ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
दास्ताने-ज़ीस्त ज़िंदगी
CATEGORY : ग़ज़ल 01-Sep-2018 08:34 PM 193
दास्ताने-ज़ीस्त  ज़िंदगी

ज़िंदगी
हासिल हुई न जन्नत, न दोज़ख़ मुझको
बे-मौत मैं मारा गया, दिल दे के तुझको।
कभी ख़ुशहाल किया तो कभी बेज़ार मुझे
गो कि हर रंग में तूने सताया मुझको।
शुक्रिया, जो आईना दिखाया मुझको
सोया था मैं, तूने जगाया मुझको।
रोना आवे है मुझे और हँसी भी साहिल
ऐ ज़िंदगी, तूने क्या-क्या न दिखाया मुझको।

दास्ताने-ज़ीस्त
अजब है दास्ताँ इंसाँ तिरे फ़साने की
एक तरफ़ दौलते-जाँ हासिल
तो दूजे फ़िक्र मर जाने की
अजब है दास्ताँ इंसाँ...

रोज़-ब-रोज़ उलझी जावे है ज़ीस्त यहाँ
कोई तो होगी, कहीं तो होगी
सूरत इसे सुलझाने की,
अजब है दास्ताँ इंसाँ...

तमाम उम्र, उधार पे गुज़री अपनी
पांव अब कब्र में लटके
तो फ़िक्र कर्ज़ा चुकाने की
अजब है दास्ताँ इंसाँ...

सूद-दर-सूद चढ़ा आवे है इधर
अस्ल-ओ-सूद की किसको ख़बर
फ़िक्र होने लगी हर्जाने की
अजब है दास्ताँ इंसाँ...

यह घबराहट कैसी, यह हिचकियाँ क्योंकर साहिल
क्या, हुक्म सफ़र-आख़िरी आया?
घड़ी है, जाने की
अजब है दास्ताँ इंसाँ...

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