ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लोकतंत्र और नौकरशाही
01-Apr-2018 02:30 AM 1304     

लोकशाही और नौकरशाही को लेकर इस समय देश और प्रदेशों की सियासत गरमाई हुई है। दिल्ली में केजरीवाल बनाम एलजी की राजनीतिक लड़ाई जगजाहिर है। विभिन्न प्रदेशों में लोकशाही और नौकरशाही के बीच जंग छिड़ी हुई है। आजादी के बाद हमारे संविधान निर्माताओं ने देश में जनतांत्रिक प्रणाली को स्वीकार किया था और एक लिखित संविधान का निर्माण कर इसे मान्यता दी थी। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र का मतलब है जनता के द्वारा जनता के लिए शासन। लोकतंत्र में शासन की बागडोर जनता के हाथ में होती है और जनता के प्रतिनिधि शासन प्रशासन की जनहितकारी नीतियों और विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाते हैं। लोकतांत्रिक प्रणाली में विधायिका और कार्यपालिका इसके प्रमुख स्तम्भों में से हैं। विधायिका नीतियों के निर्माण और लोक हितकारी योजनाओं के जरिये जनसाधारण के विकास के लिए आवश्यक कदम उठाती है वहाँ कार्यपालिका उसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए क्रियान्वित करती है। कहने का तात्पर्य है लोकतंत्र के ये दोनों अंग मिल बैठकर जन साधारण के विकास के कार्य करते हैं। यही हमारे अनूठे लोकतंत्र की विशेषता है।
मगर आजादी के 70 सालों के बाद भी विधायिका और कार्यपालिका में एकरूपता और सामंजस्य दिखाई नहीं दे रहा है। दोनों ही पक्षों में असंतोष की भावना व्याप्त हो रही है। कहीं खुले में तो कहीं अन्दरखाने भारी मतभेद के समाचार सुनने और पढ़ने को मिल रहे हैं जो लोकतंत्र के लिए किसी स्थिति में हितकारी नहीं कहे जा सकते। आजादी के बाद हमने अंग्रेजी शासन व्यवस्था की अनेक बातों को अपनाया जिसमें नौकरशाही भी एक है।
सरकार की योजनाओं और नीतियों को नौकरशाही (सरकारी अधिकारी-कर्मचारी) अमलीजामा पहनाने का कार्य करती है। नौकरशाही के माध्यम से गांव से शहर तक इन योजनाओं का क्रियान्वयन होता है। यह व्यवस्था हमने अंग्रेजों के शासन व्यवस्था से ही अंगीकार की थी।
विधायिका और कार्यपालिका की विस्तृत व्याख्या के बाद भी चहुंओर इसकी विफलता की चर्चा सुनने को मिलती है। दिल्ली में चुनिन्दा सरकार और उपराज्यपाल के मध्य अधिकारों की लड़ाई रोज ही मीडिया में सुर्खियों में रहती है। विभिन्न प्रादेशिक सरकारों में भी आये दिन होने वाले विवादों से समाचार पत्रों के पन्ने रंगे होते हैं। हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्तर पर नौकरशाही को प्रताड़ित करने से वहाँ की सियासत में जंग छिड़ी हुई है। दोनों ही प्रदेशों में भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा के अधिकारियों को कई बार निलम्बन का सामना करना पड़ा है। उत्तर प्रदेश में बाहुबली विधायकों और मंत्रियों की फौज के आपराधिक कृत्यों से नौकरशाही आतंकित है।
प्रायः यह देखा जाता है कि जन प्रतिनिधियों द्वारा नौकरशाही से उचित-अनुचित कार्य अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए येन केन प्रकारेन करवाये जाते हैं तो उस स्थिति में नौकरशाही भी स्वच्छन्द हो जाती है और जन प्रतिनिधियों की कमजोरी का लाभ उठाकर भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाती है। जनतांत्रिक व्यवस्था में जन प्रतिनिधियों की अहम भूमिका है और जन विकास के कार्य करवाने की उनकी महत्ती जिम्मेदारी और भागीदारी है। मगर जन विकास कार्यों में जनता के धन पर डाकेजनी करने से नौकरशाही भी बेलगाम हो जाती है। या तो दोनों मिलकर अपनी स्वार्थ सिद्धि करते हैं अथवा दोनों के मध्य भयंकर विवादों के उत्पन्न होने का खतरा मंडराता है।
लोकशाही और नौकरशाही निश्चय ही लोकतंत्र के दो प्रमुख स्तम्भ हैं। दोनों के कंधों पर लोकतंत्र की सफलता की जिम्मेदारी है। यदि नौकरशाही बेलगाम हुई तो यह जनतंत्र के लिए घातक होगा। दोनों पक्षों को जनता के प्रति अपनी-अपनी जवाबदेही समझनी होगी। तभी जनहितकारी योजनाओं और कार्यों को वास्तविक रूप में क्रियान्वित किया जा सकता है।

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