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रोशनी का संचार
01-Oct-2019 11:30 AM 647     

सभी लोग नये साल के जश्न की तैयारी में जुटे थे। चारों तरफ रंगीन कनातें तन चुकी थीं। लाइटों की कुछ लड़ियाँ अव्यवस्थित सी पड़ी थीं; जिनको अभी लगाना बाकी था। लॉन की मखमली दूब पर रंग-बिरंगी कुर्सियाँ रखी हुई थीं। लॉन की बाहरी दीवार से सटे हुए अशोक के वृक्षों पर आम, लीची, अंगूर और तितलियों से सजी हुई लाइटें लगाईं गईं थीं; जिसको देखकर आभास ही नहीं हो रहा था कि वो रात का वक्त है। शायद ऐसा ही आभास उस पेड़ पर रहने वाली चिड़ियों के जोड़े को हुआ था तभी तो वह भी उठकर उछल-कूद कर रहा था, लेकिन वह बड़ा भ्रमित नज़र आ रहा था, उनके नन्हें-नन्हें बच्चे भी चीं-चीं चूँ-चूँ की आवाज़ से सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे, किन्तु लोगों को तो अपनी ही पड़ी थी। ऐसे दुनिया में जहाँ इन्सान ही इन्सान को कुछ नहीं समझता तो वहाँ पक्षियों की तो औकात ही क्या? कौन सोचेगा उनके बारे में? एक बड़े से हॉल को फूलों से सजाया गया था, रंगीन गुब्बारों से नववर्ष लिखा गया था। एक ओर मेज़ पर बड़ा सा केक रखा था। जिस पर लिखा था- "नववर्ष तुम्हारा स्वागत है।" बराबर वाले हॉल में खाने-पीने की व्यवस्था की गई थी। लोगों की भीड़ धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। यह पार्टी शहर के एक बड़े व्यापारी के घर पर थी। पिछले वर्षों के मुकाबले इस वर्ष पार्टी कुछ ज्यादा शानदार थी। शहर के सभी लोग इस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। धीरे-धीरे घड़ी की सुइयाँ बारह की ओर खिसक रही थीं और लोग पुराने वर्ष को विदाई और नये के स्वागत की प्रतीक्षा कर रहे थे।
अचानक सारी लाइटें गुल हो गईं और जैसे ही घड़ी ने बारह बजाए तालियों की गड़गड़ाहट, आतिशबाजियों की रोशनी, म्यूजिक की ध्वनि और हैप्पी न्यू ईयर की आवाज़ से सारा वातावरण गूँज़ उठा। आवाज़ें कटे शीशे की तरह नीता के कान से जा टकराईं और वो चीख पड़ी- "बन्द करो ये शोरगुल, भगवान के लिए चुप हो जाओ।" लेकिन वहाँ उसकी कोई सुनने वाला नहीं था। वह खुद में ही तिलमिलाकर रह गई। बदहवासी में सड़क पर निकल पड़ी। वह अपने आपे में नहीं थी, बस दौड़े जा रही थी, न दिशा का ज्ञान न ही मंजिल का पता। तभी सामने से तेज रफ्तार में आती गाड़ी से टकराकर सड़क के दूसरे किनारे पर जा गिरी। किसी सज्जन ने अस्पताल पहुँचाया दो दिन बाद आज़ होश आया। अपने आपको बिस्तर पर देखकर नीता अतीत के पन्नों में खो गई।
ऐसा ही एक बैड था जब कुछ दिनों पहले वो अस्पताल में भर्ती हुई थी। वो दिन उसकी जिंदगी का सबसे हसीन दिन था। वह माँ जो बनने वाली थी। उसका महेश भावविभोर होकर बार-बार उसका मस्तक चूम लेता था। दोनों ने न जाने कितने सपने देख डाले थे अपने नन्हें-मुन्ने की कल्पना में। तभी तीव्र पीड़ा से कराह उठी थी मीता। महेश ने डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने बताया कि अब वो घड़ी आ चुकी है, जब उनका सपना पूरा होगा। डॉक्टर मीता को अन्दर ले गये और महेश मीता और आने वाले बच्चे की सलामती की भगवान से प्रार्थना करता रहा। यही कुछ दो घन्टे के पश्चात एक नर्स और डॉक्टर सुन्दर से गोलमटोल बच्चे को साथ लिये बाहर आए। महेश ने जब बच्चे को देखा तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। बच्चे को गोद में लेकर एकटक उसे निहारता रहा जैसे उसमें अपना बचपन ढूँढ रहा हो।
मीता और महेश बच्चे को पाकर बहुत खुश थे। दोनों ने मिलकर एक बड़ा-सा जश्न करने की ठानी। बस फिर क्या था, दोनों जुट गये काम में, मेहमानों की लिस्ट तैयार की गई, मैन्यू फिक्स कर लिया गया, कार्ड छपवा दिये गये और न जाने क्या-क्या तैयारियाँ कर डाली गईं उस नवागन्तुक की खुशी में, क्योंकि पार्टी पन्द्रह दिन बाद ही जो थी। ऐसे अवसर पर एक कमी बहुत खल रही थी वह थी महेश की माताजी; जो कुछ दिन पहले ही न जाने कितने अधूरे सपने साथ लेकर इस जहाँ से विदा ले गईं थीं। अब इस परिवार में सिर्फ महेश, महेश के पिता, महेश का छोटा भाई रमेश और महेश की पत्नी मीता ही थे। महेश को रह-रहकर आज माँ बहुत याद आ रहीं थीं, जब भी महेश की माँ उसको बुरी तरह काम में जुटा देखती तभी कहती -"महेश अब मुझे तु्म्हारी शादी करनी पड़ेगी तभी शायद तुम घर में भी कुछ वक्त रुक पाओ वरना तो हर समय बस काम ही काम, मेरी भी इच्छा है मैं भी किसी के साथ बातचीत करूँ, किसी के साथ खेलूँ, तुम शादी कर लोगे तो मैं भी अपने पोते-पोतियों के साथ खेलने का अपना अरमान पूरा कर लूँगी। तुम्हारे मन में कोई लड़की है तो तुम बताओ वरना मैं तुम्हारे लिए तुम्हारी पसन्द की कोई अच्छी सी लड़की तलाशती हूँ।" ऐसा सुनकर महेश हमेशा ही ना नुकुर करने लगता। इसी तरह वक्त बीतता गया और महेश की माँ अपना अधूरा अरमान लिये इस दुनिया से विलग हो गयीं।
महेश इन दिनों बहुत व्यस्त हो गया था। एक तरफ तो जश्न की तैयारी दूसरी तरफ अपने ऑफिस के पचास काम। सुबह काम पर निकलता और देर रात तक घर लौटता।
मीता बार-बार समझाती - "इतनी भाग दौड़ मत किया करो बीमार पड़ जाओगे।"
पर महेश हमेशा ही हँसकर टाल देता और कहता कि- "कुछ ही दिनों की तो बात है जश्न के बाद तो इतनी भाग दौड़ नहीं रहेगी और अब तो मेरा बेटा भी आ गया हम दोनों मिलकर फटाफट सारा काम निबटा लिया करेगें।"
मीता महेश की इस बात पर खिलखिलाकर हँस पड़ती और महेश उसको अपने आगोश में ले लेता। इस बात को एक हफ़्ता ही हुआ था। अभी महेश और मीता के बेटे का नामकरण संस्कार भी नहीं हुआ था कि हमेशा की तरह आज भी महेश सुबह ही काम पर निकल गया।
जब भी महेश को लोकल जाना होता तो वह हमेशा ही बाइक लेकर जाता, ताकि शहर की भीड़-भाड़ से बच सके। आज भी वह बाइक लेकर निकला। आज भी हमेशा की तरह उसको लौटने में देर हो गई। मीता ने कई बार सोचा कि फोन कर लिया जाए, पर फिर उसी क्षण सोचती चलो आते ही होंगे पर जब घड़ी की सुँइयों ने रात के बारह बजाए तो मीता को चिन्ता सताने लगी। मन में अज़ीब सी दुश्चिन्ताएँ सिर उठाने लगीं। इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, फोन की घन्टी बज उठी। मीता ने दौड़कर फोन उठाया। उसे लगा कि महेश का ही फोन होगा। लेकिन फोन पर किसी अज़नबी की आवाज़ सुनकर वह कुछ आशंकित सी हुई और जब उधर से बोलने वाले व्यक्ति की पूरी बात सुनी तो अपने होश गँवा बैठी। आँखें खुली तो अपने सामने अपने पिता समान ससुर को पाया जो पानी के छीटें मारकर उसे होश में लाने का प्रयत्न कर रहे थे और बेतहाशा बोले जा रहे थे- "क्या हुआ बेटे? बोलो तो किसका फोन था?"
मीता बस इतना ही कह पाई - "वो महेश..." महेश के पिता लगभग चीख पड़े- "बताओ क्या हुआ महेश को? कहाँ है मेरा बेटा?"
मीता ने अपने आपको सँभाला और कहा "वो अस्पताल में हैं। उनका एक्सीडेन्ट हो गया है।"
महेश के पिता सकते में रह गए। फिर थके से कदमों से फोन के पास जाकर जैसे ही फोन उठाया उनके हाथ से रिसीवर छूट गया। तब मीता ने खुद में हिम्मत जुटाई और रिसीवर उठाकर उनके हाथ में दे दिया। महेश के पिता ने महेश के मोबाइल पर फोन किया। किसी अज़नबी ने फोन उठाया और बताया कि वो कौन से अस्पताल में है। महेश के पिता और महेश का दोस्त अस्पताल पहुँचे। महेश की हालत देखी नहीं गई। उसके आँख, नाक और मुँह से लगातार खून बह रहा था। सिर फट गया था, डॉक्टर ऑपरेशन की तैयारी में उसके अपने किसी के आने का इन्तज़ार कर रहे थे, ताकि शीघ्र से शीघ्र उसका खून का बहना रोका जा सके। ऑपरेशन के बाद महेश को आईसीसीयू में रखा गया।
दो दिन हो गए थे पर महेश को अभी तक होश नहीं आया था। डॉक्टर अभी भी बता रहे थे कि खतरा टला नहीं है। सबकी साँस अटकी हुई थीं। सभी भगवान से मन्नत माँग रहे थे पर होनी को कुछ ओर ही मंज़ूर था। जैसे ही खतरे से बाहर वाली घड़ी आती उससे पहले ही महेश सबसे विदा ले गया।
बड़ा मनहूस दिन था वो जब सबके घर मोमबत्तियों और दीपकों से जगमगा रहे थे तब किसी घर का चिराग हमेशा-हमेशा के लिए बुझ गया। तब भी लोग इसी तरह जश्न मना रहे थे, आतिशबाजियाँ चला रहे थे। बिल्कुल इसी तरह सब लोग अपने आपे में नहीं थे। वही शोरगुल, वही कहकहे, किसी को कान पड़ी नहीं सुनाई नही दे रही थी। लोग तो कुछ देर आकर गम मनाकर चले गए, पर मीता की जिंदगी तो हमेशा के लिये गमों से भर गई।
अभी शादी को साल भर भी नहीं हुआ था। अभी तो उस नन्हीं सी जान ने पिता के प्यार का ठीक से एहसास भी नहीं किया था। वह यह भी नहीं जानता था कि उसका और उसके पिता का साथ सिर्फ चन्द दिनों का है।
आज मीता की जिंदगी सवाल बनकर उसके सामने खड़ी उसको मुँह चिड़ा रही थी। अभी तो उसको महेश का साथ ठीक से मिला भी नहीं था, अभी तो उन्होनें सपने देखने ही शुरू ही किये थे कि किस्मत ने उनके सारे सपनों को रेत की दीवार की तरह धराशायी कर दिया। मीता का जीवन गमों से भर गया। नन्हीं सी जान को अपने सीने से लगाए बिलखने के अलावा और महेश के साथ बीते चन्द पलों को याद करने के सिवाय उसके पास अब कुछ नहीं बचा था।
उसका लगा जैसे उसका भविष्य अन्धकार की गहरी खाई में दुबक कर बैठ गया। अपने बेटे में ही वह महेश का चेहरा तलाशती कुछ बड़बड़ाती और फिर चेतना शून्य हो जाती। होश में आई तो उसका ध्यान नन्हें शिशु पर गया। वह भूख के मारे होंठ चाट रहा था। मीता के दिल में एक हूक सी उठी। उसने नन्हें प्यारे से, कोमल से बच्चे को अपने सीने से लगा लिया। हौले से उसके सिर पर हाथ फेरने लगी। वह भी कुनमुनाया। उसे लगा घाटियों से होकर किसी मनोरम झरने का संगीत उमड़ पड़ा हो । वह बुदबुदाई- "मैं अकेली नहीं हूँ, मेरा बच्चा है ना मेरे साथ मेरे महेश की निशानी, मैं करूँगी इसका पालन-पोषण और महेश की ही तरह एक नेक, ईमानदार और अच्छा इंसान बनाऊँगी और महेश के हर अधूरे सपने को पूरा करूँगी। उसके ऐसा सोचते ही चारों तरफ मानों रोशनी की लहर दौड़ पड़ी, पूरा वातावरण मानो इत्र सा महक उठा हो, उसके विचारों की दृढता से उसमें नई रोशनी का संचार हुआ।
आज बरसों बाद ही सही पर मीता के सारे सपने पूरे हो गए थे। बेटा भी अब बड़ा हो चुका था। वह भी अपने पापा की तरह ही बहुत ईमानदार और नेक इंसान बना।
जिस महेश ने ईमानदारी के कारण अपनी जान गवाँ दी पर अपने फर्ज़ से गद्दारी नहीं की और पुल के निर्माण में सीमेंट में जरूरत से ज्यादा रेत मिलाने के प्रस्ताव को ठुकरा कर सैंकड़ों लोगों की जान बचाई आज उसके गुनहगारों को सलाखों के पीछे भेजकर मीता ने चैन की साँस ली।

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