ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चिड़ियाँ
01-Aug-2017 11:45 PM 1846     

पौ फटते मुंडेर पर बैठीं चहक जगातीं नींद से चिड़ियाँ
भोली भाली छल कपट से दूर मासूम मतवाली चिड़ियाँ
कहाँ उड़ गईं कौन से देस पधारीं सुंदर चितचोर चिड़ियाँ
सूना सूना घर का आँगन बिना चहकती नन्ही चिड़ियाँ।

चिड़ी चोंच भर ले गई अब कैसे लिखे कबीर
दादी हँस कर कैसे बोले नदी न घटियो नीर
आते जाते मिल जाएँ कहीं तो कहना मेरी सखियाँ
लौट आओ अब न तरसाओ मेरी प्यारी चिड़ियाँ।

तेरे नाम की रोटी आज भी माँ पकाती है
आँसू भर कर आँख में तेरी वाट निहारती है
स्नान करके कुँए से जब कौवा घर को आता है
तुम्हें न पा कर बेचारा हाल बेहाल हो जाता है।

चिड़ियों के अभाव ने इक दिन ऐसा मुझे रुलाया
बचपन की हर याद को मैं ने सामने खड़ा था पाया
तुम से सीखा मिलजुल कर सब सखियों संग टहकना
जो कुछ करना लगन से करना हंसना और महकना।

दाना खाती उड़ उड़ जाती चँचल फुर्तीली चिड़ियाँ
वरके पर बस छपी हुई इक मूरत सी हो गई हैं चिड़ियाँ
एक था काँ एक थी चिड़ी कहानी सुनते न थकते थे
अब बच्चे पूछते हैं मां यह क्या होती है चिड़ियाँ?

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