ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
देशाटन का आनंद है अलग
CATEGORY : नजरिया 01-Aug-2016 12:00 AM 743
देशाटन का आनंद है अलग

भारत की संस्कृति एक आत्मसंबद्ध निरंतर संस्कृति है इसलिए यहां का हर क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से हर दूसरे क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। हम देश के दूसरे इलाके में भोजन करते हैं, तो हम नए स्वाद का अनुभव करने के साथ देश की एकता को भी चख लेते हैं।
देश घूमना चाहिए। देशाटन बड़ा पुराना शब्द है और भारत में समय-समय पर व्यवहार में लाया जाता रहा है। कई कहानियों में यह पढ़ा जा सकता है कि फलां व्यक्ति देशाटन के लिए निकल गए या फलां साधु पूरे देश का चक्कर लगा आए। नदियों की परिक्रमा करने का भी हमारे देश में पुराना रिवाज है नर्मदा परिक्रमा पर लोगों ने बहुत सोचा है और सैकड़ों लोग शताब्दियों से यह परिक्रमा करते रहे हैं।
भक्तिकाल में यह रिवाज बहुत अधिक हुआ कि लोग विशेषकर साधु, फकीर या कवि देश घूमने निकल जाया करते थे। मीराबाई जिस "साधु संगत" की चर्चा अपनी कविताओं में करती हैं, वह इसलिए हो पाती थी, क्योंकि उन दिनों यह परिपाटी थी कि साधू लोग खुद को जानने की प्रक्रिया में देश के विभिन्न इलाकों में घूमा करते थे। स्वाभाविक भी है आंतरिक प्रकृति को जानने की प्रक्रिया में मनुष्य बाह्य प्रकृति को जानने की कोशिश करता है। बाह्य प्रकृति को मनुष्य की अपनी आंतरिक प्रकृति की निरन्तरता में देखने की परिपाटी भारत में बहुत पहले से है। मेरे एक मलयालम कवि मित्र हैं, विनयचन्द्रन। विचित्र किस्म के व्यक्ति हैं। वैसे भी कवि स्वभाव व्यक्ति थोड़ा सा उखड़ा हुआ ही होता है, पर विनयचन्द्रन पूरी तरह से उखड़े हुए व्यक्तित्व हैं। वे अपने घर में भी इस तरह रहते हैं मानों किसी सराय में डेरा डाले हों। वे मुझे बता रहे थे कि कई बरसों पहले उन्हें सूझा कि क्यों न देशाटन किया जाए। उन्होंने आव देखा न ताव, साधु हो गए और तुरन्त ही साधुओं की टोलियों के साथ देशाटन करने लगे यानी देश में एक जगह से दूसरी जगह भटकने लगे। वे यह लगभग दो बरसों तक करते रहे। यह करते हुए उन्होंने लगभग सारा देश घूम लिया। वे लौटकर त्रिवेन्द्रम आए और समूचे देश को अपने भीतर लेकर रहने लगे। मैं विनयचन्द्रम जितना साहसी न हो पाया, साधु बनकर देश घूमने का कोई भी अवसर मिलता है, मैं छोड़ता नहीं। वैसे तो विदेश घूमने में भी पर्याप्त आनन्द मिलता है पर देश घूमने की बात ही कुछ और है।
अगर आप पेरिस की सड़कों पर घूम रहे हैं, तो आपको नवीनता का सुख तो मिलेगा, पर इस नवीनता के अंतस में प्रवाहित आत्मीयता तक पहुंचने में आपको वर्षों लग जाएंगे, पर अगर आप असम की गलियों में भटक रहे हैं, तो आपको नवीन और आत्मीयता दोनों का ही एक साथ अनुभव होगा। चूंकि भारत की संस्कृति एक आत्मसंबद्ध निरन्तर संस्कृति है, इसलिए यहां का हर क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से हर दूसरे क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। यह सच है कि हर क्षेत्र के अपने विशिष्ट सांस्कृतिक रूपाकारों से जुड़े हुए हैं। सांस्कृतिक रूपाकारों के इस वैशिष्ट्य और जुड़ाव के कारण जब भी आप देश के किसी भी दूसरे इलाके में जाते हैं आपको नवीनता और आत्मीयता एक साथ अनुभव होती है, बल्कि यह कहा जाए कि आपको अलग-अलग तरह से आत्मीयता का अनुभव होता है। इसीलिए मुझे विदेश भ्रमण की तुलना में देशाटन कहीं अधिक रोचक लगता है।
देश के हर नये इलाके में जाकर वहां के नृत्यों, काव्यों, संगीत, रंगकर्म, चित्रकला, पाकविद्या आदि में देश की साभ्यतिक स्मृति के संकेतों को खोजता और बूझता रहता हूं। आप सच मानिये यह काम बेहद दिलचस्प हुआ करता है। यह किसी अनजान भाषा में, अनजान मुंह से अपना नाम सुनने जैसा है। मैंने यह कड़ा नियम अपने लिए बना रखा है कि जब भी मैं देश या विदेश के किसी भी इलाके में जाऊँगा तो मैं वहां अपने यहां का याने मध्यप्रदेश का भोजन नहीं तलाशूंगा। मैं किसी भी नये इलाके में जाकर वही भोजन करूंगा जो वहां के लोग करते हैं। मैं इस नियम का पूरी कड़ाई से पालन करता हूं। मसलन में बंगाल जाकर गोभी की रसीली सब्जी खोजने की कतई कोशिश नहीं करता, मैं वहां पूरी रुचि से नाम बैगुन खाता हूं या माछमुड़ी को चखता हूं।
मैं बहुत दिनों तक कावालम नारायण पणिक्कर के रंगमंडल के लिए नाटक लिखने के सिलसिले में केरल के गांव और वहां की राजधानी तिरुअनन्तपुरम् में रहा हूं। मुझे बार-बार पणिक्कर जी की पत्नी, जिन्हें मैं अम्मा कहकर बुलाता हूं, उत्तर भारतीय भोजन खाने के लिए कहती थी, पर मैं हर बार विनयपूर्वक उन्हें यह कहकर मना कर देता था कि मुझे उत्तर भारतीय भोजन उत्तर भारत में ही अच्छा लगता है। केरल में मैं केरल का खाना ही खाता था। वहां जाने से पहले मुझे कई मित्रों ने यह कहकर डराया था कि वहां नारियल के तेल में खाना बनता है। यह सच भी था पर डराना गलत था। मुझे नारियल के तेल में पका केरल का खाना एक बार भी बुरा नहीं लगा। मुझे हर बार वह बेहद स्वादिष्ट लगता रहा। मैं बड़ी रुचि से नारियल के तेल में पकी सब्जियां, वहां का खास व्यंजन अवियल, अप्पम आदि खाता रहा। यह नया स्वाद जरूर था पर उसकी गहराई में एक गहरी आत्मीयता मुझे अनुभव होती थी। यह इस हद तक हुआ कि अब मैं नि:संकोच यह कह पाता हूं कि संभवत: भारत में सबसे अच्छा खाना केरल में और वो भी नारियल के तेल में बनता है। मेरे मित्र और सुप्रसिद्ध कन्नड़ उपन्यासकार यू.आर. अनन्तमूर्ति मानते कि भारत में तेल-रेखाएं हैं। यानी हम अगर चाहें तो भारत के विभिन्न इलाकों को वहां खाये जाने वाले तेलों के आधार पर जोड़ सकते हैं।
उदाहरण के लिए अगर हम पश्चिमी उ.प्र. से पूर्वी उ.प्र. की ओर चलें, तो हम पाएंगे कि मीठे तेल का व्यवहार धीरे-धीरे बदलकर सरसों के तेल के व्यवहार में बदल रहा है। और यह व्यवहार पश्चिम बंगाल के सुदूर इलाकों तक चलता चला जाता है। इसी तरह अगर आप केरल से उत्तर की ओर बढ़ें तो पाएंगे कि नारियल के तेल का व्यवहार धीरे-धीरे बदल रहा है।
इसी अर्थ में हमारे देश में तेल रेखाएं हैं। ये रेखाएं न सिर्फ हमारे भोजन के स्वाद को धीरे-धीरे नया करती चलती हैं, बल्कि यह भी सच है कि इन रेखाओं के कारण हमारे देश के विभिन्न इलाकों के भोजन एक-दूसरे से कहीं गहराई में जुड़े भी रहते हैं। इसीलिए जब हम देश के किसी दूसरे इलाके में भोजन करते हैं तो हम न सिर्फ एक नये स्वाद का अनुभव करते हैं, हम देश की एकता को भी चख लेते हैं

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