ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रतिक्रिया

As is your wont, the 43rd issue of Garbhanal  makes an interesting and wholesome reading. Many felicitations for the same. I am sanguine you will keep making endeavours in the likewise fashion for times to come. With best wishes and warm regards.

VK Sharma, Brigadier (Retired)

 

I received your mail and Hindi E-magazine 43 issue. I am thankful to you. I use to write articles on Mental Health subject which are publishing in various magazines and newspapers of north India. Can I send you my articles so that these can be published for public interest.

Dr. Kuldeep Singh, Member, ISPA, The Chicago School of Professional Psychology, USA.

  

I am getting garbhnal. its has really too rich content. i want to write an story on a journy of indo-pak dialogue from Thimpu to Islamabad and so on. Since sixths months in indian part Times group and pakinsani counterpart The jung group have started "Aman kee aasha" it will be relevent and intresting for our reader.

if u will say than i will work on it. with regard,

kaushlendra prapanna 

 

गर्भनाल का अंक पहली बार देखा और जानकर खुशी हुई कि भारत से बाहर रहने वाले हमारे साथी हिंदी साहित्य में न केवल रुचि लेते हैं, बल्कि पढ़ने और लिखने में भी अपनी सक्रियता को कायम रखे हैं. यह पत्रिका साहित्य की सभी विधाओं की पैरवी करते हुए विविधताओं को भी अपने में समेटे हुए है. सामग्री का चयन गंभीर और पठनीय है. मैं गर्भनाल की पूरी टीम को इस प्रयास के लिए धन्यवाद देता हूँ.

गोपाल सिंह चौहान, बीकानेर, राजस्थान 

 

गर्भनाल का 43वां अंक पाकर प्रसन्नता हुई. अंक में प्रकाशित रचनाएं श्रेष्ठ हैं. हरि बिंदल साहब की कहानी 'आशा' पढ़ने पर सभी पुराने मित्रों की याद हो आई और उनके साथ गुजारे लम्हों की भी, कभी किसी रचना में उतारने का प्रयास करूंगा. तेजेन्दर शर्मा की कविता 'जड़ और चेतन' को पढ़कर जीवन का असली रूप आंखों के सामने नाचने लगा और हृदय तरलता से भर उठा. दिविक रमेश जी की 'मां गांव में है' कविता अभी कुछ रोज पहले ही 'आजकल' में पढ़ी और आपके अंक में चित्र के साथ इसका अलग ही प्रभाव पड़ रहा है. डॉ. गुलाम मुर्तजा शरीफ की कविता 'अनुराग' इस अंक की अनूठी उपलब्धि कही जा सकती है। महादेवी वर्मा का लेख स्त्री का कार्यक्षेत्र प्रत्येक पाठक को पढ़ना चाहिए.

मुकेश पोपली

 

गर्भनाल से पहली बार मुखातिब हुई हूँ. अंक 43वां देखा, एक-एक पेज पढ़ती चली गई. हिंदी साहित्य के नामचीन लेखकों/लेखिकाओं की बेहतरीन प्रस्तुतियों पढ़ने को मिली, जो कि मन को बेहद अच्छी लगी. निसंदेह गर्भनाल हिंदी साहित्य की अग्रणी पत्रिका है. लेखन में मैं अपने को कविता के निकट अधिक पाती हूँ इसलिए मैं सबसे ज्यादा प्रभावित पेज 44 पर राजेश उत्साही जी की 'मेरी कविता लिखकर' दिल को छू गयी. इतनी अच्छी कविता लिखने के लिए बधाईयाँ.  गर्भनाल में साहित्य की सभी विधाओं की अच्छे स्तर की रचनाएं देखकर बहुत ख़ुशी हुई. हिंदी साहित्य को सार्थकता प्रदान कर एक नयी दिशा देने की आपकी सतत कोशिश के लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएँ.

कविता रावत 

 

गर्भनाल का 43वाँ अंक मिला. ये पत्रिका में बहुत पसंद करता हूँ और पूरी पढ़ता हूँ. अभिमन्यु अनत से अमित कुमार की बातचीत ने मन मोह लिया. बहुत-बहुत शुक्रिया.

अनिल अत्री, आईबीएन-7, दिल्ली

 

ई-पत्रिका गर्भनाल के जून-2010 अंक में राजेश उत्साही जी की कविता पढ़कर अच्छा लगा. मेरी ओर से उन्हें शुभकामनाएँ इस उम्मीद के साथ कि आगे भी उनकी इसी तरह की अच्छी कविताएँ पढ़ने को मिलती रहेंगी.

प्रीति शर्मा

  

गर्भनाल को पहली बार पढ़ा. मज़ा आ गया. विश्वनाथ तिवारी पर काफी अच्छा लिखा गया है, पसन्द आया. एक अच्छी पत्रिका के लिए बधाई.

मेजर रतन जांगिड

 

गर्भनाल मिली. इसी तरह ईमेल पर ही सब को सामग्री भेजिये. आसान और लो-कास्ट तरीका है. पोस्टेज का जमाना गया.

शशिभूषण शर्मा, जंगपुरा एक्स., नई दिल्ली 

 

गर्भनाल के ताजे अंक में यतेन्द्र वार्षनी की अपनी बात शिक्षा के ऊपर एक बेहतरीन दस्तावेज बन गया है किन्तु कुछ अधूरा सा है.

शासकीय विद्यालयों की हालत जो है सो है. बहुत सारी वजह हैं इस हालत की. मैं शिक्षा से बहुत लम्बे अरसे से जुड़ा हूँ इसलिए यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ कि केवल लेख लिखने से कुछ होने वाला नहीं. ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों की, चाहे वे सरकारी हो या प्राइवेट एक सी ही है. सरकार को कोंसते रहेंगे तो हालत और भी बिगड़ेंगे ही. हमें अपनी पहल पर काम शुरू करना होगा. मैंने आज से 30 वर्ष पूर्व विदिशा जिले के ग्रामीण इलाके में एक विद्यालय प्रारंभ किया था एक झोपड़ी में. आज उस में 3000 छात्र पढ़ रहे हैं. लगभग एक करोड़ का भवन है और पढ़ाई का स्तर इतना ऊंचा है कि जिला स्तर, संभाग स्तर और राज्य स्तर पर मेरिट में स्थान आता है. इस साल भी 12वीं की मेरिट में विज्ञान क्षेत्र में दसवां स्थान राज्य स्तर पर आया है और जिले की मेरिट में विज्ञान के सभी प्रथम तीनों स्थान इसी विद्यालय के छात्रों ने लिए हैं. केवल पढ़ाई में ही नहीं खेल-कूद, संगीत एवं अन्य अनेक प्रतियोगिता में भी यहाँ के छात्र अव्वल रहते हैं. फीस एकदम नोमिनल है 50 प्रतिशत छात्र अजा-अजजा एवं एक् वर्गों के हैं 100 प्रतिशत ग्रामीण इलाके के छात्र हैं.

कहने का तात्पर्य है कि हम को खुद को कुछ करना होगा. अपना जीवन होम करने की प्रबल लालसा होनी चाहिए. प्राइवेट की बात होती है तो हमारे दिमाग मैं ऊंचे-ऊंचे कॉन्वेंट स्कूल्स ही क्यों आते हैं? प्राइवेट स्तर पर भी अच्छे स्कूल्स ग्रामीण स्तर पर खोलना होंगे तभी हम शिक्षा तंत्र को सुधार पाएंगे. वैसे भी यह बड़े-बड़े कॉन्वेंट स्कूल्स गाँवों में तो कभी जाने वाले नहीं. ग्रामीण क्षेत्र की सुध हमको ही लेना होगी.

जहाँ तक सरकारी स्कूल्स की बात है सरकार का कौन-सा विभाग ढंग से काम कर रहा है? तो शिक्षा विभाग की बात हम न करें तो ही ठीक.

गर्भनाल के अंक पढ़े आनंद आ गया. बेहतर संपादन, सटीक चयन और सुंदर साज-सज्जा देखकर मन प्रसन्न हो गया. आपके विभिन्न अंकों में छप रही सामग्री का उपयोग हम अक्षर शिल्पी में करना चाहेंगे.

डॉ. विजय श्रीडोनकर 

 

गर्भनाल-43 अपने खूबसूरत कलेवर और गंभीर सामग्री के कारण पाठक को बांधती है. इसमें समकालीन जीवन के अनेक प्रश्नों पर चर्चा की गयी है. साहित्य, भाषा, स्त्री, राजनीति और समाज के विभिन्न सवालों को कहानियों, लेखों, कविताओं के जरिये समझने और सुलझाने की पहल दिखाई पड़ती है. अपनी बात में यतेन्द्र जी ने वर्तमान पीढ़ी के साथ निरंतर हो रहे छल को उजागर करने का प्रयास किया है. समाज में व्यक्तियों को उनकी सफलता से आंकने की एक ऐसी परंपरा बनती जा रही है कि लोग उन प्रयत्नों से तनिक भी मुग्ध नहीं होते जो शिखर पर तो नहीं ले जा सके, मगर वहां तक पहुँचने की सम्भावना जगा गए. अस्वीकृति के इस भाव से हताशा का पैदा होना स्वाभाविक है. बच्चों में बढ़ती आक्रामकता और हताशा के पीछे यही सामाजिक मनोवृत्ति काम कर रही है.

अभिमन्यु अनत से अमितकुमार की बातचीत हिंदी की दशा-दिशा पर तमाम महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है. भाषा के नाम पर हिंदुस्तान में चल रही संकीर्ण लड़ाइयाँ अनत को बहुत दुखी करती हैं. वे सच कहते हैं कि भाषा ही किसी देश की अस्मिता होती है और जब मराठी बोलने वाला हिंदी बोलने वालों पर हाथ उठाता है तो इस तरह अनजाने में ही वह अपनी राष्ट्रीयता पर प्रहार करता है. भारत में हिंदी की दशा पर उनकी चिंता वाजिब लगती है. क्या उनका यह वाक्य भारतीय हिन्दीप्रेमियों और साहित्यकारों को मथेगा कि हिंदी की दशा मारिशस में भारत से बेहतर है? राजकिशोर समकालीन राजनीति और समाज के अंतर्संबंधों पर विचार करते हैं. वे न केवल हिंदी लेखकों के छद्म पर चोट करते हैं बल्कि  मार्क्सवादियों को भी घुट्टी पिलाने से नहीं चूकते. उनका यह ख्याल अच्छा है कि मार्क्स की राजनीति गाँधी की शैली में की जाय. मैं चाहूँगा कि वे श्रीगणेश तो करें. यह चिंता न करें कि पता नहीं लोग साथ आयेंगे या नहीं. प्रयोग तो प्रयोग होता है, उसके आरम्भ पर ही उसकी सफलता, असफलता का चिंतन जरूरी नहीं है. उनका यह सोचना बिल्कुल सही है कि भारत में कोई भी सामाजिक, राजनीतिक प्रयोग यहाँ की परम्पराओं के भीतर से ही निकलकर कामयाब हो सकता है.

स्त्री का कार्यक्षेत्र, महादेवीजी के इस लेख की पुनर्प्रस्तुति सामयिक और महत्वपूर्ण है. आज महिलाओं ने बहुत प्रगति कर ली है फिर भी वे हमारी पुरातनपंथी सोच की जकड़न से पूरी तरह बाहर नहीं आ पायीं हैं. वे अब भी भेदभाव की शिकार हो रही हैं, पुरुषों के अत्याचार की शिकार हो रहीं हैं. समय बदल गया है पर आदमी समय के साथ नहीं बदला है. वह एक रूढ़ पारंपरिक सोच के वातावरण में पैदा होता है और अपनी तमाम आधुनिकता के बावजूद उनसे पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता है. आज भी बहुत सारे लोग अपनी बच्चियों को उस तरह की शिक्षा नहीं देना चाहते, जिस तरह की शिक्षा वे बेटों को देते हैं. बहुत से लोग ऐसे हैं जो लड़कियों की नौकरी पसंद नहीं करते, नहीं चाहते कि वे घर से बाहर निकलें, पुरुषों के साथ काम करें, उनसे बातें करें. यह सब सैकड़ों वर्ष पुरानी दकियानूस चिंताएं ख़त्म होनी चाहिए. स्त्री पर जितनी जिम्मेदारियां होतीं है, पुरुष जितनी अपेक्षाएं उससे करता है और वह जिस तरह उसे निभाती हैं, वह उसे सम्माननीय बनाता है, पर यह सम्मान कहाँ मिलता है उसे. अब निश्चित ही हम सबको स्त्रियों के बारे में पुरानी धारणाओं से मुक्त होने की आवश्यकता है. डॉ. सोनिका सहाय ने हबीब तनवीर को याद किया है. हबीब ने केवल थियेटर की दुनिया को ही आधुनिक और प्रयोगधर्मी नहीं बनाया बल्कि वे नाटकों के जरिये समाज के पोंगापंथ और पाखंड से भी निरंतर जूझते रहे.

इन महत्वपूर्ण लेखों के अलावा डॉ. गुलाब मुर्तजा शरीफ, कमला प्रसाद गुप्त, दिविक रमेश, तेजेंदर शर्मा, राजेश उत्साही की कविताएँ भी प्रभाव छोड़तीं हैं. दिविक रमेश की माँ गाँव में है, कविता इस संक्रमणकालीन समय में गांवों को निगलते शहर का भयानक चेहरा बड़ी मासूमियत से दिखाती है. हमारे मन में शहर पूरी तरह आता नहीं, गाँव हमेशा के लिए जाता नहीं. मां को तो शहर रुचता नहीं पर बेटा भी गाँव को अपने भीतर से कहाँ निकल पाता है-पर देखता हूँ/कुछ गाँव तो जरूर है/अभी देह के किसी भीतरी भाग में/ इधर उधर छिटका, थोड़ा-थोड़ा चिपका. ज्ञान कृष्ण भट्ट का यात्रा वृत्तांत, अनिल विद्यालंकार का गीता सार, वेद मित्र का अंग्रेजी के माध्यम से हिंदी शिक्षण जैसी ज्ञानवर्धक सामग्रियों के अलावा, विश्वनाथ प्रसाद पर दयानंद पाण्डेय का लेख, बलदेव सिंह ग्रेवाल के  उपन्यास परिक्रमा का डॉ. सुधा ओम धींगरा द्वारा अनुवाद अंश और कहानियां भी गर्भनाल की विविधता को समृध्द करती है. एक अच्छी और पूरी पत्रिका के लिए साधुवाद.

डॉ. सुभाष राय, आगरा

 

Thanks for sending me "Garbhnal" regularly. Each issue of the magazine is very interesting. The article "Aao Hindi Seekhen" is very useful for learning Hindi. The efforts for bringing out this e-magazine in Hindi by you and your colleagues deserves great appreciation. Your efforts will go a long way in promoting Hindi all over the world.

Sanjay Vedi, Deputy Director, JNCC, Embassy of India, Moscow

 

I must say the meaning and impact is great of the opening line - Kaise bhulu Kya yaad karu and then the words flow through the poem like inner consciousness trying to find its stream. Sometimes words can express so much that you can feel each and everything while reading, its just like a song that you listen after a gap and it take you back to the memory of time when you first heard it. Keep it up Mrs Sheel Nigam.

Basant Yadav, Canberra, Australia

 

Thanks as ever... I have been reading and enjoying “you” from start. Keep up the good work. May God bless you!

Sidheshwar Sethi, Botswana, Africa

 

बिना बिलम्ब के हमेशा की तरह गर्भनाल का चालीसवाँ अंक प्राप्त कर बहुत अच्छा लगा. आपके सतत परिश्रम की जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है.

हरिबाबू बिंदल, यूएसए

 

Thank you very much. I have gone through the Rachnayein. Vinod Sav's article is very impressive. Poems are good but some of them could be better. Overall this is very good and important issue. Congratulations.

Divik Ramesh, Delhi.

 

Recently, i had received GARBHANAL new issue and Om ji article SAAS BAHU... I like that. It really appreciatble.

Peeyoush Chaturvedi

Parth PR Services, Gwalior

 

I received Garbhanal's 36th issue to 40th issue from my nephew Ajay Bhatt who is at Bangkok who forwarded it. It is an excellent magzine for our brother settled abroad and there wards have forgotten our mother tongue.

My daughter too is at US. I am finding her children forgettng our national language. When you speak to them in Hindi they shall switch over to English.

Gyan Krishna R. Bhatt, Lucknow

 

Thanks for providing regular a nice and knowled-geable e-magazine. Apake Vicharon Ka Karwan chalata Rahe Yu hi.

Arun Pandey, Project Manager, Chitrakoot

 

गर्भनाल के 40वें अंक में अनुराग शर्मा जी की कहानी एक और इंसान बहुत अच्छी लगी. ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगने वाले भिखारियों से हम रोज दो-चार होते हैं, लेकिन इस विशेष पहलू पर शायद ही किसी का ध्यान जाता होगा, क्योंकि इसे देखने के लिए जो अंतर्दृष्टि चाहिए वो शहरी लोगों में नहीं है. और इसे समझना भी हर किसी के बस की बात नहीं है. एक कम्यूटर प्रोफेशनल होकर भी अनुराग जी ने क्या मार्मिक कहानी लिखी है. भीख मांगने वालों के रैकेट ने हमारे विश्वास को इस कदर आहत किया है शहरों में मानवीय और परोपकारी दृष्टि का बंटाढार ही हुआ है. तारीफ करनी होगी अनुराग जी की कि उनकी कहानी मन के अंदर झाँकने को प्रेरित करने वाली है.

धर्मेन्द्र कुमार राय, पीटीआई भाषा, नई दिल्ली

 

कम्प्यूटर खोला तो मजा आ गया 'गर्भनाल' का ताजा अंक पाकर. पत्रिका पूरी पढ़ डाली. बहुत ही दमदार बन पड़ी है. अनुराग शर्मा की कहानी 'एक और इंसान', हरि बिंदल की कविता और शील निगम की कविता - कैसे भूलूं क्या याद करूं - खासी पठनीय हैं. हर अंक पढ़कर आपकी मेहनत को सलाम करता हूं. एक निवेदन है. जब फुर्सत में हों तो चौमासाडाटकाम देखियेगा. अगर 'गर्भनाल' के सांस्कृतिक समाचार स्तंभ में स्थान दे सकें तो मेहरबानी होगी. चौमासा का बहुत व्यापक तो नहीं लेकिन हां छोटा-मोटा संसार है.

राजू मिश्रा, लखनऊ

 

नए अंक के लिए साधुवाद. आपका 'गर्भनाल' रूपी साहित्यिक प्रयास निरंतर आ रहा है, यह हर्ष का विषय है. मैं इसका अंक प्राप्त होते ही पढ़ डालता हूँ. पढ़ना चूंकि स्वान्त: सुखाय ही होता है, इसलिए एक-दो बातें कहने का दुस्साहस कर रहा हूँ. कवितायें निरंतर कमजोर हैं, और उन्हें पढ़ कर कहानी पढ़ने की हिम्मत मैं इस बार नहीं जुटा पाया. पहले तीन लेख पठनीय थे, पर आकर्षक नहीं. मीरा की पंक्ति देख कर आकर्षण जागा था, पर निबंध तथ्य-परक था और वे तथ्य मुझे लगभग पता ही थे, अत: विशेष आकर्षण नहीं हुआ. पर लिखने वाले ने लिखा अच्छा था.

अगर मेरे जैसा समर्पित पाठक असंतोष का अनुभव कर रहा है तो कोई कारण अवश्य होगा.

आपसे निवेदन है कि (अ) कोई विशेषांक निकालें, जिसमें भरपूर उच्चस्तरीय सामग्री हो. वह किसी भी थीम पर हो सकता है, जैसे 'प्रेम', 'बारिश', 'रामकथा', इत्यादि. पर मज़ा आ जाय, ऐसा हो. (आ) महादेवी वर्मा एवं नरेन्द्र कोहली का साहित्य मुझे विशेष प्रिय है. उन पर विशेषांक निकालेंगे तो आनंद ही आ जाएगा. एक व्यक्ति की पसंद हो सकता है आपके लिए कोई मायने न रखे, पर मैं फरमाइश तो कर ही सकता हूँ. (इ) ललित निबंध एवं व्यंग्य नियमित रूप से शामिल हो सकें तो और भी आनंद. (ई) नयी सामग्री सुविधानुरूप न मिले तो क्लासिकल श्रेष्ठ सामग्री का प्रयोग भी कर लें. (उ) प्रवासियों के यात्रा-विवरण अवश्य छापें. (ऊ) नरेन्द्र कोहली का कोई उपन्यास (जैसे वसुदेव) का धारावाहिक प्रकाशन करें. (ए) अच्छे गीत /ग़ज़ल छापें.

उम्मीद है, इसे रचनात्मक माना जाएगा. पाठक की फरमाइश है, कोई टीका-टिप्पणी नहीं.

शिशिर मित्तल्

 

गर्भनाल अपने आप में एक मिसाल है हिंदी पत्रकारिता की जिजीविषा का! प्रत्येक अंक संग्रहणीय. इसके 40वें अंक के प्रकाशन पर मेरी बधाई स्वीकार करें. इसमें रचनाओं का चयन जितना उत्तम है, उनका प्रस्तुतीकरण उतना ही सुरुचिपूर्ण है. बीच -बीच में साहित्यिक समाचार पत्रिका के आकर्षण और महत्व को बढ़ाते हैं. मैं भी मानता हूँ कि मंच पर कविता-पाठ केवल शब्द और स्वर की ही नहीं, प्रस्तुति की कला की भी अपेक्षा करता है. इस दृष्टि से अगले काव्य समारोहों के लिए तीनों कवियों का चयन बहुत अच्छा है. लोगों को इन नए रचनाकारों को सुनने में प्रसन्नता होगी.

बुध्दिनाथ मिश्र, देहरादून

 

गर्भनाल पत्रिका के अंक मुझे नियमित रूप से मिलते हैं. बहुत बार सोचा कि आपको लिखूँ, लेकिन कुछ आलस एवं कुछ समयाभाव - अत: आपको देने वाली बधाइयां भी बहुत लंबित हो चुकी हैं. हिन्दी ई पत्रिका - एक बहुत ही नया विचार एवं दिलेरी से उसे इतने लंबे समय तक चलाना - तथा उसे नई सामग्री से सरोबार करना - ही बहुत है. उम्मीद है कि आप इस मशाल को जलाए रखेंगे. आपके लिए इतना ही कहा जा सकता है - बेचैनियाँ समेट कर सारे जहान की / जब कुछ न बन सका तो मेरा दिल बना दिया.

राधा किशन खेतान, ग्वालियर

 

हिंदी ई-मैगज़ीन का 40वाँ अंक मिला, मन प्रसन्न हो गया. पर कहीं दुख का अहसास भी हुआ हिंदी पर भविष्यवाणी पढ़कर. मैं इससे सहमत नहीं हो पा रहा. यह सही है कि आज स्कूलों-कॉलेजों के बच्चे एक पूरा वाक्य ठीक से हिंदी में नहीं बोल पाते हैं. टीवी पर बहस में इसकी बानगी देखी जा सकती है. पर फिर भी हिंदी लेखन समृध्द हो रहा है. पूर्वांचल राज्यों में हिंदी का प्रसार बढ़ाने का कार्य कई संस्थाएँ कर रही हैं. वैज्ञानिक शब्दावली भी समृध्द हुई है. आवश्यकता मनोबल बनाये रखने की है. 'जिसका सिक्का उसकी भाषा' कहावत के अनुसार यदि हमारे भारत की अर्थ व्यवस्था मजबूत होगी तो उसके साथ भाषा भी विश्व में जायेगी. कोरिया इत्यादि के कंप्यूटर हार्डवेयर पर क्या ऍंग्रेजी में लिखा होता है? पर वे चलते हैं. बस राष्ट्रीय स्वाभिमान होना चाहिये. फ्रांस की संसद 'डुमा' प्रत्येक वर्ष फ्रेंच भाषा में घुसपैठ करने वाले अंग्रेजी शब्द निकाल बाहर करती है और अपने फ्रेंच शब्द का विकल्प देती है. फ्रेंच शब्द ही है अंग्रेजी में प्रशासनिक. न्याय और विधि की सारी शब्दावली फ्रेंच है. यह कितने लोग जानते या इस पर चिन्तन करते हैं?

बृजेन्द्र श्रीवास्तव, ग्वालियर

 

I very much appreciate you for sending a copy of Garbhanal. Undoubtedly it is an excellent web-magazine and you and your associates, in particular Dr. Sudha Dhingra, deserve our thanks. Best regards,

Ram Chaudhari, USA

 

I am  regular reader of yr magzine  since its first publication. I had been in africa for last thirty years. A friend of mine mr. vinod kumar jain is a poet in bundeli. His poetry has been published and will be very appealing and interesting to yr readers. I would be very please to see that his poetry gets a place in future issus of garbhnal.

Komal Jain, Botswana, Africa

 

गर्भनाल को सुनियोजित और सुरेख रूप से सुसज्जित कर प्रति माह तमाम पाठकों तक पहुँचाने का कार्य आप भली-भांति कर रहे हैं, इसमें लगने वाला परिश्रम और लगन की तुलना किसी साधारण कार्य से नहीं की जा सकती. आप इसी तरह इस कार्य को जारी रखें. 39वें अंक के आवरण चित्र को जीवित कर देने वाली गिरिजाकुमार माथुर की पंक्तियों का चयन अत्यंत सटीक और भावपूर्वक है.

उमेश ताम्बी, फिलाडेल्फिया

 

गर्भनाल का 39वां अंक मिला. डॉ. राम चौधरी से सुधा ढींगरा जी की बातचीत बड़ी उत्साहवर्ध्दक लगी. न जाने क्यों भारत में यह धारणा बन गई है कि विज्ञान अंगरेजी के अतिरिक्त अन्य किसी भाषा में पढ़ाया ही नहीं जा सकता.

डॉ. चौधरी ने उन मान्यताओं का न केवल खंडन किया है, अपितु स्वयं अपनी उपलब्धियों द्वारा सिध्द कर दिया है कि हिन्दी भाषा के माध्यम से विज्ञान न केवल पढ़ाया जा सकता है, बल्कि भारत में वैज्ञानिक समझ बढ़ाने के लिए वह आवश्यक भी है. अंगरेजी को हटाना पहाड़ के समान तो हो सकता है, परन्तु पहाड़ भी अच्छे विज्ञान और दृढ़ संकल्प से हटाए जा चुके हैं और हटाए जाते रहेंगे.

भूपेन्द्र कुमार दवे का आलेख हिन्दी भाषा की विशेषताएं पठनीय रहा और डॉ. ओम विकास ने अपने आलेख में अनेक विचारणीय मुद्दे उठाए हैं. उन पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है.

वेदमित्र, यू.के.

 

गर्भनाल' के ताजा अंक में कुसुम जी की कविताएँ पढ़कर बहुत अच्छा लगा. उनकी चारों कवितायें भावमय और सुरचित हैं. बधाई स्वीकार करें !

प्रतिभा सक्सेना, अमेरिका

 

आपकी पत्रिका पढ़ी, अच्छी लगी. एक स्थान पर अनेक प्रवासी रचनाकारों को जोड़ना सराहनीय है. मुझे पता है कि प्रवासी साहित्य लिखा जा रहा है पर प्रकाश में कम आ रहा है. मैं भी इस पुनीत कार्य में पहले 'परिचय' और अब 'स्पाइल-दर्पण' और 'वैश्विका' प्रिंट मीडिया के माध्यम से वह भी विपरीत वातावरण वाले देश नार्वे से निकाल रहा हूँ. आप सभी साधुवाद के पात्र हैं.

सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक', ओस्लो, नार्वे

 

गर्भनाल पत्रिका प्राप्त हुई. हमें तो पता भी नहीं था ऐसी किसी पत्रिका के बारे में. आपका धन्यवाद. इस पत्रिका को पढ़कर इच्छा हुई कि अब मैं भी शिकागो से अपनी रचनाएँ इसमें प्रकाशनार्थ भेज सकूंगा. पत्रिका अति आकर्षक है तथा सूचनात्मक भी.

काम गुप्ता, अमेरिका

 

गर्भनाल का 39वां अंक मिला. हर बार की तरह यह अंक भी सुंदर बन पड़ा है. खासकर मुखपृष्ठ पर कविता की लाइनें प्रभावित करती हैं. हिन्दी की वर्तमान दशा पर डॉ. ओम विकास के आलेख में गंभीर मुद्दे उठाये गये हैं.

विकास मिश्रा, न्यूयार्क

 

गर्भनाल का अंक अच्छा निकला है. नजरिया में राज किशोर जी का लिखा लेख पठनीय है. वही व्याख्या में भी भूपेंद्र कुमार जी की रचना अच्छी लगी. हिन्दा भाषा पर लिखा गया लेख इस अंक में विशेष रहा है. डॉ. अशोक गौतम जी का नववर्ष पर लिखा व्यंग्य बहुत ही अच्छा लगा.

अंकिता मिश्रा

 

गर्भनाल का यह अत्यंत सराहनीय प्रयास है. आपकी टीम इसके लिए साधुवाद की पात्र है. इस तरह की वेब पत्रिका की सख्त आवश्यकता आज दुनिया को है. हम सब मिलजुल कर ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहित करें तो बेहतर. हिन्दी को प्रोत्साहित करने के इस प्रयास के लिए मेरी तरफ से जो भी संभव सहयोग हो सकेगा, मैं अवश्य करूंगा. प्रवासी लेखकों की संपर्क सूची प्रकाशित कर उन्हें अन्य लोगों से जोड़ने का भी प्रयास करना चाहिए.

ओंकारेश्वर पांडेय, Executive Editor, The Sunday Indian

 

गर्भनाल के पुराने अंक 34 में रेखा भाटिया जी के संस्मरण 'ये  कैसी अनुकम्पा?' ने दिल को छू लिया और ऑंखें नम हो गईं. इतना अच्छा लिखने पर बधाईयाँ. पेज 6 के पहले पेराग्राफ के अन्त में आपने लिखा है ---- 'छह पहर चैन की नींद जाने कब से मेरा साथ छोड़ चुकी थी.' मुझे लगता है 'पहर' को आपने एक घंटे के बराबर लिया है जबकि यह उर्दू शब्द है और तीन घंटे के बराबर होता है. तभी हम 24 घंटे को 8 पहर कहते हैं और इसी में से 'दोपहर' बहुत प्रचलित शब्द है.

नजमुल इस्लाम, भोपाल

 

गर्भनाल 39 वें अंक की कुछ रचनाएं पढ़ी. इसमें साहित्य की सभी विधाओं की अच्छे स्तर की रचनाएं मिलीं. मैं ईकविता हिंदी भारत समूह का सक्रिय सदस्य हूँ और कवितायें लिखता हूँ. हिन्दी के आपके इस काम के लिए मेरी शुभकामनाएँ.

कमल

 

मेरे सहपाठी के निवेदन पर मैंने गर्भनाल पत्रिका पढ़ी बहुत सराहनीय प्रयास है. विज्ञान का विद्यार्थी होने पर भी मुझे भारतीय साहित्य और शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि है. गर्भनाल ने मेरी रुचि को पंख लगा दिये. पुनश्च प्रयास के लिए बधाई.

डॉ. हरीश तिवारी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी

 

गर्भनाल 39 देख रही हूँ. जितना देखा है और इससे पहले जो अंक देखे हैं, उनसे सम्पादकीय सुरुचि और सूझ की खबर मिलती है.

देखना यह है कि बाहर का सब कुछ समझते और जानते हुए कहीं हम ऐसा कुछ चूक तो नहीं रहे, जिसका सम्बन्ध सिर्फ हमसे है, हमारे अपने होने से, हमारे वजूद से, जिसको समझे बिना हम दूसरों के सामने तो सम्मानित हो सकते हैं, लेकिन अपने उस घोर अकेलेपन में बहुत उदास हो जाते हैं, जो हमारा अंतिम प्राप्य है. यों भी स्वयं की खबर लिए बिना सारे जगत की खबर रखना खुद को धोखा देना है. यह सब मैं अक्सर खुद से कहती रहती हूँ.

यह भी एक संयोग है कि गर्भनाल को देखने के बाद मुझे अपना ब्लॉग "snowa the mystic' चलाने की बात सूझी. मैं mystic himalaya नामक कार्य में हूँ. हम कुछ मित्र लेखन, गायन और पेंटिंग आदि में नए प्रयोग कर रहे हैं. हमें संपत्ति और सम्मान जैसी चीज़ों से दूर रहकर अपना काम करना होता है. आप गर्भनाल के सहयोगियों और पाठकों तक मेरी बात पहुंचा दें.

स्नोवा बोर्नो, नर्गिस वैल्ली, रायसन, कुल्लू

 

गर्भनाल का नया अंक देखा और बिना रुके पढ़ती चली गई, कमाल के लेख हैं. सबसे ज्यादा मुझे प्रभावित किया राजकिशोर जी के लेख ने 'फेंको मत प्रयोग करो'. हम लोग पर्यावरण के प्रति बहुत बातें करते हैं और जागरूक भी हैं. मैं सभी लेखकों और लेखिकाओं से अनुरोध करूँगी कि आज से ही वे सब निब वाले पेन का प्रयोग शुरू करें. बूँद-बूँद से ही घट भरता है. जहाँ हम वृक्ष लगाओ अभियान कर ही रहे हैं वहीं हम 'फाउन्टेन पेन' उपयोग में लाओ अभियान भी शुरू कर सकते हैं.

यह सच है कि हम लोग अपनी सुविधा के लिए 'लिखो और फेंको' पेन का इस्तेमाल कर रहे हैं. पर आज से हमारी कोशिश रहेगी कि हम कुछ प्लास्टिक का कचरा कम करें और राजकिशोरजी ने इसका नामकरण भी एकदम सही किया है 'गाँधी कलम'. मैं उनकी इस सोच का तहेदिल से स्वागत करती हूँ. इस्मत चुगताई कि 'अमरबेल' के पढ़ाने के लिए भी शुक्रिया.

अनीता सक्सेना

 

I have gone thru many issues of "Garbhnaal" in past & today received fresh issue of FEB., 2010 on very first day of the Month. I think I must have done good deeds in the past and because of that I am receiving this E Magazine in the form of "Amrit Patra".  The contents, presentation and quality of E-Magazine are priceless. My father Shri Gopikrishnaji, who is aged 75 years and is having degree of B.Com, FICWA, FCS nad "Sahitya Ratna" in Hindi also  admires and has high regards for "GARBHANAAL". The cover page itself speaks a lot about the quality of E-Magazine. I convey my thanks and warm regards for your great self-less efforts in promoting HINDI. Lot of Thanks.

 Ajay Sharma, Chartered Accountant, Ahmedabad

 

I have been reading you e-magazine for a while and must say that I enjoy reading it as the content is of very good quality. Warm Regards

Sunita Bhadauria

 

I must put on records the efforts put in by Garbhanal by publicizing this issue. I indeed like it very much. How can this be sub-scribed... will appreciate if this is sent to me every time. Thanks & Regards..

Mayank Jain, Birla Sunlife Insurance, Mumbai

 

I am getting Garbhnal regularly and forwarding it to my contacts abroad. It has grown very nicely. Keep the tempo up. Regards.

O.P. Rawat

 

गर्भनाल के 38वें अंक में डॉ. ओम विकास का आलेख पढ़ा. बहुत पसन्द आया. अपने सारगर्भित लेख से उन्होंने सिध्द कर दिया कि वे अपने विषय पर न केवल पूर्ण अधिकार रखते हैं, बल्कि तथ्यों का आकलन और विश्लेषण करने की कला में पारंगत भी हैं. हिन्दी की उपादेयता उन्होंने बड़ी कुशलता से प्रस्तुत की है. अन्य अनेक लोगों के विपरीत उन्हें भारत में विज्ञान का इतिहास का अच्छा ज्ञान दिखाई पड़ता है, परन्तु वे अपनी व्यवहारिकता का भी परिचय देते हुए लिखते हैं कि हमें अपने इतिहास पर संतोष करके नहीं बैठ जाना चाहिए कितनी मार्मिकता से उन्होंने दर्शाया कि हमारे आईटी स्नातक 10-20 प्रतिशत ही उद्योगों में काम करने योग्य होते हैं और 90 प्रतिशत का आधारभूत विषय ज्ञान अच्छा नहीं होता. इस सबका मूलभूत कारण है कक्षा 1 से अंगरेजी शिक्षा का अनिवार्य बना दिया जाना. काश उनकी वेदना को हमारे शिक्षा नीति को तय करने वाले समझ सकें और इस नीति को बदलें.

भारत में विज्ञान की समझ और सच्चा विकास हिन्दी के माध्यम से ही संभव है.

वेदमित्र, लंदन 

नये साल की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ - सब पाठकों को और मैगज़ीन में काम करने वालों को जिनकी मेहनत से यह मैगज़ीन हम तक पहुँचती है. आपकी मैगज़ीन पढ़कर अपने आपको हिन्दी और हिन्दुस्तान से जुड़ा समझता हूँ, वरना अब तक हिन्दी बोलना ही भूल जाता. नया साल सुखमयी हो और मैगज़ीन और उन्नति करे, इसी शुभकामना के साथ.

विजय कुमार धन्वंतरि, सउदी अरब

गर्भनाल का 38वाँ अंक समय पर मिला. धीरे-धीरे इसमें से काफी कुछ पढ़ भी लिया है. मन में उठे कुछ विचार यों हैं :

डॉ. ओम विकास के सारगर्भित लेख हिन्दी का वर्तमान और भविष्य की दृष्टि में टेक्नोलॉजी के स्तर पर हिन्दी को सक्षम बनाने व उसके प्रयोग की दिशा में किए गए व किए जा रहे प्रयासों को बताने के साथ-साथ सरकारी कार्यालयों में उसका प्रयोग सुनिश्चित करने के बारे में अनेक सुझाव दिए गए हैं. डॉ. ओम विकास वर्षों से इस कार्यक्षेत्र से जुड़े हुए हैं और इस दिशा में उन्होंने प्रशंसनीय कार्य किया है. भविष्य की दृष्टि में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं किंतु वर्तमान वास्तविक स्थिति को देखते हुए - जिसका उन्होंने इस लेख में जगह-जगह पर भारी मन से उल्लेख किया है - यदि ये सुझाव कार्यान्वित हो जाते हैं तो भी, इनके कोई आशावादी परिणाम निकल सकने की सम्भावना नहीं लगती. प्रश्न नियमों, आदेशों, व्यवस्थाओं आदि का नहीं, बल्कि नीयत का है. हिन्दी के प्रयोग के लिए नियमों की कोई कमी नहीं है - सच पूछें तो उनकी भरमार ही है और एक समय तो उनकी बाढ़-सी ही आ गई थी. असली समस्या तो यह है कि उन्हें लागू करने के प्रति न कोई सोच है, न गम्भीरता और न ही सच्ची नीयत. यह नियति केवल हिन्दी की नहीं, लगभग सभी क्षेत्रों की है.

जैसा कि डॉ. ओम विकास ने अपने लेख में कहा है 'गुलामी के बाद पश्चिम के समृध्द समाज से कदम-से-कदम मिलाने की चाह ने अंग्रेज़ी को अपनाया, अंग्रेज़ी को ओढ़ा.' वस्तुत: यह स्थिति केवल भाषा तक ही सीमित नहीं रही है, बल्कि हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक आदि सभी क्षेत्रों के चिंतन- कार्यकलापों आदि पर हावी रही है. देश से अंग्रेज़ों का जाना, दरअसल, किसी कम्पनी के निदेशक मंडल के बदलने से अधिक कुछ नहीं रहा है. हुआ बस यह है कि कम्पनी एक हाथ से निकलकर दूसरे हाथों मे चली गई है. उसे चलाने वालों की सोच नहीं बदली, मानसिकता नही बदली, मिज़ाज जस-का-तस रहा और कम्पनी अपने पुराने ढर्रे पर चलती रही है, और अधिक विद्रूप जोश, उत्साह से चलती जा रही है. यदि कुछ बदला तो बस यह कि उसे चलाने वालों ने अपने-अपने हितों के अनुसार उसे निचोड़ने के नए-नए तरीके अपनाकर अंदर-अंदर से उसे और भी खोखला कर दिया है. यही हमारी विडम्बना है, त्रासदी है, दुर्भाग्य है.

डॉ. ओम विकास ने 'क्या करें' के अंतर्गत अनेक सुझाव दिए हैं. इनमें से कुछ के संबंध में कमोबेश पहले से ही नियम हैं, आदेश हैं जिन्हें कभी लागू नहीं होने दिया गया और न ही उनके लागू हो सकने की स्थितियाँ बनने दी गईं. सरकारी संगठनों में हिन्दी को अनुवाद की भाषा से आगे नहीं बढ़ने दिया गया. मूल रूप से काम यथावत् अंग्रेज़ी मे चलता रहा और आदेशों की खानापूर्ति के लिए कुछ हिन्दी अधिकारियों की नियुक्ति करके उन्हें अनुवाद के काम पर लगा दिया गया जिसका न कभी कोई मूल्यांकन हुआ और न ही कोई सार्थक उपयोग. समीक्षा करने वालों का सरोकार केवल ऑंकड़ों तक सीमित रहा जिन्हें प्रस्तुत करने में देश सिध्दहस्त है - आंकड़े भले किसी भी क्षेत्र, कार्य के हों। वर्षों पहले अपने संगठन में एक न्यूनतम अनुपात में हिन्दी टाइपिस्टों की नियुक्ति के लिए हमने भरसक प्रयास किए, लेकिन ऐसे टाइपिस्ट हमें नहीं मिल सके क्योंकि तब तक नौकरी पाने, कैरियर बनाने के लिए अंग्रेजी लगभग अनिवार्य-सी हो गई थी. विडम्बना यह रही कि जो कुछ मिले भी उन्हें कोई विभाग यह कहकर लेने के लिए तैयार नहीं था कि वह हिन्दी टाइपिस्ट का करेगा क्या. जिन्होंने लिए उन्होंने उनका इस्तेमाल किन्हीं और कामों के लिए किया. आज स्थिति बदतर हो चुकी है और लोग पहली कक्षा से बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाने के लिए बाध्य हो गए हैं. ऐसी स्थिति में हिन्दी में काम करने वाले मिलेंगे कहाँ से और यदि मिल भी जाते हैं तो वे हिन्दी में काम करेंगे किसके लिए! आज जब ग्राहक सम्पर्क वाले किसी कार्य में ग्राहक ही हिन्दी में कोई कागज़, पत्र, पासबुक आदि स्वीकार करने में नाक-भौं सिकोड़ता है और स्वयं तो कोई फार्म भरने, सूचना देने, लिफाफे पर पता लिखने आदि जैसे छोटे-मोटे काम भी हिन्दी में करने के लिए तैयार नहीं है तो ऐसे नियम, आदेश, व्यवस्थाएं आएंगी किस काम! अंग्रेज़ी की मार्केट में हिन्दी या भारतीय भाषाओं के लिए स्थान है कहाँ? आज की शिक्षा-प्रणाली के अंतर्गत अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़कर आए कितने लोग सेमिनारों, काँफ्रेंस, संगोष्ठियों में शोध-पत्र हिन्दी में प्रस्तुत करते हैं, उन्हें ग्रहण करने वाले कितने होंगे और राष्ट्रीय स्तर पर ही उनका समुचित मूल्यांकन-उपयोग करने वाले कहाँ से आएंगे!

परंतु देश का सौभाग्य है कि डॉ. ओम विकास जैसे लोग इस निराशाजनक स्थिति में भी जबकि हिन्दी वर्तमान में उपेक्षित, असंगठित, किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में है, इस निराशा को आशा में बदलने, अबला को सबला बनाने के प्रयासों में कृतसंकल्प होकर जुटे हुए हैं और उन्होंने सूचना-प्रौद्यिगिकी के क्षेत्र में इतना महत्वपूर्ण कार्य किया भी है. कुछेक क्षेत्रों में इन प्रयासों की सफलता, सार्थकता दिखाई भी दे रही है. गर्भनाल ही इसका एक ज्वलंत उदाहरण है, प्रमाण है.

इसी अंक में हिन्दी के लिए चुपचाप बहुत बड़ा, महत्वपूर्ण, उपयोगी और सार्थक कार्य कर रहे श्री अरविंद कुमार के संबंध में श्री दयानंद पाण्डेय का लेख है. श्री अरविंद कुमार, डॉ. ओम विकास जैसे निष्ठावान, कृतसंकल्प, अथक विद्वान ही हिन्दी जगत् ही नहीं भारतीयता के लिए आशा की किरण हैं. उन्हें और उन जैसे अन्य विद्वानों को नमन.

महेन्द्र कुमार शर्मा, दिल्ली  

मेरे मित्र दयानंद पांडेय ने अपने लेख 'बालश्रमिक से शब्दाचार्य तक' में लिखा है कि ख़्वाजा अहमद अब्बास की फ़िल्म सात हिंदुस्तानी के लिए श्री अमिताभ बच्चन का चयन मैंने किया था. मुझे जो यह श्रेय दयानंद जी ने दिया है उसका अधिकारी मैं नहीं हूँ. सच कहें तो श्री अब्बास की फ़िल्म 'सात हिंदुस्तानी' और श्री सुनील दत्त की फ़िल्म 'रेशमा और शेरा' के लिए अमिताभ के नाम की सिफ़ारिश तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने स्वयं की थी. इसकी मुझे निजी जानकारी है. हाँ, मैं अमिताभ जी को आरंभिक प्रोत्साहन देने का श्रेयाधिकारी अवश्य हूँ. 'आनंद' फ़िल्म की रिलीज़ पर माधुरी ने उन्हें मुखपृष्ठ पर छापा था और जैनेंद्र जैन ने उन पर जो लेख लिखा था उस का शीर्षक था_एक और सूर्योदय. यह भविष्यवाणी सही सिध्द हुई. पर अमिताभ को हमारा प्रोत्साहन कोई पक्षपात नहीं था. और अकेले वही हमारे प्रोत्साहन के पात्र नहीं थे. माधुरी के मेरे चौदह वर्षों के संपादन काल में हमारी स्थिर नीति थी कि भावी और गुणी कलाकारों को खोजो और आगे बढ़ाओ. मैं बीसियों नाम गिना सकता हूँ.

मैं इस विषय में और अधिक अभी नहीं जाना चाहता क्योंकि मैं और हमारी टीम आगामी द्विभाषी ई-कोश अरविंद लैक्सिकन को अंतिम रूप देने में लगी है. वैसे भी मैं जान बूझ कर अपने आप को मुंबई और फ़िल्म पत्रकारिता के अनुभवों के बारे में चर्चा और लिखने से दूर रखता रहा हूँ. संभव हुआ तो जून जुलाई के बाद कभी अपनी कहानी लिखी तो कुछ लिखूँगा.

अरविंद कुमार  

गर्भनाल के संदर्भ में सबसे पहले मैं आपको कोटिश: धन्यवाद देना चाहता हूँ कि आपने यह अति सराहनीय कार्य करने का बीड़ा उठाया है. प्रवासी भारतीयों को अपनी संस्कृति से जोड़कर रखने का इस से अच्छा और क्या उपाय हो सकता है.

इसमें छपे लेख इतने अच्छे होते हैं कि मेरे पास उनकी प्रशंसा करने के लिए शब्द नहीं हैं. मैं बहुत ही आश्चर्यचकित हूँ कि इतनी अच्छे लेख आप कैसे जुटा लेते हैं! सभी लेख और कविताएँ पत्रिका के नाम को सार्थक करती प्रतीत होती हैं. मेरी ओर से आप सभी को बधाई. कृपया इसे भेजना जारी रखें.

लोकवीर शर्मा  

गर्भनाल का विहंगम अवलोकन किया. बहुत प्रभावित करती है प्रवासियों के प्रयास की यह अनुपम फलश्रुति है. मेरी बधाई और नव वर्ष की मंगलमय कामनाएँ स्वीकारें.

अरविन्द मिश्रा 

गर्भनाल का 38वाँ अंक आद्योपांत पढ़ गया और खाना-पीना तक भूल गया, लेकिन इसमें इतना रस मिला कि उठने को जी नहीं चाहता था. डॉ. राघवेन्द्र झा जी के नज़रिया ने तो मुग्ध कर दिया. एक-एक शब्द मन में चुभते चले गए. काश की अपना सनातन समाज इसे सही तरह से समझ पाए.

हमारी प्रगति के पथ में छुआछूत की बीमारी एक महामारी की तरह ही रही है अब तक और चाहे जितनी प्रगति हमने की हो, लेकिन इसकी तरफ शायद अभी भी ऑंखे मूंदे हुए हैं. इस कोढ़ से तो छुटकारा पाना ही होगा हमारे समाज को, क्योंकि अभी तो हमें बहुत आगे जाना है. यदि इसे हम जल्दी नहीं हटा पाये तो हमारी प्रगति वैसी नहीं हो पायेगी जैसा हम चाहते हैं.

कुमार अम्बुज जी की परख भी पढ़ी, लेकिन उनसे मैं सहमत नहीं हो सका. धर्म शब्द का अर्थ उन्होंने संस्कार किया है और हमारे सनातन धर्म पर उनकी पकड़ स्वस्थ नहीं लगी, पर इसमें तो कोई शक नहीं कि उनका दर्शन मार्क्स और एंजिल्स से प्रभावित है तभी उन्होंने इस तरह के विचार दिये हैं.

जैसा कि मैंने पढ़ा है श्री राधाकृष्णन ने ठीक ही कहा है की हिन्दू कोई धर्म का नाम नहीं, यह विचारों के संगठन से बना शब्द है, हम पर थोपा गया शब्द है. धर्म तो सनातन है जिसमें फेरबदल हो ही नहीं सकता. पर मैं यह अवश्य मानता हूँ कि कुमार अम्बुज जी ने जिसे धर्म कहा और समझा है, वो रूढ़ियों से भरा हुआ है, जिसका हटना जरूरी है.

अचल वर्मा 

बहुत ही शानदार पत्रिका है 'गर्भनाल'. एक मित्र महोदय के सौजन्य से पहली मर्तबा देखी. पर अब तो हर बार पढ़ने को मन ललचा उठा है. कम्प्यूटर ने वाकई तमाम मुश्किलें हल कर दी हैं लिखने-पढ़ने वालों की. बधाई स्वीकारें.

राजू मिश्र, लखनऊ 

गर्भनाल का 38वाँ अंक समय से एवं पुराने अंदाज में नवीन विचारों के सागर को लिए हुए 'चंद्रग्रहण' में निर्मल होने के लिए आपके असीम स्नेह का परिचायक एवं मोक्ष स्नान के रूप में मिला. शायद चाँद तो राहु के नीच दृष्टि से मोक्ष प्राप्त कर लेगा मगर आम आदमी ग्रहण के दोष एवं अभिशाप से कब मुक्त होगा? आज हम जिस धरती पर रहते हैं, वहाँ राहु कई रूप धरकर हमारे अन्तर्जगत एवं बाह्य-जगत के अमृत तुल्य प्रेम और सौहार्द्र को न जाने कौन-कौन से नाटक करके पी रहा है और हम कभी यह सोचकर कि हमारा व्यक्तिगत अमृत कलश तो सुरक्षित है, तो कभी हम यह सोच लेते हैं कि हमारे परिवार का अमृत कलश तो सुरक्षित है - तो कभी समाज एवं जाति का अमृत कलश तो सुरक्षित है. हम कभी उससे ऊपर उठते हैं तो यह सोच कर कि चलो हमारे राष्ट्र का अमृत कलश तो सुरक्षित है. मगर प्रश्न है कि क्या हम कभी यह सोच पाते हैं कि वह सत्य है या कुछ और? प्रबुध्द वर्ग आज किसी देश में, जाति में, समाज में, परिवार में या व्यक्ति में निवास करता है या कहीं और?

इस माह के मकर संक्रांति पर सूर्य का ग्रहण है? यह भी एक अनूठा संयोग है, अभी-अभी हम 'चंद्रग्रहण' से मुक्त हुए ही थे कि 'सूर्यग्रहण' भी लग गया. आम आदमी को पहले से हीं 'मंहगाई का ग्रहण' निगल रहा है. वैसी स्थिति में आम आदमी किन-किन ग्रहणों से निपटेगा. ज्योतिषों के मुखारविन्द से अभी ग्रहण के उपाय बताए जाएंगे और हम 'चंद्रग्रहण' और 'सूर्यग्रहण' से मुक्त हो जाएंगे पर हम समाज के अन्दर व्याप्त अन्य ग्रहणों से कब मुक्त हो पाएंगे. इस पर आपकी सम्पादकीय अभिव्यक्ति फरवरी 2010 अंक में आम पाठकों के हितार्थ प्रकाशित होनी चाहिए. यह मेरा प्रवासी एवं अप्रवासी पाठकों की ओर से नम्र निवेदन है.

गर्भनाल के 38वे अंक में प्रकाशित रचनाकारों की एवं उनकी रचनाओं की जितनी प्रशंसा की जाए कम है.

अरविन्द कुमार पाठक, नागदा, उज्जैन 

गर्भनाल का 38वां अंक प्राप्त हुआ. अच्छा काम जितने समय तक जारी रहा आये उतना अच्छा. डॉ. ओम विकास जी का हिन्दी की दशा संबंधी आलेख अत्यंत पसंद आया. उन्होंने समस्या के व्यवहारिक समाधान पेश किये हैं. इस अंक की कविताएँ भी प्रभावित करती हैं.

रोजी ठाकुर, उदयपुर  

Kindly accept my heartiest congratulations on the new year's day. I am regularly reading the excellent magazine published by you. I pray God that you achieve highest literary heights.

Suresh Chandra Jain, Bhopal 

I got mail from GARBHANAL continuously but I ignoring them. Today I download some attachment of your Magazine and feel that this is very good magazine. I praise for your great efforts.

I hope this magazine become peoples Magazine and touches new heights in 2010. I appreciate for your courage. I can say "yah patrika manviya samvednaon ka ek ghalk hai". warm wishes to Garbhnal and your teams.

Manoj Kumar, Delhi-85  

Dear Editor, Perhaps you do not know that Laxmi Kant Vaishnav is no more. He passed away in 1989. As such the introduction may please be corrected.

Dr. Hari Joshi 

First of all happy new year to editor of garbhnal and their family. just saw this magazine. really its too creative and balanced. poetry, story, novel and book reviews are also here. it is a  good literature contanner.

kaushlendra prapanna, kaushv.blogspot.com 

गर्भनाल के 38वें अंक के लिए आपको जितना भी धन्यवाद दूँ कम ही होगा क्योंकि आपने इस बार एक ऐसी शख्सियत से मिलाया है जिस पर हर हिन्दुस्तानी को गर्व होगा. मैं बात कर रही हूँ अरविन्द कुमार जी की. इतने निश्छल, सरल, कर्मठ और विद्वान व्यक्ति का जीवन परिचय जानने को मिला. शुक्रिया दयानंद पाण्डेय को भी जिन्होंने इसे हम तक पहुँचाया. दरअसल सर्वोत्तम पत्रिका जब मैं पढ़ती थी तब अरविन्द कुमार जी के बारे में इतना नहीं जानती थी लेकिन गर्भनाल ने 'बाल श्रमिक से शब्दाचार्य तक की यात्रा' में सुधि पाठकों को उनके बारे में बताया बहुत ही अच्छा लगा. मेरे जैसे बहुत सारे लोग उनकी फिल्मों की यात्रा के बारे में भी नहीं जानते होंगे. मैं चाहती हूँ उनके शब्दकोष का ज्ञान हमें मिले. उनके थिसारस के बारे में भी विस्तार से बताइयेगा तो मेहरबानी होगी.

अनीता सक्सेना 

गर्भनाल के 38वें अंक में अरविंद कुमार पर दयानंद पांडे जी का आलेख रोमांचित कर गया. सचमुच अरविंद जी हमारे समय के बड़ी शख्सियत हैं, जिन्होंने भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए बहुत बड़ा काम किया है. कीमती बात यह है कि उन्होंने अपना काम करते हुए कोई दुकानदारी नहीं जमायी, वरना हिंदी का काम करने वाले पहले फतवे जारी करते हैं और बाद में दुकानदार हो जाते हैं. हिंदी समाज को अरविंद जी का कृतज्ञ होना चाहिये.

अदिति व्यास, पटना 

गर्भनाल पढ़ते-पढ़ते अचानक ख्याल आया कि हिन्दी में 'भाषा' एक स्त्रीलिंगी शब्द है क्योंकि भाषा नारी की तरह श्रृंगार करने की चाह रखती है. उसकी इस चाह की पूर्ति के लिये हम भी अपने विचारों को प्रगट करने के लिये भाषा को जितना बन सके उतना सुन्दर बनाने की कोशिश करते हैं. हम गौर करें तो भाषा के सोलह श्रृंगार हमें साहित्य में देखने मिल जाते हैं. यथा साहित्य की सोलह विधाऐं हैं --- कविता, गजल, उपन्यास या कहानी या लघुकथा, नाटक या एकांकी, चिंतन, लेख, चित्रण (आत्मकथा या जीवनी), पत्रकारिता, पत्र लेखन, व्यंग्य, परिचर्चा, व्याख्या, खंड काव्य, ग्रंथ, समीक्षा तथा मुहावरे व अलंकार से सुसज्जित व्याकरण.

आश्चर्य है कि आप इन सभी विधाओं का समावेश अपनी पत्रिका में रम्य-रचना, बातचीत, शख्सियत, परख, महाभारत व गीता सार, आपकी बात आदि के माध्यम से बखूबी करते आ रहे हैं जिससे संपूर्ण श्रृंगार के साथ पत्रिका पाठकों के सामने आती है.

आप इसके लिये बधाई के पात्र हैं.          

भूपेन्द्र कुमार दवे, जबलपुर 

स्तरीय सामग्री से भरे-पूरे गर्भनाल के अंक नियमित तौर पर प्राप्त होते हैं. इनमें आपके प्रयासों की सार्थकता साफ़ दिखती है. उम्मीद है गर्भनाल ऐसे ही अपनी उपयोगिता बनाये रखेगी.

राजसिंह, न्यूयार्क

गर्भनाल का हर अंक एक विशेष अंक होता है. देखने में सुंदर नए विचारों से भरपूर, संसार की कल्पनाओं का निचोड़. इसे पढ़ते हुए मन का जायका इतना अच्छा हो जाता है कि कई बार तो कंप्यूटर के पास से उठने को दिल ही नहीं करता है. बातचीत का मामला तो दिल का मामला होता है जिसमे सचमुच इंसान की पूरी तस्वीर सामने आ जाती है. इंसान की यात्रा की कहानी उसके मुंह से जुबानी - जब एक साहित्यकार प्रश्नों में भर देता है तो ऐसा लगता है जैसे कि सिनेमा की कोई फिल्म देख रहे हों. नयी-नयी बातें जानने को मिलती हैं, एक उत्सुकता जाग्रत होती है कि यह वो ही इंसान है जिससे मैं कुछ साल हुए मिला था. सुधा ढ़ींगरा के पास एक जादू का यंत्र है जिससे वो सारी बात खोज लेती हैं. बातचीत से गर्भनाल में एक नवीनता और उत्सुकता आयी है.

श्याम त्रिपाठी, कनाडा

गर्भनाल के सैंतीसवें अंक में शील निगम की कहानी 'अनछुआ प्यार' बहुत पसंद आई. जीवन में हर रिश्ता चाहने से नहीं मिलता, चाहे वो प्यार का ही रिश्ता क्यों न हो. इस कहानी में यह अनछुए प्यार का रिश्ता भी बड़ी गरिमा के साथ निभाया गया है. बाकी की सामग्री भी बहुत रोचक एवं उच्च श्रेणी की है. इस तरह की साहित्यिक पत्रिका निकालने के लिए आप को तथा सभी रचनाकारों को बधाई.

आरती दीवान

गर्भनाल का दिसंबर अंक मिला. बहुत कुछ कहता है ये अंक. डॉ. सुधा ओम ढींगरा की सुषम बेदी जी से बात और सुषम जी का प्रवासी साहित्य को मुख्य शरीर (हिन्दी साहित्य) का अंग कहना तथा हिन्दी साहित्य का दिल बड़ा होने की बात कहना - उन सब लोगों को सोचने पर मजबूर करेगा जो प्रवासी साहित्य पर मत नहीं बना पाते. रेणु राजवंशी जी का ये कहना कि हम अमेरिकन प्रवास में भारतीय संस्कार आरोपित करना चाहते हैं, भारतीय मूल्यों की सार्थकता को दर्शाता है. इस तरह से यह प्रवासी साहित्य का स्थान निश्चित करने में मदद करेगा.

अनुराधा शर्मा 

सदाबहार गर्भनाल का 37वां अंक हासिल हुआ और रुचिकर रचनाओं, नए लेखकों और उत्तम लेखों से सामना हुआ.

मुहसिन भोपाली जी की गज़लें बेहद पसंद आईं. सुरेश शुक्ल जी की 'उठाओ हाथ में मशाल' शब्दों से हलचल मचाती हुई एक क्रांतिमय कविता अच्छी लगी, जिसमें जोश की बुलंदी साफ़ नज़र आ रही है. स्नोवा बार्नो की कविता 'चिथड़ा भर चिंता' मन को झिंझोड़ने के लिए सशक्त रही और साथ ही 'मैं कहाँ जाऊं?' भी.

डॉ. सुषम बेदी से सुधाजी की बातचीत बहुत ही ज्ञानवर्धक रही. डॉ. बेदी की सुलझी हुई बातें पाठक को अपने साथ उस सफ़र में शामिल करती रहीं. उन्होंने प्रवासी हिंदी साहित्य और अमेरिका के हिंदी साहित्य पर सकारात्मक ढंग से रौशनी डाली है. उनकी सोच और अनुभवों से वाकिफ कराने के लिए सुधाजी को बहुत धन्यवाद.

रेणु राजवंशी गुप्ता का आलेख 'अमेरिका का कथा-हिंदी साहित्य' सोने पे सुहागा रहा. हिंदी भाषा को लेकर जो हलचल मची हुई है वह हर हिन्दुस्तानी के मन की है, जहाँ कोई प्रवासी और अप्रवासी नहीं, बस देश और देश की भाषा का भाव जब कलम प्रकट करती है तो जो मनोभाव प्रकट होते हैं उन्हें किसी भी दायरे में कैद करना नामुमकिन है. न भाषा की कोई जात है न लेखन कला की. रेणुजी का कथन 'हिंदी लेखकों ने कर्मभूमि बदली है' इस बात का समर्थन है! प्रसिध्द लेखकों को लेकर एक विचारात्मक प्रश्न सामने आया है, जिसके जवाब में प्रवासी साहित्यकारों को अपना जवाब समाया हुआ मिलेगा. लेख उत्तम, सामग्री पाठनीय, पर सवाल फिर भी वहीं का वहीं! 'अमेरिका का हिंदी लेखक कौन?'

देवी नागरानी, न्यूजर्सी 

गर्भनाल का 37वां अंक पढ़ा. मन प्रसन्न हो गया. बेहतर अंक के लिए बधाई स्वीकारें. रेणु राजवंशी का अमेरिका हिंदी कथा साहित्य आलेख काफी ज्ञानवर्धक है. जो हिंदी कथा साहित्य को बखूबी स्पष्ट करता है. गीता सार, अनिल विद्यालंकार का आलेख विचारोत्तेजक है. उन्हें बधाई. अन्य साहित्यिक सामग्री में मुहसिन की गज़लें, स्नोवा बार्नो की कविता 'चिथड़ा भर चिंता', सुरेश कुमार की कविता 'आकाश का विस्तार' बेहतर प्रस्तुती का अहसास देती हैं. राजेंद्र सिंह बेदी की कहानी 'कशमकश' इस अंक की उपलब्धि है. आगे भी गर्भनाल से ऐसी ही उम्मीद रहेगी।

अशोक गौतम, सोलन 

गर्भनाल का 37वाँ अंक देखा. हमेशा की तरह बढ़िया है. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के आलेख ने मन छू लिया, क्योंकि साहित्य लिखने और पूरी सरकारी नौकरी के दौरान हिन्दी के प्रचार-प्रसार से जुड़े रहने के कारण 'हिन्दीवाला' कहलाने का जो 'सुख' सहा है, जो सुख आज भी 'हिन्दीवाला' बराबर पा रहा है, वह इस लेख में रेखांकित हो गया. देश में हिन्दी की अवस्था देख कर निराशा ही होती है. ऍंग्रेजी को 'चलाते रहने' की जो सुविधा दे दी गई है उसने उसे प्रमुख और हिन्दी को गौण भाषा बना दिया है. कई हिन्दी अखबार ऍंग्रेजी को देवनागरी में लिख रहे हैं. ऐसे में देश-विदेश में हिन्दी की प्रगति और लेखन-सृजन को प्रस्तुत करके गर्भनाल एक ताजी हवा के झोंके सा लगता है. अपने प्रयास के लिए आप लोग एक बार फिर मेरा अभिवादन स्वीकार करें.

विश्वदेव शर्मा, मुंबई 

गर्भनाल का पुराना अंक 32 पढ रहा था. परवीन शाकिर की ग़ज़ल पसंद आई. उनके परिचय में ऊपर लिखा है कि ...सरकारी नौकरी में है, जबकि सत्य यह है कि कई वर्ष पहले उनका देहांत हो चुका है.

डॉ. राधा गुप्ता की कविता भी अच्छी है. उर्दू शब्दों में बिंदी का भी बहुत महत्व है. उनकी कविता में ... 'जंग लगने दीजिए मत, योग्यता के शस्र में', यदि 'ज़ंग' लिखा जाता तो और अच्छा होता, वर्ना 'जंग' शब्द से युध्द का मतलब निकलता है. लगातार इतनी अच्छी पत्रिका निकालने के लिये मुबारकबाद.

नजमुल इस्लाम, भोपाल 

गर्भनाल पत्रिका हिन्दी साहित्य जगत में भारतीय एवं प्रवासी बंधुओं के बीच एक सेतु का काम कर रही है। पत्रिका का कलेवर एवं लेख/आलेख, कवितायें आदि बहुत ही स्तरीय हैं। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में हिन्दी साहित्य जगत के लिए गर्भनाल एक पथ प्रदर्शक का कार्य करेगी।

दिनेश ध्यानी, नई दिल्ली 

हम ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ देवनागरी लिपि में लिखे बहुत ही कम लेखों से वास्ता पड़ता है. ऐसे में आपका ये प्रयास जो हमें अपनी भाषा और अपने क्षेत्र से जोड़ता है, बहुत ही सराहनीय है.

अशोक झा 

ई-मैगज़ीन गर्भनाल के लिये बधाई और शुभकामनाएँ. जब कोई अपने हाथ में लेकर चला कुदाल / दुनिया को करना पड़ेगा उसका इस्तकबाल. सो आपका पूरे मन से इस्तकबाल इस भागीरथी प्रयास के लिये.

विजय जोशी, भोपाल 

आपकी पत्रिका मिली. पत्रिका के संदर्भ में कुछ बातें कहना चाहूंगा. गर्भनाल दावा करता है कि वह प्रवासी भारतीयों की एक पत्रिका है, कौतुहल से पन्ने पलटता चला गया कि चलो देखें विदेशी जमीन पर बसे भारतीय क्या सोचते हैं और क्या लिखते हैं. लेकिन बहुत नाउम्मीद किया आपने.

सुमंत भट्टाचार्य, आउटलुक (हिंदी)

आपकी पत्रिका ई-मेल से प्राप्त हुई. आप समाज में नवचेतना और जागृति के लिए सद्विचारों को प्रकाशित करते रहें और इसी तरह पत्रिका भेजते रहें यही कामना है. आप सभी के मंगलमय जीवन व दीर्घायु की हार्दिक कामना आद्यशक्ति माँ गायत्री से करते हैं.

चैतन्य, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, मथुरा

गर्भनाल के 37वें अंक में 'रम्य-रचना' अच्छी है. कृपया हिस्ट्री को कम जगह दीजिए. कुछ नया दीजिए. अगर समझ नहीं आ रहा हो तो पूछ लेना.

राजेश के. त्यागी, दिल्ली 

Your magazine very fantastic. I am an avid reader of GARBHNAL. At the end of every month i wait for new  issue. I like very much the content which is written by different NRI.  Thanking You.

Dharmendra Kumar Rai, PTI Bhasa, New Delhi 

Your magazine contains Muhaware, Lokotiyan and Aoo Hindi Seekhein and they themselves are adding grace to Hindi language and making Hindi a loving popular language.

B.K.Dave, Executive Director (Retd.)

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