ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चिन्ता
01-Jan-2017 01:17 AM 3179     

कहते हैं लोग
कोई साथ नहीं निभाता
चिन्ता से पूछो
कैसे नाता निभाया जाता
चिन्ता तो परछाई है
कब अलग किसी से रह पाई
विरला ही होगा
जिसे इसने नहीं घेरा
सब को एक निगाह से देखे
ना कोई तेरा-मेरा
देश बदलो चाहे प्रान्त
चहल-पहल हो या एकान्त
कितना भी दामान छुड़ाओ
कब रहने दे यह शान्त
सदा प्रतीक्षा में खड़ी    
पंथ निहारे
बिना हथियार बड़ी चोट मारे
रंग ना आकार
ना इससे किसी को प्यार
बरबस चिपटी रहें
ज्यों फूलों संग ख़ार
इससे ही जान छुड़ाने को
किये सात समन्दर पार
बिना टिकट वीज़ा बिना
आ पहुँची मेरे द्वार
मुझे ख़ुश देख भृकुटी को तान
आ बोली मेरे कान--
अजी हमसे बचकर कहाँ जाइएगा
जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा
देख कर उसको यहाँ यूँ
मैं तो रह गई दंग
इक आए इक जाए  
मेरे चेहरे का रंग
करीं मिन्नतें हाथ पैर जोड़ा
वह तो आदत से मज़बूर
उसने कब पीछा छोड़ा
मुस्कुरा कर बोली--
कभी तेरा दामन न छोड़ेंगे हम
कसम चाहे ले लो ख़ुदा की कसम
चिन्ता को छोड़ दो
जो तुझको उपदेश सुनाते हैं
अरे--दिन-राती
लुक-छिप कर वह भी  
मुझको ही ध्याते हैं।

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