ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
देवनागरी या रोमन हिंदी?
01-Feb-2019 02:50 PM 2329     

एक बार फिर देवनागरी बनाम रोमन चर्चा में है। इस कंप्यूटर-टैबलेट-मोबाइल के युग में अक्सर यह बात जोर-शोर से उठाई जाती है कि अपनी हिंदी की लिपि देवनागरी की जगह रोमन क्यों नहीं अपनाई जाए। प्रथम दृष्टया यह मुझे सांस्कृतिक हमला नज़र आता है, वह इस तरह कि मानो एक सभ्य, सुंस्कृत प्रौढ़ भारतीय महिला को कोई जीन्स-टॉप के फायदे गिनाते हुए साड़ी पहनना छोड़ने की बात कह रहा हो। रोमन हिंदी की वकालत करने वाले इसे दकियानूसी बात कह सकते हैं, पर उनके लिए इतना ही कहा जा सकता है कि आक्रमकता के साथ अपनी धारणा को थोपना भी दकियानूसी ही है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की एक सम्यक विकास परम्परा रही है और अब तक ये अपनी-अपनी लिपियों की बदौलत फलती-फूलती आयी हैं। इतना ही नहीं अपनी-अपनी लिपियों में लिखी गई भारतीय भाषाओं के साहित्य का समृद्ध भंडार है, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत है। ज़्यादा पठनीयता अर्थात् बाज़ार के दवाब में अगर इनकी लिपियों को छोड़कर रोमन मानक तय कर लिया जाए, तो इस महान विरासत का क्या होगा? क्या लिप्यान्तरण या अनुवाद से किसी कृति की आत्मा अक्षुण्ण रह पायेगी? यह चिंता का विषय है।
हिंदी देवनागरी लिपि में ही फल-फूल सकती है। यह महज नारा नहीं है, बल्कि इसके समर्थन में तथ्यपरक बातें हैं। इससे पहले कि इस विषय पर विचार करें, हम कुछ भाषा संबंधी पहलूओं को जान लेते हैं। विदित हो कि भाषा, चाहे कोई भी हो, लिखित या मौखिक रूप में सूचनाओं का कूट संकेतीकरण और विसंकेतीकरण ही है और लिपि भाषा के संकेतों को कूट (लिखित) रूप में व्यक्त करने का माध्यम है। भाषा की ध्वनि को लिपिबद्ध करने की पद्धति को वर्णविन्यास या वत्र्तनी विज्ञान (ऑर्थोग्राफी) कहा जाता है। साथ ही, भाषा की ध्वनि इकाई को हम स्वनिम (फोनेम) और लिखित इकाई को वर्णिम (ग्राफीम) या संयुक्त वर्ण के नाम से जानते हैं। जब वर्णिम (संयुक्त स्वर-व्यंजन वर्ण) अर्थात् लिखित इकाई और स्वनिम अर्थात् ध्वनि इकाई का परस्पर एकल सम्बन्ध होता है, यानि जब उच्चारण के अनुरूप वत्र्तनी होती है; तब ऐसी भाषा को स्वनिम आधारित (फोनेमकि) भाषा कहते हैं। कतिपय पूर्वी यूरोपीय और भारतीय भाषाओं में स्वनिम और वर्णिम के मध्य अनुरूपता है, जबकि मूलतः जर्मन और रोमन भाषाओं के लिए प्रयुक्त लैटिन या रोमन लिपियों में इसका सर्वथा अभाव है।
रोमन लिपि मूलतः अल्फाबेटिक (अल्फा बीटा...) लेखन पद्धति है, जिसमें प्रत्येक वर्णिम मात्र स्वर या व्यंजन हैं, जबकि देवनागरी लिपि एक आबूगीदा लेखन पद्धति है, जिसमें प्रत्येक वर्णिम एक व्यंजन या व्यंजन रहित होता है, किन्तु स्वर वर्णों की उपस्थिति आवश्यक होती है। उदाहरण के लिए, देवनागरी लिपि में "क" के व्यंजन और "ए" के स्वर को एक ही इकाई में मिलाकर "के" लिखा जाता है, जबकि रोमन जैसी अल्फाबेटिक पद्धति में ऐसा संभव नहीं है। हालाँकि, रोमन लिपि को एक कारण से यह फायदा मिलता है कि इसमें कम वर्णों से ही काम चल जाता है; वहीं दूसरी ओर उच्चारण और वत्र्तनी के बीच अनुरूपता नहीं होने की वजह से सुनकर लिखने में कई भ्रांतियाँ जन्म लेती है और शब्दों का मानकीकरण परम्परा पर आश्रित होते हुए अवैज्ञानिक हो जाता है। एलिजाबेथियन अंग्रेजी और अमेरिकन अंग्रेजी के कतिपय शब्दों की वत्र्तनी में अंतर होना इसका प्रमाण है। पुनश्च, मूलतः संस्कृत के तत्सम शब्दों पर आधारित हिंदी जैसी भाषा में श्रुतिसम-भिन्नार्थक शब्दों की भरमार है; अतएव हिंदी शब्दों और उनके अर्थों की शुद्धता बनाए रखने के लिए देवनागरी जैसी आबूगीदा लेखन पद्धति का होना अनिवार्य है।
अब चूँकि रोमन और देवनागरी - दोनों लिपियों का विकास प्राकृतिक रूप से अपनी-अपनी भाषागत ज़रूरतों के हिसाब से हुआ है, अतएव यह कहना बेईमानी है कि रोमन लिपि सीखने में आसान और देवनागरी कठिन है। भाषा और लिपि के बीज बचपन में बोए जाते हैं, क्योंकि तब कोमल मति होती है और इसलिए सीखना आसान होता है। अगर बचपन से ही दो-तीन लिपियों के संस्कार दिये जाएँ, तो यह परस्पर भेदभाव और स्वार्थपरता की बात ही नहीं उभरेगी। फिर, ऐसा नहीं है कि रोमन जैसी अल्फाबेटिक लिपि को जानने वाले देवनागरी जैसी आबूगीदा पद्धति आत्मसात् नहीं कर सकते हैं। हाँ, सीखने में समय लग सकता है; जो मनोत्साह पर आधारित और पूर्वाग्रह त्यागने की बात है।
इतना ही नहीं, देवनागरी लिपि की वर्णमाला अत्यंत सुविचारित और वैज्ञानिक है जो इसे अनूठा बनाती है। इस वर्णमाला में स्वरों के बाद ही व्यंजनों का स्थान है, क्योंकि व्यंजनों का उच्चारण स्वरों की सहायता से ही सम्भव होता है। इस लिपि में कोई स्वर-व्यंजन संकर वर्ण नहीं है। स्वरों में भी शुद्ध स्वरों का स्थान पहले आता है। व्यंजनों के आयोजन में भी अत्यंत सूक्ष्मता है। व्यंजनों को तीन क्रमागत स्थान दिया गया है - स्पर्श व्यंजन, अन्तःस्थ व्यंजन और ऊष्म व्यंजन। स्पर्श व्यंजनों को ही वर्ग-व्यंजन (कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग) कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक वर्गों के अंतर्गत आनेवाले व्यंजनों का उच्चारण स्थान एक है। यथा, कवर्ग (क ख ग घ ङ) का उच्चारण स्थान कंठ है। इसी तरह, चवर्ग (च छ ज झ ञ) का उच्चारण तालु से, टवर्ग (ट ठ ड ढ ण) का मूर्धा से, तवर्ग (त थ द ध न) का दंत से और पवर्ग (प फ ब भ म) का उच्चारण ओष्ठ से होता है। इसके अलावे, प्रत्येक वर्ग के व्यंजन अल्पप्राण और महाप्राण के क्रम में व्यवस्थित हैं। सभी वर्गों के अंतिम वर्ण (ङ ञ ण न म) अनुनासिक हैं, अर्थात् इनका उच्चारण अपने वर्ग के उच्चारण स्थान के अतिरिक्त नासिका से भी होता है। फिर, सभी वर्गों के प्रथम दो व्यंजनों का उच्चारण कठोर होता है, जबकि अंतिम तीन व्यंजनों का उच्चारण कोमल होता है। इस लिपि में वर्ग व्यंजनों के बाद अन्तःस्थ और ऊष्म व्यंजनों की व्यवस्था की गई है।
अगर सूक्ष्म विवेचन करें, तो यह ज्ञात होता है कि मानव शरीर में ध्वनि के संचरण के लिए स्वर-यंत्रों का क्रम - कंठ, तालु, मूर्धा, दंत और ओष्ठ है। इसी क्रम में कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग का व्यवस्थित करना भारतीय मनीषा के श्रेष्ठतम होने का परिचायक है। इतना ही नहीं, सभी स्वर, अन्तःस्थ और ऊष्म व्यंजन भी इन्हीं स्वर-यंत्रों के क्रम में व्यवस्थित किए गए हैं।
अब प्रश्न उठता है कि हमारे पूर्वजों ने इतनी सूक्ष्म और वैज्ञानिक व्यवस्था क्यों गढ़ी। इसका उत्तर है - ताकि भारत की समृद्ध श्रुति-स्मृति परम्परा को शुद्ध रूप में अक्षुण्ण रखा जा सके। क्या यह हम हिंदी प्रेमियों का यह दायित्व नहीं है कि हम हिंदी की समृद्ध परम्परा और धरोहर को बचाये रखें? स्मरण रहे, अगर देवनागरी मृतप्राय होती है, तब न तो हिंदी बचेगी और न हिंद संस्कृति ही।

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