है कि क्या कबीर का रास्ता किसी नए धर्म/पंथ की स्थापना की ओर जा रहा था? क्या वे सचमुच "निराला पंथ' निकाल रहे थे, जैसा कि आचार्य ¶ाुक्ल ने क्षुब्ध भाव से कहा? क्या वे सचमुच "धर्मगुरु' थे, जैसा कि आचार्य द्विवेदी मानते हैं?
उपर्युक्त प्र¶न के उत्तर में हम कबीर के अध्येताओं के बीच अद्भुत और "कालातीत'(!) सर्वसम्मति पाते हैं। आचार्य ¶ाुक्ल और आचार्य द्विवेदी को ही नहीं, 1987 ई. में लिख रहे डेविड लोरेंजन को भी लगता है कि "कबीर का प्रतिमाभंजन इतना जबरदस्त है कि बिलकुल तर्कसंगत रूप से माना जा सकता है कि वे हिन्दू धर्म और इस्लाम दोनों से नाता तोड़कर एक स्वतंत्र धार्मिक परम्परा स्थापित करना चाहते थे।'
उपलब्ध धर्मों से स्वयं को अलगाने की जो मुखर बेचैनी कबीर में है उसके कारण यह भ्रम "बिलकुल तर्कसंगत रूप से'(!) संभव है कि वे किसी नये धर्म की स्थापना करना चाहते थे। सवाल यह है कि हिन्दू धर्म और इस्लाम दोनों से नाता तोड़ने की बेचैनी का अनिवार्य अर्थ क्या एक नई "धार्मिक परम्परा' की स्थापना करने की इच्छा भी है? सवाल यह भी है कि क्या ऐसी किसी इच्छा की सूचना कबीर की कविता से मिलती है?
ऐसा लगता है कि कबीर को धर्मगुरु बताने वाले आधुनिक अध्येताओं की तुलना में मध्यकालीन भक्त और संत कबीर का प्रयोजन बेहतर ढंग से समझते थे। पीपा सरीके उनके प्र¶ांसक हों या तुलसीदास सरीखे उनके आलोचक। पीपा कृतज्ञ हैं कबीर के कि उन्होंने "साच प्रकासा'। इस सच का प्रका¶ा कबीर ने न किया होता, तो पीपा के ¶ाब्दों में :
जो कलि नाम कबीर न होते
तौ लौक वेद अरु कलिजुग मिलकर भगति रसातल देते।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^