ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अभिशप्त
01-Feb-2019 02:37 PM 1137     

उन दिनों मैं आकाशवाणी में प्रोड्यूसर था और झुग्गी-झोंपड़ी कॉलनियों में रहनेवाले लोगों के जीवन पर एक कार्यक्रम तैयार कर रहा था। मैंने ट्रांसपोर्ट सैक्शन के इंचार्ज दक्षणी को एक दिन पहले ही कार का इंतजाम करने के लिये कह दिया था। मैंने सोच रखा था कि दस बजे के करीब मैं टेप-रिकार्डर इत्यादि लेकर ऑफिस की कार में निकल जाऊंगा और जे.जे. कॉलोनी में उस दिन होने वाले एक विवाह समारोह की रिकार्डिंग करके लाऊंगा, जिसका उपयोग मैं अपने कार्यक्रम में करना चाहता था।
रिकार्डिंग का प्रबंध, लड़कीवालों से कह कर, मेरे स्कूटर मैकेनिक टिल्लू ने कराया था, जो उसी कॉलोनी में रहता था। उसने कहा था कि बारात दोपहर को आनी है, मैं अगर ग्यारह बजे तक पहुंच जाऊं तो बढ़िया रहेगा।
पर उस दिन तैयार होकर जब मैं दस बजे दफ्तर पहुंचा, मैंने पाया कि कार का कोई इंतज़ाम ही नहीं था। मैंने ड्राइवरों से पूछताछ की। वे बोले कि मेरे नाम का कोई कार-आर्डर नहीं है। मैं परेशान हो गया। मैंने ड्राइवर अमर सिंह से कहा- मैं कल रात खासतौर पर कार ऑडर देकर गया था। हद है। दक्षणी कहां हैं?
-- बड़े साहब के पास गये हैं। उसने अपने पहाड़ी लहजे में कहा ।
-- क्यों?
-- पेशी।
-- कैसी पेशी?
-- अनाउंसरों ने एसडी साहब से शिकायत की है कि दक्षणी बात-बात में गाली बोलते हैं, यह भी ध्यान नहीं रखते कि पास में महिलाएं खड़ी हैं।
दक्षणी का चेहरा-मोहरा मेरी आँखों के आगे उभर आया। खिचडी बाल, इस्तरी की हुई सफेद कलफदार कमीज़, कॉडराय की पेंट, मुंह में पान, सिगरेट के कश लेते-लेते, बीच-बीच में पीक थूकते हुए "भिंच:- भिंच:" शब्दों का प्रयोग, जिसके बारे में सबका मानना था कि वह गाली है।
मैंने कहा- कई बार समझाया था उसे, यार मुंह पर कंट्रोल रखा कर, पर समझे तो न। आज फंस गया न? नाटक, संगीत प्रभागों से भी लोग बाहर आ गये और दक्षणी के व्यवहार पर चर्चा होने लगी।
-- हुआ क्या था?
-- दक्षणी की जबान गंदी है सभी जानते हैं। मिसेज़ गुप्ता कल जब ट्रांसपोर्ट सैक्शन में कार-आर्डर देने गईं, दक्षणी ड्राइवरों से बात कर रहा था, बात करते हुए उसके मुंह से गालियां भी निकल गईं।
--कारें कम हैं, ज़रूरत ज्यादा है, खीज में गाली मुंह से निकल ही जाती है।
-- पर यह कुछ नया तो नहीं हुआ।
-- लेकिन श्रीमती गुप्ता को पहले प्रोग्राम एग्जिक्यूटिव से शिकायत करनी चाहिये थी या फिर एएसडी से, सीधे एसडी के पास जाने की क्या ज़रूरत थी और वह भी सारे स्टाफ को लेकर?
--- तो भी वह अपना काम मुस्तैदी से करता है, कभी किसी तरह की शिकायत का मौका नहीं देता। उसे इतना तो क्रेडिट देना चाहिये था। अब अगर गाली देता है तो "इग्नोर" कर दीजिये। इतना बड़ा बतंगड़ बनाने की क्या जरूरत थी।
-- शहर में जहां देखो गालियां दी जा रही हैं, बसों में, बाज़ारों में।
-- पर अनुशासन भी कोई चीज़ है। अगर सभी भींचो-भीं करने लगें तब? दक्षणी को अपनी बुरी आदत की सज़ा तो भुगतनी ही पड़ेगी।
-- लेकिन जो भी है, है तो वह अपना सहयोगी ही, उसके साथ जो होनेवाला है, बड़े दुख की बात है, मैंने कहा। मुझे अपने प्रोग्राम की चिंता थी कि अगर विवाह-उत्सव के लिये वक्त पर न पहुंच पाया तो कार्यक्रम के लिये साउंड इफैक्ट का एक बहुत बढ़िया टुकड़ा रिकार्ड होने से रह जायेगा।
तभी न्यूज़ रूम से एस.एस. आते हुए दिखायी दिये। आंखों में काजल, गले मे रुद्राक्षों की माला, कुर्ते में चांदी के बटन और उंगलियों में एक दो अगूठियां। एस.के. थे तो समाचार वाचक लेकिन उनकी ख्याति दो अन्य क्षेत्रों में उनकी विशेषज्ञता को लेकर थी। एक क्षेत्र था रुद्राक्षों और तरह-तरह के मनके-मोतियों का, जो वह बेचा करते थे और दूसरा था गालियों का जो वे अपनी डायरी में लगभग बीस-पच्चीस वर्षों से जमा करते आ रहे थे। जब कहीं कोई गाली सुनते थे, वह उसे चट नोट करते थे। वह कहते थे कि वह इस विषय पर शोध कर रहे हैं और एक दिन गालियां का संकलन छपवायेंगे।
जब एस.एस. ने दक्षणी प्रसंग के बारे में सुना तो बोले- भिंच: तो गाली ही नहीं रही अब। मैं अपनी किताब में उसे सम्मिलित भी नहीं करने जा रहा। समाचार वाचक होने के नाते, एस.एस. का उच्चारण इतना शुद्ध था कि वाक्य का एक-एक शब्द आधिकारिक लगा। एस.एस. ने अपनी डायरी खोली, उसमें से कुछ चुनिंदा गालियां छांटी और अपनी खरजदार आवाज़ में शब्दों को जमा-जमा कर उच्चारते हुए कहा- गाली तो यह है! कल्पना देखिये...।
फिर एस.एस. ने अपना ब्रीफकेस खोला और वहां खड़े लोगों को तरह तरह की रुद्राक्ष-मालाएं और किस्म-किस्म के नगीने, नीलम, टोपाज़, टर्कोइज़, फिरोज़ा आदि दिखाने लगे। और कहा- यह मूंगा तो खासतौर पर मिसेज़ गुप्ता के लिये है।
सारी बात हंसी में बदल गई। मुझे लगा कि कार के भरोसे रहा तो मेरा सारा प्रोग्राम धरा रह जायेगा। अमर सिंह ने कहा -- संकरी गंदी बस्तियों में कार कहां चल पायेगी साहब?
मुझे उसकी बात ठीक लगी। मैंने अपने बजाज स्कूटर में ही जाना ठीक समझा।
मैं जानता था कि केंद्र निदेशक लूथरा, हैं तो बड़े हंसमुख और मृदु स्वभाव के, लेकिन अनुशासन के मामले में बड़े कड़े हैं। कहा जाता था कि यह अनुशासनप्रियता उन्होंने अपने सैनिक जीवन के दौरान पायी थी, जहां से वह इमरजेंसी कमीशन मिलने के बाद मेजर के पद से रिटायर हुए थे। उनके गौरवर्ण चमकते चेहरे को देख कर लगता था कि उनके वंश में वैदिककाल से ही उनके पूर्वजों ने खून में किसी प्रकार की विजातीय मिलावट नहीं होने दी है। आवाज़ ऊंची नहीं करते थे लेकिन बड़ी मीठी मार करते थे। एक बार मैं उनके कमरे में था। उनके चपरासी पुलिन ने उनके कमरे की कोई चीज़ गलत जगह रख दी थी। उसे कमरे में बुला कर बोले थे- पुलिन! क्या तुमने कभी गधा देखा है? तुम गधे हो।
बाद में भले ही उनकी पत्नी ने उन्हें समझाने की कोशिश की- आपको पुलिन को गधा नहीं कहना चाहिये था, लेकिन उनका जवाब था- डंगरों को इन्सान बनाने के लिये कभी-कभी यह करना ही पड़ता है। हम ड़ंगरों के बीच रहते हैं। फौज में भी हमें यह करना पड़ता था। याद नहीं जब मैं आर्मी अफसर था तो कितने सैल्यूट पड़ते थे। किसी ने सैल्यूट नहीं किया तो कोर्ट मार्शल। डंगरों को बंदा बनाने के लिये यह करना ही पड़ता है। पत्नी बोली- लेकिन पहले तो आप ऐसे न थे।
वह बोले- पहले मैं क्लर्क था। अफसर बनने के बाद जिंदगी जीने का नज़रिया बदलना चाहिये। नहीं तो आदमी तरक्की नहीं कर सकता। और मैंने पाया है अफ़सराना पद पाते ही आदतें, सबकुछ, चाहो न चाहो, अपने आप बदलने लगती हैं।
विषय डंगरों को आदमी बनाने का था या आदमी को डंगर मानने का, लम्बी बहस है, पर सोचिये, ऐसा व्यक्ति क्या दक्षणी को कभी माफ़ कर सकता है?
गालियों के मामले में मेरे विचार यह रहे हैं कि गाली-गलौज भरी ज़ुबान का इस्तेमाल आदमी को शोभा नहीं देता। जो लोग गाली देते हैं उनके मन में अपनी बहन, बेटी, मां के लिये ही नहीं, बल्कि सारी महिलाओं के लिये ही कोई आदर भाव नहीं है, गाली देना ज़लालत है, यह इंसान और इंसानियत की अवमानना है, यह दासता-युग की देन है, जब दासों के स्वामी दासों को फटकारा करते थे, बल्कि सच तो यह कि इस तहज़ीब की शुरूआत उन्होंने की थी। पुलसिये और कई बड़े अधिकारी तो आज भी मातहतों और बंदियों की लानत-मलामत करते हुए उन्हें गालियां देते नहीं अघाते, बल्कि कहते हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। मैं मानता आया था कि अगर समाज को सभ्य बनाना है तो उसे गाली-युक्त-भाषा से मुक्त किया जाना होगा, जिसके लिये ज़रूरी है समाज में शिक्षा का प्रसार। लेकिन दक्षणी? वह तो पढ़ा-लिखा है, वह ऐसा क्यों करता है। यह आदत आसानी से कहां छूटती है, उसने भी यह आदत शायद अपने बड़े-बुजुर्गों ही पायी है और काम कराने का कारगर हथियार लगती है। लेकिन महिलाओं के सामने ऐसी भाषा का प्रयोग? उसे फटकारा जाना ही चाहिये। अगर मैं केंद्र निदेशक होता तो भले ही दक्षणी की जगह मेरा अपना बेटा ही होता तो मैं उसे भी सज़ा देता।
अपने फीचर कार्यक्रम के लिये मैंने दिल्ली के पूर्व में नांगलोई के पास स्थित जेजे कॉलोनी चुनी थी। टूटी-फूटी ईंटों पर ईंटें रखकर बनाये गये मकान, बाँसों को सुतली से बांधकर खड़ी की गई झोंपड़ियां, जगह-जगह बिखरा मलबा, मलबे के ढेर, ढेरों में मुंह मारते आवारा कुत्ते, टूटे-फूटे रास्ते, गड़ढों में बरसात का ठहरा गंदा पानी, पानी पर मच्छरों की बहार, वातावरण में टट्टी-पेशाब की बदबू। पानी-बिजली के अभाव और पोलियो, हैज़ा, मलेरिया आदि रोगों के प्रकोप में जीते लोग। ऐसे माहौल में शादी-ब्याह की चहल-पहल, विवाह-गीतों और बैड-बाजों की आवाज़ें। मुझे लगा, उनकी लहरियां मेरे फीचर को जीवंत बना देंगी।
पर जब मैं वहां पहुंचा, क्या देखता हूं कि बुलडोज़र ख़ड़ा है, पुलिस के सौ-दो सौ सिपाहियों का दल भी तैनात हैं। कुछ झोंपड़ियों का सफाया करते हुए बुलडोजर अपना जबड़ा उठाये विवाह वाले मकान के करीब आ चुका है और इंतजार कर रहा है कि कब कमेटी का अधिकारी इशारा करे और वह मकान को सपाट कर दे। मकान के बाहर लगा छोटा-सा शामियाना गिराया जा चुका था, वंदनवार टेढ़ा हो गया था, रंग-बिरंगी झंडियां सुतली पर झूल गयी थीं। कुर्सियों, चारपाइयों और जमीन पर बैठे बराती उठकर खड़े हो गये थे। उनके अलावा कुछ रोते-बिलखते वे लोग भी थे जिनकी झोंपड़ियां गिरायी जा चुकी थीं। घोड़ी पर बैठा दूल्हा अपने सेहरे की मालायें हटा कर हक्का-बक्का यह सब देखता रहा।
मैंने टिल्लू को देखा, टिल्लू ने मुझे, पर दोनों कुछ नहीं बोले। लड़की का बाप कमेटी वालों की मिन्नत-खुशामद करने लगा कि शादी की रस्म पूरी हो जाने दो, उसके बाद जो चाहे कर लेना। कमेटी वाले कुछ सुनने को तैयार नहीं थे। तभी क्या देखता हूं कि मकान से एक औरत निकलती हुई आयी और कमेटीवालों पर बरस पड़ी। वह लड़की की मां थी शायद। मकान के बाहर दोनों हाथ फैलाकर खड़ी हो ललकारने लगी- खबरदार आगे बढ़े तो बेशरम, बेहया, हरामजादे कहीं के।
कमेटीवालों पर उन शब्दों का कोई असर होता दिखायी नहीं दे रहा था। वह बौखला कर और भी गालियां देने लगी।
- सरकारी भड़वो। फटे निरोध के नतीजो, लंडूसो, कुत्ते के बीजो, बुलडोज़र अंदर कर दूंगी।
कमेटीवाले अधिकारी ने कहा- देखिये गाली मत दीजिए।
तब तो और लोग भी गालियां देने में उसके साथ जुड़ गये।
मैंने अपना टेप रिकार्डर चालू कर दिया। टिल्लू से पूछा - यह हुआ क्या? यहां तो ब्याह होना था।
वह बोला- कमेटीवाले कहते हैं कि दो दिन पहले नोटिस दिया था कि यह इलाका खाली कर दो। यह झूठ बोलते हैं। कोई नोटिस-वोटिस नहीं दिया सालों ने।
एक अन्य आदमी, जो मैल-खोरी कुर्ती और लबादे में था, चिल्लाया- यह लोग बड़े बेरहम हैं, अभी एक झोंपड़ा गिराकर आये हैं, इनके जाने के बाद वहां एक औरत ने बच्चा जना है खुले में। बहुत ज़ालिम हैं भैंचो।
उसके बाद तो दोनों तरफ से मोटी-मोटी गालियां की बौछार होने लगीं। तेरी तो बहन..। खबरदार... बेटी...। मादर... लौ... ली... चो... फु... भो... का... खा...। कुत्ते बुलडोज़र की तरफ मुंह उठाये अपनी प्रतिभा का अलग प्रदर्शन करने लगे।
हिंदी वर्णमाला का शायद ही कोई अक्षर रहा हो जिससे कोई गाली न दी जा रही हो। ज़रूर दक्षणी का मामला मेरे दिमाग़ में ताज़ा रहा होगा कि मेरा ध्यान गालियों की तरफ अधिक जा रहा था। मैंने बीच-बचाव करना चाहा।
- देखो भाईयो, गाली-गलौज करने से कुछ हासिल नहीं होता। ज़रा तहज़ीब...!
- बड़े आये तहज़ीब समझाने वाले। सरकार के...। और फिर किसी ने मेरा सत्कार भी गालियों से कर दिया ।
मैं कमेटी के अधिकारी को एक तरफ ले गया। उससे कहा- भाई आप कुछ देर रुक जाइये।
- नहीं जी। हमें कोर्ट के ऑडर हैं। और जी इन लोगों का यही है। न हटने का एक न एक बहाना ढूंढते ही रहते हैं। एक की माने तो दूसरा कहता है कि उसे छोड़ा है, तो मुझे भी छोड़ो। यह बड़े शातिर हैं भिंचो।
मैंने गाली सुनकर अनसुनी कर दी। मुझे लगा कि मैंने गाली को मुद्दा बनाया तो बात बननी तो क्या मेरा फीचर भी बनने से रह जायेगा। वह कोर्ट का फरमान दिखा-दिखा कर बोलता गया- फिर आप लोग ही कहते हैं कि शहर में गंदगी बहुत है, जेजे कॉलोनियां फैलती ही जा रही हैं। सरकार इनका इलाज क्यों नहीं करती। आप लोगों की सोसाइटियां कोर्ट में जाती हैं, मुकदमा जीतती हैं। हम तो बस कानून का पालन करते हैं जी।
उसने बुलडोज़र चालक को इशारा किया। पुलिसवाले भी चौकस हो गये। बुलडोज़र का जबड़ा खुला। वह उस एक ईंट के मकान की ओर बढ़ा। लड़की मां अब और भी ज़ोर चिल्लायी। पर बुलडोज़र बढ़ता ही जा रहा था। कुछ लोगों ने जब देखा कि बुलडोज़र उसे रौंद ही डालेगा, उन्होंने उसे बुलडोज़र के सामने से हटा लिया। अंदर बैठी औरतें बाहर निकल आयीं। दुल्हन भी अपने लाल साड़ी संभालती हुई बाहर भाग आयी। सब रोते-बिलखते, फटी-फटी आंखों से मकान का गिराया जाना देखने लगे। शोर मच गया। गालियों की बौछार और भी तेज़ हो गई। कमेटी बुलडोज़र एक ही मार से मकान को लीलते हुए आगे बढ़ गया। उसकी घर्र-घ्रर्र की आवाज़ ऐसी थी जैसे ज़रूरत से ज़्यादा खाने के बाद कोई भीमकाय जंतु डकार रहा हो। लड़की की मां मानो पगला ही गई। कभी घर को देखती, कभी आगे निकल गये बुलडोज़र को। वह बुलडोज़र के पीछे भागी। लेकिन वह तो काफी आगे निकल चुका था। वह वहीं जमीन पर बैठ गई। उसने सहसा आसमान की तरफ देखा, हाथ ऊपर फैला दिए और आंखें तरेरते हुए गरजी - शर्म कर, अपनी करनी पर। उसने उसे भी गाली दी।
इतना छोटा-सा मकान कि बुलडोज़र की एक ही ठोकर उसे चूर कर गई! मैंने अपने स्कूटर की सीट पर बैठते हुए टिल्लू से पूछा- यार इसमें पूरा एक कुनबा कैसे रहता होगा?
टिल्लू बोला - रह लेते हैं जी।
उसने गले में बांधे रूमाल को खोलते हुए अपना माथा पोंछा। मैंने दबी आवाज़ में मन में दबी जिज्ञासा ज़ाहिर की। मां-बाप प्यार-व्यार भी तो करते होंगे। मेरा मतलब है सैक्स?
-- हां सब होता है? बच्चे देखते ही हैं...।
दूर-दूर तक समतल कर दिये गये मैदान में बच्चे, बड़े, बूढ़े, औरत-मर्द रोते, आंखें पोंछते, अपनी-अपनी चीज़ें टटोल रहे थे। उनके स्वर अस्फुट थे। मेरा मन हुआ कि उनके पास जाकर उनकी आवाज़ रिकार्ड करूं, यह मेरे प्रोग्राम के लिये लाजवाब सामग्री बनेंगी। पर पहले टिल्लू से जो सवाल किया था उसका जवाब सुनना चाहता था।
मैंने अपनी बात को आगे बढ़ाया -- बच्चों के सामने?
-- हां वह भी। सर्दियों में खासतौर पर।
– बच्चों पर उसका क्या असर होता है?
-- क्या? क्या?
-- हां-हां। आपने ठीक सुना है ।
मुझे वह मंज़र आज भी याद है। सूर्य ढलते-ढलते जैसे रुक गया हो। साये लम्बे होने लगे थे। उजाड़, बियाबान मैदान में खड़ी घोड़ी, अजब हैरान-सी कि इस तरह के द्वार पर तो पहले कभी नहीं आयी ऐसी बेइज्ज़ती, इतनी बेहुर्मती! घोड़ी पर बैठा दूल्हा, असमंजस में दांय-बांय देखता कि बैठा रहे या उतर जाये। मलबे में से दुल्हन और उसकी सखियों का दहेज का सामान बीन-बीन कर संदूक में रखते हुए, बीच-बीच में बरातियों को देखना कि पहले स्वागत-गीत गायें या घर को देखें। सहसा एक महिला स्वर का उभरना। मेरी बन्नो...। दुल्हन का श्रृंगार होने लगना। उसी बीच लड़की की मां का भी दूल्हे के स्वागत में मंगल गीत गाने लगना और अन्य औरतों की आवाज़ों का भी जुड़ते चले जाना।
फिर जैसे सरकारी फरमान को ठेंगा दिखाते हुए वहीं एक नया घरबार बसाने की तैयारियां होने लगीं। कड़ाहे चूल्हों पर चढ़ा दिये गये। मंडप खड़ा किया जाने लगा। टिल्लू भी मदद करने के लिये खड़ा हो गया। मैं भी उसका हाथ बंटाने के इरादे से उठा। अब सोचता हूं कि उस समय मेरी कोशिश यह अधिक थी कि टेप रिकार्डर का माइक वक्ता के मुख के समीप रहे ताकि रिकार्डिंग का लेवल प्रसारण की तकनीकी के भीतर रहे।
बैंडवालों से कहा गया कि कोई अच्छी सी धुन छेड़ें। मैं बैंडवालों के पास चला गया ताकि फीचर के लिये भरी-भरी रिकार्डिंग कर सकूं। वर-वधु से कहा गया कि जय मालाएं पहनाएं।
मुझे लगा और रुकूंगा तो प्रोग्राम एडिट करने के लिये समय कम रह जायेगा। मैंने स्कूटर उठाया और चला आया।
दफ्तर लौटा तो ड्राइवर अमर सिंह पोर्च में ही मिल गया। मुझे देख कर दक्षणी का किस्सा सुनाने लगा- पता है क्या हुआ?
-- क्या हुआ अमर सिंह जी?
-- दक्षणी के हाथ से ट्रांस्पोर्ट सैक्शन गया।
-- पर हुआ क्या?
-- एसडी साहब ने दक्षणी को बुला कर कहा महिलाओं की शिकायत है तुम गालियां बहुत इस्तेमाल करते हो? पता है दक्षणी क्या बोला? बोला- कौन कहता है, भिंच:? मिसेज़ गुप्ता वहीं थी, वह बोलीं- देखिये फिर दी गाली। दक्षणी के मुंह से फिर निकल गया - कहां! कहां! किसको दी गाली भिंच:? एसडी साहब ने कहा - हद है सब को सुनाई दी गाली, आपको ही नहीं सुनाई देती। भाषा में एक से एक सुंदर शब्द हैं ही इसलिये कि कड़वी से कड़वी बात भी कहो तो सलीके से। गाली बोलने की क्या ज़रूरत है। एसडी साहब ने चेतावनी दी है- अगर बोलने पर क़ाबू न रखा, सस्पैंड करना पड़ सकता है। इस वक्त सिर्फ ट्रांसपोर्ट सैक्शन से ही हटा रहा हूं।
मैं अमर सिंह की बात सुनते हुए सोचता रहा - केवल शिक्षा से कुछ नहीं होगा, गालियों से भी पहले समाज को उन स्थितियों से मुक्त करने और उसका अहसास कराने की ज़रूरत है सबको जिसमें लोग गाली-सरीखा जीवन जीने के लिये अभिशप्त हैं।
मैंने घड़ी देखी। फीचर तैयार करने के लिये तीन-चार घंटे का समय बचा था। मैं स्टूडियो की तरफ लपका। रिकार्डिंग बड़े टेप पर ट्रांस्फर की। जब मैं टेप को एडिट कर रहा था, तो यह ही सोचता रहा कि उसमें से क्या रखूं और क्या काट दूं। घंटेभर तक शब्दों को विलग करने की कोशिश करता रहा, पर नाकाम रहा। यह भी ख्याल आता रहा कि पत्रकारिता की नैतिक-नियमों के अनुरूप क्या करना ठीक रहेगा? हर शब्द एक दूसरे से इतना जुड़ा हुआ था कि मुंह से निकला - भिंचो ।
जब मैं प्रोग्राम तैयार नहीं कर पाया तो मैंने अपना एक पुराना प्रोग्राम प्रसारित करने के निर्देश दिये और घर चला आया।
घर पर जब लूथरा़ साहब ने रेडियो पर सुना- प्रकाशित कार्यक्रम के स्थान पर आज प्रस्तुत है रूपक - दिल्ली के खोमचेवाले, तो उन्होंने मुझे फोन किया - यह सब क्या है?
-- माफी चाहता हूं सर। बस कुछ ऐसा हो गया, वक्त रहते एडिट नहीं कर पाया। कल ज़रूर कर दूंगा।
अगले दिन स्टूडियो का चक्कर लगाते हुए लूथरा़ साहब मेरे स्टूडियो में आ पहुंचे। घर लौटने से पहले यह उनका रोज़ का नियम था। मुझे काम में व्यस्त देख उन्होंने पूछा - फीचर तैयार हो गया?
-- लगभग तैयार हो ही गया है सर। आपको सुनाना चाहता हूं?
--- मैं घर पर रेडियो पर सुन लूंगा।
-- सर, आप प्रसारण से पहले सुन लेंगे, तो मुझे तसल्ली हो जायेगी।
-- ठीक है। सुनाओ?
वह कुर्सी खींच कर पीठ लगा कर बैठ गये। दिनभर की, बल्कि पूरी उम्र की थकान उनके चेहरे पर देखी जा सकती थी। मैंने टेप रिकार्डर चला दिया। शादी, डिमोलीशन, बुलडोज़र, औरतों मर्दों की आवाज़ें आने लगीं। बेटी... बहन.. मादर.. साले.. फटी.. गा.. से चो... फा... गालियों का फव्वारा दोनों पक्षों की तरफ से उमड़ रहा था। लूथरा साहब ने कहा - यह क्या है? सभी डंगर। बंद करो इसे। यह फीचर बनाया है?
मैंने कहा - यह सवाल तो पूरे हिंदोस्तान से तलब करना होगा सर।
उनके होंठ कुछ इस तरह हिले मानों कोई गाली मुंह में आकार लेने को हो...।

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