ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
देखणा सो भूलणा नहीं
CATEGORY : जन्नत की हकीकत 01-Feb-2017 12:30 AM 720
देखणा सो भूलणा नहीं

जीव का मूल स्वभाव है जिज्ञासा। यह उसकी मूलभूत जैविक आवश्यकताओं के कारण भी हो सकती है और मानसिक व वैचारिक ज़रूरतों के तहत भी। यह जिज्ञासा ही जीव को घुमाती है, सिखाती है और भटकाती भी है। परिस्थितिवश यह भाव कम-ज्यादा होता रहता है। जब मानव घुमंतू था तब भ्रमण का यह भाव सब में समान रूप से पाया जाता था लेकिन जैसे-जैसे कृषि, उद्योग आदि के विकास के कारण जीवन शैली और सुख-सुविधाओं में अंतर आता गया उसके अनुसार विभिन्न समाजों में यह प्रवृत्ति प्रभावित होती रही है।
प्राचीन काल में नदी घाटी सभ्यताओं में कृषि की पर्याप्त सुविधाएँ होने के कारण वहाँ के निवासियों ने कृषि योग्य भूमि के लिए भ्रमण, पलायन या आगे चलकर उपनिवेश कब्जाने का काम कम किया बनिस्पत ठंडे और बंजर इलाकों के लोगों के। भारतीयों का भ्रमण तीर्थयात्रा, देशाटन और अंतर्देशीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए अधिक हुआ।
बुद्ध, महावीर, नानक की यात्राएँ सांस्कृतिक और वैचारिक यात्राएँ थीं। गाँधी जैसे नेताओं ने देश की स्वाधीनता के लिए उसे एक सूत्र में बाँधने के लिए यात्राएँ कीं लेकिन राहुल सांस्कृत्यायन जैसे शुद्ध जिज्ञासु भ्रमण-कत्र्ता बहुत कम हुए हैं। योरप और अरब देशों के निवासियों में कम सुविधाजनक परिस्थितियों से निजात पाने के लिए साहसिक अभियानों की संख्या सर्वाधिक मिलती है। अमरीका में गए लोग स्वतंत्रता, समृद्धि के अन्वेषी थे। उनके जीवन में यह भाव आज भी मिलता है।
इसी भाव के तहत देखा जाए तो अमरीकी मजबूरी में ही घर के अन्दर बैठता है। अधिकतर इलाका ठंडा है इसलिए सर्दियों में बाहर निकलना कम होता है जिसकी कमी वे गर्मी के लम्बे दिनों में अधिक से अधिक घूम कर करना चाहते हैं। जब चाहे भरी दुपहरी में भी लोग जोगिंग करते मिल जाएँगे। गर्मियों की छुट्टियाँ तीन महीने की होती हैं। इसलिए हर सप्ताहांत चिड़ियाघरों, साइंस सेंटरों, पर्यटन स्थलों में बहुत भीड़ रहती है। साइंस सेंटरों में विज्ञान के बहुत से सिद्धांत वर्किंग मोडल्स के द्वारा बहुत अच्छी तरह से समझाए गए हैं। यहाँ बहुत कम समय और खर्च में और मज़े-मज़े में विज्ञान का शिक्षण हो जाता है। चिड़ियाघरों और अन्य पर्यटन स्थलों में सभी जानकारी बहुत ही व्यवस्थित और वैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत की गई होती है। हमारी तरह नहीं कि ऐसे स्थलों में केवल टिकट का पैसा वसूलने का ही उद्देश्य रहता है। सुविधाओं और प्रस्तुतीकरण के नाम पर सर्वत्र प्रमाद और गैरजिम्मेदारी। उदाहरण के लिए कुरुक्षेत्र में महाभारत का जो पैनोरामा बनाया गया है उसके प्रस्तुतीकरण और व्यवस्था से उनकी तुलना करके समझा जा सकता है। देखने के अनुभव को पूर्ण बनाने से ज्ञान और शिक्षण का आधे से अधिक काम तो अपने आप ही पूर्ण हो जाता है।
अमरीका में ये स्थान बहुत बड़े पैमाने पर बड़ी पूंजी लगाकर बड़े व्यापारिक समूहों द्वारा बनाए जाते हैं। इन स्थानों पर पार्किंग के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों के लिए भी पर्याप्त स्थान और सुविधाओं का प्रावधान रहता है। पुस्तक में कोई भी लाख सुन्दर चित्र देख ले, विस्तृत वर्णन पढ़ ले लेकिन पूरा-पूरा और पक्का समझ में नहीं आता। तभी वनस्पति विज्ञान के विद्यार्थियों को विशेष रूप से विभिन्न वनस्पतियाँ दिखाने के लिए यात्राएँ करवाई जाती हैं।
हमारे यहाँ गुरु-शिष्य इस विधा में कितनी रुचि लेते हैं यह किसी से छुपा नहीं है लेकिन यह सच है कि एक बार अपनी आँखों से किसी वनस्पति को देख लेने से कुछ मिनटों में ही बिना लिखे और बोले सब ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इसलिए भ्रमण का शिक्षा में बहुत महत्त्व है। यही बात किसी समाज के बारे में है। उसके साथ रहे बिना, दूर-दूर से पूर्वाग्रह ही पनपते हैं। इसलिए सच्ची वैश्विक एकता के लिए भी पहले अपने आसपास, फिर अपने प्रदेश-देश और अंततः (विश्व-भ्रमण) का महत्त्व असंदिग्ध है।
जब अमरीका के लोग किसी स्थान के भ्रमण के लिए जाते हैं तो पूरे दिल और दिमाग से जाते हैं। उस समय के लिए वे तन-मन-धन से उसके हो जाते हैं और इसीलिए भ्रमण उनके लिए सकारात्मक परिवर्तन का कारण बनता है। वे उस समय को पूरी तरह जीते हैं। उस समय उनके मन में किसी जाति-धर्म, लोक-परलोक, पाप-पुण्य का गणित नहीं चलता। वे वहाँ उससे संबंधित अपनी सभी जिज्ञासाओं का शमन चाहते हैं और उनके पर्यटन स्थलों में इस प्रकार की व्यवस्था भी होती है। वहाँ सभी संबंधित जानकारी बहुत शोध और सूझ-बूझ से जुटाई जाती है। किसी भी स्थान से संबंधित जानकारी देने वालों की भी व्यवस्था रहती है। सभी स्थलों पर सभी प्रकार की सुविधाएँ रहती हैं। यह ठीक है कि कुछ भी मुफ्त नहीं है लेकिन यह भी नहीं है कि आपको अपने भुगतान के बाद भी उपयुक्त सेवा न मिले।
बच्चों के लिए साइंस सेंटर, चिड़ियाघर, पुस्तकालय, अजायबघर, मनोरंजक स्थल जैसे डिज्नीलैंड, यूनिवर्सल स्टूडियो आदि बहुत रोचक और ज्ञानवद्र्धक हैं। प्राकृतिक स्थल जैसे नियाग्रा फाल्स, ग्रेट कैनियन आदि स्थानों पर सभी प्रकार की सुचारु व्यवस्था है। सामान्यतया दुर्घटनाएँ नहीं होतीं। वहाँ ऐतिहासिक स्थल बहुत कम हैं क्योंकि देश ही पाँच सौ साल पुराना है। फिर भी जो कुछ दो-चार सौ साल पुराना है उसका प्रस्तुतीकरण बहुत बढ़िया है। हमारे देश में जितने पुराने स्थल और जीवन की जितनी विविधताएँ हैं यदि उनके वहाँ होतीं तो पता नहीं वे क्या कर देते। किसी भी चीज, विचार, स्थल आदि का व्यापार करना तो कोई अमरीका से सीखे।
अमरीका में आज भी बच्चों को हमारी तुलना में रटाने की बजाय जीवन को छूने, अनुभव करने और जीने की शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाता है। इसलिए वहाँ के लोग किसी भी वस्तु, भाव और विचार को अधिक शिद्दत से जीते हैं। इसीलिए वहाँ के लोग साहसिक पर्यटन का भी भरपूर आनंद लेते हैं। हमारे जीवन में नौकरी के लिए अपने को तैयार करने में ही सारी शक्ति और साधन खर्च हो जाते हैं। वहाँ के लोगों और छोटे-छोटे बच्चों को साहसिक खेल और पर्यटन का आनंद लेने के लिए तैरना, स्केटिंग जैसे शारीरिक विकास और संतुलन वाले खेल बचपन से ही सिखाए जाते हैं। माता-पिता अपनी जेब से पैसा खर्च करके भी बच्चों को विभिन्न खेल और कलाएँ सिखाते हैं जिससे बच्चे जीवन का अधिकाधिक आनंद ले सकें। वे संगीत का आनंद भी वास्तव में लेते हैं। यही कारण है उनमें कुंठाएँ कम हैं।
भारत मूल के लोग भी अपने बच्चों को इस प्रकार की विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने के लिए ले जाते हैं लेकिन इसमें भी वे अपने गणित को नहीं भूलते क्योंकि वहाँ विभिन्न व्यावासायिक महाविद्यालयों में भारत की तरह प्रवेश परीक्षा नहीं होती बल्कि पुस्तकीय परीक्षा के अतिरिक्त अन्य गति-विधियों और सामुदायिक कामों में सहभागिता को भी प्रवेश में प्राथमिकता देने का आधार बनाया जाता है। इस कारण ही सही अमरीका में रहने वाले भारतीय बच्चों को भारत में रहने वाले बच्चों की अपेक्षा जीवन को बहुआयामी बनाने के अधिक अवसर मिल जाते हैं।
कुछ गोरे-काले अमरीकी  लोग तो अपना ट्रक लेकर ही निकल पड़ते हैं देशाटन के लिए जिसमें छोटी सी रसोई और सोने की व्यवस्था होती है। होटल का किराया नहीं देना पड़ता। जहाँ  चाहो पड़ाव डालो, घूमो और फिर आगे चल पड़ो। जहाँ ऐसे ट्रकों को पार्क किया जाता है वहाँ सीवर और बिजली के कनेक्शन होते हैं और खाना तो उनका लगभग डिब्बा खोलो, गरम करो और खाओ वाला ही होता है। हमारी तरह पैसा बचाने के लिए हर चीज घर से लेकर नहीं चलते। उनका भ्रमण का अनुभव वास्तव में अनुभव होता है और बहुत से लोग तो, यहाँ तक कि बच्चे भी अपने अनुभव तरह-तरह से नोट करते हैं जो उन्हें अभियक्ति में भी सक्षम बनाता है जो अपने आप में एक प्रकार की भाषा और ज्ञान को व्यवस्थित करने की शिक्षा है।
तीर्थस्थान तो वहाँ हैं नहीं, इसलिए पाप माफ़ करवाने और स्वर्ग के लिए ईश्वर और उसके प्रतिनिधियों को खुश करने के लिए मृत्यु से पहले चार धाम जाने की औपचारिकता निभाने की मजबूरी नहीं है।
अनुभवों और ज्ञान के लिए थोड़ा साहस, थोड़ा त्याग, थोड़ा बेहिसाब होना बहुत ज़रूरी है। और फिर "बही लिख-लिख के क्या होगा"?

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