ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
धर्म का मूल भाव
01-Jul-2018 04:55 AM 1497     

ऊँ सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यं करवावहै, तेजस्विना वधीतमस्तु मां विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
अर्थ : हम सभी एक-दूसरे की रक्षा करें। हम साथ-साथ भोजन करें। हम साथ-साथ काम करें। हम साथ-साथ उज्ज्वल और सफल भविष्य के लिए अध्यनन करें। हम कभी भी एक-दूसरे से द्वेष न करें।
उपनिषदों से चयनित ये शब्द देश के सभी केंद्रीय विद्यालयों और अन्य संस्थानों में उच्चारित किए जाते हैं। हम जिन वेदों पर गर्व करते हैं और जिनके ज्ञान को अपौरुषेय बताते नहीं थकते जब उन पर आचरण की बात आती है तो हम तत्काल नस्लों, धर्मों, राजनीतिक पार्टियों और जातियों में बँट जाते हैं। ऐसा आडम्बर और दुचितपना शायद ही कहीं देखने को मिले। इसी तरह हम "वसुधैव कुटुम्बकम" कहते भी नहीं थकते लेकिन आए दिन छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए कुलवधू को भरी सभा में नंगा करने में लज्जित नहीं होते।
जबकि यह मन्त्र हमें सर्वत्र ईष्र्या रहित होकर साथ-साथ जीने, आगे बढ़ने, ज्ञान अर्जन करने और साथ-साथ पराक्रम करने का दर्शन देता है।
सभी जीव अपनी-अपनी मूल प्रवृत्तियों से स्वयं संचालित होते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार जीव की मूल प्रवृत्तियों को अपने हारमोंस में समय-समय पर स्वतः होने वाले परिवर्तनों से आतंरिक उत्प्रेरण मिलता है। प्रकृति सभी जीवों को अपने जीन्स अगली संतति में पहुँचाने या अपनी वंश वृद्धि के रूप में आप को बचाए-बनाए रखने के लिए हारमोंस का एक ऐसा उत्प्रेरण देती है कि वह अभिमंत्रित-सा उसके अनुसार आचरण करने लगता है। मनोविज्ञान में विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षण या विद्युत के धन और ऋण चार्ज का आकर्षण प्रकृति के इस विधान और तकनीक के उदाहरण हो सकते हैं। बच्चे पैदा होने पर स्तनपायी माता के लिए स्तनों में का दूध का दबाव पीड़ाकारक होता है इसलिए वह बार-बार दूध पिलाने के लिए शिशु के पास जाना चाहती है, शिशु को भी दूध चाहिए क्योंकि अभी वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आत्मनिर्भर नहीं है। यह पारस्परिक निर्भरता एक रिश्ते को जन्म देती है। विज्ञान की भाषा में यह एक हारमोनल रिश्ता है, मनोविज्ञान की भाषा में एक मूल-प्रवृत्ति तो संवेदना की भाषा में वात्सल्य है। इसे धर्म तक भी ले जाते हैं कि वात्सल्य माँ का धर्म है। इसके बदले में संतान का भी कोई धर्म बन ही जाता है।
इस प्रकार आकर्षण, संबंध, संपर्क, सहजीवन किसी न किसी रूप में धर्म की सीमा तक जाते हैं। सच भी है, किसी अन्य के साथ संपर्क और सहजीवन के बिना धर्म की कल्पना नहीं हो सकती। मानव में यह धर्म मात्र मूल प्रवृत्तियों तक सीमित नहीं होता। वह उसके विवेक, विचार, जिज्ञासा, संवाद और सामूहिकता से जन्मता है। अकेले का क्या धर्म और क्या अधर्म? किसी समूह, समाज की पारस्परिक निर्भरता, आवश्यकता और उससे उपजी संवेदना ही उसका निर्माण और स्थायित्त्व तय करती है। और इसका विस्तार ही उस धर्म की श्रेष्ठता तय करता है। मानव धर्म में इन सबका निर्वाह हो सकता है। इसका और विस्तार हो तो उसकी सीमा में समस्त सृष्टि आ जाती है। समस्त जीव-निर्जीव, स्थावर और जगम, चर-अचर सृष्टि आ जाती है। तब पादप और पर्वत भी पूज्य और परिवार के सदस्य हो जाते हैं, जल स्रोत भी पूजित हो जाते हैं। बादल, ग्रह-नक्षत्र और सूरज-चाँद हमारे रिश्तों की ज़द में आ जाते हैं।
प्रलय के बाद बचे मनु यज्ञ के बाद बलि का अन्न इस आशा से कहीं रख देते हैं कि उनके अतिरिक्त कोई और भी हो सकता जिसे इसकी ज़रूरत हो। युधिष्ठिर धर्म के पुत्र या रूप माने जाते हैं। "यक्ष प्रश्न प्रसंग" में धर्म स्वयं प्रश्न पूछकर उनकी परीक्षा लेते हैं। प्रश्नों के अंत में कहते हैं कि प्रश्नों के सही उत्तर देने के उपलक्ष्य वे उनके एक भाई को जीवित कर सकते हैं। ऐसे में युधिष्ठिर तत्काल, बिना किसी दुविधा के उत्तर देते हैं कि सहदेव को जिन्दा कर दिया जाए। यक्ष फिर परीक्षा लेता है। पूछता है- तुम्हें कौरवों से अपना हक़ लेने के लिए लड़ना पड़ सकता है तो भीम या अर्जुन क्यों नहीं? और फिर यह तो सौतेला है। तुम्हारा सगा नहीं है। युधिष्ठिर कहते हैं- सहदेव मेरा सगा नहीं, सौतेला है इसीलिए मैं उसका जीवन चाहता हूँ। दूसरा, पराया ही अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यही धर्म है।
सच्चा धर्म किसी अज्ञात, सातवें आसमान में स्थित, आज तक किसी के भी अनदेखे स्वर्ग नरक की बात नहीं करता। इस जीवन के दुखों का उपाय और निराकरण मृत्युपरांत नहीं बताता जिसका कोई प्रमाण और जाँच नहीं। एक अप्रमाणित और अप्रामाणिक उपाय नहीं बताता। वह किसी धर्म को छोटा नहीं बताता। जबकि सचाई यह है कि सभी धर्म वाले मंच पर चाहे कुछ भी कहें, एक ही ईश्वर की बात करें, सभी जीवों को उसकी संतान कहें लेकिन कार्यरूप में अपने अंदरखाने सब एक-दूसरे निंदा करते हैं, अपने धर्म वालों को किसी अन्य धर्म के बारे में सुनने तक की छूट नहीं देते, अपने अन्दर भी संवाद और जिज्ञासा को स्थान नहीं देते। बस, किसी तानाशाह की तरह अपने भक्त-गुलामों के लिए फरमान सुनाते हैं।
मजे की बात यह कि खुद अपने कहे का पालन नहीं करते। दूसरों को सादगी, वैराग्य और इन्द्रिय-निग्रह का उपदेश देने वाले सभी धर्मों के उपदेशकों को खुद के लिए सभी भौतिक सुख-सुविधाएं चाहियें। यह चतुर लोगों द्वारा अपने से कम चतुर लोगों को ठगने की बात है। चार सौ साल पुराने गैलिलियो की चर्च-धर्म-विरुद्ध खोज को मान्यता देकर चर्च ने इसे बड़े प्रगतिवादी कदम के रूप में प्रचारित किया गया लेकिन आज भी वेटिकन में भूत-प्रेत भगाने का पाठ्यक्रम ज़ारी है, मूर्तिपूजा के विरोधी धर्मों में मजारें पूजी जाती हैं। ज्ञान और संवाद की परंपरा वाले धर्म में भी पता नहीं किस कुंठा को छुपाने के लिए त्रेता में टेस्ट ट्यूब बेबी और द्वापर में इंटरनेट खोजा जा रहा है? ऐसे में धर्म और उसके अधिकारियों के साथ-साथ भक्त भी आडम्बरी हो जाते हैं। वे भी दुराचार करते हुए इन धर्माधिकारियों के माध्यम से, यदि कहीं ऊपर कोई स्वर्ग है तो, उस स्वर्ग को खरीदना चाहते हैं। यह किसी धर्म के अधः पतन की चरम स्थिति है।
कवि मैथिलीशरण गुप्त के राम कहते हैं- मैं यहाँ संदेसा नहीं स्वर्ग का लाया। इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।।
वन से लौटने के बाद वे सरयू के किनारे आमजन से संवाद के समय कहते हैं-
जो अनीति कछु भाखौं भाई। तो मोहे बरजेहु भय बिसराई।।
वे सुनने वालों, संवाद करने वालों, समाज को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार देते हैं। यह किसी के मन की इकतरफा बात नहीं है। यदि इकतरफा बात होती तो वह आत्मरति या आत्मप्रचार होती। जन के मन को दरबार लगाकर नहीं बल्कि सामान्य आदमी के रूप में उसके साथ जी कर जाना जा सकता है। तभी नाटककार लक्ष्मी नारायण लाल ने अपने प्रयोगधर्मी एकांकी "यक्ष-प्रश्न" में यक्ष से पुछवाया- वनवास क्या होता है?
और धर्म के अवतार युधिष्ठिर से उत्तर दिलवाया है- लोगों के बीच में होना।
तभी आज़ादी की लड़ाई से पहले गाँधी जी ने देश के शहरी वकीलों और बुद्धिजीवियों को भारत के गांवों की यात्रा की सलाह दी थी जिसके फलस्वरूप देश को सच्चे और बहुलतावादी सामाजिक नेता मिले। सच है जब तक आप अपने स्वार्थ, अहम् और आत्ममुग्धता के वायवीय संसार से बाहर नहीं निकलेंगे तब तक जन से दूर रहेंगे। तब आपके विचार कोई धर्म नहीं बन सकेंगे क्योंकि वे समष्टि से सम्बद्ध नहीं हैं। उनके और उनके लिए नहीं हैं। धर्म का पहला तत्त्व है मन, वचन और कर्म की एकता। यही सच है।
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है, उन्होंने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। वे कहते हैं- "सत्य ही ईश्वर है एवं ईश्वर ही सत्य है।" यह वाक्य ज्ञान, कर्म एवं भक्ति के योग की त्रिवेणी है। सत्य की अनुभूति अगर ज्ञान योग है तो इसे वास्तविक जीवन में उतारना कर्मयोग एवं अंततः सत्य रूपी सागर में डूबकर इसका रसास्वादन करना भक्ति योग है। शायद यही कारण है कि लगभग सभी धर्म सत्य को केन्द्र बिन्दु बनाकर ही अपने नैतिक और सामाजिक नियमों को पेश करते हैं।
धर्म किसी राजा द्वारा अपनी सत्ता और सुरक्षा के लिए बनाया गया बाध्यकारी कानून नहीं बल्कि किसी समाज की संवेदना और पारस्परिकता का वह चैतन्य और मन-वचन और कर्म में प्रकट होने वाला रूप है जो व्यष्टि का समष्टि तक विस्तार करके उसे जीवन की कृतार्थता की अनुभूति कराता है। और शायद यही वह स्वर्ग है, बिना कुंठा वाला वैकुण्ठ है। यही सभी धर्मों का आदर्श होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो वह विचार या संगठन कुछ भी हो सकता है लेकिन धर्म नहीं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि धर्म मानव की उस संवेदना और चेतना का शाश्वत विस्तार है जो चिंतन, जिज्ञासा, संवाद और सामूहिकता की प्रक्रिया को निरंतर जीते रहने से सिद्ध होता है।

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