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दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन राष्ट्रभाषा की वैश्विक यात्रा को लगे पंख
01-Jan-2017 12:57 AM 3899     

अभी तक चर्चा का विषय रहता था ""सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी"", परन्तु इस सम्मेलन के फलस्वरूप दिशा परिवर्तन हो गया है और अब विमर्श का विषय बनेगा ""हिन्दी में सूचना प्रौद्योगिकी""। ये प्रतिक्रिया थी दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अंतिम दिन एक अमेरिकी मूल की भारतीय नागरिक की, जो दो दशक पूर्व भरत मुनि के अध्ययन के लिए भारत आई थीं और फिर यहीं की होकर रह गई। पिछले चार दशकों में हिन्दी के उतार-चढ़ाव की विकास यात्रा को समझने-समझाने के लिए विश्व हिन्दी सम्मेलनों के प्राप्त विवरण लाभकारी संदर्भ सिध्द होते हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलनों की यात्रा भारत से प्रारंभ होकर मॉरीशस (तीन बार), त्रिनिदाद, इंग्लैण्ड, अमेरिका, सूरीनाम एवं दक्षिण अफ्रीका से होती हुई दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में फिर से भोपाल, भारत में दसवां पडाव लेती है। विश्व सम्मेलनों की यह वैश्विक यात्रा अपने-आप में सकारात्मक एवं उत्साहवर्धक ऊर्जा का सृजन करती है। हर सम्मेलन में नए विषय, विमर्श के नवीन आयाम एवं संकल्पों की सुंदर उपयोगिता बरबस ही मन को उल्लासित करती है। केवल हिन्दी के अध्येताओं के लिए ही नहीं परन्तु उन सभी के लिए जो भाषा की यात्रा के अध्येता हैं, दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन अपने आप में सिद्ध प्रमाण है  कि किस प्रकार सामूहिक प्रयासों से भाषा को विकास के मार्ग पर तीव्र गति दी जा सकती है।
मीठा या कड़वा जैसा भी माने, वर्तमान का सत्य यह है कि हिन्दी को साहित्य से अधिक व्यापार और मनोरंजन ने वैश्विक धरातल पर खड़ा करने में सफलता प्राप्त की है। हिन्दी का विस्तार पिछले सौ वर्षों में अप्रत्याशित स्तर पर हुआ है। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को मान्यता न भी मिली हो तो भी पूरे विश्व में आज हिन्दी भाषा के रूप में स्थापित है। विश्व के अनेक देशों में विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी में और हिन्दी की शिक्षा के प्रमाणसिध्द आंकड़े संभवत: उपलब्ध नहीं हैं परन्तु लगातार इसमें हो रही व्यापक वृध्दि में किसी को संशय नहीं है। कहा जाय तो हिन्दी का संसार विस्तृत हुआ है और इसे अधिक और विस्तार देने की प्रबल संभावनाएं विद्यमान हैं। इसीलिए दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का मूल विषय रखा गया ""हिन्दी जगत विस्तार एवं संभावनाएं""।
हिन्दी के वर्तमान वैश्विक रूप का विचार करें तो उसमें साहित्य के साथ-साथ अनेक आयाम जुड़े हैं जिनसे न केवल हिन्दी का विस्तार हुआ है परन्तु वे हिन्दी के साम्राज्य को विस्तृत करने के कारण भी बने हैं। विश्व की शीर्षस्थ सूचना प्रौद्योगिकी की प्रयोगशालाओं ने संस्कृत, हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को अन्य भाषाओं विशेषकर यूरोप की भाषाओं से अधिक सशक्त, समृध्द और वैज्ञानिक माना है। यही कारण ऐसे संकेत देते हैं कि आज से दस साल के बाद संगणक की भाषा कोई कृत्रिम भाषा न होकर संस्कृत होने वाली है और हिन्दी संस्कृत के निकटस्थ होने के कारण स्वयं महत्वपूर्ण बन जाने वाली है। इसी वजह से सम्मेलन में ""विज्ञान क्षेत्र में हिन्दी"" तथा ""संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी"" दोनों मुख्य उप विषय के रूप में विमर्श के लिए आए। जब हम हिन्दी के विस्तार की चर्चा करते हैं तो हिन्दी के सीखने-सिखाने का विषय उभरता है। इस विश्व हिन्दी सम्मेलन में ""विदेशियों के लिए भारत में हिन्दी अध्ययन की सुविधाएं"", ""विदेशों में हिन्दी के अध्ययन की सुविधाएं"" एवं ""अन्य भाषा-भाषी प्रान्तों से आए प्रशासनिक अधिकारियों के लिए हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था"" के विमर्शों में केवल वर्तमान की स्थितियों पर ही चर्चा नहीं हुई परन्तु व्यावहारिक रूप में अनेकों कार्य-बिन्दु एवं योजनाएं प्रस्तावित हुईं। उल्लेखनीय यह रहा कि सम्मेलन में उपस्थित राजनेताओं ने इन अनुशंसाओं को अमलीजामा पहनाने के संकल्प स्वयं लिए। सरकारी क्षेत्रों में हिन्दी को किस प्रकार से नस्तियों एवं पत्राचार की भाषा बनाया जा सकता है, इस पर विशेष रूप से तीन उप विषय निर्धारित हुए थे- ""प्रशासन में हिन्दी"", ""विदेश-नीति में हिन्दी"" तथा ""विधि तथा न्याय क्षेत्र में हिन्दी एवं भारतीय भाषायें""।
वैश्विक स्तर पर जब हिन्दी की बात चलती है तो गिरमिटिया देशों का योगदान सहज ही मानस पटल पर आता है। तीन सत्रों में चर्चित गिरमिटिया देशों में हिन्दी एक सार्थक विमर्श का मानो उत्सव बना हो। संुदर निष्कर्ष उभरकर यह आया कि नौंवे विश्व हिन्दी सम्मेलन के पश्चात गिरमिटिया देशों में हिन्दी की यात्रा को उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त हुई हैं। सम्मेलन के अवसर पर प्रवासी साहित्य ""जोहानसबर्ग से आगे"" पुस्तक भी प्रकाशित हुई जिसके प्रधान संपादक डॉ. कमल किशोर गोयनका हैं। इस पुस्तक के माध्यम से गिरमिटिया देशों एवं अन्य विदेशी साहित्यकारों ने जो पिछले तीन वर्ष में हिन्दी साहित्य में योगदान किया, उसका सम्पूर्ण विवरण उपलब्ध है।
समाज का बचपन जिस साहित्य को पढ़ता है, उसी से उस समाज के कल की बौध्दिक मानसिकता की रचना होती है। बालकों के वर्तमान साहित्य का सर्वेक्षण और भविष्य की योजना की रचना करने के लिए सम्मेलन का एक विषय ""बाल साहित्य में हिन्दी"" रहा जिसकी अध्यक्षता डॉ. बालशौरी रेड्डी ने की। परन्तु दु:खद समाचार यह रहा कि सम्मेलन से घर लौटकर उन्होंने इस संसार से अंतिम विदाई ले ली। परन्तु डॉ. रेड्डी का अमूल्य मार्गदर्शन आने वाले समय में बाल साहित्य की दिशा और दशा अवश्य बदलेगा और यही उनके प्रति हम सबकी श्रध्दांजलि भी होनी चाहिए।
मीडिया का महत्व मात्र समाज को संवादित रखना एवं समाज का मनोरंजन करना ही नहीं है। इसके अतिरिक्त समाज की भाषा का निर्माण भी मीडिया करता है। चिन्ता का विषय, सभी भाषाओं के लिए यह बन गया है कि मीडिया भाषा के संस्कार देने के कार्य में शिक्षक की भूमिका न लेकर पलायन कर रहा है। दलील यह दी जा रही है कि मीडिया उसी भाषा का प्रयोग कर रहा है जो भाषा आज का युवा प्रयोग करता है। इस कारण से विशेषकर हिन्दी में गंभीर संक्रमण की स्थिति उत्पन्न हो गई है। बेहतर हिन्दी का शब्द होने पर भी कठिन अंग्रेजी के शब्दों का हिन्दी मीडिया प्रयोग कर रहा है। इसी विषय का विश्लेषण एवं सुधार का मार्ग निकालने के लिए तीन सत्रों वाला एक विषय था- ""हिन्दी पत्रकारिता और संचार माध्यमों में भाषा की शुध्दता""। अध्यक्षता श्रीमती मृणाल पाण्डे की थी, संयोजक श्री राजेन्द्र शर्मा थे और मुख्य वक्ताओं में श्री ओम थानवी, श्री आलोक मेहता, डॉ. नरेन्द्र कोहली और श्री राहुल देव थे। हर्ष का विषय है कि इस सत्र में प्रारंभिक छीटांकशी और असहमति तो हुई परन्तु अंत में सर्वसहमति से अनुशंसाओं का अनुमोदन हुआ। हिन्दी के विस्तार की संभावनाओं की बात करने पर प्रकाशन एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में समक्ष में आता है। ई-प्रकाशन और कागज पर मुद्रित पुस्तकों आदि की व्यवहारिक कठिनाइयों को सामने लाना और समाधान खोजना चर्चा का विषय रहा, एक सत्र में जिसका विषय था- ""देश और विदेश में प्रकाशन : समस्याएं एवं समाधान""।
हालांकि सम्मेलन में उप-विषय कुल 12 थे परन्तु विमर्शों का सिलसिला 28 सत्रों में चला। एक समय में चार समानांतर सत्र उद्घाटन और समापन के बीच में लगातार चले। पूर्व में हुए सम्मेलनों में समानांतर सत्रों में उपस्थिति कम और कभी-कभी तो नगण्य केवल वक्ताओं की ही रहती थी। इस अनुभव के कारण सत्र-संचालन समिति में काफी चिन्ता रही। परन्तु आश्चर्य यह रहा कि कोई भी समानांतर सत्र ऐसा नहीं था जिसमें बड़ी संख्या में प्रतिभागियों को खड़ा न रहना पड़ा हो। यह इसके बावजूद कि हर समानांतर सत्र के कक्ष में तीन सौ विद्वानों के बैठने की व्यवस्था थी। यदि बहुत संकुचित अनुमान भी लगाया जाय तो चारों समानांतर सत्रों में कुल मिलाकर हर समय कम-से-कम दो हजार विद्वान प्रतिभागी उपस्थित रहते थे। बड़े सम्मेलनों की एक समस्या की ओर आयोजकों का ध्यान बार-बार आता था वह यह कि हर विद्वान जो ऐसे सम्मेलन में आता है कुछ-न-कुछ कहने की योग्यता रखता है परन्तु जब समय नहीं मिलता या कम समय मिलता है तो मन में अच्छे भाव नहीं आते। सत्रों की रचना में ही इस समस्या का समाधान प्रारंभ से ही कर दिया गया था। हर सत्र नब्बे मिनट का था और आधे से अधिक समय प्रस्तुतियों का प्रावधान था, शेष समय चर्चा एवं सुझावों का था। इसका भरपूर लाभ प्राप्त हुआ और हर विषय पर मुख्य वक्ताओं के अतिरिक्त बहुत बड़ी संख्या में बोलकर और लिखकर प्रतिभागियों ने अपना योगदान दिया। हालांकि इससे संयोजकों को एक कठिनाई अवश्य आई कि हर विषय पर उनको बहुत बड़ी संख्या में प्राप्त सुझावों को पढ़कर अपनी अनुशंसाओं में उन्हें यथास्थान जोड़ना पड़ा।
विशेष उल्लेखनीय व्यवस्था यह की गई थी कि हर विषय पर पूरा एक सत्र अनुशंसाओं पर चर्चा का रहा और हर विषय पर सर्वसम्मति से अनुशंसाएं पारित की गईं। इसी में एक विशेष कार्य इस सम्मेलन में यह भी हुआ कि हरेक 12 विषयों की अनुशंसाएं समापन सत्र में पूरी सभा के सम्मुख संयोजकों ने प्रस्तुत की। यह सब उसी योजना के अंतर्गत हुआ जब प्रारंभ में ही संचालन समिति में निर्णय लिया गया था कि दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन व्यावहारिक सूत्रों को खोजने पर केन्द्रित हो, परिणाममूलक हो।
देश-विदेश से विद्वानों एवं शोधार्थियों द्वारा लिखे गए लगभग दो सौ लेख विदेश मंत्रालय में प्राप्त हुए थे। अंतर्राष्ट्रीय परम्पराओं के अनुसार एक उच्च स्तरीय समिति ने इनमें से 27 लेखों को प्रस्तुति के लिए चयनित किया। एक अलग सभागार में दो दिन में चार सत्रों में इन आलेखों का वाचन हुआ एवं हर आलेख पर प्रश्नोत्तर एवं चर्चा हुई।
पूर्व में आयोजित सम्मेलनों की परम्परा के अनुसार दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी प्रदर्शनी की व्यवस्था हुई। ""अभिज्ञानम मध्यप्रदेश"" नाम के अंतर्गत प्रदर्शनी में मध्यप्रदेश से संबंधित अनेकों साहित्यकारांे का जीवन परिचय और साहित्य में योगदान सुरुचिपूर्ण तरीके से किया गया। अप्रैल 2016 में होने वाले सिंहस्थ कुंभ की जानकारी भी इस प्रदर्शनी में दी गई। प्रदर्शनी के दूसरे अंग में हिन्दी जगत के भविष्य की संकल्पनाएं देखने को मिली। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा संकल्पित इस प्रदर्शनी का शीर्षक था ""हिन्दी कल आज और कल""। इसमें अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की सूचना प्रौद्योगिकी की शीर्ष संस्थाओं ने कम्प्यूटर और मोबाइल के क्षेत्र में हिन्दी का उपयोग आज कितना सुलभ है और कल और कितना सरल होने वाला है, न केवल दिखाया परन्तु सिखाने की व्यवस्थाएं भी की। संभवत: एप्पल, गूगल और माइक्रोसाफ्ट एक छत के नीचे पहली बार भारतीय भाषाओं की सूचना प्रौद्योगिकी में उपस्थिति करवाने के लिए एक साथ एकत्र हुए। इसी प्रदर्शनी में हिन्दी के शीर्ष समाचार-पत्रों में कौन-कौन से अंग्रेजी के शब्द अनावश्यक रूप से प्रयोग होते हैं, उनकी सूची भी प्रदर्शित हुई। इसी तरह हिन्दी भाषा किस प्रकार से अधिक सशक्त और समृध्द है, यह दर्शाया गया एक लम्बी सूची के माध्यम से जिसमें वे हिन्दी के शब्द जो अंग्रेजी में रूपांतरित या अनुवादित हो ही नहीं सकते, सम्मिलित थे। ऐसे शब्दों को धीरे-धीरे अंग्रेजी भाषा अपने आप में समाहित कर रही है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा प्रात: ""दैनिक सार"" नामक समाचार-पत्र प्रतिदिन प्रात: प्रतिभागियों में बंटता रहा। इसके कुल छ: संस्करण प्रकाशित हुए और समापन के दिवस का पूरा विवरण सायं सात बजे तक वितरित हो गया।
सम्मेलन का उद्घाटन अत्यंत भव्य एवं पांच हजार से अधिक खचाखच भरे रामधारीसिंह दिनकर सभागार में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया।  मोदीजी ने यह कहकर कि ""यदि मुझे हिन्दी न आती तो मेरा क्या होता"" हिन्दी की प्रतिष्ठा बढाई। वरन् यह संदेश भी सर्वजन को दिया कि हिन्दी ही देश की मुख्य भाषा हो सकती है। इसी प्रकार समापन में भारत के गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने आने वाले समय को सूचना प्रौद्योगिकी का युग बताया और आंकड़े देते हुए घोषणा की कि सूचना प्रौद्योगिकी में भी हिन्दी का ही बोलबाला रहने वाला है। समापन में सभी अतिमाभ बच्चन की प्रतीक्षा थी परन्तु अस्वस्थ होने के कारण उनका भेजा हुआ पत्र आयोजन के उपाध्यक्ष श्री अनिल दवे ने पढ़कर सबको सुनाया।
सार रूप में कहा जाय तो एक अत्यंत भव्य और विशाल आयोजन अस्थाई रूप से निर्मित माखनलाल चतुर्वेदी नगर में सम्पन्न हुआ। 39 देशों से सौ से अधिक विदेशी विद्वानों ने सहभागिता की। लगभग 13 सौ ऐसे प्रतिभागी थे, जिन्होंने शुल्क देकर पंजीयन करवाया था। तीन सौ के लगभग आमंत्रित अतिथि थे और लगभग पांच सौ हिन्दी प्रेमी युवा विद्यार्थियों ने इसमें भाग लिया। विदेश मंत्रालय, एवं मध्यप्रदेश सरकार मुख्य आयोजक थे और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय सहयोगी संस्था के रूप में इसमें कार्यरत था। अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल का योगदान भी सराहनीय रहा।

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