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हाजोंग जनजाति का सांस्कृतिक वैशिष्ट्य
01-Oct-2018 07:56 PM 2205     

जनसंख्या की दृष्टि से हाजोंग एक छोटा समुदाय है। इनकी अधिकांश आबादी मेघालय में निवास करती है। इसके अतिरिक्त असम के कार्बी ओंगलोंग तथा नार्थ कछार हिल्स जिलों में भी हाजोंग जनजाति के लोग रहते हैं। मेघालय की सीमा पर स्थित असम के लखीमपुर व ग्वालपारा जिलों में भी इनकी कुछ आबादी है। इस समुदाय के उद्भव और मूल निवास के संबंध में अनेक आख्यान तथा मिथक प्रचलित हैं। इस जनजाति के लोगों का विश्वास है कि इनका मूल निवास क्षेत्र असम के नलबारी जिले में स्थित हाजो था। किसी कारणवश ये लोग हाजो छोड़कर गारो हिल्स (वर्तमान में मेघालय) में बस गए। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि हाजोंग लोग महाभारत काल के क्षत्रिय राजा किरातार्जुन के वंशज हैं। परशुराम ने किरातार्जुन से प्रतिशोध लेने के लिए आर्यावर्त को क्षत्रियविहीन करने का संकल्प लिया था क्योकि किरातार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया था। जिस समय परशुराम ने किरातार्जुन को मारा उस समय रानी स्वरूपा देवी गर्भवती थीं। रानी भागकर कामरूप में संत कामदत्त के आश्रम में आ गई जहाँ पर उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। उस पुत्र का नाम पादांशु था। पादांशु ने हाजो को अपना निवास क्षेत्र बनाया। कुमार भाष्कर बर्मन उन्हीं के वंशज थे। ऐसा माना जाता है कि हाजोंग समुदाय कुमार भाष्कर बर्मन के वंशज हैं तथा हाजो से संबंध होने के कारण उन्हें हाजोंग कहा गया। कुछ विद्वानों का अभिमत है कि हाजोंग गारो भाषा का शब्द है। गारो भाषा में हा का अर्थ भूमि और जोंग का अर्थ चींटी या कीड़ा होता है। यहाँ जोंग का व्यापक अर्थ मानव है। इस प्रकार हाजोंग का अर्थ भूमिपुत्र है अर्थात ऐसे लोग जो भूमि पर कृषि कर्म कर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। हाजोंग लोग स्वयं को क्षत्रिय के रूप में अपना परिचय देते हैं। इस समुदाय के गोत्र के संबंध में भी काफी भ्रम और अनिश्चय है। कुछ विद्वानों के अनुसार हाजोंग के 21 गोत्र, कुछ के अनुसार 7 गोत्र और कुछ के अनुसार 3 गोत्र हैं। सामान्य हाजोंग लोग तीन गोत्र के नाम ही जानते हैं - चंडी, केंदागईया और बलियाती। यह पितृसत्तात्मक समाज है। पिता ही परिवार का मुखिया होता है, उसी का निर्णय अंतिम होता है। पुत्र पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है। पिता द्वारा लिए गए ऋण का भुगतान करने एवं पिता का अंतिम संस्कार करने का दायित्व भी उसी के कन्धों पर होता है। पैतृक संपत्ति पर पुत्री का कोई अधिकार नहीं होता है। किसी व्यक्ति को पुत्र नहीं होने की स्थिति में उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर उस वंश के किसी पुरुष सदस्य का उत्तराधिकार होता है। इस समुदाय में विवाह विषमगोत्रीय होते हैं। पति-पत्नी का गोत्र अलग-अलग होना आवश्यक है। ऐसा माना जाता है कि एक गोत्र के सभी सदस्य परस्पर भाई-बहन हैं। समुदाय से बाहर शादी सर्वथा प्रतिबंधित है। समुदाय से बाहर विवाह करने पर उस परिवार से गाँव के सभी लोग अपने संबंध तोड़ लेते हैं। उस परिवार को इस शर्त पर पुनः समुदाय में शामिल किया जा सकता है जब वह आर्थिक दंड देता है तथा गाँववालों के लिए भोज का आयोजन करता है। इस समाज में वधू मूल्य की परंपरा मौजूद है जिसे खल्ती कहा जाता है। इसकी राशि बहुत कम होती है। इस जनजाति में एकपत्नी प्रथा है। संतान नहीं होने के बावजूद पुरुष दूसरी शादी नहीं कर सकता है। तलाक बहुत कम होते हैं। गाँव के बुजुर्ग लोगों की सहमति से विधवा पुनः शादी कर सकती है। इस समुदाय में तीन प्रकार के विवाह प्रचलित हैं - 1. बातचीत द्वारा विवाह जिसे शुभ विवाह कहा जाता है, 2. विधवा और विधुर के बीच विवाह जिसे हंगो कहते हैं और 3. सहपलायन द्वारा विवाह जिसे दाई पारा कहते हैं।
पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों की तरह हाजोंग समुदाय का भी मुख्य भोजन चावल है। चावल के साथ सब्जियां और कभी-कभी दाल भी खाते हैं। ये लोग मछली भी खाते हैं परन्तु सुअर का मांस नहीं खाते हैं। बकरी और कबूतर का मांस खाया जाता है। पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों के विपरीत हाजोंग समाज में मदिरा का नियमित सेवन नहीं किया जाता है। पूर्वोत्तर की अधिकांश जनजातियाँ दूध का उपयोग नहीं करतीं परन्तु हाजोंग समाज दूध और दुग्ध उत्पादों का नियमित उपयोग करता है। पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों की तरह इस जनजाति का भी मुख्य पेशा कृषि है। ये लोग स्थायी खेती करते हैं। चावल इनकी मुख्य फसल है। अन्य फसलें हैं- सरसों, सब्जियां, फल इत्यादि। महिला-पुरुष सभी खेतों में कम करते हैं। महिलाएं हल नहीं चलाती हैं। बकरी, बत्तख, कबूतर आदि पालते हैं लेकिन इस समुदाय में मुर्गी और सुअर का पालन करना वर्जित है। महिलाएं कताई-बुनाई में दक्ष होती हैं। प्रत्येक घर में हथकरघा मौजूद होता है। बुनाई हाजोंग समुदाय का कुटीर उद्योग है। बांस और बेंत की गृहोपयोगी वस्तुएं बनाने में भी ये लोग पारंगत होते हैं। धार्मिक दृष्टि से हाजोंग समुदाय हिंदू धर्मावलम्बी है, परन्तु अभी भी इस समाज में कुछ पारंपरिक रीति-रिवाजों एवं विश्वासों का पालन किया जाता है। अधिकांश लोग शक्ति के उपासक हैं किन्तु कुछ लोग वैष्णव भी हैं। ये लोग अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते हैं जिनमें से कुछ हिंदू धर्म से संबंधित हैं तो कुछ प्रकृति पूजा से। तुलसी के प्रति हाजोंग समुदाय की अगाध आस्था है। प्रत्येक घर में तुलसी का पौधा विद्यमान होता है। तुलसी के पौधे के निकट संध्या के समय महिलाओं द्वारा धूप, दीप, अगरबत्ती जलाई जाती है तथा आध्यात्मिक गीत गाए जाते हैं। हाजोंग समुदाय अनेक भूत-प्रेतों में विश्वास करता है, कुछ के नाम हैं - जारंग देव, माचंग देव, डैनी, मैला, भूत, जुखिनी इत्यादि।
प्रतिवर्ष श्रावण मास के अंतिम दिन सर्पों की देवी मनसा की पूजा की जाती है। सभी पर्व व त्योहारों में गाँव का पुजारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसे अधिकारी कहा जाता है। प्रतिवर्ष बैशाख में बांस पूजा की जाती है। नए बांस को काटकर उसे सफ़ेद या लाल कपड़े से सजाया जाता है और उसे भूमि में गाड़कर उसकी पूजा की जाती है। जमीन में तीन बांस गाड़े जाते हैं जिनमे से दो बांस मदन और गोपाल के प्रतीक हैं। कुछ लोग इसे शिव व पार्वती का प्रतीक मानते हैं जबकि कुछ लोग इसे कामदेव का प्रतीक समझते हैं। हाजोंग समुदाय में कार्तिक पूजा को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। कार्तिक पूजा केवल महिलाओं द्वारा मनाया जाता है, पुरुषों का इस पूजा में सम्मिलित होना अथवा पूजा स्थल में प्रवेश करना वर्जित है। यह कार्तिक माह के अंत में मनाई जाती है तथा इसमें भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महिलाएं उपवास रखती हैं। पूरी रात महिलाएं नृत्य करती हैं और गीत गाती हैं। अन्य असमिया समुदायों की भांति हाजोंग समाज भी तीन बिहू मनाता है - रंगाली बिहू, माघ बिहू और काती बिहू। रंगाली बिहू को सैता संगरनी, माघ बिहू को पुष्ण और काती बिहू को कातीगासा कहा जाता है। इनका पुनर्जन्म, आत्मा के अमरत्व, स्वर्ग और नरक की अवधारणा में विश्वास है। मृत्यु के बाद हिंदू धर्म के अनुसार अंत्येष्टि की जाती है। मृत्यु के बाद शव को तुलसी पौधे के निकट लाया जाता है तथा उसे हल्दी मिश्रित जल से साफ किया जाता है। शव के दोनों अंगूठे को एक-एक सफ़ेद धागे से बांध दिया जाता है। इसके बाद शव को दाहस्थल पर ले जाकर चिता में आग लगाई जाती है। कुछ हड्डियाँ एकत्रित कर उसे घर के आँगन में मिटटी में गाड दिया जाता है तथा उस पर तुलसी का पौधा लगा दिया जाता है। प्रतिदिन संध्या समय वहां दीपक जलाया जाता है। मृत्यु के दसवें या बारहवें दिन नदी के तट पर घातकमनी संस्कार किया जाता है। नदी तट पर मिट्टी के पात्र में मृतक के लिए ग्रामवासियों द्वारा भोजन तैयार किया जाता है। मृतक का पुत्र नदी में स्नान कर अपना शुद्धिकरण करता है। ग्यारहवें या तेरहवें दिन हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम श्राद्ध किया जाता है तथा गाँववासियों को भोज दिया जाता है। श्राद्ध के दौरान मदिरा पान करना सर्वथा वर्जित है। एक वर्ष तक मृतक के पुत्र कुछ निषेधों का पालन करते हैं। जैसे छाता का उपयोग न करना, केला नहीं खाना, दूसरे के घर भोजन न करना आदि।

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