ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दक्षिण कोरिया में हिन्दी
CATEGORY : तथ्य 01-Sep-2018 08:19 PM 244
दक्षिण कोरिया में हिन्दी

कोरिया और भारत का संबंध लगभग दो हजार साल पुराना है। पहली शताब्दी में भारत के उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगरी की राजकुमारी का विवाह कोरिया के राजकुमार के साथ हुआ था। उनके दस पुत्र थे। जिसमें से अंतिम दो पुत्रों का उपनाम राजकुमारी के उपनाम के आधार पर रखा गया था। आज लगभग साठ लाख कोरिया के लोग, जो कि कोरिया की आबादी का 10 प्र.श. हैं वे अपने आपको राजकुमारी का वंशज मानते हैं। वे प्रतिवर्ष अप्रैल के महीने में राजकुमारी के विवाह की सालगिरह के अवसर पर अयोध्या नगरी में आकर राजकुमारी की आत्मा को शांति प्रदान कर एवं अपने ननिहाल में खुशी का अनुभव प्राप्त करते हैं। इसके अलावा बौद्धधर्म के प्रचार-प्रसार ने भारत और कोरिया को आपस में मजबूती से जोड़ा। 7वीं शताब्दी में है चौ नामक बौद्ध भिक्षु ने अध्ययन के लिए नालंदा पहुँचा, तब से ही बौद्ध धर्म से सम्बंधित धार्मिक ग्रन्थ कोरिया में प्रविष्ट हुए। बौद्ध धर्म के ग्रंथों और मंदिरों की दीवारों पर संस्कृत के अक्षर आज भी दिखाई पड़ते हैं।
21वीं शताब्दी में कोरियन कम्पनियाँ एलजी, हुंडइ, सैमसंग आदि ने भारत में अपनी पकड़ मजबूती से बनाई हुई है और अभी हाल ही में कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन भारत की यात्रा पर आए थे। इस यात्रा के दौरान भारत और कोरिया ने व्यापार, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक व तकनीकी क्षेत्र समेत 11 समझौतों पर हस्ताक्षर किए तथा चौथी औद्योगिक क्रांति के फायदों का लाभ उठाने के लिए व्यावसायीकरण की अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के विकास में सहयोग के लिए एक भविष्य रणनीति समूह के गठन वाले एक अन्य समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किये हैं। कोरिया और भारत के बीच पारिवारिक, धार्मिक, व्यापारिक संबंध, ये सारी घटनाएँ दोनों देशों को मजबूती के साथ जोड़ती हैं। इसीलिए सैमसंग कंपनी अपने कर्मचारियों को हिन्दी सिखाने के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये खर्च करती है। यह हिन्दी का आकर्षण और विश्व बाजार में भारत की तेजी से उभरती हुई आर्थिक शक्ति का ही तो रूप है जिसे नकारा नहीं जा सकता।
वैश्वीकरण के इस दौर में सम्पूर्ण विश्व एक बाजार के रूप में सामने आया और उस विश्व बाजार में भारत का विशेष स्थान है। यही कारण है की सम्पूर्ण विश्व भारत को एक बड़े बाजार के रूप में देख रहा है अत: बाजार में निवेश और व्यापार के लिए हिन्दी भाषा का सीखना अत्यंत आवश्यक है। तभी निवेशक जन-जन तक अपने सामान को पहुंचा सकता है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में एशियाई देशों में साउथ कोरिया का नाम उन देशों में शामिल है जो हिन्दी की प्रगति एवं विकास में अपनी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। साऊथ कोरिया में सन 1972 से हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य "हंकुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फॉरेन स्टडीज" में हिन्दी विभाग खुलने से सर्वप्रथम हुआ। यहाँ हिन्दी शिक्षण चार वर्षीय स्नातक कोर्स है। पहली, दूसरी कक्षा में पाठ, व्याकरण, भाषा अभ्यास, वार्तालाप और रचना आदि की पढाई होती है। हंकुक विश्वविद्यालय की एक अन्य शाखा योंगइन कैंपस में भी हिन्दी पढ़ने वाले विद्याथियों की संख्या अच्छी खासी है। सन् 1981 से हिन्दी में स्नातकोत्तर की पढाई शुरू हुई। कोरिया के एक अन्य बड़े शहर पूषान के "पूषान कॉलेज ऑफ़ फॉरेन स्टडीज" में हिन्दी विभाग 1984 में खुला। यहाँ हिन्दी शिक्षण का कार्य सुचारु रूप से चल रहा है। इसके अलावा साऊल नेशनल विश्वविद्यालय के "डिपार्टमेन्ट आफ एशियन लैड्ग्वेजस एंड सिविलाइजेशन" में भी हिन्दी पढ़ाई जाती है। कुल मिलाकर दक्षिण कोरिया में हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण व्यवस्थित और तीव्र रूप से चल रहा है।
दक्षिण कोरिया में शिक्षकों को शिक्षण की पूरी स्वतंत्रता दी जाती है। वे अपनी रुचि अनुसार पाठ्य सामग्री का गठन एवं अपने तरीके से पढ़ा सकते हैं। शिक्षक, विद्यार्थियों को कक्षा में पढ़ाने के अलावा कॉफी हाउस में या सैर सपाटे पर भी ले जाकर पढ़ा सकता है ताकि शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच एक घनिष्ठ रिश्ता पनप सके। कोरियाई छात्रों को भारतीय नाम बहुत पसंद आते हैं। वे शिक्षण के दौरान अपने हिन्दी नाम रखते हैं। यह सौहाद्र्रपूर्ण संबंध विद्यार्थियों को शिक्षक से और शिक्षक को विद्यार्थियों से जोड़ता है। यहाँ का प्रशासन भी शिक्षक को विद्यार्थियों के साथ सौहाद्र्रपूर्ण संबंध बनाने के लिए कहता है।
मेरे लिये देश से बाहर पढ़ाने का यह पहला मौका था। स्वयं पाठ तैयार करना और पढाना। मुझे इंटरमीडिएट और एड्वान्स लेवल की कक्षाओं का पाठ निर्माण करना था, जिसके लिए मुझे दो से तीन सप्ताह लगा। एक से दो सप्ताह मुझे यह समझने में लगा कि छात्रों को हिन्दी का ज्ञान कितना है। वे हिन्दी समझ और लिख सकते हैं या नहीं। वे अपने आस-पास के वातावरण के प्रति, समाज के प्रति, प्रकृति के प्रति, अपने मित्रों के प्रति संवेदनशील हैं या नहीं। यह सब जानने के पश्चात ही पाठ निर्माण की प्रक्रिया की जा सकती थी। मेरा उदेश्य उन्हें कोरियाई संस्कृति के साथ-साथ भारतीय संस्कृति से भी रु-ब-रु करवाना था, ताकि उनके अंदर भारतीय संस्कृति के बारे में जानने की ललक पैदा हो सके। इन सभी जानकारियों के पश्चात ही मैंने पाठ निर्माण किया। सबसे पहले कोरिया से संबंधित पाठों को रखा जैसे कोरिया का मौसम, पहाड़, त्यौहार, भोजन आदि। चूंकि छात्र इनसे पहले से परिचित थे और रुचि ले रहे थे लिहाजा धीरे-धीरे उन्हें भारतीय संस्कृति से रूबरू करवाना शुरू कर दिया जैसे भारतीय संस्कृति, समाज, मौसम, पहाड़, नदी, त्यौहार, भोजन आदि को विषय बनाया। यह मेरे लिए एक चुनौती भरा कार्य था जिसे मैंने पूर्ण निष्ठा के साथ पूरा किया।
हिन्दी में ऐसी अनेक ध्वनियाँ हैं जिनका उच्चारण विदेशियों के लिए बहुत कठिन होता है। हिन्दी स्वरों में पहला स्वर ह्रस्व तथा दूसरा दीर्घ रूप में उच्चरित होता है। शेष स्वरों की मात्राएं होती हैं, जो व्यंजन के साथ प्रयुक्त होकर ह्रस्व और दीर्घ के रूप में प्रयोग की जाती हैं। व्यंजनों को क्रमशः वर्गों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक वर्ग का पहला और तीसरा वर्ण अल्पप्राण तथा दूसरा और चौथा महाप्राण होता है सभी स्वर अल्पप्राण हैं। जिन व्यंजनों के उच्चारण में "ह" की ध्वनि सुनाई देती है उसे महाप्राण और शेष को अल्पप्राण कहते हैं। इसके अतिरिक्त ङ, ञ, ण, न, म अनुनासिक ध्वनियाँ अल्पप्राण तथा श, ष, स अल्प ध्वनियाँ महाप्राण हैं। अनुस्वार() और अनुनासिकता (ँ) के उच्चारण में अंतर है। अनुस्वार दूसरे स्वरों या व्यंजनों के समान एक अलग ध्वनि है परंतु अनुनासिकता की अपनी विशेषता है।
कोरियाई छात्रों को शुरुआती वर्णों जैसे स्वर-व्यंजनों का ज्ञान कराते समय उच्चारण संबंधी अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। वे स्वर का उच्चारण तो आसानी से कर लेते हैं क्योंकि हिन्दी के स्वर और कोरियाई भाषा के स्वरों का उच्चारण लगभग एक जैसा है पर व्यंजनों के उच्चारण में कठिनाई सामने आती है। जो व्यंजन उनकी मातृभाषा से मिलते-जुलते हैं उनका उच्चारण छात्र आसानी से कर लेते हैं लेकिन कुछ व्यंजन जैसे पंचम वर्ण ङ, ञ, ण, न, म हैं। जिसमें न, म व्यंजन कोरियाई भाषा में हैं इनका उच्चारण छात्र आसानी से कर लेते हैं पर ङ, ञ, ण, का उच्चारण करने में छात्रों को कठिनाई होती है। ये अल्पप्राण अनुनासिक ध्वनियाँ हैं। शुरुआत में इन सभी के लिए न का उच्चारण कराया जाता है पर धीरे-धीरे अभ्यास से छात्र इनका सही उच्चारण सीख लेते हैं। ल, ड, ढ, ड़, ढ़ का उच्चारण करने में भी उन्हें कठिनाई होती है। इन वर्णों का उच्चारण करते समय जीभ ठीक से पलटती नहीं हैं जिससे उच्चारण में असुविधा होती है। हिन्दी की कुछ ध्वनियां ऐसी हैं जो छात्रों को एक जैसी लगती है जैसे- ग-घ, च-छ, ज-झ, त-ट-ठ, द-ध, र-ल आदि व्यंजन का उच्चारण करने में छात्र भ्रमित हो जाते हैं। इनके बार-बार अभ्यास और सही उच्चारण पर ध्यान देने से यह समस्या दूर की जा सकती है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती। प्रत्येक भाषा की अपनी एक व्यवस्था होती है। जिसके अनुसार एक शब्द दूसरे शब्द से जुड़कर अर्थ प्रदान करता है। भाषा की यह व्यवस्था नियमों में बंधी होती है और नियमों को जानने समझने के लिए व्याकरण की सहायता लेते हैं।
भाषा तत्वों के शिक्षण बिन्दुओं को निम्न प्रकार से विभाजित किया जा सकता है। 1. शब्द विचार और शब्द निर्माण, 2. रंजक और विशिष्ट सहायक क्रियाएं, 3. संज्ञा पदों के रूप परिवर्तन और 4. भाषिक प्रयोग। चूंकि हम भारतीय शिक्षक कोरियन छात्रों को "हिन्दी रचना और वार्तालाप" ही पढ़ाते हैं व्याकरण मुख्य रूप से नहीं पढ़ाते हैं तो हमें खास तौर पर यह नहीं पता की छात्रों को व्याकरण में कहाँ परेशानी होती है। पर जो छात्र कक्षा में पूछते हैं उसके आधार पर जो अहसास हुआ वह है संज्ञा पदों के रूप परिवर्तन में जैसे लिंग, वचन, कारक चिह्नों आदि में। इन छात्रों को हिन्दी के लिंग को पहचानने में कठिनाई का सामना होता है। ये प्राणीवाचक संज्ञा के लिंग तो पहचान लेते हैं पर अप्राणिवाचक या निर्जीव संज्ञा शब्दों के पदों के लिंग पहचानने में कठिनाई होती है क्योंकि वे हिन्दी की संरचना और उसके व्यवहार से अनभिज्ञ हैं। छात्र वचन समझ लेते हैं पर कारक और रंजक क्रिया में कठिनाई होती है परंतु अभ्यास और सही नियमों को जानने के बाद वे गलतियाँ कम करते हैं।

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