ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दवा दी न गयी, दर्द बढ़ा दिया
01-Sep-2017 03:44 PM 2044     

कोई भी दिवस बना कर मना लो, माँ-दिवस, बाप-    दिवस, भाई, बहन, दोस्ती, वेलेन्टाइन, आई लव यू दिवस! भैये ये रिश्ते नाते और प्यार के उद्गार, यानि भांति -भांति के दिवस कोई होली, दिवाली, क्रिसमस या ईद थोड़े ही है कि साल में एक बार मना लिया और छुट्टी पायी। अरे यार, रमज़ान तक हमारे मौज़ी भाई-बहन-मित्र, पूरे एक महीने तक मनाते हैं। अब आ गया हिंदी दिवस! क्यों जी! बस एक दिन हिंदी बोल कर रस्म पूरी कर दी और पूरे साल अंग्रेजी में गिटपिट करेंगे। यह भी कोई बात हुयी!
अच्छे भले गाँधी बाबा कह गये थे कि बच्चों, अंग्रेज़ों के साथ अंग्रेजी को भी हटाओ वरना आज़ादी तो आधी मिलेगी ही, तुम लोग पूरे गुलाम बने रहोगे। अब क्या किया जाये इन नेताओं का जो ज़हनी गुलामी से तो ग्रस्त हैं ही; साथ ही वे कुर्सी के लोभ से भी नहीं उबर पाये। बताओ तो -- कौन-सी बात मानी है इन्होने बापू की? ना अहिंसा की बात मानते हैं (संसद भवन में सबसे ज़्यादा हिंसा और तोड़ फोड़ कांग्रेसी करते हैं), ना सादगी की (नेहरू जी के कपड़े पेरिस से धुल कर आते थे)। ले दे कर एक खादी ज़रूर पहनते थे तो उसके भी दाम आसमान पर चढ़ा दिये। गरीब लोग अब स्वदेशी खादी की जगह विदेशी नायलॉन कर गुज़ारा करते हैं।
छोड़िये साहब, बात हो रही थी हिंदी की। देखो जी, हम भले ही उत्तर प्रदेश से हैं पर हिंदी भाषी हैं; किन्तु समूचा यूपी घूम कर (पर्यावरण के तहद नहीं, अब्बाजान के तबादले के कारण) यह समझ में आ गया कि हम जो हिंदी बोलते हैं वह तो सम्पूर्ण हिंदी का एक हिस्सा मात्र है। हमने मथुरा में बृज की हिंदी सुनी और बोली है। सूरदास तो हमारे बेहद प्रिय कवि हैं और हम उन्हें हिंदी का ही कवि मानते हैं। बिहार की भोजपुरी भी हिंदी ही है। याद है वो सुपर हिट भोजपुरी फिल्म -- गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबे? पूरे उत्तर भारत में चर्चित रही। पंजाबी फिल्म "बुड्ढा मिल गया" सभी हिंदी भाषियों ने देखी और खूब देखी।
इलाहबाद, लखनऊ, आगरा, गोरखपुर, देवरिया, शाहजहाँपुर, मुरादाबाद, जहाँ-जहाँ भी हम गये, हमें हिंदी एक नये रूप में सुनाई दी। मराठी, गुजराती, बंगाली, राजस्थानी आदि सभी भाषाओं में हिंदी के शब्द सुनाई देते हैं। अरे भैया भारत में ही नहीं, दक्षिण एशिया में भी अनेक स्थानों पर हिंदी प्रशस्त रूप में सुनाई और दिखाई देती है। बैंकॉक के हवाई अड्डे का नाम पता है? वो है "स्वर्णभूमि एयरपोर्ट" - जी हाँ शुद्ध हिंदी। श्रीलंका के प्रधानमंत्रियों के नाम सभी हिंदी से लिये हुये लगते हैं। उर्दू की लिपि भले ही अलग हो, बोलचाल में तो वो हिंदी ही है।
हमें तो एक बात समझ में नहीं आती कि भाषाओं को लेकर यह लड़ाई झगड़ा किस बात का है। भाषा सम्पर्क का एक ज़रिया है। इशारों की भाषा भी भाषा ही है। स्पर्श की भाषा भी भाषा ही है। प्राचीनकाल में चित्रों से काम चलाया जाता था। अब हम ध्वनि का इस्तेमाल करके और लिख के भाषा को भाषा बोलते हैं। कोई बतायेगा कि कितनी भाषा किसके पास है? सबके पास उतनी ही भाषा है जिसका इस्तेमाल करके हम, आप और सब अपना काम चला लेते हैं। भले ही वो कामवाली से आधी हिंदी और आधी कन्नड़, तमिल, तेलुगु, गुजराती, मराठी आदि का मिक्चर हो या दोस्तों के साथ टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलना हो। बस इतनी ही हमारी भाषा है। साहित्यकारों को कुछ अधिक शब्दों तथा वाक्यों की आवश्यकता होती है, अतः उनके पास कुछ अधिक भाषा होती है। तो ठीक है; हर प्रदेश का साहित्यकार रखे अपनी बोली की अमीरी अपने पास, आम जनता को क्यों झगड़े में घसीटते हो?
पता नहीं ये डर किसने बैठा दिया कि हिंदी दूसरी भाषों पर लादी जा रही है। अरे भाई, लादी तो अंग्रेजी गयी थी। अंग्रेजी की ना तो लिपि हमारी भारतीय भाषाओं से मिलती है, ना ही उसके शब्द। दक्षिण की भाषाओं की लिपि भले ही भिन्न हो मगर उनके पचास प्रतिशत शब्द संस्कृत से उद्धृत हैं। हमने तो बावजूद अंग्रेजी को अतिरिक्त सम्मान देने के (मानसिक दासता के कारण), लोगों को अंग्रेजी से डरते ही देखा है। अक्सर अंग्रेजी स्कूलों तथा कान्वेंट में पढ़ने वाले (कुछ अपवादों को छोड़ कर) मौलिकता और रचनात्मकता खो देते हैं। कारण - सारा ध्यान एवं शक्ति तो सही अंग्रेजी का उपयोग करने में व्यर्थ हो जाती है। जिस बहाव यानि फ्लो के साथ हम अपनी भाषा में सोचते और लिखते हैं, वह हमारी रचनात्मकता (creativity) को बढ़ावा देता है। जो लोग हिंदी का विरोध महज़ विरोध के लिये करते हैं और इसे नीचा दिखाने के लिये अंग्रेजी को तरजीह देते हैं उनसे हम यही कहेंगे की भैये पड़ोसी के घर में धुआँ करने के लिये अपने घर में आग क्यों लगाते हो? ऐसी ही एक कहावत आंग्ल भाषा में भी है - Cut the nose to spite thee face अर्थात मुखारविंद को बदसूरत बनाने के लिये नाक काट डालना। भला बताओ तो सही कि नुकसान किसका हुआ? कुछ लोग यह दलील भी देते हैं कि विश्व से सम्पर्क बनाने के लिये अंग्रेजी का ज्ञान होना अंग्रेजी ज़रूरी है। सही बात तो यह है कि अंग्रेजी अंतर-वंतर राष्ट्रीय-वाष्ट्रीय भाषा-वाशा कुछ नहीं है। जर्मनी, फ़्रांस, चीन, जापान, रूस - हर देश अपनी अपनी भाषा बोलता है। कोई इंग्लिश विंग्लिश नहीं बोलता, ना ही जानता है। हमारे नकली धर्मनिरपेक्ष विद्वान् जो इंग्लिश का समर्थन करते हैं, वही चीनी, जापानी, या फ्रेंच भाषा का समर्थन करते, यदि भारत ने इन देशों की गुलामी की होती। ये लोग "हिज मास्टर्स वोइस" वाले वफादार प्राणी हैं।
हिंदी की दुर्दशा हमारी मानसिक ग़ुलामी के कारण ही हुयी है। नेहरू जी पूरी तरह से अंग्रेज़ीदाँ थे। इसीलिये वे अंग्रेज़ों की जेल में भी शान-ओ-शौकत से रहते थे। (बिलकुल शशिकला की तरह)। उनकी बहुचर्चित किताबें - "भारत की खोज", "पिता के पत्र, पुत्री के नाम", वगैरहर दरअसल अंग्रेजी में ही लिखी हुयी हैं और क्यों ना हो, वे एडविना के साथ हिंदी में बोल कर रोमांस थोड़े ही कर सकते थे।
हमारे यहाँ कोई भी स्वप्नदृष्टा या सही अर्थों में राजनीतिज्ञ नहीं हुआ; केवल सत्ता-लोलुप नेता हैं जो अपने मतलब के लिये मातृभाषा क्या असली माँ को भी दरकिनार करने से नहीं चूकेंगे।
एक राज़ की बात बतायें, एक पेड़ों के झुरमुट पर बहुत सारे उल्लुओं ने बसेरा कर रखा था। आस पास रहने वालों ने तंग आकर सारे पेड़ काट डाले और चैन की साँस ली कि चलो उल्लुओं से छुटकारा मिला। पर भैया इस देश के लोगों का ऐसा अच्छा नसीब कहाँ! कटे हुये पेड़ों को बढ़ई उठा कर ले गये और उनकी कुर्सियां बना दीं। वे कुर्सियां संसद भवन की शोभा बन गयीं। ख़ुदा की कुदरत साहब! अब सारे के सारे उल्लू संसद भवन की उन कुर्सियों पर विराजमान होते हैं। सुना है न अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान। ऊपर से दुर्भाग्य कि शायद उल्लू ज़्यादा हैं और कुर्सियाँ कम; इसलिये (कम से कम कर्नाटक में) मौका मिलते ही पेड़ कटवाने का हुक़्म जारी हो जाता है, ताकि और कुर्सियां बन सकें।
ये लोग ना तो राष्ट्र का हित का देखते हैं ना ही राष्ट्र भाषा का। इन्हें समझ में ही नहीं आता कि अपने देश की एक अपनी राष्ट्र भाषा भी होनी चाहिये। बाहर से लाकर थोपी हुयी सम्पर्क भाषा नहीं। परन्तु मानसिकता तो वही है ना - उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद क्यों? अर्थात कहीं दूसरे प्रदेश की भाषा हमारी भाषा से ऊपर न उठ जाये; भले ही विदेशी भाषा हमारी संस्कृति और सम्मान की हत्या क्यों ना कर डाले।
दरअसल भाषा, संस्कृति, और सम्मान का तो अर्थ ही ये लोग नहीं समझते। इन्हे तो बस वोट-बैंक से मतलब है। आज तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ फ़ैसले ने शाहबानो के साथ हुयी नाइंसाफ़ी का बदला चुका दिया। जिस प्रकार राजीव गाँधी ने शाहबानो की ज़िंदगी बर्बाद की, उसी प्रकार कर्नाटक सरकार वहां का वातावरण, पर्यावरण और सामाजिक हालात बर्बाद कर रही है। बगीचों का शहर कचरे का शहर बन गया है। जनता जनार्दन! तेरी गठरी में लगा चोर, मुसाफिर जाग ज़रा। अरे भाई, जाग और सम्भल - ये नेता लोग कुछ नहीं करने वाले। "हवा आदी नहीं है मशवरों की, चिराग़ों को ही समझाना पड़ेगा।"
भैया सिद्धरमैया! ये अब्बा का फ्लाई ओवर, ये अम्मा की कैंटीन और ये बच्चों का आसमान-भ्रमण (sky walk) अगर 2018 के चुनावों को ज़हन में रख कर बना रहे हो तो आँखें खोलो - ये सब मुद्दे कांग्रेस के ताबूत में कीलों का काम करेंगे। जितने पेड़ काटोगे, उतने ही वोट कट जायेंगे। जब तक सड़कें नहीं बनेंगी तब तक कोई माई का लाल वोट बूथ तक नहीं जायेगा। सोच लो कि जनता क्या चाहती है और तुम क्या कर रहे हो!
हमको हमारे सब्र का क्या खूब सिला दिया गया
यानि दवा ना दी गयी, दर्द बढ़ा दिया गया।

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