ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चिन्तन Next
मगर देखो, कहाँ पहुँचे

यदि किसी कवि की एक पंक्ति भी लोक में इतना गहरे तक पैठ जाए कि वह अपनी बात कहने के लिए उसका सहारा ले तो समझिए रचनाकार सफल है, उसका जीवन सार्थक हो गया। लेकिन यह सौभाग्य सबको नहीं क्योंकि सब में इतनी क ...

01-Aug-2018 12:57 AM 236
जन्मजात साक्षर विश्व की कविता

कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनकी कविताएँ अलग-अलग समयों में अपने अर्थ खोलती हैं। महाकवि तुलसीदास ऐसे ही कवि हैं जो जीवन भर हमारे साथ चलते हैं।
अपने स्वभाव और प्रकृति से प्राप्त कर्मों पर आधारित हमने ...

01-Aug-2018 12:49 AM 226
म्हारा उरलगिया घर आया जी

कौन किस गर्भ से जन्म लेगा, नहीं जानता। बस जन्म होता रहता है। जन्म लेते ही सम्बन्ध भी जुड़ जाते हैं। कोई पुत्र हो जाता है, कोई माता और कोई पिता। यह तीनों सम्बन्ध फिर और भी कई सम्बन्धियों से जोड़ देते ...

01-Jul-2018 05:21 AM 348
सबके हित का काम

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
करतब (कर्तव्य) बायस (वायस) कौआ। अंग्रेज़ी बायस का अर्थ पक्षपात, (पूर्वग्रह) का और वेष मराल (हंस) का। यही कौवा कागभुसुंडि है, जो रामकथा का श्रोता होन ...

01-Jul-2018 05:13 AM 324
कला और जीवन

हम दिनचर्या का बड़ा हिस्सा जिस कार्य को देते हैं उसी को जीवन मान लेते हैं। इन कार्यों में प्रत्यक्ष संलग्नता और उसके बाद भी उसे ढोते रहते हैं। संस्थाओं में बंधी दिनचर्या व्यक्ति को संस्था का बना देत ...

01-Jul-2018 05:06 AM 336
माधव हम परिणाम निरासा

इस सदी में तमाम तरह के स्वप्न देखती दुनिया में मिथिला के कवि विद्यापति की याद आ रही है। देखो तो माधव के प्रेम में पगी राधा की देह में कैसी प्रलय मची हुई है। लगभग उत्सव में डूबी यह आधुनिक दुनिया कैस ...

01-Jun-2018 12:55 AM 423
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी

ईश्वर का धाम शरीर ही है, जो सबको मिलता है। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द होकर वह सकल संसार में व्यापा है। शरीरों में हृदय ही उसका भवन है। प्रभु के घर में काम, क्रोध और लोभ घुस आये हैं। महाकव ...

01-May-2018 06:19 PM 584
अव्दैत का विस्तार और संसार

कभी विकल होकर कहने का मन होता है कि अव्दैत की धारणा कुछ विरले ज्ञानियों की जिद है और संसार को देखकर लगता है कि वह व्दैत में ही जीने की जिद बांधे हुए है।
कोई उत्प्रेरक जरूर है जिसके कारण इतना ब ...

01-Apr-2018 03:27 AM 677
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब ...

01-Apr-2016 12:00 AM 1556
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब ...

01-Apr-2016 12:00 AM 1556
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