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दौड़ की दिशा
01-Dec-2017 01:30 PM 3152     

यह एक शाश्वत और सही मान्यता है कि गति कम है लेकिन दिशा सही है तो वांच्छित लक्ष्य की प्राप्ति थोड़ा विलंब से ही सही निश्चित है। इसका उदाहरण है वास्को-द-गामा द्वारा अफ्रीका का चक्कर लगाते हुए योरप से भारत पहुँचना। यदि ज्ञान हो और उस पर विश्वास हो तो कोई कोलंबस की तरह भारत की खोज में अटलांटिक महासागर को चीरता हुआ भी भारत पहुँच सकता है बशर्ते रास्ते में एक नईदुनिया न मिल जाए। कोलंबस का मार्ग ज्ञान के विश्वास का मार्ग है तो वास्को-द-गामा का मार्ग परीक्षित ज्ञान का मार्ग। शायद इसी प्रकार की ईमानदार, निरपेक्ष, सत्य, तर्क और विश्वास पर आधारित कोशिशों के लिए भारतीय मनीषियों ने बार-बार कहा है- एकः सत्यम बहुधा विप्राः वदन्ति। मानव निरंतर चलता रहे, गतिशील रहे, बेहतर के लिए प्रयत्न करता रहे यही उसके श्रेष्ठ होने का प्रमाण है।
बहुत बार आदमी चला है। बहुत बार उसके निर्णय सही नहीं निकले। वह लौटा भी है। फिर चला है। इसीलिए मानव में निहित शक्तियों के रूप में कृष्ण बोलते हैं- जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब मैं अवतार लेता हूँ। यह अवतार मनुष्य की अनवरत जिजीविषा ही है जो हर हार के बाद उठ खड़ी होती है। वह जिजीविषा, वह ज्योति बार-बार कभी महावीर, कभी बुद्ध, कभी ईसा, कभी नानक, कभी कबीर, कभी गाँधी के रूप में कौंधती है। और अपनी-चमक में हमें तत्त्वज्ञान से समस्त सृष्टि में छुपी एकात्मकता से परिचित कराती है। दिन-रात के इसी क्रम के तहत उस कौंध के बाद फिर उसी में से मनुष्य की स्वार्थी और फितरती चतुराई कुछ ऐसा अँधेरा बुनती है कि तत्त्वज्ञान ओझल होने लगता है। दीये और तूफ़ान की लड़ाई चलती रहती है।
जिन भी विचारकों का ज़िक्र किया गया है उनके अनुयायियों ने अपने स्वार्थ के लिए, उसी तत्त्व ज्ञान के नाम पर एक नई गली निकाल दी। इसी तरह ज्ञान के मुख्य मार्ग से हीनयान-महायान, श्वेताम्बर-दिगंबर, शैव-वैष्णव, निर्गुण-सगुण, मूर्तिपूजक-मूर्तिभंजक, प्रोटेस्टेंट-कैथोलिक, शिया-सुन्नी, निरंकारी-खालसा, डेरे-आश्रम-मठ, संत-महंत और यहाँ तक कि स्वयं को भगवान घोषित करती अनेकानेक गलियाँ निकल गई हैं कि सही मार्ग ही ओझल हो गया है। ऐसी ही स्थिति के लिए तुलसी कहते हैं-
हरित भूमि तृण संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड विवाद तें लुप्त होहिं सदग्रंथ।
वैसे तो हर जीव आहार और सुरक्षा के लिए भटकता और ज़रूरत हुई तो लड़ता भी रहा है। लेकिन यह कभी बहुत संगठित नहीं रहा। कुछ घटिया, चतुर और धूर्त लोगों ने धन और प्रभुत्त्व के लालच में, विचार और उसके बाद उसकी दुहाई देते धर्म की आड़ में, संगठित होना शुरू किया। ऐसे संगठित लुटेरों ने अपने स्वार्थ के लिए अपने ही धर्म को बदनाम किया। ऐसे में दुनिया का परिचय सच्चे धर्म नहीं बल्कि उसके एक छद्म रूप से हुआ। भारत पर आक्रमण करने वाले लुटेरे किसी इस्लाम या ईसाई धर्म के प्रतिनिधि नहीं थे। लेकिन जो पराजित हुए वे पराजय की कुंठावश उस विजेता के धर्म के विरुद्ध और विजेता अपने दंभ में विजितों के विरुद्ध एक तर्कहीन, वैचारिक प्रतिरोध रचने लगे। और विभिन्न धर्मों में एक-दूसरे के प्रति ये घनीभूत प्रतिरोध तंत्र कालान्तर में घृणा और शत्रुता का कारण बनते गए।
यह घनीभूत घृणा मनुष्य को नस्ल, रंग, जाति, धर्म से परे जाकर किसी सार्वकालिक, तर्कपूर्ण, सर्वसमावेशी, संवेदनशील और वैज्ञानिक सत्य, तर्क और विचार पर विश्वास करने से रोकती है। इसी एकांगी सोच के तहत मनुष्य अपने इलाके, बोली-भाषा, नस्ल, धर्म के आधार पर एक-दूसरे को पहचानता और विश्वास करता है। इसमें उसे सुरक्षा अनुभव होती है। जैसे कि अमरीका में किसी भारतीय को काले या गोरे अमरीकी ईसाई की बजाय पाकिस्तानी या बँगलादेशी अधिक अपना लगता है। इसी का लाभ मनुष्य को बाँटने वाली ताकतें उठाती हैं और वे अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य को इसी आधार पर ध्रुवीकृत करके अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करती हैं। इस समय देश-दुनिया में यही चल रहा है। इसी के चलते करोड़ों लोग दर-बदर होकर भटक रहे हैं। अमानवीय परिस्थितियों में नृशंस अत्याचारों को सहते हुए जीने को मज़बूर हैं।
इसी के चलते पहले भी योरप में ईसाई और इस्लाम के संघर्ष शताब्दियों तक चले और आज भी ज़ारी हैं। भारत में भले ही अधिकतर मुसलमान यहीं के हैं। उनका डीएनए उन्हें यहीं का सिद्ध करता है। उन्हें बाहर का कोई भी इस्लामिक देश स्वीकार नहीं करेगा और न ही वे वहाँ जाकर खुश रहेंगे। लेकिन आज इसी गंगा-जमुनी तहज़ीब पर शंका उठाने की मानसिकता प्रकारांतर से सक्रिय नज़र आने लगी है। सभी देशों में तात्त्विक विचारकों के होते रहने के बावजूद स्थिति कोई बहुत आशाजनक नहीं है। समाजवादी विचारधारा के बावजूद चीन जैसे देश में मुसलमानों से नमाज़ पढ़ने की चटाइयाँ और कुरान की प्रतियाँ ज़ब्त की जा रही हैं। अमरीका में दाढ़ी के कारण सरदारों को मुसलमान समझकर हमले होते हैं। विभिन्न इस्लामिक देशों में उसी धर्म के मानने वाले एक फिरके द्वारा नृशंस गोलीबारियाँ किस नए मानवविरोधी धर्म का संकेत हैं?
धर्म, देश, नस्ल भाषा से परे एक सहिष्णु मानवता का यह काम विश्वव्यापी, वैज्ञानिक और तार्किक शिक्षा के द्वारा ही संभव है। हालाँकि विज्ञान की शिक्षा सारे संसार में एक ही है और जब भी उसमें कोई संशोधन होता है तो वह बिना किसी विवाद के सर्वव्यापी भी हो जाता है। लेकिन धर्म के नाम पर दी जाने वाली तथाकथित नैतिकता की शिक्षा, जिसका नीति के बहुत दूर का भी संबंध नहीं होता, में ही सारे विभेदों की जड़ हैं। इसीलिए विभिन्न धर्मों के आधिकारिक संस्थानों में, कभी इन धर्मों आनुसंगिक संगठनों द्वारा चलाए जाने वाले विद्यालयों में संस्कृति के नाम पर दी जाने वाली शिक्षा (जो पाठ्येतर पुस्तकों के रूप में पढ़ाई जाती हैं) उन संस्थानों के विद्यार्थियों के मन में एक समानांतर इतिहास रचती रहती हैं। यह इतिहास उन्हें विश्व के सही, तार्किक और तात्विक इतिहास के विरुद्ध कुंठित मानसिकता के लिए तैयार करता रहता है। यह सामानांतर इतिहास ही समाज में विभेद का कारण रचता रहता है। बड़े विचार की राजनीति न कर सकने वाले संगठन इन्हीं एकांगी और तुच्छ-विभेदक विचारों का ध्रुवीकरण करते हैं और सत्ता के अवैध केन्द्रों के बल पर सत्ता हथियाते हैं।
इसलिए यह आवश्यक है कि दुनिया में एक सच और निरपेक्ष ज्ञान का विकास और विस्तार किया जाना चाहिए। सच्चे समावेशी और लोकतांत्रिक समाज के विकास में विश्वास रखने वाली संस्थाओं और लोगों को एकजुट होना चाहिए। वास्तव में एक सभ्य और संवेदनशील समाज में विश्वास रखने वाली सरकारों को सत्ता के अवैध केन्द्रों द्वारा संचालित शिक्षा संस्थानों को प्रतिबंधित करना चाहिए। यदि कोई संस्थान ऐसा करते हैं तो उन्हें बोर्ड और विश्वविद्यालयों द्वारा मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। सभी स्कूलों का पाठ्यक्रम एक जैसा होना चाहिए। धर्म के आधार पर भिन्न और विभेदक शिक्षा की छूट नहीं होनी चाहिए।
ऐसी शिक्षा के बिना इस दुनिया में घृणा और कुटिलता का अँधेरा आस्था और धर्म का रूप धरकर फिर-फिर आता रहेगा। प्रकारांतर से विश्व की कुटिल आर्थिक शक्तियाँ भी यही काम कर रही हैं।

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