ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चिन्तन Next
मगर देखो, कहाँ पहुँचे

यदि किसी कवि की एक पंक्ति भी लोक में इतना गहरे तक पैठ जाए कि वह अपनी बात कहने के लिए उसका सहारा ले तो समझिए रचनाकार सफल है, उसका जीवन सार्थक हो गया। लेकिन यह सौभाग्य सबको नहीं क्योंकि सब में इतनी क

जन्मजात साक्षर विश्व की कविता

कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनकी कविताएँ अलग-अलग समयों में अपने अर्थ खोलती हैं। महाकवि तुलसीदास ऐसे ही कवि हैं जो जीवन भर हमारे साथ चलते हैं।
अपने स्वभाव और प्रकृति से प्राप्त कर्मों पर आधारित हमने

म्हारा उरलगिया घर आया जी

कौन किस गर्भ से जन्म लेगा, नहीं जानता। बस जन्म होता रहता है। जन्म लेते ही सम्बन्ध भी जुड़ जाते हैं। कोई पुत्र हो जाता है, कोई माता और कोई पिता। यह तीनों सम्बन्ध फिर और भी कई सम्बन्धियों से जोड़ देते

सबके हित का काम

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
करतब (कर्तव्य) बायस (वायस) कौआ। अंग्रेज़ी बायस का अर्थ पक्षपात, (पूर्वग्रह) का और वेष मराल (हंस) का। यही कौवा कागभुसुंडि है, जो रामकथा का श्रोता होन

कला और जीवन

हम दिनचर्या का बड़ा हिस्सा जिस कार्य को देते हैं उसी को जीवन मान लेते हैं। इन कार्यों में प्रत्यक्ष संलग्नता और उसके बाद भी उसे ढोते रहते हैं। संस्थाओं में बंधी दिनचर्या व्यक्ति को संस्था का बना देत

माधव हम परिणाम निरासा

इस सदी में तमाम तरह के स्वप्न देखती दुनिया में मिथिला के कवि विद्यापति की याद आ रही है। देखो तो माधव के प्रेम में पगी राधा की देह में कैसी प्रलय मची हुई है। लगभग उत्सव में डूबी यह आधुनिक दुनिया कैस

मैं केहि कहौं बिपति अति भारी

ईश्वर का धाम शरीर ही है, जो सबको मिलता है। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द होकर वह सकल संसार में व्यापा है। शरीरों में हृदय ही उसका भवन है। प्रभु के घर में काम, क्रोध और लोभ घुस आये हैं। महाकव

अव्दैत का विस्तार और संसार

कभी विकल होकर कहने का मन होता है कि अव्दैत की धारणा कुछ विरले ज्ञानियों की जिद है और संसार को देखकर लगता है कि वह व्दैत में ही जीने की जिद बांधे हुए है।
कोई उत्प्रेरक जरूर है जिसके कारण इतना ब

प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब

प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^