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साहित्य का कुल-गोत्र
01-Apr-2019 09:10 PM 1141     

आज जब समानता और न्याय आधारित, सबकी स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति, गरिमा और सम्मान की रक्षा करने की गारंटी देने वाले संविधान से संचालित देश को चलाने के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव होने जा रहा है तो अचानक आस्थाओं, गोत्र, जाति और धर्म के परिचय पत्र माँगे जा रहे हैं और लोग प्रतिप्रश्न करने की बजाय प्रमाण-पत्र प्रस्तुत कर रहे हैं तो एक ही झटके में समस्त ज्ञान, विवेक, अध्यात्म, मानवता आदि संदिग्ध प्रतीत होने लग जाते हैं। समस्त शिक्षा पर प्रश्न-चिह्न लग जाते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में हमारे क्षेत्र के एक उम्मीदवार से उसी जाति के प्रत्याशी द्वारा जाति का प्रमाण-पत्र माँगा गया और मज़े की बात यह कि उस उम्मीदवार ने जातिवाद का विरोध करने की बजाय बाकायदा प्रमाण-पत्र लाकर दिखाया। कहाँ हैं गुण, योग्यता, मूल्य और मूल्य आधारित राजनीति?
सभी धर्म कहते हैं कि ईश्वर एक है और सभी मनुष्य उसकी संतानें हैं। सभी धर्म दया और भाईचारे की बात भी करते हैं तो किसी विधर्मी के प्रति इतने निष्करुण कैसे हो जाते हैं? तब लगता है कि ऐसे निष्करुण धर्म एकांगी हैं, अपने आदि विचार-विचारक से बहुत दूर निकल गए हैं तथा मानव कल्याण की बजाय किसी अन्य हेतु को सिद्ध कर रहे हैं। आज भी देखा जाए तो प्रकारांतर से दुनिया में धर्म और नस्ल की लड़ाई जारी है।
ऐसे में एक दूसरे द्वारा पोषित राजनीति और धर्मों से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। तब उम्मीद आकर ठहरती है साहित्य पर। विश्व की सभी भाषाओं और क्षेत्रों में रचित नूतन-पुरातन साहित्य मानव ही नहीं बल्कि समस्त जड़-चेतन, जंगम-स्थावर को अपने माध्यम से अभिव्यक्ति देता है, उसकी सीमाओं में छुपी विराटता को तलाशता है, उसे एक-दूसरे के सुख-दुखों से जोड़ता है, अपने बिम्बों और शैली द्वारा बिना किसी भाषा के संवाद का विधान करता है। जब व्यक्ति की चेतना अपने-पराए, हानि-लाभ से ऊपर उठ जाती है तभी वह सच बोल, लिख, रच और सोच सकती है। हर हालत में हरेक के साथ हो सकती है। कोई नारा नहीं बल्कि वास्तव में सबका साथ ही साहित्य का उद्देश्य है। यदि कोई किसी और विचार या उद्देश्य से इस सृजन और संवाद की दुनिया में आता है तो वह भटकाता ही है। मानवेतर जीवों और प्रकृति में कुछ भी झूठ नहीं है। इसीलिए शाश्वत और सच्चे साहित्य में कहीं कोई विमर्श नहीं है, अमर्ष नहीं है, असत से संघर्ष है, दर्द पर सहलाता स्पर्श है।
नस्ल, धर्म, जाति, कुल, गोत्र की यह क्षुद्रता साहित्य तक भी पहुँच गई है। अब साहित्य सहित के भाव वाला, आपके जीवन में सहभागिता निभाने वाला, एक दूसरे से संवाद करवाने वाला नहीं रहा बल्कि उसके भी नस्ल, जाति, देश, रंग, धर्म, सम्प्रदाय, राजनीतिक पार्टी हो गए हैं। अब उसे इन भेड़ों के आधार पर ही सम्मानित, प्रतिबंधित और बहिष्कृत किया जाने लगा है। यदि आप इस प्रकार के विभाजनों से ऊपर उठाकर किसी भी साहित्य को पढ़ेंगे तो वह कहीं न कहीं आपकी क्षुद्रता को कम करेगा, आपको उदार बनाएगा। यदि कोई साहित्य ऐसा नहीं करता है तो वह साहित्य नहीं है। इसलिए साहित्य का कोई नाम हो सकता है तो वह केवल "साहित्य" ही हो सकता है।
अमरीका में हावर्ड फ़ास्ट के उपन्यास "स्पार्टकस" के प्रकाशित होने में बड़ी अड़चनें आई थीं। कारण- वह अमरीका की गुलामों पर अत्याचार की ओर संकेत करती रचना थी। कुछ लोग जीवन और भारतीय समाज की कटु सच्चाइयों का बखान करने वाली प्रेमचंद की रचनाओं में अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण आध्यात्मिकता ढूँढ़ने लगे हैं। धन के बल पर अपनी पहचान बनाने के लिए सत्तर के दशक में अमरीकी सरकार ने भारत और विश्व के कई देशों के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में अमरीकी साहित्य को शामिल करवाया जबकि अपनी मानवीय प्रतिबद्धता के कारण उससे बहुत पहले ही अनुवाद के माध्यम से "अंकल टॉम्स केबिन" और "स्पार्टकस" जैसी रचनाएं भारत और तीसरी दुनिया के देशों में पहुँच चुकी थीं।
आजकल भारत के हिंदी साहित्य जगत में एक नाम बहुत सुना जा रहा है- प्रवासी साहित्य। मुझे तो आज तक यह विभाजन समझ नहीं आया। किन्हीं कारणों से व्यक्ति की नागरिकता बदल सकती है लेकिन उसका देश और नागरिकता बदल जाने से उसका साहित्य किस प्रकार भिन्न हो सकता है। उषा प्रियंवदा की कहानी "वापसी" भारत में रहते भारतीय समाज की बदलती स्थितियों पर लिखी एक अच्छी रचना है लेकिन उनके अमरीका में बसने से वह कहानी कैसे प्रवासी साहित्य हो गई? और फिर आप इस नए विभाजन के आधार पर किसी रचना को कैसे पहचानेंगे? रामायण, रामचरित मानस, महाभारत आदि पर धार्मिक ग्रन्थ की मोहर लगाकर साहित्य का बहुत बड़ा अहित किया गया है। अब हम उसका मानव मन के परिष्कार के लिए, मानव संवेदना को विराट करने के लिए पूरी तरह से उपयोग नहीं कर सकते। अब उसे पढ़ने से किसी अन्य धर्म के अनुयायी के खिलाफ फरमान ज़ारी हो सकता है, उसका धर्म खतरे में पड़ सकता है।
और फिर प्रवासी शब्द भी अभी तक सही ढंग से व्याख्यायित नहीं हो सका है। प्रवासी वह होता है जो कहीं जाता है और फिर कुछ समय बाद वापिस लौट आता है। कृष्ण मथुरा गए तो ब्रज बालाओं के लिए वे प्रवासी हो गए। "प्रिय-प्रवास"। वैसे वे कभी लौटकर नहीं आए। इसलिए उन्हें विदेशी कहना ही अधिक ठीक है। वैसे ही वे भारतीय जो किसी अन्य देश में जाकर बस गए हैं वे प्रवासी नहीं बल्कि किसी अन्य देश के नागरिक हो गए हैं।
नोट बंदी के दौरान इन दोनों शब्दों का फर्क समझ में आ गया होगा। ये दो शब्द थे ओसीआई और एनआरआई। एनआरआई वे जिनके पास भारतीय पासपोर्ट है, जिनको उस देश की सरकार ने कुछ शर्तों के आधार पर वहाँ रहने की इजाज़त दी है। उनका उस देश में रहना उस देश की सरकार की कृपा पर निर्भर है। वे वहाँ पर अपना अधिकार नहीं जता सकते। एनआरआई अपने सभी भारतीय नोट एक निश्चित अवधि तक प्रमाण देकर यहाँ के बैंकों के माध्यम से बदलवा सकते थे। ओसीआई (किसी अन्य देश की नागरिकता ले चुके) अधिक से अधिक पांच हजार रुपए के नोट तक बदलवा सकते थे क्योंकि किसी विदेशी द्वारा इससे अधिक भारतीय मुद्रा रखना गैरकानूनी है। इस स्पष्टीकरण से किसी देश की नागरिकता के चुके व्यक्ति प्रवासी नहीं हैं बल्कि उस देश के नागरिक हैं। इस पहचान के आधार पर उस देश की सरकार ऐसे लोगों को "आप्रवासी" (इमिग्रेंट्स) कह सकती है। इसी आधार पर अमरीका को इमिग्रेंट्स का देश कहा जाता है। जिनको यहाँ प्रवासी के नाम से प्रचारित और पुरस्कृत किया जाता है वे भारतीय नहीं बल्कि अमरीकी नागरिक हैं जिन्हें अधिक से अधिक भारत मूल का कहा जा सकता है। और वहाँ जन्म लेने वाले उनके बच्चे तो कानूनन अमरीका मूल के ही हैं जैसे योरप से जाकर बसे फ़्रांस, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी आदि देशों से जाकर बसे अन्य आप्रवासी।
साहित्य का साहित्य के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए। यदि वह मनुष्य और उसके समस्त जीवन, परिवेश, मूल्यों और आशाओं-आकाक्षाओं, सुख-दुःख के साथ खड़ा है तो वह साहित्य है।
प्रवासी साहित्य और उसके नाम पर चल रही धुंध के बारे में भी बात करेंगे।
अभी अपने दो अनुभव साझा करना चाहता हूँ जिनसे साहित्य की भूमिका को कुछ समझा जा सकता है। बचपन में गरमियों की छुट्टियों में ननिहाल जाते थे हरियाणा में। तब वहाँ खारा पानी हुआ करता था। बांगड़। खेती न के बराबर। तेज़ धूप, बाहर निकलने की मनाही, लम्बी दोपहरियाँ। नानाजी अपने पास बैठा लेते। वे रामचरितमानस पढ़ते और गमछे से आँसू पोंछते जाते, विशेष रूप से राम वन गमन, भरत मिलाप, लक्ष्मण शक्ति-प्रसंग आदि को पढ़ते हुए। राम उनकी जाति के नहीं थे। परिवार जन तो कतई नहीं। वे ही क्या, इतना तो हम भी जानते थे कि दशरथ को मरना ही है, लक्ष्मण जीवित होकर रहेंगे, राम को वन में कोई खतरा नहीं, भरत उनके आने पर गद्दी उन्हें सौंप देंगे। फिर काहे का रोना। हम कहते नानाजी यदि इसे पढ़कर आपको रोना आता है तो फिर आप इसे पढ़ते ही क्यों हैं? तब हमें पता नहीं था इस रोने का अर्थ।
और अब उसके सत्तर साल बाद कवि सम्मेलनों के माध्यम से जो साहित्य(!) विदेशों में पहुँच रहा है उसके और उसके अध्येताओं के बारे में एक अनुभव। वैसे तो कवि सम्मेलन करने और करवाने वालों के लिए धंधा है और धंधे में लागत कम और मुनाफा अधिक का सिद्धांत सर्वोपरि है फिर चाहे अमरीका के उद्योगपति द्वारा अपने अधिक मुनाफे के लिए अमरीका के मजदूरों की रोजी ख़त्म करके सस्ती मजदूरी के चक्कर चीन में अपना सामान बनवाना या भारत में नकली दूध या मावे का उत्पादन। टिकट वाले कवि सम्मलेन में चुटकुले और सस्ते हास्य की कविताएँ ही अधिक चलती हैं या फिर देश के किसी काल्पनिक या स्थायी शत्रु को गाली निकालने वाली तथाकथित वीर रस की कविताएँ। सुनाने वाले शायद इससे बेहतर लिख नहीं सकते और श्रोता इससे बेहतर समझ नहीं सकते। संयोग से एक कवि ने कुछ करुण रस की सी कविता सुनाई तो कई श्रोता बिखर गए। बोले- हम यहाँ मज़े के लिए आए हैं, कोई रोने-धोने के लिए नहीं। हमारे टिकट के पैसे वापिस दो।
हो गया साहित्य और संवेदना का हिसाब-किताब!

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