ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ पेटवा के खातिर
01-Nov-2016 12:00 AM 3676     

भारत की हुनरमंद जातियां अपनी कारीगरी और कला कौशल के लिये पूरे संसार में पहचानी गयी हैं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक यही जातियां भारत को समृद्ध बनाने में सदियों से अपना योगदान दे रही थीं। वे लोहा गला सकती थीं, संसार का सबसे बारीक कपड़ा बुन सकती थीं, सागर में डूबा साधकर मोती निकाल सकती थीं। खानों और नदियों की रेत को छानकर सोना खोज सकती थीं। भारत की हुनरमंदगी की चर्चा योरुप तक फैली हुई थी। जब ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों ने भारत में अपने कुटिल पैर बढ़ाये तब एक गहरी व्यापारिक साजिश के तहत उन्होंने इन हुनरमंद जातियों को नगरों से खदेड़ कर गांवों में छोटी-मोटी खेती किसानी करने के लिये मजबूर किया और अपने उद्योगों का जाल फैलाया।
भारत के आसपास के द्वीपों और छोटे देशों पर भी इंग्लैड का औपनिवेशिक कब्जा रहा है। जहां गन्ना और धान आदि की खेती करवाने के लिये तथाकथित अंग्रेज बहादुर भारत के इन्हीं कुशल कारीगरों को अत्यंत दारुण स्थिति में मजदूर बनाकर इन जगहों पर ले गये। ये जगहें आज भी मॉरीशस, त्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका, गयाना, सूरीनाम और फीजी के रूप में इस धरती पर बसी हुई हैं। भारत के कारीगर अपनी गिरती हालत को सम्हालने के लिये अंग्रेजों के शर्तनामे कबूल करने के लिये मजबूर किये गये। और इनने अपनी भाषा में एग्रीमेंट को गिरमिटिया शब्द में बदल लिया। लम्बे समय के बाद ये गिरमिटिया ही कहलाने लगे। ये कर्मकुशल लोग अपने साथ अपने दुख की पोटलियों में अपने-अपने गांवों के किस्से-कहानियां, लोकगीत, भगवद्गीता और रामचरित मानस भी ले गये। ये गये तो इनके साथ इनके तीज-त्यौहार और लोकरंगी उत्सव भी गये। इनके साथ भोजपुरी, अवधी, मागधी, मैथिली जैसी बोलियां भी गयीं। इन्होंने हिंदुस्तान की संस्कृति की स्मृतियां हमेशा अपने मन में बसाये रखीं। ज्यादातर ये कर्मकुशल लोग उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे इलाकों से ही गये थे। बाद में कुछ पंजाब आदि से भी गये।
पानी के जहाजों में कई महीनों की कठिन यात्राओं के बाद ये इन द्वीपों और जगहों पर पहुंचे जहां इन्हें अपने खेतों के बीच ही छोटी-छोटी झोपड़ियां बनाकर पूरे साल गर्मी, सर्दी और बरसात का सामना करना पड़ा। उनकी कोठरी आठ फुट से ज्यादा की नहीं होती थी। वे उसी में रहते, वहीं पकाते और वहीं उनके औजार रखे रहते। उनके इस जीवन के ऐसे कई गीत आज भी सुनने को मिलते हैं। पर उनके मानस में हमेशा गंगा मैय्या के आंचल की याद सदा बसी रही और भारत की माटी की सौंधी गंध को ये माटी से जुड़े लोग कैसे भूल सकते थे। जब बहुत समय बाद इन द्वीपों और देशों को उपनिवेशवादियों से मुक्ति मिलना शुरू हुई तब तक ये भारत के लोग उन जगहों में अपने पैर जमा चुके थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी हुनरमंदगी और कर्म कुशलता से इन द्वीपों में छोटे-छोटे व्यापार और रोजी कमाने के तरीके विकसित किये। अपनी सहकारी समितियां बनाईं। वहां के लोगों से अपनी संस्कृति का मेल बिठाया। और एक लम्बी जीवन यात्रा के बाद ये भारतीय इन देशों की समृद्धि में सहायक साबित हो रहे हैं। ये कहने को तो प्रवासी हैं लेकिन इनकी यादों के पंछी बार-बार हिंदुस्तान के आकाश में उड़ते ही रहते हैं। इन लोगों ने वहां की बोली-बानी को जरूर अपनाया लेकिन ये कभी अपनी बोली-बानी और अपनी आस्था को नहीं भुला पाये। वहां की नदियां अब इनकी गंगा बन गई हैं और वहां इन्होंने अनेक भारतीय देवी-देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा की है। मंदिर बनाये हैं, जहां आज भी भारतीय भाषा, भूषा, भजन और भोजन का स्वाद एक साथ लिया जा सकता है। ये सारे इलाके अपने अंतर में छोटे-छोटे भारत को बसाये हुए हैं। यहां हिंदी भी खूब बोली जाती है इसीलिये इन्हें हम हिंदी भाषा के द्वीप भी कह सकते हैं।
यह एक संयोग ही है कि गिरमिटियों का जो आखिरी जहाज 1916 ईस्वी में सूरीनाम ले जाया गया था उसके बाद फिर कोई नहीं गया और यह अंक ठीक सौ वर्ष बाद 2016 में जारी करते हुए हम उस जहाज को गुलामी के अंत के रूप में आज याद तो कर ही सकते हैं क्योंकि 1917 में महात्मा गांधी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नायक बन चुके थे और उनकी आवाज से अंग्रेजी बहादुर कांपने लगे थे। यह तथ्य भी यहां स्मरणीय है कि गांधी जी को भी अपने अफ्रीका प्रवास के कारण कभी-कभी गिरमिटिया कहकर पुकारा जाता है, जहाँ वे अपने कुछ अफ्रीकी भाईयों को अंग्रेजों के अत्याचार से एक वकील के रूप में बचाने गये थे। गांधी जी 1901 में करीब तीन हफ्ते मॉरीशस में भी रुके और उन्होंने मॉरीशस के हिंदुस्तानियों से सिर्फ यही कहा कि अपने बच्चों को ऊंची शिक्षा दो, यही तुम्हारा उद्धार करेगी।
हमने यह अंक इन्हीं भारतवंशियों की सर्जना, वाणी और संस्कृति की स्मृतियों में पिरोने का एक छोटा-सा प्रयत्न किया है। जिसमें भारत के और इन द्वीपों के भारतवंशियों ने अपनी लेखनी से इसे समृद्ध और पठनीय बनाने में हमारी रचनात्मक सहायता की है। हम उनके प्रति हार्दिक रूप से कृतज्ञ हैं। यह अंक लखनऊ लिटरेचर फेस्ट 2016 के अवसर पर लोकार्पित करते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता हो रही है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^