ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सर्द रात का सन्नाटा
01-Aug-2019 03:52 AM 1186     

नेहा बिस्तर पर पड़ी-पड़ी करवटें बदलती रही। नींद को न जाने किस बात की शिकायत थी, जो उसके पास आने-भर से क़तरा रही थी। जनवरी की गहराई रात काफ़ी ठंडी थी। सुबह से ही रुई-सी कोमल श्वेत बर्फ़ झर-झर गिरती हुई सड़क पर बिछी जा रही थी। स्कॉटलैंड के पहाड़ बर्फ़ से ढके थे। ऐसा आभास होता था, जैसे किसी अप्सरा ने सफ़ेद परिधान ओढ़ लिया हो। सर्दी इतनी थी कि लगता था कि घर के फ़र्श पर भी बर्फ़ की एक हलकी-सी पर्त जम गई थी, जो दिन-भर हीटिंग चलाने के बावजूद पिघलना नहीं चाहती थी। यूं मन को विक्षिप्त करने के लिए तो एकांत ही काफ़ी होता है, तिस पर नीरव सन्नाटे की बांहों में जकड़ी हुई यह सर्द अंधेरी रात....!
बार-बार परेश का चेहरा उसके सामने आकर उसे झिंझोड़ डालता। वह जितना ही उसे भुलाने की कोशिश करती उतना ही उसका चेहरा याद आकर उसके मन-मानस में तूफ़ान मचा देता। क्यों सोचती है वह उसके लिए? क्यों नहीं आज़ाद हो पाती उसके चंगुल से? उस अजनबी से अब नेहा का क्या वास्ता था भला? हाँ, अब तो वह एक अपरिचित अजनबी ही तो था। जब संबंध था तो अपनापन था, अपनेपन का अहसास था... रिश्ते की गर्मी थी... महक थी। लेकिन... आज... अब?
कब, कैसे जाने-अनजाने परेश उसके हृदय की पर्तों में उतरता चला गया, पगली नेहा जान ही न पाई, कब वह अचानक उसकी पलकों में बंद हो गया, उसे ख़बर तक न हुई। स्मृति-सागर में ज्वार-भाटा-सा आ गया हो जैसे। बिस्तर में पड़ी बेचैन नेहा उस सागर में डूबने-उतराने लगी।
नेहा तब भारत से नई-नई आई थी। उसे याद आ रहा था, जब उसने केमिस्ट्री में एम.एस.सी. प्रथम श्रेणी में पास की तो मम्मी-पापा गर्व से फूले न समाए थे। बेटी को गले लगाते हुए बोले, "शाबाश नेहा, हमें तुमसे यही आशा थी। भगवान ने बेटा नहीं दिया तो क्या हुआ-तुम्हारी योग्यता, उपलब्धि क्या किसी बेटे से कम है भला?"
प्रो. आनंद की आंखें भी हर्षातिरेक से भीग गईं; नेहा उनकी चहेती शिष्या थी। आत्मीयता और स्नेह से नेहा को प्रोत्साहन देते हुए बोले, "नेहा एक सुझाव है मेरा, एडिनबरा विश्वविद्यालय अपने मेडिकल साइंस और इंजीनियरिंग विभाग के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। मैंने भी अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री वहीं से हासिल की थी। तुम यूनिवर्सिटी ग्रांट-कमीशन में छात्रवृत्ति के लिए आवेदन-पत्र दे दो। शायद बाहर जाकर शोध कार्य करने का कोई अवसर मिल जाए। मैं अपनी तरफ़ से पूरा सहयोग दूंगा। बस तुम देर मत करो अब।
नेहा ने तुरंत आवेदन-पत्र दे दिया। देहली जाकर एक-दो इंटरव्यू भी दे दिए। मेधावी छात्रा तो थी ही। वह उत्तीर्ण हो गई और उसे एडिनबरा यूनिवर्सिटी में शोध करने का अवसर मिल ही गया।
नेहा तो जैसे सातवें आसमान पर थी। बचपन से ही उसकी यह इच्छा रही थी कि वह विदेश जाकर पढ़े, वहां की संस्कृति और सभ्यता देखे और समझे! वहां खुले और मुक्त वातावरण में सांस ले। भारत में तो हर क़दम पर यह मत करो वह मत करो, इससे मत मिलो, उसके यहां मत जाओ... आदि आदि...! हर जगह बंधन... कहीं भी तो मुक्ति की सांस नहीं। यह कैसा चमत्कार हुआ उसकी जिंदगी में... कैसे उसका स्वप्न यथार्थ में बदल गया! ऐसा सोचते हुए नेहा फूली न समाई।
पापा ने बहुत एतराज़ नहीं किया, पर मम्मी विदेश जाने की बात पर कुछ नाराज़-सी लगी। "अकेली लड़की को कहां विदेश भेज दें। यहां भी तो पी.एच.डी. हो सकती है, वहां ऐसी क्या ख़ास बात है, वगैरह-वगैरह।" पर ऐसे तूफ़ान तो भारतीय परिवारों में छोटी-छोटी घटनाओं के होने पर आते ही रहते हैं।
बहुत सारी हिदायतें और उपदेश देते हुए मम्मी-पापा ने भरे गले से उसे विदा किया। छोटी बहन तनु गले से लगकर सिसक पड़ी, "दीदी, मुझे बहुत अकेला लगेगा तुम्हारे बिना। जल्दी से पत्र लिखना, फ़ोन करती रहना।" यह सुनकर नेहा की भी आंखें छलक गईं।
हवाई-जहाज़ में बैठी नेहा सोच रही थी कि कैसा होगा विदेश... कैसे होंगे वहां के लोग...। सुना है, स्कॉटलैंड में मौसम काफ़ी ठंडा रहता है और पश्चिम के लोग भी मौसम की तरह ही ठंडे होते हैं। एक तरफ विदेश जाने की उत्सुकता थी, उल्लास था तो दूसरी तरफ मम्मी, पापा, तनु और सहेलियों को छोड़ने की एक उदासी थी।
स्कॉटलैंड का प्राकृतिक सौंदर्य देखकर मुग्ध हो उठी नेहा। नीले-नीले ऊँचे पहाड़, जो सुरमई शाम के धुंधलके में और भी गहरे लगते, पहाड़ों के क़दम चूमती विस्तृत गहरी झीलें, इतिहास की गरिमा समेटे विशाल किले, छोटी-छोटी बलखाती टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियां; जिधर भी नज़र उठ जाए मनभावक दृष्यों का जमघट दिखाई पड़ता। मन विभोर हो गया नेहा का।
डॉ. मैकमिलन की अध्यक्षता में शोध कार्य करना था नेहा को। वह बहुत सज्जन स्वभाव के व्यक्ति थे, बड़े प्यार और स्नेह के साथ वह नेहा से पेश आए। शुरू-शुरू में नेहा जब अपने आस-पास अनजाने चेहरे देखती, तो घर की याद से मन भीग जाता।
एग्नेस, ब्रूस, हैमिश - सारे विदेशी नाम, विदेशी चेहरे, विदेशी भाषा। अक्सर स्कॉटिश उच्चारण उसकी समझ में न आता। मन उद्विग्न होने लगता। कभी-कभी उसे लगता अपने देश जैसा कोई देश नहीं है दुनिया-भर में। मम्मी के हाथ की गर्म-गर्म रोटी, पापा को बनाकर दी गई सुबह की बेड-टी और रात गए देर तक तनु से घुल-मिलकर बातें करना, बात-बेबात पर हंसना-पूरे दिन का ब्यौरा देना-लेना आदि, इन सबके लिए नेहा का मन ललकने लगता। अकेलेपन की बोरियत से बचने के लिए देर-देर तक नेहा अन्यमनस्क-सी होकर लाइब्रेरी में बैठी रहती। सामने क़िताब खुली होती, मन कहीं अपनों में रम जाने को तरसता रहता; बेताब नज़रें कुछ इधर-उधर तलाशती रहतीं।
ऐसी ही एक कजरारी शाम को नेहा लाइब्रेरी में बैठी थी कि अपनी भाषा सुनकर चौंक गई, "नई आई हैं क्या? आपको पहले नहीं देखा, मुझे परेश कहते हैं। यहां आज लाइब्रेरी में एक दोस्त से मिलने आया था, दोस्त तो पहुंचा नहीं...। हां, आपसे परिचय करने चला आया।"
"जी, नमस्कार, मैं नेहा हूं। यहां भारत से इंजीनियरिंग साइंस में पी.एच.डी. करने आई हूं।"
"बहुत ख़ुशी हुई आपसे मिलकर", दोनों एक साथ बोल पड़े।
यह पहला परिचय था परेश से उसका। सांवला रंग, ऊँचा क़द, चौड़े कंधे, घुँघराले बाल, दिलकश मुस्कान - कुल मिलाकर परेश आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था। उससे मिलने के बाद नेहा का अकेलापन थोड़ा कम होने लगा। धीरे-धीरे वह पहली औपचारिक मुलाकात, दोस्ती में बदलने लगी। परेश मेडिसिन का विद्यार्थी था, उसके माँ-बाप, भाई-बहन सब ग्लासगो में रहते थे। एक-दो बार परेश उसे अपने घर भी ले गया। नेहा को इतने दिनों बाद एक भारतीय परिवार के साथ उठना-बैठना, खाना-पीना, हंसना-बोलना बहुत अच्छा लगा।
नेहा सोच-सोचकर थकने लगी-अपने कड़वे अतीत की ये सब बातें याद करके वह दुःखी नहीं होना चाहती थी, लेकिन विचार थे कि आवारा बादलों की तरह क़ाबू से बाहर होते चले जा रहे थे।
नेहा को बारिश की वह भीगी-भीगी शाम याद आई। कितनी बरसात थी उस दिन! लगता था, आज धरती प्यास बुझाकर ही रहेगी। क्या सिर्फ धरती ही प्यासी थी! वह नहीं? लेक्चर खत्म होते ही नेहा हर रोज़ की तरह बस स्टॉप की ओर जा रही थी कि तभी परेश ने पास आकर गाड़ी रोककर कहा, "नेहा मौसम बहुत ख़राब है। यहां बरसात होती है तो रुकने का नाम नहीं लेती। बैठो गाड़ी में, मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं। बस, एक छोटी-सी शर्त... गर्म-गर्म काफ़ी पिलानी पड़ेगी", और बिना ना-नुकुर किए, गाड़ी में बैठ गई नेहा। कितनी अच्छी लगती हैं, छोटी-छोटी सुविधाएं, अपनेपन का बोध अगर कहीं मिल जाए, तो जीवन अपने-आप सरस होने लगता है।
"बहुत भीग गई हो नेहा, फ़्लू हो जाएगा। तुम कपड़े बदल लो, मैं कॉफ़ी बना देता हूं तब तक", परेश की यह चिंता उसे अच्छी लगी।
"बहुत दिनों से कुछ कहना चाह रहा हूं, नेहा", परेश ने खोजपूर्ण दृष्टि से उसे देखा, जैसे कि फैसला कर रहा हो कि कहे या न कहे, "हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं, एक-दूसरे के दुःख-सुख में साथ हैं, अपना एकांत एक-दूसरे से बांट सकते हैं पर इस रिश्ते का दायरा थोड़ा और बढ़ाना चाहता हूं। तुम भी क्या कभी ऐसा सोचती हो? तुमने कभी कुछ कहा तो नहीं, समझाया भी नहीं", नेहा ने परेश का हलका-सा स्पर्श महसूस किया जो उसकी आंखों में अपने सवाल का जवाब ढूंढ रहा था।
थोड़ी देर के लिए तो नेहा का मन चाहा कि परेश की छाती में अपना मुंह छिपाकर उसकी बाहों के घेरे में बंध जाए। उसकी सांसों की गर्मी से पिघलने लगे... बिना किसी हिचक-झिझक के उसे संपूर्ण रूप से पा ले। अपना अलग सा अस्तित्व मिटाकर बस एक हो जाए परेश के साथ, परंतु विचारों की एक लहर फिर तेज़ी से उभरी। अगर उस रात वह अपने को परेश को समर्पित कर देती तो क्या फिर वह होने की संभावना थी जो हो गया अचानक...
तभी मम्मी की बातें बिजली बनकर कौंधी, "नेहा बहुत विश्वास से भेज रहे हैं तुम्हें हम। अपने आदर्श, अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता को भूलना मत... विदेश की स्वछंदता, जरूरत से ज्यादा स्वतंत्र तौर-तरीके हम भारतीयों को शोभा नहीं देते। नादानी में किसी ऐसी राह पर मत चलना जहां से वापस न लौट सको और जिसका अफ़सोस तुम्हें और हमें सारी जिंदगी सताता रहे।"
"परेश थोड़ा-सा वक्त चाहिए मुझे। अभी से इस दलदल में मत खींचो, मैं इतने गहरे नहीं उतरना चाहती कि फिर बाहर ही न निकल सकूं। फ़िलहाल तो हम अच्छे दोस्त हैं, दोनों ही अपना-अपना भविष्य संवारने में लगे हैं। फिर मम्मी-पापा की अनुमति, उनका परामर्श... बहुत-सी उलझनें हैं। अभी इस समय मैं तुम्हें कोई आश्वासन नहीं दे सकती, कोई वायदा नहीं कर सकती।" नेहा का स्वर भरभराने लगा।
"आश्वासन की बात, वायदे की बात कौन कर रहा है। तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं कि तुम्हारे जीवन में भी मेरे लिए कोई विशेष जगह है या नहीं? तुम भी मुझे प्यार करती हो या कि मेरी चाहत, मेरा आकर्षण एकतरफ़ा है; यही जानना चाहता हूं।"
गले में कांटा-सा अटक गया नेहा के। मन हुआ कह दे परेश से, जो तुमने आज कहा है, मैं तो न जाने कबसे कहना चाहती थी। फिर सच कहूं, तो पहले तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती थी। नारी होने का लोभ संवरण नहीं कर पाई कि पुरुष पहल करे, अपनी बांहों में सिमटने का आमंत्रण दे। लेकिन मैं हूं न, बार-बार संशय में घिर जाती हूं। क्या हम एक-दूसरे से निभा पाएंगे? एक किनारे से दूसरे किनारे तक लप-लप करके बहते प्यार का अल्हड़, तीव्र उमड़ता, ठाठें मारता बहाव कुछ और होता है। वैवाहिक जीवन की समस्याएं, परेशानियां, जिम्मेदारियां, इन सबको एक साथ जी पाना, निभा पाना एक अलग बात है। फिर, कहीं यह सब-दिन-रात एक-दूसरे को बर्दाश्त करने और सहने की विवशता न हो जाए? कुछ भी फैसला नहीं कर पाती नेहा।
क्यों वह कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकती जिंदगी में। हां, समाज ही दोषी है इसके लिए, बस। हमारे समाज ने नारी को अपनी तरह से जिंदगी जीने का अधिकार ही कब दिया है? पहले मां-बाप-भाई, फिर पति-पुत्र, बस इन्हीं के माध्यम से ही तो औरतें अपनी जिंदगी जीती हैं। क्यों मैं हर मोड़ पर, हर राह पर टुकड़े-टुकड़े होकर टूटने-बिखरने लगती हूं। कुछ भी तो नहीं कह पाई परेश से। जाने उसके मौन का अर्थ परेश ने क्या समझा हो... स्वीकृति या अवहेलना।
तनु की चिट्ठी आई थी, "दीदी! थोड़े दिनों के लिए मुझे भी बुला लो न, घर में दिल की बात कहने-सुनने वाला कोई नहीं है। बहुत ख़ालीपन लगता है तुम्हारे बिना, तुमसे बिछुड़कर। एकदम अकेली पड़ गई हूं, मम्मी-पापा ठीक हैं। तुम्हारी सफ़लता की बातें दोहराते नहीं थकते। वह दस नंबर वाली बिंदु थी न... उसकी शादी हो गई। सामने वाली कोठी में रहने वाली मिसेज़ गर्ग को कैंसर हो गया है, चिमनी की तरह सिगरेट फूंकती थी न, वगैरह-वगैरह।
शाम को नेहा एयरपोर्ट, पुलिस-स्टेशन और अस्पताल में बंगलादेश, पाकिस्तान और पंजाब आदि से आए हुए ग़ैर-कानूनी इमिग्रेंट्स के लिए दुभाषिये का काम करने लगी। फिर कुछ पैसे जमा करके उसने तनु के लिए टिकट भेज दिया। तनु के लिए कुछ भी करना, उसे संतुष्टि की चरम सीमा तक पहुंचा देता था। उससे ज़्यादा अपना उसे कोई नहीं लगता था।
उस दिन जब तनु आई तो उस चंचल, चुलबुली से परिचय करवाती हुई नेहा ने कहा, "तनु, यह है मेरा अभिन्न मित्र परेश! यह यहां मेडिसिन में डिग्री...", तनु ने बिना पूरा वाक्य सुने फुलझड़ी छोड़ी, "अभी तक सिर्फ मित्रता तक ही पहुंची हो, यहां आकर भी उतनी ही कायर रहीं, जितनी भारत में थी। अरे! दीदी, थोड़ा खुली हवा में सांस लो न ... मुक्त महसूस करो अपने को। यहां मम्मी-पापा और आर्यसमाज वाली बातें नहीं हैं", फिर उसने परेश की ओर देखते हुए कहा, "हैलो परेश, प्लीज़ड टू मीट यू", तनु ने ऐसी सहजता से कहा, जैसे पुरानी जान-पहचान हो।
"तनु अब चुप! और कुछ नहीं बोलोगी", फिर परेश की तरफ मुख़ातिब होकर क्षमा मांगने के से स्वर में बोली, "परेश, ये मेरी लाड़ली छोटी बहन है। शरारत इसकी रग-रग में बसी है। बोलती है तो बेलाग बोले ही चली जाती है, फिर भी, प्यार से भी प्यारी लगती है। इसकी किसी बात का बुरा मत मानना।"
समय पंख लगाकर उड़ता चला गया। तीनों विदेशी पर्यटकों की तरह सारा स्कॉटलैंड और लेक-डिस्ट्रिक्ट वगैरह खूब घूमे-फिरे। बस, दो सप्ताह के बाद वापसी थी तनु की, दोनों बहनें कैफ़े में बैठी बतिया रही थीं। "दीदी परेश तुम्हें बहुत पसंद करते हैं न, उनकी हर नज़र जो तुम्हारी तरफ उठती है प्यार में लिप्त होती है। मेरे जीजू बनने की सारी विशेषताएं हैं उनमें। अब मैं भारत जा रहीं हूं, अगर ठीक समझो, दीदी, तो मम्मी-पापा से कुछ कहूं इस विषय में?"
"तनु, मैं तीन-चार दिनों के लिए एक सेमिनार में सम्मिलित होने के लिए लंदन जा रही हूं। वापस आकर इस विषय पर आराम से बैठकर सोचेंगे। परेश कल ग्लासगो जा रहे हैं। एक-दो दिन में लौट आएंगे घबराना मत। कोई प्रॉब्लम हो तो बाजूवाली मिसेज़ हैमिल्टन के पास चली जाना। किचन में खाने-पीने की खरीदारी तो हमने कल ही कर ली थी। बस मैं गई और आई", दीदी का इस तरह प्यार और मनुहार से यह सब कहना तनु को भीतर तक छू गया।
लंदन की अपनी एक अलग रौनक है। तेज़ी से भागता-दौड़ता यह शहर कभी सोता ही नहीं है। बहुत कुछ देखने को है लंदन में। कोई भी, कैसी भी, आपकी रुचि हो; लंदन में सब मौजूद है। सैम्यूल जॉनसन के शब्दों में कितनी सच्चाई है कि यदि कोई मनुष्य लंदन से थक गया है तो वह जीवन से थक गया है। लंदन में वह सब-कुछ मयस्सर है जो जीवन को चाहिए। दो ही दिनों में सेमिनार ख़त्म हो गया। तीसरा दिन सभी विद्यार्थियों के लिए वैकल्पिक था। लंदन घूमो, शॉपिंग करो, दर्शनीय स्थल देखो या जो भी आप करना चाहें। नेहा ने सोचा, क्यों न तनु को लेकर यहां आए अगले सप्ताह। तनु नहीं आई तो कैसे देख पाएगी वह लंदन। परेश की गाड़ी में तीनों मिलकर पिकनिक करते हुए आएंगे। ख़ूब मज़ा आएगा। तनु के जाने का आखिरी सप्ताह ज़ोर-शोर से मनाया जाए। नेहा वापस लौट गई।
लंदन के मुकाबले में, एडिनबरा में अभी भी काफ़ी ठंड थी, पर सुबह हलकी-हलकी धूप में पास वाली झील चांदी की चादर-सी चमक रही थी। धीरे से नेहा ने दरवाज़ा खोला कि तनु डिस्टर्ब न हो। हालांकि बचपन से ही तनु कुंभकरण की नींद सोती थी। फिर भी, सीधे किचन में जाकर एक कप काफ़ी बनाई और कपड़े बदलने बेडरूम में गई।
लेकिन यह क्या देख रही थी नेहा! उसको लगा, उसके पांव जड़ हो गए हों और उसके पांव के नीचे की ज़मीन तेज़ी से सरकती जा रही है, जैसे एक-एक बूंद करके उसका सारा ख़ून उसके जिस्म से निचोड़ लिया गया हो, जैसे उसका एक हिस्सा मर गया हो, निर्जीव हो गया हो।
तनु और परेश एक-दूसरे से लिपटे गहरी नींद सो रहे थे। तनु की लंबी काली अलकें परेश के कंधे पर बेतरतीबी से बिखरी हुई थीं। निश्छल कामदूत की-सी आभा लिए परेश के चेहरे पर गहरी संतुष्टि की झलक थी। एक-दो घुंघराले बालों की लटें उसके माथे पर चिपकी हुई थीं। उसकी बलिष्ठ बांहों में सिमटी थी तनु की इकहरी छरहरी काया... कितने प्यारे और मासूम लग रहे थे दोनों!
एकदम सन्न, निश्चेष्ट खड़ी रही नेहा। नेहा के हाथ से कॉफ़ी का मग गिरते-गिरते बचा। जड़ हुई चेतना जब वापस लौटी तो उसका जी चाहा कि तनु को बिस्तर से घसीटकर, दो-चार थप्पड़ मारकर घर से बाहर निकाल दे। पर केवल तनु को ही क्यों? परेश को क्यों नहीं? आखिर दोनों की ही स्वीकृति-सम्मति से ही तो यह सब-कुछ हुआ होगा? वासना की इस चरम सीमा तक पहुंचने के लिए तो दोनों की सांसें व जिस्म बेक़रार रहे होंगे? इस स्थिति के लिए वह दोनों साझे दोषी हैं। फिर, अकेली तनु ही क्यों सज़ा की पात्र बने?
तनु तुम्हारी बहन है नेहा, तुम्हारे प्रति उससे इतनी लापरवाही कैसे हो गई! विश्वासघात किया है उसने तुमसे। मूक प्यार, मौन स्वीकृति, अनबोला समझौता, तो मेरे और परेश के भी बीच था। सिर्फ़ स्थायी निर्णय लेने के लिए प्रतीक्षा के कुछ क्षण ही तो शेष थे। फिर परेश ने क्या कोई बेईमानी नहीं की? नेहा को लगा उसके अंतर से एक साथ निकली कई आवाज़ें उसे पागल बना रही हैं। फ़ैसला नहीं कर पा रही थी नेहा, क्या करे? क्या कहे? जाने के लिए मुड़ी ही थी कि तनु हड़बड़ाकर उठ बैठी। सामने दीदी को देखकर भयभीत मृग की तरह उसने एक बार फिर आंख बंद करने की कोशिश की, पर नग्न सच्चाई की उस स्थिति को कैसे नकारती?
"दीदी प्लीज़ सुनो-देखो, अचानक यह सब... मैं तुम्हें सब-कुछ बताती हूं... रुको...", शब्दों का तारतम्य बांधे नहीं बंध रहा था तनु से। तब तक परेश की भी नींद खुल गई। नेहा उसके होंठों के कंपन से, बस यही अंदाज़ा लगा पाई नेहा कि वह कुछ कहने को शब्द ढूंढ रहा था।
हृदय में उठते बवंडर पर काबू पाती हुई अस्थिर-सी इतना ही कह सकी नेहा, "कपड़े तो पहन लो तनु", और कमरे से बाहर हो गई।
क्यों किया यह सब तनु तुमने! बचपन से लेकर आज तक मैंने तुम्हारी सारी ख्वाहिशें पूरी की थी। शाम को ट्यूशनें पढ़ाकर तुम्हारे कॉलेज की फ़ीस दी। अच्छी-से-अच्छी और बेहतरीन... तमाम तुम्हारी मनपसंद चीज़ें जुटाई जो मम्मी-पापा अफोर्ड नहीं कर सकते थे। तुम्हें क्या सचमुच कुछ भी याद नहीं रहा? मैंने तुम्हें समझने में कहां भूल कर दी? तुम्हारी आकृति के कौन से बिंदु को मैं नहीं पहचान पाई? तुम्हें परेश चाहिए था न, तुम मांगकर देखती, एक बार वह भी उपहार के रूप में दे डालती मैं तुम्हें तनु! पर यह चोरी क्यों की तुमने? नेहा अपने आप से जैसे सब कह रही हो।
दो दिन तक नेहा होटल में रही। सबसे कटकर अकेली... अपने आप के साथ बस। अब यहां था ही कौन उसका अपना? जिन्हें अपना समझने की भूल की थी उन्हीं अपनों ने ही तो उसे एक संकरी टेढ़ी गली में फ़ेंक दिया था। अब उसे अपनी मंजिल के लिए दोबारा से सोचना है और ज़िंदगी को एक नई दिशा देनी है।
तीसरे दिन वह लौटी तो तनु घर में नहीं थी। सूरजमुखी के फूलों वाली चादर, जिस पर तनु और परेश उस रात सोए थे, उसने उठाकर कूड़े में फेंक दी। जैसे उस रात के सारे निशान मिटाने की असफल कोशिश कर रही हो। तकिए के नीचे एक पत्र था छोटा-सा -
दीदी! तुम्हारी अपराधिनी हूं। तुम नाराज़ होती, गुस्से में आकर चिल्लाती, तो मेरे मन का बोझ कुछ हलका तो हो जाता। लेकिन तुम तो सागर की गंभीरता समेटे, शिव की तरह विष पी गई। क्या मुझे क्षमा कर सकोगी दीदी!
तुम्हारी तनु
उड़ती-उड़ती ख़बर सुनी नेहा ने कि तनु अभी भारत नहीं लौटी। फिर सुना कि परेश और तनु ने शादी कर ली है। आखिरी किरण के बीच कभी-कभी जो रोशनी की लकीर दिख जाती थी, वह भी बुझ गई।
हर रात के साथ उसकी नींद कम होती चली गई। आज की नीरव रात भी ऐसी ही थी। वह हमेशा की तरह करवटें बदल रही थी। आंखें थकान से बोझिल थी, नींद पलकों में बंद होने से इनकार कर रही थी। सुना तो यही था कि जब दिलों-दिमाग़ और जिस्म सब थक जाते हैं तो नींद अपने आप ही आ जाती है, पर नेहा के साथ ऐसा क्यों नहीं होता?
उसे लगा दरवाजे की घंटी बज रही है। नहीं-नहीं, इतनी रात गए कौन घंटी बजाएगा? तेरे अपने ही दिमाग़ की घंटियां बज रही हैं नेहा। सोने की कोशिश कर, नियति से लड़कर कोई जीत पाया है भला? घंटी की आवाज़ अब लगातार सुनाई देने लगी। लाइट जला, स्लीपर और गाउन पहन, दरवाजे की चेन लगा, नेहा ने दरवाज़ा खोला और बोली, "कौन है?"
"दीदी, मैं हूं तनु। दरवाज़ा खोलो प्लीज़। हमारी कार का एक्सीडेंट हो गया है! क्रैश हो गई है गाड़ी। अस्पताल पहुंचते-पहुंचते परेश ने दम तोड़ दिया! दीदी परेश नहीं रहे अब... नहीं रहे। दीदी, मैं अकेली हूं, यहां मेरा कोई नहीं तुम्हारे सिवा...", तनु रोते-रोते फफक पड़ी।
"मेरा जीता-जागता अस्तित्व नकारकर, तुमने अपनी अलग पहचान बना ली, अलग दिशा चुन ली। मुझे पराया कर दिया। मेरी मुस्कराती हुई ज़िंदगी का सुख तुझसे देखा न गया। मुझ जीती-जागती का गला दबाकर तुमने जिंदा लाश में परिवर्तित कर डाला। एक ऐसी ज़िंदगी है अब मेरी जो सांस तो लेती है पर जीती नहीं। रही बात परेश की तो सुनो, वह तो मेरे लिए उसी दिन से नहीं रहा था, जिस दिन से वह मेरी कुंवारी भावनाओं को कुचलकर, तुम्हारी बाहों में तृप्ति ढूंढने लगा था..." और दरवाज़ा बंद कर दिया नेहा ने।
अपने सर्द लहजे पर वह स्वयं ही चौंक गई, नेहा भूल गई कि उसका संबंध उस महान देश से है जिसकी मिट्टी की सुगंध प्यार प्रेम का संदेश देती है। जिसका संदेश लेना या पाना नहीं। जहां चाहत का मतलब बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के चाहना है, और चाहते रहना है। कहां अदृश्य हो गए उसके क्षमाशीलता और सहिष्णुता के संस्कार? विचारों के झंझावत में लिपटी नेहा सोचती रही... क्या वह भी यहां आकर, यहां के लोगों की तरह ठंडी हो गई है? क्या वह हिमानी देश के हिमाच्छादित पर्वत की चोटी का एक अंश हो गई है? क्या असमान्य होती हुई वह अपनी पहचान भूलती जा रही है? क्या बाहर गिरने वाली बर्फ़ बाहर ही नहीं उसके अंतर में भी पर्त-दर-पर्त जमती जा रही है?

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