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दरवाजे और खिड़कियाँ
01-Nov-2016 12:00 AM 3463     

दरवाज़े व्यवहारिक होते हैं
और खिड़कियाँ भावुक।

दरवाज़े सिर्फ समझते हैं
साँकल की बोली
कदमों की आहटें।

खिड़कियाँ पहचानती हैं
दबे पाँव पुरवाई का
चुपके से अंदर आ जाना
सबेरे की किरणों का
भीतर तक उतर जाना।

परिंदों का राग
मौसमों का वैराग
बादल की आवारगी
बूँदों की सिसकियाँ
घटते-बढ़ते चाँद की
लम्बी-छोटी रातें
चाँदनी के सज़दे या
टूट जाना किसी तारे का
खिड़कियाँ सब जान जाती हैं।

दरवाज़े होते हैं सख्त, मजबूत
नींबू-मिर्ची से सजे-धजे
अख्खड़ किसी दरबान जैसे।

खिड़कियाँ होती हैं
अल्हड़, नादान और सहज
उन पर नहीं लिखना पड़ता
स्वागतम्।

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