ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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म्हारा उरलगिया घर आया जी
म्हारा उरलगिया घर आया जी

कौन किस गर्भ से जन्म लेगा, नहीं जानता। बस जन्म होता रहता है। जन्म लेते ही सम्बन्ध भी जुड़ जाते हैं। कोई पुत्र हो जाता है, कोई माता और कोई पिता। यह तीनों सम्बन्ध फिर और भी कई सम्बन्धियों से जोड़ देते ...

01-Jul-2018 05:21 AM 115
सबके हित का काम
सबके हित का काम

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
करतब (कर्तव्य) बायस (वायस) कौआ। अंग्रेज़ी बायस का अर्थ पक्षपात, (पूर्वग्रह) का और वेष मराल (हंस) का। यही कौवा कागभुसुंडि है, जो रामकथा का श्रोता होन ...

01-Jul-2018 05:13 AM 116
कला और जीवन
कला और जीवन

हम दिनचर्या का बड़ा हिस्सा जिस कार्य को देते हैं उसी को जीवन मान लेते हैं। इन कार्यों में प्रत्यक्ष संलग्नता और उसके बाद भी उसे ढोते रहते हैं। संस्थाओं में बंधी दिनचर्या व्यक्ति को संस्था का बना देत ...

01-Jul-2018 05:06 AM 110
माधव हम परिणाम निरासा
माधव हम परिणाम निरासा

इस सदी में तमाम तरह के स्वप्न देखती दुनिया में मिथिला के कवि विद्यापति की याद आ रही है। देखो तो माधव के प्रेम में पगी राधा की देह में कैसी प्रलय मची हुई है। लगभग उत्सव में डूबी यह आधुनिक दुनिया कैस ...

01-Jun-2018 12:55 AM 222
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी

ईश्वर का धाम शरीर ही है, जो सबको मिलता है। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द होकर वह सकल संसार में व्यापा है। शरीरों में हृदय ही उसका भवन है। प्रभु के घर में काम, क्रोध और लोभ घुस आये हैं। महाकव ...

01-May-2018 06:19 PM 368
अव्दैत का विस्तार और संसार
अव्दैत का विस्तार और संसार

कभी विकल होकर कहने का मन होता है कि अव्दैत की धारणा कुछ विरले ज्ञानियों की जिद है और संसार को देखकर लगता है कि वह व्दैत में ही जीने की जिद बांधे हुए है।
कोई उत्प्रेरक जरूर है जिसके कारण इतना ब ...

01-Apr-2018 03:27 AM 465
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब ...

01-Apr-2016 12:00 AM 1327
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब ...

01-Apr-2016 12:00 AM 1327
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