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देश को खोकर कविता
01-Oct-2017 01:15 PM 2810     

आज सुकवि की मुश्किल यह है कि वह मानुषी जनतंत्र की माया के सामने
इतना निहत्था और असहाय है कि वह किससे शिकायत करे।

मूर्खो, देश को खोकर ही मैंने प्राप्त की थी यह कविता --दूर दिल्ली से श्रीकान्त वर्मा की आवाज सुनाई देती है -- मगर खबरदार, मुझे कवि मत कहो। झूठे हैं समस्त कवि। धन्य-धन्य, ओ नकली कवियों के वसन्त में डूबी वसुन्धरा। जिज्ञासाहीन अंधकार में कीचड़ की शय्या पर स्वप्न देखती हुई वसुन्धरा मनुष्य उगल रही है नगर फेक रही है। जन्म पर पछता रहे हैं पालनों के शिशु। टोकरी के नीचे छिपे मुर्गों के मसीहा कवि बाँग दे रहे हैं, सुबह हुई... चली जा रही हैं दो बूढ़ी औरतें रसातल की ओर -- सभ्यता और संस्कृति। मैं क्या करूँ, क्या जीने की कोशिश में किसी और दुनिया में जा मरूँ? मैं अपनी विफलताओं का प्रणेता हूँ, मैं अपनी करतूतों का दरोगा हूँ, एक रोजनामचा हूँ, मुझमें मेरे अपराध हू-ब-हू कविताओं-से दर्ज हैं। मैं बकता नहीं हूँ कविताएँ ईजाद करता हूँ गाली... मुझसे बरदाश्त नहीं होतीं देशभक्त कवियों की कविताएँ। चेचक और हैजे से मरती हैं बस्तियाँ, कैंसर से हस्तियाँ, वकील रक्तचाप से, कोई नहीं मरता अपने पाप से। अपना देश खोकर कई देश लाँघ पहाड़ से उतरती हुई चिड़ियों का झुण्ड यह पूछता हुआ ऊपर-ऊपर गुजर जाता है -- कहाँ है तुम्हारा घर? -- अपने जमाने की अप्रिय दुनिया में अपने प्रिय कोने की खोज -- रोज-रोज... कुछ भी नहीं याद, केवल रामायण की पोथी पर जमी हुई धूल-सा इकट्ठा है पुरखों का अवसाद... मेरा विश्वास जो मेरी परछाईं की तरह मेरे संग था, छोड़कर चला गया...
श्रीकान्त वर्मा संसार के मायादर्पण में अपना चेहरा देखते हैं और अनुभव करते हैं कि वे अपनी विफलताओं के प्रणेता हैं -- और जो उनसे नहीं हुआ वह उनका संसार नहीं। उनकी शिकायत अपने आपसे उतनी नहीं जितनी संसार से है, जिसके कारण कवि एक रोजनामचा बनकर रह गया है और जिसकी कविताएँ अपराधों की सूची जैसी लगती हैं। पहले के कवि ईश्वर के प्रजातंत्र में उसकी रची माया से त्रस्त होकर उसी से शिकायत करते थे -- मैं केहि कहौं बिपति अति भारी -- यह विपत्ति अपने ही हृदय पर थी जो ईश्वर का घर है जहाँ तम-लोभ-मोह-अहंकार-मद और क्रोध इस घर को लूट रहे हैं। कवि को अपार चिन्ता है कि इनके कारण मेरा बोध डूब रहा है और इसीलिए तुम्हारा घर लुट रहा है।
पर आज सुकवि की मुश्किल यह है कि वह मानुषी जनतंत्र की माया के सामने इतना निहत्था और असहाय है कि वह किससे शिकायत करे। आखिरकार कविता कवि का प्रेस वक्तव्य बनने लगती है, वह अपराधबोध और पापबोध की विनय-पत्रिका नहीं बनती, गाली ईजाद करती है, उस सत्ता और सभ्यता के खिलाफ जिसे जन रचते हैं और जिसकी ओट में सबके पाप छिपाये जा सकते हैं -- कोई नहीं मरता अपने पाप से। अनुभव में यही आता है कि संसार अपनी जन्मजात प्रकृति के अनुरूप कभी विफल नहीं होता पर संसार के मायादर्पण में कवि का चेहरा अपनी ही विफलताओं के प्रणेता के रूप में उभरता है।
असहाय होते जाते कवियों के बीच रघुवीर सहाय की आवाज भी सुनायी देती है -- अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ / और आप कहते हैं कि कविता की है / क्या मुझे दूसरों की तोड़ने की फुर्सत है?
आत्महत्या के विरुध्द रघुवीर सहाय की ज्यादातर कविताएँ प्रेस-वक्तव्य सरीखी ही जान पड़ती हैं -- हर संकट भारत में एक गाय होता है, ठीक समय ठीक बहस नहीं कर सकती है राजनीति, बाद में जहाँ कहीं से भी शुरू करो, बीच सड़क पर गोबर कर देता है विचार... आज भाषा ही मेरी एक मुश्किल नहीं रही, एक मेरी मुश्किल जनता है जिससे मुझे नफरत है सच्ची और निस्संग, जिस पर कि मेरा क्रोध बार-बार न्यौछावर होता है... अब नहीं हो सकता कोई लेखक महान, पहले तो बामन होंगे फिर ठाकुर होंगे फिर... गाँव में दिया जन-जन को विश्वास नेकराम नेहरू ने कि अन्याय आराम से होगा आमराय से होगा, नहीं तो कुछ नहीं होगा गाँव का... संसद एक मंदिर है जहाँ किसी को देशद्रोही कहा नहीं जा सकता... संघ रहे संघ रहे उसने कहा भारत का, चाहे हर भारतीय हर भारतीय का गुलाम रहे... बीस बर्ष खो गये भरमे उपदेश में, एक पूरी पीढ़ी जन्मी पली-पुसी क्लेश में, बेगानी हो गयी अपने ही देश में... दल का दल पाप छिपा रखने के लिए एकजुट होगा, जितना बड़ा दल होगा उतना ही खायेगा देश को... बाँध में दरार, पाखण्ड वक्तव्य में, घटतौल न्याय में, नीति में टोटका, अहंकार भाषण में, आचरण में खोट... घुटन को समझो अपनी कि भाषा कोरे वादों से, वायदों से भ्रष्ट हो चुकी है सबकी, न सही यह कविता यह मेरे हाथ की छटपटाहट सही... कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा, न टूटे-न टूटे तिलिस्म सत्ता का मेरे अंदर एक कायर टूटेगा...
हिन्दी कविता में रघुवीर सहाय जनता से सच्ची और निस्संग नफरत करने वाले अकेले कवि हैं। वे मानते हैं कि मैं भीड़ का कायल तो नहीं पर लोकतंत्र में विराट भीड़ों के समाज को बदलने के लिए फिलहाल भीड़ ही एक साधन है जो अधूरी, टूटी, नकली, मिलावटी और मूर्ख सत्ता स्थापित करती है। उनकी दृष्टि में यह एक कवि का संकटकालीन रवैया है जिसके कारण वे बदमाशों, गधों, आधे पागलों और मक्कारों के लिए एक जिम्मेदारी महसूस करते हैं। वे उन्हें उनके हाल पर नहीं छोड़ना चाहते बल्कि उनकी गहन आलोचना के आईने में उन्हें उनका चेहरा दिखाना चाहते हैं वे अपने कविकर्म में अपने कवि की मूर्ति तो ढहाते ही हैं, कविता को भी ढहाकर उसे एक प्रेस वार्ता के शिल्प में गढ़ते हैं। वे लोकतंत्र के दुख को रोज समझने वाले कवि हैं और यह दुख रोज-रोज रचा नहीं जा सकता। पर किसी तरह कहना तो पड़ेगा। किसी न किसी तरह कहने की अकुलाहट ही रघुवीर सहाय की कविता का शिल्प बन जाती है। ऱघुवीर सहाय ही तो कह गये कि -- अरे अब ऐसी कविता लिखो कि कोई मूड़ नहीं मटकाय, न कोई पुलक-पुलक रह जाय न कोई बेमतलब अकुलाय।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कविता की साधना को भावयोग कहा था जिसे पहले के कविगण प्रकृति की अँगनाई में साधते थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समय यूरोप और भारत की सभ्यता समीक्षा करते हुए महात्मा गांधी ने सबको पालने-पोसने वाले प्रकृति के आदि स्वभाव को फिर से रेखांकित किया था और चेताया था कि यूरोपीय सभ्यता के बुध्दि-विधान मनुष्य को उस भाव-विधान से दूर लिए चले जा रहे हैं जो प्रकृति के आँगन को सूना करके नहीं साधा जा सकता। आधुनिक सभ्यता के रचनाकार बिना किसी भय और निर्लज्जता से जगत काव्य को मिले ऋतुओं के उपहारों को लूट रहे हैं और कविता का घर उजड़ रहा है। वह दुनिया उजड़ती चली गयी है जिसकी कविता में जीवन टिक सकता था पर अब जो दुनिया है उसमें कविता ही नहीं टिकती। रघुवीर सहाय अपनी ही उन पिछली कविताओं को याद करते हैं जिनकी सीढ़ियों पर धूप थी --
जो अब सच होता जाता है वह पहले ही कह आये थे
फिर से वह दर्द जगाती हैं ये अपनी पिछली कविताएँ।
जिस सच को हमने खोजा था उतने थोड़े-से अनुभव में
कुछ और जिन्दगी जी आये उस एक सचाई की रौ में
आगे भी राह दिखाती हैं ये अपनी पिछली कविताएँ।
महाप्राण कवि हुए हैं। उन्नत और संयत प्राणों से कविता अभी भी रची जा सकती है पर देखते ही देखते कवि अशान्त प्राण होने लगे। उन्हें लगता है कि जैसे कवि के देशकाल में बसी दुनिया को खाली करके किसी ऐसी दुनिया में बसाया जा रहा हो जहाँ कविता अपना घर न बना सके और कवि निर्वासित हो जाये। सारी पृथ्वी को संतोष की कविता की तरह अनुभव करने वाले कवि श्रीकान्त वर्मा को यह क्यों लगने लगता है कि -- दुनिया की मिट्टी में दबा हुआ अपने को ही खोद रहा हूँ। -- कैसी भी दुनिया हो, हर दुनिया में कवि की चाह अपने आपको बार-बार पाने की होती है। कोई दुनिया कवि के हुए वगैर हो नहीं सकती। दुनिया कैसी थी, यह कवि के अलावा कोई और कैसे बता सकता है। पर कवियों को कविता से उम्मीद नहीं रहे तब? कवि धूमिल कविता में जाने से पहले पूछते हैं -- इस ससुरी कविता को जंगल से जनता तक ढोने से क्या होगा, आपै जवाब दो मैं इसका क्या करूँ, तितली के पंखों में पटाखा बाँधकर भाषा के हलके में कौन-सा गुल खिला दूँ। धूमिल की कविताओं में बयानों के अलावा कुछ और ढूँढे नहीं मिलता। वे कविता और भाषा के बारे में सबसे ज्यादा बयानबाजी करने वाले कवि हैं। वे कहते हैं -- कविता घेराव में किसी बौखलाये हुए आदमी का संक्षिप्त एकालाप है... कविता इतने जिन्दा शब्दों के बावजूद हमलावरों के डर से खाली किये गये शहर की तरह दिखती है... कविता सिर्फ उतनी ही देर सुरक्षित है जितनी देर कीमा होने से पहले कसाई के ठीहे और तनी हुई गँडास के बीच बोटी सुरक्षित है... कविता शब्दों की अदालत में मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का हलफनामा है... कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है... और भाषा उस तिकड़मी दरिन्दे का कौर है जो सड़क पर और है, संसद में और है ... दरअस्ल, अपने यहाँ जनतंत्र एक ऐसा तमाशा है जिसकी जान मदारी की भाषा है ।
धूमिल कहते हैं कि -- एक सही कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है पर धूमिल तो अपनी अनेक कविताओं में निरर्थक वक्तव्य दिए चले जाते है, जैसे यही कि -- उसने जाना कि हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है और कविता हर तीसरे पाठ के बाद। वे लड़की, धर्मशाला और कविता -- तीनों को ही अपमानित करके कवि होना चाहते हैं। कहने की इच्छा होती है कि धूमिल के यहाँ कविता एक ऐसा तमाशा है जिसकी जान मदारी की भाषा है। दरअस्ल, धूमिल भाषा को कवि का पटवारी हलका और कविता को नक्सलवाड़ी मान बैठे हैं। वे भाषा को पटवारी की तरह बरतते हुए चाहे जिसके खाते में (मुँह पर) मनमाने ढंग से चढ़ा (मढ़) देते हैं, भले ही वह उसकी न हो। जंगल से जनता तक आती उनकी कविता सड़क पर आतिशबाजी के बाद के धुएँ की लकीरों-सी खो जाती है। वह किसी की हो नहीं पाती, उनके नाम की तरह धूमिल हो जाती है ।
गाली ईजाद करने और गरियाने में अन्तर है, बयान देने और मजमा लगाने में अन्तर है -- श्रीकान्त वर्मा कहते हैं -- मैं बकता नहीं हूँ कविताएँ। ऱघुवीर सहाय को अपनी कविताओं के लिए धूमिल की तरह किसी दूसरे प्रजातंत्र की तलाश नहीं है, जो है, वे उसी के प्रति जिम्मेदारी महसूस करते हैं। उनकी कविता अन्याय के उन रूपों का रेखांकन है जिसमें राजनीतिक सत्ता और समाज बराबर के भागीदार हैं। रघुवीर सहाय कविता में उस दुर्भाग्य की समझ विकसित करते हैं जिसके घेरे में लोग अपने आपको भूलकर रहने लगते हैं, अन्याय को ही न्याय मान बैठते हैं। उनकी कविताएँ अत्याचार के बीच कष्ट उठाने के मतलब को समझाती हैं, वे दुख के गौरव को बढ़ाने वाली कविताएँ नहीं हैं। लगता है कि जैसे रघुवीर सहाय हर आदमी को अकेला पाकर उसे अन्याय की समझ से परिपूर्ण करना चाहते हैं और हर अकेले आदमी को हर अकेले आदमी से मिला देना चाहते हैं।

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